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सवाल से नाराज़

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 11 सितम्बर 2012, 18:40 IST

उद्योगपति और सांसद नवीन जिंदल एक टेलीविज़न चैनल से नाराज़ हो गए और कैमरामैन पर झपट पड़े.

चैनल का कहना है कि कोयला घोटाले से जुड़े सवालों पर नवीन जिंदल नाराज़ हो गए.

नवीन जिंदल की अब तक की छवि एक ऐसे राष्ट्रभक्त की रही है जिसने लोगों को अपने घरों पर तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाया. सुप्रीम कोर्ट में नवीन जिंदल की याचिका पर फैसला होने से पहले सिर्फ़ सरकारी इमारतों पर झंडा फहराने का अधिकार था.

अब उन्हीं नवीन जिंदल की कंपनियों पर कोयला घोटाले को लेकर कई आरोप हैं. पिछले दिनों छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक कई प्रदेशों में उनकी कंपनी के ख़िलाफ़ कई आंदोलन भी होते रहे हैं.

घोटालों के आरोपों और आंदोलनों ने नवीन जिंदल नाराज़ नहीं हैं. एक और टीवी चैनल पर उन्होंने कहा कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है.

लेकिन वो सवाल पूछे जाने से नाराज़ हैं.

ये नवीन जिंदल की समस्या नहीं है. समाज की समस्या है.

पता नहीं कब हमारे समाज में सवाल पूछा जाना ग़लत ठहरा दिया गया. इसका ब्यौरा समाजशास्त्री और इतिहासकार दे सकते हैं.

लेकिन अब हमारे समाज में सवाल से हर कोई नाराज़ हो जाता है.

घर पर सवाल पूछो तो पिता नाराज़ हो जाता है. सवाल पर जवाब मिलने की बजाय झिड़क दिया जाता है, "ज़बान लड़ाते हो?"

स्कूल में टीचर से सवाल पूछें तो जवाब की जगह डांट मिलती है, "ज़्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करो."

दफ़्तर में बॉस से सवाल पूछो तो वह अक्सर कहता कुछ नहीं लेकिन उसका ख़ामियाजा तनख़्वाह और प्रमोशन सबमें भुगतना पड़ता है.

हमारे आसपास लोग तभी तक भले रह पाते हैं जब तक सवाल न पूछे जाएँ. या तो आप सहमत हो जाएँ या फिर अपनी असहमति को मन में दबाकर रखें.

इतिहास गवाह है कि विज्ञान से लेकर दर्शन तक जितने भी नए सिद्धांत प्रतिपादित हुए हैं, सवाल पूछे जाने से ही संभव हुए हैं.

ये बेवजह नहीं है कि शून्य का आविष्कार करने वाले, अर्थशास्त्र का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाले, शास्त्रार्थ करने वाले और दुनिया को भाषा देने का दावा करने वाले भारत में पिछले कुछ सौ सालों में ऐसा कुछ भी नया नहीं हुआ, जिसका आप गर्व से गुणगान कर सकें.

ऐसे किसी समाज में किसी नए की उम्मीद कैसे की जा सकती है जो सवाल पूछे जाने का विरोध करता हो.

नवीन जिंदल एक उदाहरण हैं. ऐसे नवीन जिंदल तो हम सबके मन में हैं, सवाल पूछे जाने से नाराज़ होते हुए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 23:01 IST, 11 सितम्बर 2012 अमित रंजन, नई दिल्ली:

    बरसों से हम ने चाटुकारिता की संस्कृति पैदा कर ली और उसे पाल रहे है. गुलामी गई, मगर बाबूडम हमने बचा लिया. यथार्थ से आँखें चुराना हमारी आदत में शुमार रहा है. बंधे बंधाए दायरों से निकलना जुर्म हो गया. हाँ, हम कभी इनसे बाहर झाँक कर देखते हैं मगर वह प्रश्न करने वाले कौम के धक्कों के चोट से ही हुआ. स्वभावतः हमने अपनी प्रतिभा खो दी.

  • 2. 02:03 IST, 12 सितम्बर 2012 Anuj:

    आम जनता अगर वोट देती है तो उसे सवाल पूछने का अधिकार है. नेता सोचते हैं कि जनता उनको पाँच साल में एक बार वोट देकर बर्दाश्त करती रहे. अब ज़माना बदल गया है.

