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ज़िया ज़िंदा है

मोहम्मद हनीफ़ मोहम्मद हनीफ़ | रविवार, 15 जुलाई 2012, 14:45 IST

न कहीँ मातमी जलसा, न कोई स्मृति टिकट, न किसी बड़े चौक पर उनकी प्रतिमा, न किसी पार्टी झंडे पर उनकी तस्वीर, न उनकी मज़ार पर प्रशंसकों की भीड़, न किसी को यह पता कि मज़ार के नीचे क्या दफ़न है.

न किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में उनके सिद्धांत, न समय उठते राजनीतिक हंगामों में उनकी बात, न बड़े लोगों के ड्राईंग रुमों में उनके साथ खिंचवाई हुई तस्वीर, न किसी पुस्तकालय में उनके हाथ ही लिखा हुआ कोई लेख, न कोई राजनेता छाती पर हाथ मार कर कहता है कि मैं उनका मिशन पूरा करुँगा, न कोई दुआ के लिए हाथ उठाता है कि मौला हमें एक ऐसा ही मुक्ति दिलाने वाला और दे.

यदि ये बच्चों की कहानी होती तो हम यहाँ यह कह सकते थे कि बस सिद्ध हुआ कि अत्याचार को विराम नहीं, अत्याचारी को कोई अच्छे शब्दों में याद नहीं रखता, अपने आप को ख़ुदा समझने वाले रेत की प्रतिमा होते हैं.

इतिहास सबसे बड़ा न्याय दिलाने वाला है और उसकी सबसे बड़ी सज़ा यह है कि वह आपका नाम-ओ-निशान मिटा देता है. जिस व्यक्ति ने पूरे राष्ट्र को टकटकी पर लटकाया, संविधान को कागज़ का चीथड़ा बताया, जनता के नेताओं को सूली पर लटकाया, बाक़ी बचे राजनेताओं को अपने दर का कुत्ता क़रार दिया, जो अपने लोगों को गुलाम बना कर अफ़गानिस्तान, भारतीय पंजाब और कश्मीर को आज़ाद कराने चला, जिसने अपनी इच्छा को अल्लाह का क़ानून क़रार दिया और अल्लाह के क़ानून को गली गली बदनाम किया. आज उनका नाम भी भुला दिया गया.

उनके घर से लाभ उठाने वाले भी उनके ज़िक्र पर यूँ मुँह बनाते हैं जैसे गले में हराम चीज़ आ गई हो.

ज़िया किसी इंसान का नाम होता तो शायद हम भूल गए होते लेकिन वह एक सोच का नाम था, विचारधारा का नाम था, या यूँ कहिए कि एक बीमारी का नाम था जो हमारे ख़ून में रच बस गई और हमें पता भी नहीं चला.

जब भी कभी 'ज़िंदा है भुट्टो ज़िंदा है' का नारा सुनता हूँ तो जी चाहता है कि उन दीवानों को समझाऊँ कि नहीं भुट्टो फाँसी पर झूल गया, आओ तुम्हें दिखाता हूँ कि कौन ज़िंदा है. देखो तुम्हारी सड़कों, चौकों पर, तुम्हारे मोबाईल फोन की रिंगटोन में, जिधर देखो, जिधर सुनो, ज़िया ज़िंदा है.

वह ज़िंदा है हमारे बच्चों को पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में, उनको सुनाई जाने वाली लोरियों में, हमारे संविधान, क़ानून में, उस क़ानून की रक्षा करने वालों के ज़मीर में, उस क़ानून को अल्लाह का क़ानून बनाने का वादा करने वाले के दिमाग़ में. वह ज़िंदा है मस्जिदों में फटने वाले युवाओं के दिलों में, वह ज़िंदा है टीवी के ड्रामों में, टीवी टॉक-शो से मीज़बानों में, हमारे गले से निकली जाली अरबी आवाज़ों में, वह ज़िंदा है हिजाबों में, नक़ाबों में, हीरोइन की दौलत से बने मेहलों में, हराम-हलाल करते बैंक खातों में.

वह ज़िंदा है शादी पर चलाई जाने वाली कलाशनिकोव की आवाज़ में, वह छिपा है उस चौक पर जहाँ 70 वर्षीय बुढ़िया भीख मांगती है और आपको हाजी साहब कह कर पुकारती है, वह ज़िंदा है हर उस पुलिस वाले के सवाल में जब वह कहता है कि निकाहनामा कहाँ है.

वह ज़िंदा और आसिया बीबी की काल कोठड़ी का पहरेदार है. वह हर अहमदी, हर शिया, हर हिंदू, हर ईसाई के सिर पर लटकी तलवार है. (उनमें मज़ार पर धमाल डालने वालों, या रसूल अल्लाह कहने वालों या नंगे सिर नमाज़ पढ़ने वालों को भी शामिल करें).

