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इज़हारे मोहब्बत की बीमारी

वंदना वंदना | गुरुवार, 17 जनवरी 2013, 13:10 IST


"मैं तुमसे मोहब्बत करता हूँ .." ये मेरा नहीं यश चोपड़ा की फिल्म चाँदनी का शुरुआती डायलॉग है.

दरअसल हाल ही में मैं गोवा घूमने गई. वहाँ की संस्कृति, पहनावा, साफ़-सफ़ाई, फ़िज़ा, हर अंदाज़ जुदा था जो मन को भा गया. कभी-कभी लगता ही नहीं था कि भारत में हूँ. लेकिन ये एहसास तब तक ही था जब तक मैं वहाँ के पुराने किलों और इमारतों तक नहीं पहुँची थी.

कहने को तो वो गोवा में बनाया पुर्तगालों का पुराना किला था. पर इसकी दीवारें इज़हारे-मोहब्बत से पटी पड़ी थीं..लग रहा था कि यश चोपड़ा की रोमांटिक फिल्मों के किरदारों ने अपनी सारी मोहब्बत यहीं उड़ेल दी है.

भारत में जहाँ-तहाँ से आए लोगों ने गोवा के इस किले में अपना प्यार दीवार पर कुरेद-कुरेद कर अंकित किया था. मानो आने वाला समय इनके प्यार को इसी कसौटी पर परखेगा कि किसने कितनी गहराई से दीवार पर नाम कुरेदा है.

भारत में जितनी जगह घूमी हूँ शायद ही कोई ऐतिहासिक धरोहर ऐसी देखी है जिसकी दीवारों, दरवाज़ों को लोगों ने नाम खुरच-खुरच कर खराब न किया हो.

यूँ तो भारत में आमतौर पर लोगों को 'पब्लिक डिस्प्ले ऑफ एफेक्शन' यानी खुल्ल्म खुल्ला प्यार जताने से ऐतराज़ होता है लेकिन ऐतिहासिक दीवारों पर इनका प्यार उमड़ घुमड़ कर सामने आता है.

वक़्त के साथ भारत में कई बदलाव आए हैं लेकिन बचपन से लेकर अब तक मैंने लोगों की 'दीवारे-मोहब्बत' या 'इज़हारे मोहब्बत' की फितरत में कम ही बदलाव देखा है...कारण?

क्यों न इसका ठीकरा भी युवाओं पर विदेशी संस्कृति के प्रभाव पर डाल दिया जाए...क्योंकि आजकल यही फैशन है.

मैं निजी और किताबी अनुभव से इतना तो कह सकती हूँ कि अपवादों को छोड़ दें तो पश्चिमी देशों ने आम तौर पर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को बहुत ही सहेज कर रखा है. ब्रिटेन में रहते हुए मैंने नहीं देखा कि वहाँ के किलों में लोगों ने कोई छेड़- छाड़ की हो.

वहाँ के कई टूटे-फूटे और मामूली से दिखने वाले किलों को भी सजाकर संभालकर रखा गया है. पर्यटक न जाने कितने पाउंड देकर इन्हें देखने जाते हैं.

ऐसे कई ब्रितानी किलों में घूमने के बाद मुझे कितनी बार हैरानी होती थी कि भारत में इतनी ऐतिहासिक और सुंदर इमारतें होते हुए भी भारतवासी इन्हें पर्यटन लायक नहीं बना सके.

पर मैं भी कैसी बात कर रही हूँ. जहाँ इतने ज्वलंत मुद्दे मौजूद हैं वहाँ ये भी कोई मुद्दा है बहस करने का. ऐतिहासिक धरोहर सहेजकर रखने का वक़्त ही कहाँ है. हाँ ऐसी जगहों पर जाकर वहाँ इश्क की नई इबारत लिखने की फुरसत ज़रूर है.

या हो सकता है कि मैं ही सनकी हो गई हूँ.. प्यार करने वालों का इज़हार मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा. "तैय्यब अली प्यार का दुश्मन हाय-हाय."

