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मलाला बेगुनाह तो नहीं!

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012, 20:11 IST

ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्चे या बच्ची पर कैसे हमला कर सकता है? यक़ीकन कोई न कोई वजह ज़रूर होगी, और वजह भी कोई ऐसी वैसी नहीं, बल्कि बहुत ही ठोस.

मिंगोरा में मेरे जितने भी जानने वाले हैं, एक एक से फोन करके पूछ रहा हूं कि पाकिस्तान पर पिछले आठ बरसों में जो तीन सौ बीस अमरीकी ड्रोन हमले हुए हैं, उनमें से कितने स्वात घाटी पर हुए? कोई नहीं बता रहा है. सब कह रहे हैं कि एक भी नहीं हुआ है. सब मुझसे कुछ छिपा रहे हैं. सब मेरा दिल रखने के लिए झूठ बोल रहे हैं. यकीकन स्वात में ड्रोन हमले हुए हैं और मलाला उन्हीं हमलों के पीड़ितों की प्रतिक्रिया का निशाना बनी है.

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है? तो फिर मलाला यक़ीनन अमरीका की जासूस है या रही होगी. मोमिन (मुसलमान) कभी बिना सबूत बात नहीं करता. क्या आपने तालिबान के प्रवक्ता का ये बयान नहीं पढ़ा कि मलाला ने एक बार कहा था कि वो ओबामा को पसंद करती है. इससे बड़ा भी कोई सबूत चाहिए मलाला के अमरीकी एजेंट होने का?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

हा हा हा हा! कौन कहता है कि 14 साल की बच्ची मासूम होती है. अगर 14 साल का लड़का माता पिता की खुशी और अपनी मर्जी से धर्म को पूरा पूरा समझ कर बुराई को मिटाने के लिए बिना ज़ोर ज़बरदस्ती आत्मघाती जैकेट पहनने का स्वतंत्र फैसला कर सकता है तो मलाला कैसे अभी तक बच्ची है? अगर इतनी ही बच्ची है तो सिर झाड़ मुंह फाड़ कर घर से बाहर जाने की बजाय आंगन में गुड़ियों के साथ क्यों नहीं खेलती? घर के काम काज में अपनी मां का हाथ क्यों नहीं बंटाती रही?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

क्या बच्चियां इस तरह चटर पटर मुंहफट होती हैं? बच्ची है तो खिलौनों और गुड़ियों की ज़िद क्यों नहीं करती? बस ज़हरीले पाठ्यक्रम की किताबों, कॉपी, पेन्सिल की बात क्यों करती है? क्या मलाला की उम्र की बच्ची गला फाड़-फाड़ के ज़ोर-ज़बर और बुनियादी स्वतंत्रता जैसे पेचीदा विषयों पर अपनी राय देती है या कभी इस सेमीनार में तो कभी उस कार्यक्रम में या कभी धमाकों की जगह जाकर मोमिनों पर कीचड़ उछाल कर गैरों की तारीफें और तमगे वसूल करती फिरती है?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

और बंद करो ये बकवास कि पख्तून समाज में औरतें और बच्चे अमन से रह रहे हैं. कोई अमन-वमन नहीं है. पख्तून लोगों का इस्लाम से क्या लेना देना? जो भी धर्म के वर्चस्व के रास्ते में आएगा, उड़ जाएगा. जो हमारे सच्चे रास्ते को अपनाने की बजाय अपनी डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने की कोशिश कर रहे हैं वो आस्तीन के सांप हैं और इतनी साइंस को हम भी जानते हैं कि सांप पैदा होते ही तो ज़हरीला नहीं बन जाता. तो क्या आप हमसे ये कह रहे हैं कि संपोलियों को छोड़ दें क्योंकि वे बच्चे होते हैं. हा हा हा हा!

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

क्यों चीख रहे हैं आप इतना मीडिया पर, फेसबुक पर, ट्विटर पर? क्या आपकी किसी बेटी को निशाना बनाया गया है? क्या मलाला आपकी सगी है? मलाला की उम्र के आत्मघाती हमलावर भी तो वहीं के हैं जहां की वो है. 14 वर्षीय शाहीन कुफ्र के किले पर हमला करे तो गलत और गुमराह 14 वर्षीय मलाला अपने विचारों और भाषणों के जरिए बारूद से मोमीनों पर रात में छापे मारे तो हीरो. वाह जी वाह!

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

हम यही तो चाहते थे कि आप मलाला के बहाने अपने आडंबर का लबादा उतार कर सामने आ जाएं और हम देख सकें कि कौन हमारा है और कौन ग़ैर. मगर फिक्र न करें हम मलाला की तरह आपकी किसी बच्ची को निशाना नहीं बनाएंगे. हम भेड़ बकरियों की रेवड़ को नहीं छेड़ते.