वह ज़िंदा है हमारे राजनीतिक ढांचे में, हमारी चादर और चार-दीवारी में, हमारे सकारात्मक परिणामों में, हमारे निज़ाम-ए-मुस्तफा की तलाश में, हमारे उम्मत-ए-मुसलमा के सपने में, वह ज़िंदा है हमारे हर अज़ाब (पीड़ा) में.

जब अहमदपुर शरकिया के चनी गोठ चौक पर हज़ारों लोग इकट्ठे होते हैं और एक मलंग पर तेल छड़कना शुरु करते हैं तो वह उस भीड़ में शामिल हर शख़्स के दिल में ज़िंदा है. जब मलंग शख़्स को आग लगाई जाती है और वह चीख़ता तो लोगों की ख़ामोशी में से यही आवाज़ आती है. देखो मैं ज़िंदा हूँ.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:20 IST, 15 जुलाई 2012 नवल जोशी:

    हनीफ साहब, आपने पाकिस्तान के संदर्भ में जो कहा है वह हर जगह की बात है, हर देश में, हर समाज में यहॉ तक कहा जा सकता है कि लगभग हर व्यक्ति में जिया है, लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम इन जियाओं को किस तरह निबटाते हैं, इस पूरे प्रकरण में यह कैसे कहा जा सकता है कि हर कसूर जिया का ही है हमारा कोई कसूर नहीं है ,हम भी जिया के पीछे चले यह कसूर कम तो नहीं है और हम सारा दोष जिया पर ही रख दें और खुद इससे बच निकलें यह सम्भव नहीं है, आज भी यदि पाकिस्तानी समाज में जिया रच-बस गया है तो यह कम गम्भीर बात नहीं है, जिया को पाकिस्तानियों ने हराया नहीं वह दुर्घटना में मारा गया अन्यथा क्या होता कुछ कहना कठिन है। लोग हमेशा से ही भले होते हैं यह धारणा भी ठीक नहीं है आम जनता भी चालाकी करती है आज अमेरिका को ही लें वहॉ के लोगों का समर्थन अपनी उस सरकार के साथ है जो पूरी दुनियां में तबाही का सबब बनी हुई है और मध्यपूर्व को तो इस सरकार ने बर्बाद ही कर दिया लेकिन अमेरिका की जनता आज मजे में है क्योंकि मध्यपूर्व की खुली लूट से अपने खुशहाल दिन लौटाने का ख्वाब वहॉ के आम जनमानस में है, लेकिन जब इनके फौजी मारे जाते हैं तो ये बिलखने लगते हैं और वहॉ युद्ध विरोधि प्रदर्शन होने लगते हैं। यही हाल द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की निर्णायक पराजय होने तक जर्मन जनता का भी रहा है हिटलर तब तक जर्मनों का हीरो था। जनता भी दोषी होती है हम इससे इन्कार नहीं कर सकते हैं। लेकिन आपने जो मुद्दा उठाया है वह वाकई जिया के खिलाफ जागरूक होने और लडाई की शुरूआत है इसी तरह जियाओं को हराया जा सकता है। चाहे हमारे भीतर का कोई जिया हो समाज में कोई जिया हो या राजनीति में कोई जिया हो हमें लाभ हानि की चिंता किये बगैर अपनी बात कहनी चाहिए जैसा कि आपने कहा है। आपने बहुत शिद्दत से यह ब्लॉग लिखा है इसके लिए आपका धन्यवाद।

  • 2. 01:35 IST, 16 जुलाई 2012 स्वप्निल:

    रोंगटे खड़े हो गए पढ़कर लगा कि किसी युद्ध या दंगे का वीडियो देख रहा हूँ. वाकई कलम की ताक़त किसी भी तलवार से बड़ी होती है.

  • 3. 02:01 IST, 16 जुलाई 2012 अंकुर झा :

    पहली बार आपको पढ़ा हूँ.वाकई आपके लेखन का कायल हो गया. उम्मीद करता हूँ, यहीं से आपके साथ रिश्ता बने.

  • 4. 10:22 IST, 16 जुलाई 2012 नरेन्दर:

    ठीक लिखा है आपने.

  • 5. 12:10 IST, 16 जुलाई 2012 ताहिर, दिल्ली:

    कमाल का लेख है हनीफ़ साहब, आपकी पत्रकारीय समझ का प्रमाण.