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:21 IST, 17 जनवरी 2013 Satnam Singh:

    वंदना जी आपने बिल्कुल सही लिखा है. ये हमारी हिंदुस्तानी संस्कृति है. ये शुरुआत स्कूल से होती है जब हम बेंचों पर लिखते हैं. ये सब हमारे खून में इस कदर समा चुका है कि हम लाख कोशिश कर लें फिर भी खत्म नहीं होगी.

  • 2. 17:30 IST, 17 जनवरी 2013 BHEEMAL Dildarnagar:

    भारतवासी होकर भारतवासियों पर कीचड़ उछालना कुछ गर्व की बात नहीं. आप विदेश में जाकर क्यूँ नहीं रहतीं. लेखन का मसाला बेहतर करें.

  • 3. 17:39 IST, 17 जनवरी 2013 Saptarshi:

    वंदना जी, हम प्यार करने वालों को तो समाज कोई जगह देता नही, जाहिर है ये बेज़ुबान दीवारें ही हमारा निशाना बनेंगी. वैसे कभी आप भी प्यार करके देखें , आपका प्यार और दीवारों से मोहब्बत साथ साथ चला करेंगी.

  • 4. 17:41 IST, 17 जनवरी 2013 saptarshi:

    वंदना जी, हम प्यार करने वालों को तो समाज कोई जगह देता नही, जाहिर है ये बेज़ुबान दीवारें ही हमारा निशाना बनेंगी. वैसे कभी आप भी प्यार करके देखें , आपका प्यार और दीवारों से मोहब्बत साथ साथ चला करेंगी.

  • 5. 19:09 IST, 17 जनवरी 2013 naval joshi:

    वंदना जी,ऐतिहासिक ईमारतों को खुरच कर नाम या दूसरी तरह की इबारत लिखने वाले लोगों को आप प्रेमी कैसे कह सकती हैं? ये प्रेमी या प्रेमिकायें नहीं है ये हिसंक मनोवृत्ति के लोग हैं जो प्यार का नाम लेकर किसी तरह का उत्पात मचा सकते हैं. कल को प्रेमी अथवा प्रेमिका से विवाह हो जाने पर ये उसे भी किसी न किसी तरह खुरूचेगें ही. ऐतिहासिक इमारतों को विकृत करने वाले लोगों को प्रेम से जोडना ठीक नहीं होगा . हम अपने प्रेम के लिए किसी को खुरच दें तो अपने प्रेम का फिर से विश्लेषण करना होगा कि यह वास्तव में क्या है जिसे हम प्रेम कह रहे हैं? प्रेम इतनी उन्नत और सुखद अनुभूति है कि यह कहना भी सही मालूम नहीं पडता कि प्यार किया भी जा सकता है वास्तव में तो प्यार में डूबा ही जा सकता है ,प्यार में डूबा व्यक्ति जो भी करेगा वह प्रेममय ही होगा. यह अनुभूति उसके प्रत्येक कर्म से दिखाई देती है. लेकिन प्रेमिका के नाम पर इमारतों को खुरचकर बदशक्ल बनाने वाले कुछ भी हो सकते है लेकिन प्रेमी तो बिल्कुल ही नहीं .इस तरह के विकृत मनोदशाओं वाले लोगों की अनेक शक्लें होती है जिनमें मैसोच और सैडिज्म काफी परिचित मनोविकृतियां है जिन्हें मनोविज्ञान ने काफी हद तक चिन्हित और परिभाषित किया है .ये भी अपने का प्रेमी कहते हैं. पहली बात तो यह तय है कि इस तरह सार्वजनिक और ऐतिहासिक धरोहर को जो खुरच रहे हैं अथवा सार्वजनिक स्थानों पर लिपटे-चिपटे लोग फूहड तरीके से प्यार दिखाने की कोशिश कर रहे हैं वे विक्षिप्त अथवा अर्द्धविक्षिप्त होते हैं. थोडा बारिकी से देखा जाए तो प्यार एक अनुभूति है जिसमें डूबा जाता है.यह कर्म नहीं भाव दशा है.

  • 6. 21:08 IST, 17 जनवरी 2013 jo:

    बहुत बढ़िया वंदना जी. हमें समाज में आपके जैसे लोगों की ज़रूरत है.

