« पिछला | मुख्य पोस्ट | अगला »

पत्रकारिता की दुविधाएं

शालू यादव शालू यादव | मंगलवार, 29 जनवरी 2013, 17:20 IST

जब मेरे संपादक ने मुझसे पूछा कि क्या मैं बदायूँ जाकर दिल्ली गैंगरेप के नाबालिग अभियुक्त के परिवार से मिलना चाहूंगी, तो मेरे मन में कई सवाल उठे.
मेरे अंदर के पत्रकार ने मुझसे कहा कि ये दौरा काफ़ी रोमाँचक होगा, लेकिन मेरे अंदर की महिला ने कहा कि मैं कतई उस इंसान के घर नहीं जाना चाहती, जिसने एक लड़की के साथ बर्बर दरिंदे की तरह बलात्कार किया और फिर उसके शरीर पर कई आघात किए.
मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूं और चाहे कोई कुछ भी कहे, मुझे इस बात पर फख़्र है कि दिल्ली वो शहर है जिसने देश के हर तबके को पनाह दी है.
मुझे कभी अपने शहर में असुरक्षित महसूस नहीं हुआ और अगर हुआ भी है तो मैंने उसका हमेशा डटकर उसका सामना भी किया.
ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं दिल्ली में ही होती हैं. मुझे लंदन जैसे शहर में भी छेड़-छाड़ का सामना करना पड़ा.
फिर भी लंदन में मुझे उन टिप्पणियों से शर्मिंदा होना पड़ा जिनमें दिल्ली को 'बलात्कार की राजधानी' कहा जा रहा था.
जो 16 दिसंबर की रात उस लड़की के साथ हुआ, उसने हर देशवासी की तरह मेरी भी अंतरात्मा को झिंझोड़ कर रख दिया था.
उन छह लोगों के प्रति मेरे मन में बहुत गुस्सा था और मैंने भी सभी देशवासियों की तरह यही दुआ की कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा हो.
ये तो रही उस आम लड़की की भावनाओं की बात, जो हर बलात्कारी को बेहद गुस्से से देखती है.
लेकिन जहां तक पत्रकारिता की बात है, तो मैं इस बात से दुविधा में पड़ गई थी कि जिस लड़के के प्रति मेरे अंदर इतनी कड़ुवी भावना है, उसके परिवार से जुड़ी ऐसी कहानी मैं कैसे कर पाउंगी जो संपादकीय तौर पर संतुलित हो.
मुझे लगा कि भले ही पुलिस ने इस नाबालिग को सबसे ज़्यादा बर्बर बताया हो, लेकिन मुझे अपने भीतर का पक्षपात निकाल कर उसके परिवार से बातचीत करनी चाहिए.
लेकिन जब उस नाबालिग अभियुक्त के गांव पहुंची और उसके परिवार से मिली, तो मन की दुविधा और बढ़ गई.
उनकी दयनीय हालत देख कर मेरे अंदर का गुस्सा खुद-ब-खुद काफूर हो गया.
नाबालिग अभियुक्त की मां बेसुध हालत में बिस्तर पर पड़ी थी. जब मैंने उनसे पूछा कि अपने बेटे के बारे में सुन कर कैसा लगता है, तो बोली कि 'मैं तो मां हूं...क्या एक मां अपने बच्चे को ये सिखा कर बाहर भेजती है कि तू गलत काम कर? हमारी इन सब में क्या गलती है? हमें मिली तो बस बदनामी.'
उनकी ये बात सुन कर मेरे मन में गुस्से के साथ-साथ पक्षपात की भावना भी खत्म हो गई.
मैं ये नहीं कहूंगी कि उस परिवार की गरीबी देख कर ही मेरा मन बदला. मेरा मन तो बदला उस सच्चाई के बारे में सोच कर जो लाखों भारतीय गरीब बच्चों की कहानी है.
रोज़गार की तलाश में अकेले ही वे शहर चले जाते हैं और अपनी ज़िंदगी के सबसे महत्त्वपूर्ण साल अकेले रहकर ज़िंदगी की कठिनाइयों का सामना करने में गुज़ारते हैं.
इस नाबालिग लड़के की भी यही कहानी थी. मां-बाप से दूर, बिना किसी भावनात्मक सहारे के उसने दिल्ली शहर में अपने तरीके से संघर्ष किया.
मैं उस अभियुक्त के घर में बैठ कर ये सब सोच ही रही थी कि मां दूसरे कोने से बोली कि मेरे बेटे ने ज़रूर बुरी संगत में आकर ऐसा काम किया होगा...
खैर उसकी हैवानियत के पीछे वजह जो भी हो, मेरे अंदर की महिला उसे कभी माफ नहीं कर सकती.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:02 IST, 31 जनवरी 2013 himmat singh bhati:

    शालू जी. आपने इस वारदात के मार्मिक पहलू की ओर इशारा किया है. लेकिन ये भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत के न्यायालयों में ऐसे जितने भी मामले हैं उसमें कोई न कोई किसी न किसी रूप में पीड़ित है और इसका असर उसके परिवार पर भी पड़ रहा है. जबकि जिसने अपराध किया है ज्यादातर मामलों में वो आज़ाद घूम रहा है. हमारी न्याय व्यवस्था को इन मामलों के बारे में गंभीर होना होगा.

  • 2. 02:49 IST, 01 फरवरी 2013 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    शालू जी, न जाने कितनी अबला बहनें इस बीमारी से पीड़ित होती हैं लेकिन जितनी चर्चा दामिनी को मिली उतनी किसी को नहीं मिलती है. क्या ये कड़वा सच नहीं है कि दामिनी रात के समय अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ घूम रही थी - इसके बारे में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता है.

  • 3. 13:18 IST, 01 फरवरी 2013 उमेश कुमार यादव, लखनऊ:

    शालू जी, आपने जो प्रश्न उठाया वो बिल्कुल सही है. गरीबी की मार झेलते हुए जब मैंने अपना घर रोजगार के लिए छोड़ा था तब मेरी उम्र भी 16 साल के आसपास थी पर मेरे दिमाग में कोई अपराध करने की भावना नहीं आई. ये भी सच है कि कोई मां-बाप अपने बच्चे को अपराध के लिए नहीं उकसाता. इस नाबालिग ने जो किया वह दरिंदगी की इंतेहा थी. सिर्फ नाबालिग होने के नाते उससे कोई सहानुभूति रखना सिर्फ तथाकथित मानवतावादियों के लिए सही होगा मेरे जैसे आम इंसान के लिए नहीं. भारत में महिलाओं के प्रति नजरिया बहुत नहीं बदला है. मुझे वो दिन भी याद हैं जब गांव में उसी पुरुष को सबसे बड़ा मर्द माना जाता था जो अपनी पत्नी को नियमित रूप से पीटता हो. स्थिति में बदलाव आज भी ज्यादा नहीं आया है. इसी मानसिकता का परिणाम है कि स्त्री हर जगह प्रताड़ित होती है. मुझे हैरत तब ज्यादा हुई जब आपने यह लिखा कि लंदन में भी छेड़छाड़ होती है. क्या कहूं इस पर.........समझ नहीं आता है. आपके अंदर की स्त्री और पत्रकार दोनों ही अपनी संवेदना को जीवित रखे, यही कामना है.

  • 4. 17:30 IST, 01 फरवरी 2013 Sandeep Mahato:

    शालू जी आपने बिलकुल सहज तरीके से एक सच्चाई बयान की है. हम सब बुराई की जड़ को मारने के बजाय बुरे को खत्म करने पर ज्यादा ज़ोर देते हैं. एक बुरे व्यक्ति के ख़त्म होने पर बुराई ख़तम नहीं हो जाती. दोष अवश्य उस नाबालिग का भी है, परन्तु उससे भी ज्यादा दोषी है वह वातावरण जिसने उसे ऐसा घिनौना कर्म करवाया. माँ बाप का कर्तव्य होता है कि वह अपने बच्चों की सही परवरिश करें पर पापी पेट के सवाल के आगे बाकी सारे सवाल छोटे पड़ जाते हैं.

  • 5. 20:12 IST, 01 फरवरी 2013 Akhilesh Chandra:

    शालू जी, पत्रकार का काम घटनाओं का हिस्सा बनना नहीं है. यह सबसे मुख्य बात है इसे पेशे की. हालांकि इसका पालन नहीं हो रहा. देश का पूरा मीडिया एक मुद्दे के साथ झंडा लेकर खड़ा हो जाता है, तो दूसरे का विरोध करने लगता है. आज के पत्रकारों से निष्पक्षता की उम्मीद बेमानी है. बीबीसी के बारे में सुनता आया था कि यहां चीजें अलग होती हैं, लेकिन ऐसा लगता नहीं है. आप लोग भी किसी घटना का हिस्सा बनते जा रहे हैं. अब क्या उम्मीद की जाए!