हमारी जंग तो उन गड़रियों और उनके बच्चों से है जो आपको तालिबान की मशाल थामने से रोक रहे हैं और कुफ्र के अंधेरों में धकेल रहे हैं.

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 21:19 IST, 16 अक्तूबर 2012 Amritanshu Mishra:

    देखिए, कहीं आप भी निशाना न बन जाएं. भय पैदा करने के लिए मलाला पर हमला जरूरी था. अब शायद ही कोई इतनी जल्दी मलाला बनने की सोचे. मलाला की खैरियत के लिए हमारी दुआ.

  • 2. 23:58 IST, 16 अक्तूबर 2012 Prem Verma:

    मलाला पर हुए आक्रमण की जितनी भी निंदा की जाये कम होगी . वसतुल्लाह खान जी ने तालिबान की मानसिकता का जो खुलासा इस ब्लॉग में किया है वह सचमुच प्रशसनीय है . भगवान् इस बच्ची को लम्बी उम्र दे यही प्रार्थना है .

  • 3. 07:30 IST, 17 अक्तूबर 2012 Akhilesh Chandra prabhakar:

    सभी जानते है की "इस्लामिक चरमपंथी और तालिबान" अमरीका की ही पैदाईश था जिसे अमरीका ने शीत-युध्होत्तर काल में अफगानिस्तान में डॉ. नजीबुल्लाह की कम्युनिस्ट सरकार और सोविएत सेना से लड़ने के लिए इस्तेमाल किया था. आज उसी चरमपंथी गुटों के खिलाफ अमेरिका ड्रोन हमले कर रहा है- जिसमे सैंकड़ों की तादाद में निर्दोष-मासूम बच्चे, महिलाए और आम नागरिक मारे जा रहे है. खुद पाकिस्तान में इस्लामिक चरमपंथी हमले में अबतक पचास हजार से अधिक आम नागरिक मारे जा चुके है जबकि कई बरिष्ठ राजनीतिज्ञों ने अपनी जान गवाई है. मलाला पर तालिबान के हमले के बाद जिस तरह पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी अवाम ने एकजूट होकर प्रतिक्रिया दी है उससे साफ़ जाहिर होता है की इस्लामिक चरमपंथी के खिलाफ "दृढ़ता के साथ मुकाबला करने" के लिए लोग कमर कसकर अब तैयार हो चुके है. पाकिस्तान में अमन व तरक्की का प्रतीक बनकर मलाला उभरी है.

  • 4. 09:53 IST, 17 अक्तूबर 2012 SARTAJ:

    तस्वीर का दूसरा चेहरा , कभी कभी कुछ चीजें पीछे से भी देखनी चाहिए.

  • 5. 12:02 IST, 17 अक्तूबर 2012 गोविंद सिंह :

    बहुत ही गज़ब की टिप्पणी है.

  • 6. 12:30 IST, 17 अक्तूबर 2012 आशीष सुमन:

    क्या शानदार व्यंग्य है.

  • 7. 16:53 IST, 17 अक्तूबर 2012 Muhammad Ammar:

    शानदार व्यंग्य बहुत ही गज़ब

  • 8. 16:17 IST, 18 अक्तूबर 2012 javed sheikh jhansvi:

    आपने बड़ी आसानी से इनकी जात और औकात के बारे में बताया है.

  • 9. 19:21 IST, 18 अक्तूबर 2012 tanveer alam:

    मैं आपकी बातों से पूरी तरह से सहमत हूं.पाकिस्तान में सिर्फ और सिर्फ मलाला ही एक लड़की है क्योंकि पाकिस्तान में हमेशा अमरीकी हमले होते है और मासूम मारे जाते हैं.

  • 10. 16:00 IST, 19 अक्तूबर 2012 Ebad Ali Khan, Jamshedpur, Jharkhand:

    खान साहब जब भी आप ब्लॉग लिखते हैं कलेजे को हिला देते हैं. जो लोग चरमपंथ से लोहा लेने मे निष्क्रिय होते हैं यकीनन भेंड बकरियों के रेवड़ की तरह हैं. न तो हम मासूम बच्चों द्वारा बारूदी जैकेट पहन कर आत्मघाती हमलावर बनने के हिमायती हैं और न अमरीका द्वारा अंधाधुंध किए जाने वाले ड्रोन हमलों की सराहना करते हैं. सारा कुछ ग़लत और मानवता के खिलाफ हैं. हम उसकी पुरजोर निंदा करते हैं

  • 11. 16:50 IST, 19 अक्तूबर 2012 NEERA JAIN jaipur:

    कैसा प्रजातंत्र है जहां आज भी महिलाओ पर एक तरफ़ा फैसला थोपा जाता है. क्यों इन्सान की गरिमा ही उससे छीनी जा रही है. महज स्कूल जाते रहने की जिद एक बच्ची की मौत देने का कारण कैसे बन सकती है. इतनी सी उम्र मे इस लड़की मे इतना होंसला समां गया.

