इस विषय के अंतर्गत रखें मई 2012

ढूँढते रह जाओगे....

टीम अन्ना घायल शेर की तरह चिल्ला रही है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें आरोप साबित करने की चुनौती दे रहे हैं. कह रहे हैं कि आरोप साबित हुए तो संन्यास ले लेंगे.

प्रशांत भूषण को इस बात का पछतावा नहीं कि उन्होंने प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाते हुए शिखंडी का उदाहरण दे डाला.

कल को सरकार के मंत्री भी इस होड़ में शामिल हो जाएँगे. फिर शुरू होगा कभी न थमने वाला आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला. ऐसा सिलसिला जो कहीं जाकर नहीं थमता.

टीम अन्ना में दरार है, तो सरकार भी लोकपाल विधेयक को लेकर संजीदा नहीं और विपक्ष भी इस मामले पर शेखी बखारने के अलावा कुछ ठोस करता नहीं दिख रहा है.

बाबा रामदेव की एक अलग धुन है. गाहे-बगाहे उनके बयान मीडिया में चर्चा बटोरते हैं और कल को बाबा का नया बयान उनके पुराने बयान की ही बखिया उधेड़ते नजर आता है.

ऐसा लगता है कि सब कुछ एक फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह हो रहा है. नायक, खलनायक सब तय हैं. सरकार भी आनंद मगन है. उसे और क्या चाहिए. पिछले साल अगस्त में हुए आंदोलन से घबराई सरकार घुटने टेक गई. लेकिन समय अनुकूल होते ही उसकी भी भाव-भंगिमा बदल गई.

इस मामले में जनता ने भी कम उपकार नहीं किया है. मैं भी अन्ना तू भी अन्ना के नारे लगाते रामलीला मैदान में जुटी भारी भीड़ का उत्साह भी पस्त हो गया लगता है.

हर कोई रास्ते से भटक गया लगता है. हर किसी को एक-दूसरे को बौना दिखाने में लगा है. इन सबके बीच असल मुद्दों की फिक्र किसी को नहीं.

क्या कभी वो लोकपाल बन पाएगा, जिसके लिए बड़ी शिद्दत से मांग उठी थी? क्या सरकार वर्षों से लटकाए जा रहे लोकपाल विधेयक को उतनी मजबूती दे पाएगी, जिसकी मांग पिछले एक साल से हो रही है?

क्या टीम अन्ना अपनी मांग पर टिकी रहेगी? क्या टीम अन्ना अराजनीतिक रह पाएगी? क्या टीम अन्ना खुद का घर संभाले रख पाएगी? ये सब ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब शायद हम आप सभी ढूँढ़ते ही रह जाएँगे.

अगर मैं प्रधानमंत्री होता

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 22 मई 2012, 16:27

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स्कूल के दिनों में निबंध लिखने को जो विषय दिए जाते थे वे अक्सर बेहद उबाऊ होते थे. इनमें से एक होता था, 'यदि मैं प्रधानमंत्री होता....'

बचपन में ये कभी समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री होने पर क्या करना पड़ता है और क्या किया जा सकता था. तो अंत में ये होता था कि गुरुजी अपनी मर्जी का एक निबंध लिखवा देते और ज़्यादातर बच्चे उसे रटकर परीक्षा में पास होने का जुगाड़ करते थे.

लेकिन अब कुछ चीज़ें समझ में आती हैं. क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की एक सूची मन में हर वक़्त रहती है. शायद हर सोचने विचारने वाले व्यक्ति के मन में ऐसा होता होगा.

जब यूपीए सरकार की दूसरी पारी के भी तीन साल बीत गए और मीडिया में आकलन की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई तब लगा कि अपने साथियों से ही पूछा जाए कि वे क्या सोचते हैं.

मैंने अपने साथियों से अलग-अलग पूछा कि पिछले आठ वर्षों से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं अगर वे मनमोहन सिंह की जगह होते तो क्या करते और क्या नहीं करते?

जो जवाब आए, उन्हें पिरोकर देखें तो यूपीए सरकार और मनमोहन सिंह के कार्यकाल की एक तस्वीर उभरती है. आप भी एक नज़र डालिए. बस, इतनी सी इल्तजा है कि ध्यान में रखिएगा कि ये ब्लॉग मेरे नाम से प्रकाशित हो रहा है लेकिन इस बार विचार उधार के हैं...

दस चीज़ें जो मैं करता (या नहीं करता) अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता...