  • 6. 16:59 IST, 16 जुलाई 2012 सज्जाद उल हसनैन, हैदराबाद, आंध्र प्रदे:

    हनीफ साहब कमाल लिखते हैं आप. यकीनन ज़ियावाद एक बीमारी है और ये बीमारी हमें वक्त जड़ पकड़ती है जब एक बड़ी जमात या फिर ये कहें कि बहुमत का ज़हन बनाने में कामयाबी मिल जाए. जहाँ तक मेरा ख़याल है अगर ज़िया को अपने नज़रियात सार्वजनिक थोपने में कामयाबी चरमपंथियों को मिली है मगर इसकी बड़ी वजह आवाम की सोच ही रही है.

  • 7. 08:19 IST, 17 जुलाई 2012 डॉ लाल रत्नाकर:

    मोहम्मद हनीफ़ ज़ी का आलेख पढ़ा. निश्चित रूप से 'मुसलमान' के लिए जिया जिन्दा है, जो इतिहास के विद्यार्थी हैं वो जानते हैं की इतिहास अपने को दोहराता है, जिया बार बार जीतता है. पर जो हारा था वह बार बार हार रहा है पिछले दिनों 'अंबेडकर' की तरह एक और ऐतिहासिक घटना हुयी थी जिसका केंद्र उत्तर प्रदेश था, जिसमे उस इतिहास बनाने वाला हारा ही नहीं ठगा गया था, कहते हैं अंतिम दिनों में आंबेडकर भी किसी 'घातक' संगति के शिकार हुए थे और 'अंबेडकर अभी जिन्दा है' की युक्ति सटीक नहीं हुई और न ही दोबारा ऐसा हुआ जब वह विचारधारा फिर उन्हीं कंधों से लुढ़क गई.काश हिन्दुस्तान में एक और जिन्ना जैसा उनका मसीहा बन पता. सुंदर ब्लॉग के लिए बधाई.

  • 8. 14:33 IST, 17 जुलाई 2012 धर्मेश शाह:

    बहुत अच्छा लिखा है. और आपकी सोच पाकिस्तानी सोच नहीं है ये जानकर बड़ी खुशी हुई क्योंकि ज़िया ऐसा पाकिस्तान चाहते थे - हर जगह मुजाहिदीन और इस्लाम साथ में हों, वो वो खुद को इस्लाम के आका के तौर पर पेश करना चाहते थे. आज ज़िया तो ज़िन्दा नहीं हैं लेकिन उनकी सोच आज भी पाकिस्तान में मौजूद है.

  • 9. 22:05 IST, 17 जुलाई 2012 गुनगुन झा:

    गुस्सा आता है जब किसी मुसलमान का लिखा ऐसा कुछ पढ़ने को मिलता है। लगता है जैसे एक खेल चल रहा हो जहाँ एक तरफ बम फोड़े जा रहे हैं और दूसरी तरफ तुलसी की माला जपी जा रही है। क्या आप उत्तरदायी नहीं हैं? क्या आप दोषी नहीं? जिया पर दोष मढ़कर आज पूरा पाकिस्तान अपने आपको धुला हुआ साफ-सुथरा दीखना चाह रहा है। दो सौ बरस पीछे जाकर किसी और को दोष दे दीजिए। आगे भी किसी ना किसी का नाम तो रहेगा ही ठीकरा फोड़ने को। आप सबों के दिये पैसों से ही ये आवाज का खेल खेला जा रहा है। और आपका ही कोई दूर का भाई खेल रहा है।

  • 10. 13:25 IST, 18 जुलाई 2012 E A Khan, Jamshedpur (Jharkhand):

    हनीफ साहब आप के ब्लॉग का करारा जवाब इस ब्लॉग पर गुनगुन झा की टिप्पणी लगती है. आप के ही किसी आबा वज्दाद ने उस जुलूस में शिरकत की होगी जब पाकिस्तान बनाने की जद्दोजहद उरूज पर थी और लोग नारा लगाते सड़कों पर शान से उधम मचा रहे थे गरजदार आवाज़ में "हाथ में बीड़ी मुंह में पान, लेके रहेंगे पाकिस्तान." उस समय जब मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के अस्तित्व को सिरे से नकारना चाहा कि खुदा की बनाई हुई ज़मीं पाक या नापाक नहीं होती. इन सब बातों और नादानियों का खामियाजा पूरे एशिया महाद्वीप को झेलना पड़ेगा. वक़्त ने अपना काम करना प्रारंभ कर दिया है. जिया, लादेन और न जाने और कितने लोग इस तरह से जन्म लेते रहेंगे और अमेरिका जैसे षड़यंत्रकारी देश अपनी रोटी सेंकते रहेंगे.

  • 11. 02:05 IST, 27 जुलाई 2012 nivedita:

    अच्छा लगा पढ़कर , आपको पढ़कर हमेशा अच्छा लगता है.

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