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किसे ऐतबार होगा?

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | गुरुवार, 29 नवम्बर 2012, 14:56 IST

दो पत्रकारों को कथित धन उगाही के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.

पत्रकार बिरादरी बँट गई है. आमतौर पर पत्रकारों के संपन्न समुदाय का तर्क है कि ये प्रेस की आज़ादी का मामला है और इसकी जाँच पत्रकारों के ही किसी संगठन को करनी चाहिए. जबकि वंचित पत्रकारों का समुदाय इस मामले में बहुत से सवाल उठा रहा है.

इन दोनों के बीच भी एक वर्ग है. वो संपन्न है और वंचित दिखना चाहता है. वो दोनों नावों में सवार है.

पत्रकार और उनके संस्थान को इस बात से इनकार नहीं है कि उन्होंने उद्योगपति से मोलभाव किया था. उनका तर्क है कि वे उद्योगपति की पोल खोलना चाहते थे.

दिलचस्प है कि जिसे पोल खोलनी था उसने स्टिंग ऑपरेशन नहीं किया. स्टिंग ऑपरेशन किया उसने, जिसकी पोल खुलने वाली थी.

ये पेंचदार बात है. आम लोगों को सिर्फ़ कील का माथा दिख रहा है, कील के भीतर के पेंच नहीं दिख रहे हैं.

ये पूरा मामला औद्योगिक-व्यावसायिक और मीडिया संस्थानों की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ है.

एक अख़बार के मालिक और संपादक ने कहा है कि कंपनियों के जनसंपर्क अधिकारियों और उनके लिए काम करने वाली जनसंपर्क कंपनियों के प्रतिनिधियों का भी स्टिंग ऑपरेशन करना चाहिए जिसमें वे कंपनी की ख़बरें रुकवाने के लिए आते हैं.

बात सही है. उम्मीद करनी चाहिए कि वे ऐसा करेंगे क्योंकि वे एक मीडिया संस्थान के मालिक भी हैं.

ऐसा करना किसी संपादक के बूते की बात नहीं है. अख़बार या टीवी कंपनी का मालिक ऐसा करने नहीं देगा. सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को समझदार व्यक्ति मार ही नहीं सकता.

एक संपादक मित्र की सलाह है कि संपादकों और ब्यूरो प्रमुखों के लिए हर साल अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना ज़रुरी कर देना चाहिए.

वे ये सलाह देने से चूक गए कि मीडिया संस्थानों के मालिकों को ऐसा करना चाहिए.

'पेड न्यूज़' यानी ख़बरों को अपने पक्ष में छपवाने/चलवाने के लिए भुगतान किए जाने का मामला पिछले कुछ समय से गर्म है. राजनेता कथित रूप से चिंतित हैं.

लेकिन इससे बड़ा मामला ख़बर को ना छापने या रोकने के लिए होने वाले भुगतान का है. जितना मीडिया व्यवसाय दिखता है उससे तो बस रोटी का जुगाड़ होता है, उस रोटी पर घी तो ख़बर रोकने या तोड़ने-मरोड़ने के धंधे से चुपड़ी जाती है.

विज्ञापन से लेकर ज़मीनें सरकारें ख़बर छापने के लिए नहीं, न छापने के लिए देती हैं.

ये आपराधिक सांठगांठ है. उद्योग-व्यवसाय और मीडिया के बीच. राजनीतिक वर्ग और मीडिया के बीच.

दरअसल जो ख़बर दिखती हैं, वो तीन तरह की होती हैं.

एक वो जिसमें मीडिया संस्थान की लाभ-हानि का सवाल ही नहीं होता, दूसरी वो जिससे मीडिया संस्थान का कोई राजनीतिक या आर्थिक हित सधता है और तीसरी वो जो राजनीतिक-आर्थिक लाभ सधने की आस टूटने के बाद प्रकाशित-प्रसारित होती है.

यक़ीन मानिए कि असल में जो ख़बर है, वो नदारद है. कुछ अपवाद हो सकते हैं. लेकिन वो सिर्फ़ अपवाद हैं.

मीडिया पर समाज अब भी बहुत भरोसा करता है. लेकिन मीडिया क्या इसको बरकरार रख पा रहा है?

शायद नहीं. ये एक मामला गवाह है. इससे पहले राडिया के टेप ने कई गवाहियाँ दी थीं.

इस समय तो इक़बाल के एक शेर का एक मिसरा याद आता है, "यही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ऐतबार होगा"

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:18 IST, 30 नवम्बर 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    वर्मा जी, पत्रकार दूध के धुले नहीं होते. स्वादिष्ट और सुपाच्य लज़ीज़ भोजन के लिए पत्रकार अपने दीन ईमान को नीलाम कर देते हैं.