  • 6. 20:43 IST, 01 फरवरी 2013 akash rai mp:

    अच्छा लेख है.

  • 7. 02:00 IST, 02 फरवरी 2013 Mohammad Athar Khan, Faizabad Bharat:

    बीबीसी के पत्रकार तो राष्ट्र और धर्म से ऊपर उठ कर पत्रकारिता करते हैं और आप अपने आप को महिला मान रही हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. कम से कम बीबीसी के पत्रकारों से हम ऐसी उम्मीद नहीं रखते.

  • 8. 22:11 IST, 02 फरवरी 2013 SHISHIR KUMAR:

    शालू जी आपने तो सिर्फ़ बलातकारियों के बारे में सोचा, पर आप भूल गयी की लड़की के घर वालो का क्या होगा, वे लोग क्या सोचते है या फिर हमारा समाज किधर जा रहा है. क्या यह ऐसे ही चलता रहेगा? कोई रोक नहीं लगेगा? अगर कानून या समाज कोई कदम नहीं उठता है तो मजबूरन कोई भुक्तभोगी हथियार उठा ले तो उसे आपकी पत्रकारिता क्या कहेगी, आतंकवादी या मुजरिम? मै यह समझता हूँ की ऐसे लोग (अपराधी) यदि मर भी जाये तो इस दुनिया को क्या फर्क परेगा? मेरे हिसाब से तो कुछ भी नहीं फर्क पड़ेगा.

  • 9. 09:44 IST, 04 फरवरी 2013 ashish yadav,hyderabad:

    शालू जी, नाबालिग दुष्कर्मी के परिवार से आपकी संवेदनाएं हो सकती हैं, लेकिन अपने घर से निकल कर रोज़ी-रोटी के लिए घर छोड़ने वाला लगभग हर इंसान जद्दोजहद करता ही है. लेकिन हर कोई ऐसा दरिंदा नहीं बन जाता. कहने को तो वो नाबालिग है, लेकिन फिर भी उसमें बलात्कार करने जैसी अक्ल थी. ऐसे इंसान को कैसे नाबालिग और मासूम माना जा सकता है. अगर उसे अपने परिवार की चिंता होती तो क्या ऐसी हैवानियत करता?

  • 10. 17:30 IST, 04 फरवरी 2013 kapil sharma:

    आपने जबरदस्ती की टिप्पणी लिखी है जिसका एक पाठक के नजर में कोई महत्व नहीं है. सिर्फ समय खपाने के लिए आपकी टिप्पणी पढ़ी जा सकती है.

  • 11. 10:30 IST, 06 फरवरी 2013 अमित कुमार:

    जनता मीडिया को, मीडिया व्यवस्था को, व्यवस्था नेता को और नेता फिर से जनता को ही कठघरे में खड़ा करते रहे हैं. यह दोषारोपण का पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम ) चलता ही रहता है. लेकिन हवा का प्रतिरूप इस पत्रकारिता को बंधन और दुविधा में पड़ा देख बहुत अचरज होता है. शालू जी, जनता उसी और मुड़ जाती है जिधर मीडिया-रुपी हवा ले जाती है, और शायद गणतंत्र की आज दुविधा यही है कि हमारे राजनीतिज्ञ इस बात का भरपूर दुरूपयोग कर लेते हैं, या यूँ कहें कि अपने लिए बढ़िया व्यवस्था बनाने में इसका सदुपयोग करते रहते हैं और जनता धरती की तरह ही आकाश में गडाए परिवर्तन की हवा बहने का इंतज़ार करती रह जाती है. मेरा मानना है कि स्वतंत्र निर्पेक्ष और ईमानदार पत्रकारिता अगर दुविधा में ना पड़कर समानरूप से सभी बातों को सामने लाए तो देश इस बेफालतू की अवयवस्था से उबरकर विकास की और बढ़ सकता है अन्यथा वो दिन भी दूर नहीं है जब यही पत्रकारिता बवंडर बनकर पूरे देश को ही गुलामी और अव्यवस्था की गर्त में ले जाके छोड़ दे. इसलिए शालू जी चिंता छोड़िये और आगे बढिए.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.