  • 7. 21:31 IST, 17 जनवरी 2013 Pramod Shukla:

    वंदना जी आपने सही कहा. अपने यहाँ कुछ लोग हैं जो ऐसा करना बड़ी शान का काम समझते हैं. इसमें सिर्फ लोगों का ही नहीं पूरे तंत्र की गलती है. यदि बचपन से ही बच्चों को सब चीजों की देखभाल करना सिखा दिया जाए और साथ-साथ एक सख्त कानूनी तंत्र बना दिया जाए तो लोग ऐसा नहीं करेंगे.

    मैं भी ब्रिटेन में रहता हूँ. यहाँ लोग ऐतिहासिक धरोहर पर इसलिए नहीं लिख पाते क्योंकि चारों तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं. हालांकि ये कहना कि ब्रिटेन में लोगों ने सब कुछ सहेज कर रखा है ये ग़लत है. यहाँ भी शरारती तत्व हैं लेकिन उनका तरीका अलग है. आपने लंदन ट्यूब में आते जाते इधर उधर स्प्रे पेंट से की गई कलाकारी तो देखी ही होगी.

    सिर्फ भारतवासियों को ही बदनाम करना उचित नहीं. हाँ कमी ज़रूर है पर जनसंख्या भी बहुत है और एक अच्छा समाज बनाने के लिए इच्छा शक्ति किसी में नहीं है.

  • 8. 03:28 IST, 18 जनवरी 2013 Tohid Hasan:

    धीर धीरे लोग पश्चिम का अनुसरण कर रहे हैं. वहाँ इजहारे मुहब्बत के आला साधन हैं, हमारे पास?

  • 9. 15:48 IST, 18 जनवरी 2013 iqbal Fazli, Rampur (UP):

    आपके आलेख में जो ऐतिहासिक धरोहरों को सहेज कर रखने की अपील है वो मन को छू गई. वाकई हमारी जागरुकता इस संदर्भ में कम है. और इसे बढ़ाने की अत्यंत आवश्यकता है. काश ये टीआरपी बढ़ाने वाली होती तो ई-मीडिया इसको उजागर करता.

  • 10. 01:41 IST, 19 जनवरी 2013 arvind:

    अजीब सा ब्लॉग देखा आपका. ब्लॉगर को छोड़ कर बाकी सभी कमेंट्स के लिए शिकायत करने को कहा गया है.

  • 11. 15:36 IST, 19 जनवरी 2013 Nikhilesh from Chhattisgarh:

    वे लोग सबसे कम प्रेम करते हैं,जो अपने प्रेम का सबके सम्मुख विज्ञापन करते हैं।

  • 12. 18:38 IST, 19 जनवरी 2013 Shariq Kamal:

    वंदना जी इज़हारे मोहब्बत के नाम पर जो दीवारों को कुरेदने और ऐतिहासिक इमारतों को बर्बाद करना का विषय आपने छेड़ा है, इसे लिखकर आपने अपनी इमारतों से इज़हारे मोहब्बत का पैगाम दिया है.और साथ ही मोहब्बत के नाम पर बहस छोड़ दी है. लोग इमारतों के नुकसान को लेकर फिक्रमंद तो कम हैं बल्कि उस पर लिखी मोहब्बत के पैगामों पर अपने विचार लिख रहे हैं. आपके ब्लॉग पर नुकसान की चर्चा नहीं कर रहे बल्कि नज़रिया मोहब्बत करने वालों पर है.

  • 13. 09:09 IST, 21 जनवरी 2013 Anup Adhyaksha:

    राष्ट्रीय धरोहर के स्मारकों पर पक्षियों की बीट की तरह यत्र तत्र इजहारे मुहब्बत की अशलील नुमाइश मुझे तो 'लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे' जैसा विलाप गीत लगता है. अक्सर ऐसे मौकों पर देशभक्ति की लहरें उठती है. परचम हाथों में आ जाते हैं और किसी इंडिया गेट अथवा तहरीर चौक की तलाश शुरू हो जाती है. आप फ़िक्र न करें. आपके इस प्रभावकारी लेख अवश्य ही हमारे स्मारकों को अश्लील साइनबोर्ड हो जाने से बचाएगा.

