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कौन है अक्षम?

राजेश प्रियदर्शी राजेश प्रियदर्शी | मंगलवार, 04 सितम्बर 2012, 02:41 IST

पाँचवीं कक्षा में संस्कृत में पढ़ा था-- 'आलस्यम् हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान रिपु:' लेकिन इस नीति वचन का अपने ऊपर कोई ख़ास असर नहीं होने दिया.

अपने आलसी होने पर मैं आसानी से शर्मिंदा नहीं होता, मगर इन दिनों पैरालिंपिक्स देखकर ख़ासा शर्मसार हूँ, जिन लोगों को शारीरिक तौर पर अक्षम कहा जाता है वे ही मुझे अक्षमता का एहसास करा रहे हैं.

सोचता हूँ कि क्या बढ़ी हुई तोंद एक तरह की विकलांगता नहीं है? शायद ज़्यादा बुरी विकलांगता है क्योंकि अक्सर इनसान इसके लिए ख़ुद ज़िम्मेदार होता है.

'एबल बॉडीड' यानी स्वस्थ सबल आदमी माना जाता हूँ मगर बीस-तीस मीटर दौड़ना पड़ जाए तो हालत बिगड़ जाती है. दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के ऑस्कर प्रिस्टोरियस हैं जो घुटने के नीचे, दोनों पैर कटे होने के बावजूद 400 मीटर की दौड़ 45 सेकेंड में पूरी कर लेते हैं.

चीन के तैराक जैंग ताओ ने स्वर्ण पदक जीता है, मगर वे अपने पदक को हाथों से छू नहीं सकते. सीटी बजने पर उनके कोच उनके पेट के नीचे हाथ रखकर उन्हें पानी में उतारते हैं क्योंकि उनके दोनों हाथ कंधे से कटे हुए हैं. एक मैं हूँ जिसे स्विमिंग पूल के गहरे हिस्से में जाने से डर लगता है.

टीवी पर एक साइकिलिस्ट को देख रहा था, वेलोड्रम में साइकिल तेज़ी से चल रही थी, मुझे लगा कि शायद मूक-बधिर साइकिलिस्ट होंगे, जब कैमरे का एंगल बदला तो पता चला कि वे साइकिल एक पैर से चला रहे थे.

सच ये है कि अब से पहले पैरालिंपिक्स पर मैंने ख़ास ध्यान नहीं दिया, यही सोचता था कि उसमें देखने को कुछ ख़ास नहीं होगा, मगर इस बार कुछ ऐसे दृश्य देखे हैं जिन्हें भूलना आसान नहीं होगा.

ये दृश्य मेरे भीतर एक तरह की हीनभावना पैदा करते हैं और ये भी बताते हैं कि समस्या शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक है. हिम्मत और लगन, हाथ-पैर या आँख-कान के मोहताज नहीं.

मन शरीर का 'अंग' नहीं है इसलिए टूटे हुए मन या पस्त हौसले वाले व्यक्ति को विकलांग नहीं कहा जाता, मानसिक सबलता को भी देखा जाए तो, न जाने कितनी बड़ी आबादी विकलांग साबित होगी.

ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अपंग-विकलांग लोगों का हौसला बढ़ाने वाला साइडशो है पैरालिंपिक्स. किसी भी स्पर्धा को ठीक से देखिए तो आपकी राय बदल जाएगी.

जिन देशों में विकलांग कहे जाने वाले लोगों के प्रति दुर्भावना ज़्यादा दिखाई देती है उन देशों में आवश्यक रूप से पैरालिंपिक्स दिखाया जाना चाहिए ताकि लोग समझ सकें कि इन लोगों को दया नहीं, सम्मान चाहिए.

इस दृष्टि से पैरालिंपिक्स बहुत अच्छा नाम नहीं है, यह सिर्फ़ पैरेलल ओलंपिक नहीं है, इसका नाम 'करेज ओलंपिक' या 'डिटरमिनेशन ओलंपिक' जैसा कुछ होना चाहिए था, यह शारीरिक क्षमता की प्रतियोगिता नहीं है बल्कि मनुष्य के मनोबल का सबसे बड़ा शो है.

सबल शरीर को आदर से झुकाकर, इन एथलीटों के बुलंद जज़्बे को सलाम.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:45 IST, 05 सितम्बर 2012 Anand Agarwal:

    आपका लेख दिल को छू जाने वाला है. वाकई वो लोग मानसिक रूप से विकलांग होते हैं जो लोग शारीरिक विकलांगता का मज़ाक उड़ाते हैं.

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