  • 2. 19:26 IST, 30 नवम्बर 2012 दीनानाथ:

    हमेशा की तरह एक शानदार ब्लाग.

  • 3. 11:23 IST, 01 दिसम्बर 2012 Dr.Vishal Agrahari:

    निश्चित है समाज का मीडिया पर बहुत विश्वास है. भारत में जिसे प्रमाण के तौर पर दिखाया जाता है उस पर लोग भरोसा करते हैं और कभी कभी ये जीवन मरण का प्रश्न बन जाता है. इसलिए मीडिया का इस तरह का खेल करना समाज और लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है.

  • 4. 17:16 IST, 02 दिसम्बर 2012 himmat singh bhati:

    विनोद जी, आज़ादी के बाद ऐतबार करते रहे और धोखा खाते रहे हैं. अब और ऐतबार नहीं किया जा सकता. विश्वास उन्होंने तोड़ा है जिन पर विश्वास करते थे.

  • 5. 19:05 IST, 02 दिसम्बर 2012 Anuj:

    किसको किसको, क्या क्या कहें. आपका बीबीसी भी कुछ कम नहीं है.

  • 6. 19:17 IST, 02 दिसम्बर 2012 पद्मनाभ:

    ज्यादातर मीडिया इस पर बोलने से भी हिचकिचा रहे हैँ. आम जनता है कि उनको कुछ मालूम ही नही पडता है. कुछ भी हो यदि धुआँ उठा है तो आग तो होगी ही. अब देखना है कि आग की लपट रौशनी करती है या अपने मे सब को समा लेती है. घटना पर प्रकाश डालने के लिए धन्यवाद.

  • 7. 00:02 IST, 04 दिसम्बर 2012 SHAHNAWAZ ANWAR , SAHARSA BIHAR:

    पत्रकारिता के दो पहलू हो गए हैं - एक पैसा कमाना और दूसरा समाज सेवा करना. मीडिया जब से उद्योगपतियों के हाथ में गया है तब से अखबार और चैनलों के मालिकों ने मीडिया को दुहना शुरू कर दिया है. पैसा कमाने और विज्ञापनों की होड़ में अच्छे पत्रकारों की नौकरी दाँव पर लग गई है.

  • 8. 10:52 IST, 04 दिसम्बर 2012 Anuj:

    बीबीसी खुद भी कब क्या और किसको प्रमुखता द रही है ये समझ से परे होता है. मुझे तो अब आपके समाचारों पर कम विश्वास होता है.

  • 9. 13:36 IST, 04 दिसम्बर 2012 Kinjalk Tiwari:

    कभी ऐसा समय था जब हम बीबीसी के समाचारों पर सबसे अधिक विश्वास किया करते थे क्योंकि हम जानते थे की भारत की गन्दी राजनीती बीबीसी को छूने तक न पाएगी ,लेकिन अब ऐसा नहीं है| बीबीसी भी अब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया वाली लाइन में खड़ा दिखता है |

  • 10. 22:43 IST, 04 दिसम्बर 2012 Heetendra:

    मुझे लगता है कि हमें टीआरपी का कोई दूसरा विकल्प ढूँढना चाहिए.

  • 11. 14:45 IST, 05 दिसम्बर 2012 KAILASH GOUR:

    वैसे आपने जो कुछ कहा है वो बिलकुल सही है क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जिसे भूखा शेर भी कहते हैं, वास्तव में वो अपनी हदें लाँघ रहा है. बीबीसी की पत्रकारिता भी इस समय कुछ वैसे ही काम कर रही है जैसे कोढ़ में खाज. उम्मीद है कि आप सच को छापने की हिम्मत करेंगे.

  • 12. 15:13 IST, 07 दिसम्बर 2012 Sunil:

    आपसे उम्मीद बहुत रहती है मगर आप और आपके भाई-बंधु अक्सर उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते हैं. कारण आपने बता दिया है. अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद, पर ऐसा कब तक चलेगा?

  • 13. 22:28 IST, 08 दिसम्बर 2012 Anup Adhyaksha:

    इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं हैं,
    जिस तरह टूटे हुए ये आईने हैं।

  • 14. 09:50 IST, 11 दिसम्बर 2012 PRAVEEN SINGH:

    जो छवि मीडिया और समाचार पत्रों को देख के पत्रकारों के लिए उभरती है वो है - ये बेचारे पत्रकार नेताओं, पार्टियों या उद्योग लॉबी के पालतू हैं. उनके दिए टुकड़े का ही सहारा है. स्वामिभक्त होना स्वाभाविक है. आप सोचिए क्या इस कैंसर से बीबीसी अछूता होगा? विश्वास नहीं होता.

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