  • 3. 04:08 IST, 12 सितम्बर 2012 Umesh Yadav:

    सबसे चालाक व्यक्ति जितना उत्तर दे सकता है, सबसे बड़ा मूर्ख उससे अधिक पूछ सकता है. बुद्धिमानी सवाल पूछने में नहीं उन सवालों के सटीक और संतुष्ट करने वाले उत्तर देने में है. इसलिए सवाल पूछने से ज़्यादा ज़रुरी है सही जवाब पाना. इसी में खोजी पत्रकारिता का मूल भी है.

  • 4. 12:53 IST, 12 सितम्बर 2012 amit kumar garg:

    इम्तिहान देते समय कहा जाता है कि सवाल गौर से पढ़ कर जवाब देना चाहिए. सवाल ही नहीं होगा तो जवाब कहां से आएगा? बहरहाल सवाल पूछने से साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि सवाल कौन पूछ रहा है. ये बात जरूर तीखी है, लेकिन सच है.

  • 5. 13:28 IST, 12 सितम्बर 2012 Amit Prabhakar:

    ऐसा तो नहीं है कि हमारा समाज शुरु से ही ऐसा रहा होगा. वरना उपनिषद या आरण्यक तो लिखे ही नहीं गए होते. कहाँ से आया ये सब? पर हम सबों को मिलकर अपने परिवार, छोटे ओहदे वालों और विद्यार्थियों में प्रश्नवाचक भाव लाने को प्रोत्साहित करना ही होगा.

  • 6. 13:41 IST, 12 सितम्बर 2012 Ajeet S Sachan:

    ये सवाल मैं अपने आपसे पूछता आ रहा हूँ कि आख़िर ऐसा क्यों है कि हम जवाब देने की बजाय सवाल को ही टालने की कोशिश करते हैं. पर पिछले दस सालों में ऑफ़िस में काम करते रहने के बाद समझ में आया कि
    1. हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार नहीं करना चाहते
    2. हम संपूर्ण जानकारी बांटने में भी समय नहीं देना चाहते
    3. दूसरों को काम समझाने की बजाय उससे काम करवाने की कोशिश ज़्यादा रहती है.

  • 7. 21:27 IST, 12 सितम्बर 2012 himmat singh bhati:

    विनोद जी सवाल पूछने पर ये धमाल क्यों. अगर सही में ये गलत है तो फिर से इसकी शुरुआत इन लोगों को अपने घरों से करनी चाहिए जब उनके बच्चे उनसे सवाल करें. ये लोग चाहें तो अपने बच्चों को स्कूल भी ना भेजें क्योंकि वहां भी ये सवाल करेंगे. सरकारी विभागों में भी ये कोई सवाल ना करें और विपक्ष को भी खत्म कर दें. जो गलत होंगे उन्हों औरों की सुननी भी पड़ेगी और जवाब भी देना होगा क्योंकि वे उस पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं जो देश की जनता टैक्स में चुकाती है.


  • 8. 11:03 IST, 13 सितम्बर 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी काश आप बीबीसी के काम-काज के बारे में भी कुछ लिखते तो अच्छा होता. मैंने तो बीबीसी के बारे में कई बार लिखा है लेकिन उसका जवाब नहीं मिला.

  • 9. 16:53 IST, 13 सितम्बर 2012 bhinyaram:

    नेता चुनाव जीतकर यह सोचने लग जाते हैं की पांच साल हमारे हैं.

  • 10. 11:28 IST, 14 सितम्बर 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    जहाँ कहीं भी सवाल पूछने पर किसी की घिग्घी बंध जाती है या माथे पर बल पड़ जाता है इस तरह के लोगों के द्वारा ही समाज का अनर्थ होता है. इस तरह के मूर्खों को कौन समझाए.

  • 11. 20:40 IST, 15 सितम्बर 2012 SUBHASH WAGHMARE:

    सवालों पर सवाल पूछना मानो रावण के सर को बांधना. इससे अच्छा एक ही सवाल पूछो और उस सवालों से मिलने वाले जवाब से रावण के दसों सिर कट जाए.

  • 12. 12:30 IST, 17 सितम्बर 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    वर्मा जी ने एक सुंदर प्रयास किया है अंधे सुसुप्त समाज को जगाने का किंतु ये प्रयास तनिक और स्पेसेफिक और विशलेषण द्वारा किया जाना चाहिए था.

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