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बुधवार, 01 जनवरी, 2003 को 01:01 GMT तक के समाचार निवेशक नुक़सान उठाते रहे
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विश्लेषकों को 2003 से बहुत उम्मीदें हैं
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विश्व के प्रमुख शेयर बाज़ार लगातार तीसरे वर्ष भी मंदी के साथ बंद हुए. और इसी के साथ अब यह भी साबित हो चला है कि ये अब तक की सबसे लंबी मंदी है.
मंदी के कारणों पर अगर जाएँ तो प्रमुख रहे - इराक़ पर हमले का ख़तरा, कंपनियों के बड़े-बड़े घोटाले और लोगो की निराशा.
और अब जब कि सुधार के कोई भी लक्षण नज़र नही आ रहे तो कुछ विश्लेषक इसकी तुलना 1929 की मंदी से भी कर रहे हैं.
विश्व के शेयर बाज़ारों की दिशा तय करने वाला डॉव जोंस सूचकांक 17 प्रतिशत नीचे बंद हुआ जबकि लंदन का शेयर बाज़ार 24 प्रतिशत नीचे रहा. भारत के मुम्बई शेयर बाज़ार के लिए भी यह साल उतार-चढ़ाव से भरा रहा.
जर्मनी के शेयर बाज़ार के लिए शायद यह सबसे बुरा साल रहा. संवेदनशील सूचकांक डेक्स 44 प्रतिशत नीचे रहा.
जापान का निक्की सूचकांक 19 प्रतिशत नीचे रहा. बीता साल 1982 के बाद अब तक का सबसे बुरा साल रहा.
उम्मीदें
लेकिन विश्लेषकों को 2003 से बहुत उम्मीदें हैं. उनके अनुसार अब बाज़ार अपने न्यूनतम स्तर पर है.
विकासशील देशों के शेयर बाज़ारों से बहुत उम्मीदें लगाईं जा रही हैं.
पाकिस्तान के प्रमुख शेयर बाज़ार में 100 प्रतिशत की बढ़त देखी गई. श्रीलंका और थाईलैंड में भी बाज़ार का प्रदर्शन अच्छा रहा है.
ख़ास बात तो यह है कि संकट से जूझ रहे अर्जेंटीना में भी बाज़ार 62 प्रतिशत चढ़ा. |
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