  • 12. 17:35 IST, 19 अक्तूबर 2012 rajeshwari:

    बहुत बेहतरीन लिखा आपने....ज़्यादातर लोगों की यही सोच है.

  • 13. 00:43 IST, 20 अक्तूबर 2012 Rajneesh Yadav:

    तालिबान की घटिया सोच पर बहुत सही व्यंग प्रस्तुत किया है. शुक्रिया इस लेख के लिए !!!

  • 14. 01:07 IST, 20 अक्तूबर 2012 vali haji:

    मलाला तो बच जाएगी लेकिन क्या उसे गुमनामी में रहना पड़ेगा या दूसरे देश में रहना होगा.

  • 15. 17:53 IST, 20 अक्तूबर 2012 Avdhesh Kumar:

    कभी कभी कुछ चीजें पीछे से भी देखनी चाहिए तस्वीर का दूसरा चेहरा भगवान इस बच्ची को लम्बी उम्र दे यही प्रार्थना है .

  • 16. 01:08 IST, 21 अक्तूबर 2012 Prawasi:

    यह व्यंग है? क्या व्यंग है इसमें? मुझे तो हंसी नहीं आई! मुझे तो ऐसा लगा की मैं किसी तालिबान का फरमान पढ़ रहा हूँ. व्यंग के इस्तेतार में ये तालिबानी फरमान बीबीसी के हिंदी संस्करण में प्रकाशित हो गया या तो लेखक व्यंग के अंग के मामले में विकलांग है, या फिर मुझे एक बेकार लेखक और खूंखार तालिब की बू में फर्क करना नहीं आता.

  • 17. 15:37 IST, 22 अक्तूबर 2012 Ebad Ali Khan, Jamshedpur, Jharkhand:

    मैं आपके कान में चुपके से हिंदी फिल्म का गाना गुनगुनाना चाहता हूँ क़ि "समझने वाले समझ गए हैं, जो न समझें वो अनाड़ी हैं." व्यंग इसी तर्ज़ पर लिखा जाता है जैसे इन्होंने लिखा है.

  • 18. 11:05 IST, 24 अक्तूबर 2012 NS Choudhary:

    कई लोग आरोप लगाते हैं कि अमरीका पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है लेकिन पाकिस्तान अमरीका को अपना इस्तेमाल क्यों करने देता है? जो देश आत्मनिर्भर नहीं हैं और दूसरे के दिए दान पर निर्भर हैं उन्हें निर्भरता का फल भुगतना होगा.

  • 19. 21:02 IST, 26 अक्तूबर 2012 samar khadas:

    वुसत साहब बहुत ही बढिया. मलाला वहां पर कुछ कम्युनिस्ट स्टडी सर्कल से भी जुडी हुई थी, ऐसा पढने मे आया था, कितनी सच है यह बात?

  • 20. 11:08 IST, 29 अक्तूबर 2012 Malkhan Singh:

    वुसतुल्लाह ख़ान जी,
    आपका लेख मुझे बहुत अच्छा लगा. इसलिए मैंने इसे अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया है.

  • 21. 21:29 IST, 29 अक्तूबर 2012 Pankaj Nigam:

    मैने एक कविता लिखी है मलाला के लिए.
    'नन्हे हाथ मलाला'
    (दुनिया की सबसे बहादुर बेटी मलाला युसुफजई के लिए)

    इन नन्हे हाथों से होकर,
    आवाज़ उठेगी, गूंजेगी,
    इन नन्हे हाथों में बन परचम,
    आजादी खुलकर झूमेगी.

    ये हाथ खींचकर लायेंगे,
    तारीक वक़्त में सूरज को,
    ये हाथ उड़ा ले जायेंगे,
    उस परीदेश में तितली को.

    ये हाथ करेंगे अब हिसाब,
    उन दबी सिसकती फसलों का,
    ये हाथ लिखेंगे मुस्तकबिल,
    अब आने वाली नस्लों का.

    ये हाथ बनायेंगे अपनी,
    शफ्फाफ़ सुनहरी दुनिया को,
    वो दुनिया जसमें जंग नहीं,
    औरत बच्चों पर ज़ुल्म नहीं,
    वो दुनिया जिसमें प्यार भरा,
    वो दुनिया जो बस अपनी हो,
    बस इतनी की मैं हंस तो सकूं
    और हंसने से मिरे,
    तुम्हें डर ना लगे.

  • 22. 21:33 IST, 29 अक्तूबर 2012 nisar ahmad :

    मुसलमानों की मानसिकता का अच्छा विश्लेषण है.

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