  • 14. 17:19 IST, 21 जनवरी 2013 kumar:

    बीबीसी वालों की हिंदी और हिंदी की समझ का प्रणाम. आप बताएंगी कि इजहारे मोहब्‍बत बीमारी कैसे हो सकती है.

  • 15. 07:39 IST, 22 जनवरी 2013 Dr.Lal Ratnakar :

    वंदना जी एक बात लिखूं. आप पूरी दुनिया घूम आइए और दुनिया का सारा साहित्य खंगाल डालिए मोहब्बत के नाम पर इतनी 'खूबसूरत' इमारत कहीं नहीं बनी होगी जैसी आगरा में ''ताज महल". पर ताज बनाने में नाकामयाब लोग अपनी सारी शक्ति से कोई नाम खंडहरों पर ही दर्ज कर देते हैं. खँडहर इसलिए भी 'हमारे राजनेताओं ने एक पुरानी इमारत के गिराए जाने पर "खंडहर" कह कर संबोधित किया था'. आप इनकी हिफाज़त की बात करती हैं, हिफाज़त तो हम किसी भी चीज़ की नहीं कर पा रहे हैं, वास्तव में नए जागरण की जरूरत है पर कहना तो आसान है करना मुश्किल.

  • 16. 23:28 IST, 22 जनवरी 2013 Ranjit:

    बहुत अच्छा

  • 17. 18:48 IST, 23 जनवरी 2013 dr khalid hameed:

    वंदना जी असल में आप प्यार की दुश्मन है. वंदना जी प्यार की दुश्मन हाय हाय

  • 18. 00:23 IST, 24 जनवरी 2013 nathmal didel:

    वंदना जी बहुत बढ़िया. इस तरह का व्यवहार भारत में सामान्य है. हमें अपने अधिकारों के बारे में तो पता है लेकिन ज़िम्मेदारियों के बारे में नहीं. हमें अपनी विरासत को संभाल कर रखना चाहिए. इसके लिए नियम भी बहुत कड़े होने चाहिए.

  • 19. 15:09 IST, 24 जनवरी 2013 Sandeep:

    शाह जहाँ ने मुमताज के प्रति अपना प्यार जताने के लिए ताजमहल बनाया था. हम ताजमहल की दीवारों पर लिख लिख कर अपना प्यार जताते हैं.

  • 20. 18:03 IST, 24 जनवरी 2013 ajeet tiwari,bhopal:

    अच्छा लिखती हैं वंदनाजी, बधाई

  • 21. 21:33 IST, 24 जनवरी 2013 ratnakar tripathi:

    आज दो बेहद सुखद एहसास मन को गुलज़ार कर गए. पहला, किसी खोये हुए की तलाश का एक मुकाम तक आना था. दूसरा, इस लेखन की गहराई में डूब जाना था. हालात, तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया

  • 22. 11:15 IST, 25 जनवरी 2013 Dinesh Choradia:

    आपने ठीक कहा.....प्यार की बाते दिलों में लिखनी चाहिए न कि ऐताहासिक इमारतों की दीवारों पर.

  • 23. 14:18 IST, 26 जनवरी 2013 Chandan Prasad:

    इसमें कसूर उनका नही है, कसूर हमारा ही है कि हम अपनी पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहर को इस तरह से क्षति पहुंचा रहे हैं. ये एक तरह से मानसिक विकृति है जैसे की ट्रेन के शौचालय में पड़ोसी का नंबर लिख देना. और ये आज के रोमियो-जूलियट समझते हैं कि उनका प्रेम अमर हो जायेगा. ये प्रशासनिक जिम्मेवारी इन धरोहरों के संरक्षकों की भी है जो इन सब से अपने आप को दूर ही रखते हैं! मेरा सभी मित्र - बंधुओं से आग्रह है की ऐसे काम न किया करें जिससे हमारी संस्कृति का नाम खराब होता है.

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