1. मनमोहन सिंह बहुत पढ़े लिखे और समझदार व्यक्ति हैं. वे सब कुछ समझते हैं. अगर मैं उनकी जगह होता तो कम से कम अपने निर्णय ख़ुद लेता. किसी के इशारे पर नहीं चलता. इस अनिर्णय की स्थिति से ये हो गई है कि पिछले आठ वर्षों में ऐसा एक भी निर्णय याद नहीं आता जो मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में लिया हो. नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने लिखा था कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को भले ही 'फ़र्स्ट अमंग इक्वल्स' हों लेकिन वो होते अव्वल ही हैं. निर्णय लेने में उनसे आगे कोई नहीं होता. लेकिन मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अव्वल नहीं दिखते.

2. मैं प्रधानमंत्री की जगह होता तो लोकप्रियता और गठबंधन की राजनीति में सहन करने की एक सीमा तय करके रखता. याद है जब 2008 में अमरीका से परमाणु समझौते का मुद्दा आया था तो कैसे उन्होंने कैसे अपनी सरकार और अपने प्रधानमंत्रित्व सब कुछ को दाँव पर लगा दिया था. समझ में नहीं आता कि एफ़डीआई से लेकर रेल का भाड़ा बढ़ाए जाने तक दर्जनों और मुद्दों पर वे क्यों समझौता करते चलते हैं. मैं होता तो एक सीमा के बाद इस्तीफ़ा दे देता. मुझे लगता है कि ये सीमा पार हो चुकी है.

3. मुझे याद आता है कि वर्ष 2004 में जब प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण दिया था तो उन्होंने संस्थागत सुधारों की बात कही थी. वह मूल रूप से नौकरशाही में सुधार की बात थी. जिसमें कलेक्टर, एपी जैसे अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल देना जैसी बात शामिल थी. उन्होंने कुछ शुरुआत तो की लेकिन नौकरशाही ने आगे कुछ करने नहीं दिया. नतीजा ये है कि आज सरकार गर्त में दिखती है और नौकरशाह मज़े में. मैं होता तो नौकरशाही के विरोध के बावजूद सुधार कार्यक्रम को नहीं छोड़ता. आख़िर देश तो नौकरशाही ही चलाती है. वह जवाबदेह क्यों न बने.

4. मुझे तो प्रधानमंत्री का 1992 का भाषण याद आता है जब वित्तमंत्री के रुप में आर्थिक सुधार की शुरुआत करते हुए मनमोहन सिंह ने महात्मा गांधी का उद्धरण देते हुए कहा था कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं वह समाज के आखिरी आदमी के लिए है. आज जब वे प्रधानमंत्री के रूप में आठ साल पूरा कर रहे हैं तो यह देखना पीड़ादायक लगता है कि उनकी अध्यक्षता में चलने वाले योजना आयोग तो कभी हर रोज़ 26 रुपए कमाने वाला ग़रीब नज़र नहीं आता तो कभी उनकी सरकार को ये लगता है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लोगों की ख़रीदने की क्षमता बढ़ गई है. मैं होता तो ग़रीबी और महंगाई को लेकर ऐसी हास्यास्पद स्थिति तो कम से कम नहीं बनने देता.

5. मैंने मनमोहन सिंह को हमेशा एक अर्थशास्त्री की तरह देखा है. समझ में नहीं आता कि एक समय भारत को संकट से उबारकर आर्थिक उदारता के दौर में लाने वाले मनमोहन सिंह वामपंथी दलों के इतने दवाब में कैसे आ जाते हैं कि आर्थिक सुधार की पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती है. मैं उनकी जगह होता तो उसी अर्थशास्त्री की तरह काम करता रहता.

6. मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो देश में जगह-जगह अनाज तो सड़ने नहीं देता. उनके भंडारण की बेहतर व्यवस्था करता और जमाखोरी को ख़त्म करने के लिए कड़े क़दम उठाता. मैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ख़त्म कर देता और ज़रुरतमंदों को सीधे नक़द राशि देने का इंतज़ाम करता और अनाज का आवंटन हर उस व्यक्ति के लिए होता, जिसे उसकी ज़रुरत है. उसके लिए आय आदि की कोई सीमा नहीं होती.

7. इस समय दुनिया में राजनीतिक पुनर्ध्रुवीकरण की एक प्रक्रिया चल रही है. रूस और चीन एक साथ आते दिख रहे हैं और उनके नेतृत्व में सऊदी अरब के विरोधी इस्लामिक देश जैसे ईरान, सीरिया और लेबनान एक साथ आते दिख रहे हैं. ऐसे में अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो अपनी पूरी विदेश नीति को अमरीका की ओर न मोड़कर दूसरे देशों के साथ काम करने की एक गुंजाइश बचाए रखता है. शायद इससे आने वाले दिनों में, आने वाली पीढ़ियों की मुश्किलें कम हो जातीं.

8. अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो वर्ष 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के ख़िलाफ़ वोट नहीं देता. इस एक निर्णय की वजह से ईरान ने भारत के साथ 21 अरब डॉलर का गैस समझौता ख़त्म कर दिया. इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को जैसा नुक़सान हुआ वह अपूरणीय है. मैं ऐसा कोई क़दम नहीं उठाता.

9. मैं इस प्रधानमंत्री की जगह होता तो अन्ना हज़ारे को कभी गिरफ़्तार नहीं करवाता क्योंकि इसकी कोई वजह नहीं थी. मैं रामदेव के अनशन के दौरान आधी रात को आंसू गैस के गोले छोड़कर मैदान भी खाली नहीं करवाता. अगर ज़रुरी ही होता तो यह काम दिन में करवाया जा सकता था. क्या होता अगर भीड़ हिंसक हो जाती...क्या गोलियाँ भी चलतीं. एक लोकतांत्रिक देश में ये तरीक़ा ठीक नहीं है.

10. अगर मैं अपने आपको उनकी जगह रखकर सोचता हूँ कि लगता है कि मैं कम से कम इतना चुप तो नहीं रहता. ये ज़माना बराक ओबामा जैसे नेताओं का है, सोशल मीडिया का है. मैं उनकी जगह होता तो जनता से सीधे संवाद की कोशिश करता और फ़ेसबुक, ट्विटर आदि का ख़ूब प्रयोग करता.

ये तो रही साथियों की राय.

मैं ख़ुद इतनी गहरी बातें नहीं सोच पाता. लेकिन ये ज़रुर सोचता हूँ कि अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो कभी कभी हँसता, मुस्कुराता और कभी दुखी होकर आँसू भी बहाता. चाहे जो करना पड़ता मैं इस सपाट चेहरे से निजात पाता.

लेकिन साहबान क्या किया जाए कि मनमोहन सिंह की जगह कोई हो नहीं सकता. न मैं न मेरे साथी. फिर भी सोचिए कि अगर आप होते तो क्या करते?

धर्म या धंधा?

वंदना वंदना | बुधवार, 16 मई 2012, 02:23

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मेरे पास दो दिन की छुट्टी थी. सुझाव आया कि मथुरा और वृंदावन दो दिन में घूम सकते हैं. बृजभूमि है...कृष्ण से जुड़ी तमाम लीलाएँ, यमुना का तीर...ये सब सोचकर मन में कौतुहूल भी था.

पर वहाँ जो देखा और अनुभव किया उसका धर्म और कर्म से कम और छल और छलावे से लेना देना ज्यादा था.

मथुरा में प्रवेश करते ही खुद को पंडे या गाइड कहने वाले लोग आपको घेर लेंगे...कहेंगे 31 रुपए में दर्शन कराएंगे. आपकी गाड़ी का दरवाजा अगर खुला मिल गया तो आपके हाँ या न कहने के पहले आपकी गाड़ी में बैठ भी जाएंगे.

दूर दराज़ से आए और इलाके से अपरिचित लोग आसानी से इनकी बातों में आ जाते हैं. लेकिन बाद में पता चलता है कि ये 31 रुपए आपको काफी महंगे पड़ने वाले हैं.

दरअसल ये पूरा रैकेट है. गाइड आपको मंदिर के बाहर तक ले जाता है और अंदर मौजूद किसी पंडित के हवाले कर देता है.

मथुरा में ऐसा ही एक पंडनुमा गाइड हमें मथुरा से गोकुल ले गया, बिना हमें ठीक से बताए कि वो हमें कहाँ ले जा रहा है. रास्ते में वो कुछ बातें बार-बार दोहराता रहा जैसे गाय को दान देना चाहिए, इससे उद्धार होगा वगैरह वगैरह.

मंदिर में गाइड ने हमें पंडित के हवाले कर दिया. पंडितजी भी आते ही समझाने लगे कि गाय के नाम पर दान देना कितना पुण्य की बात होती है. तब समझ में आया कि दरअसल गाइड हमारा दिमाग पहले से कंडीशन कर रहा था ताकि पंडितजी की बात मानने में हमें आसानी हो.

यहाँ तक तो ठीक था. इसके बाद तो पंडितजी ने कमाल ही कर दिया. कहा पूजा के बाद कहा, 'दान देना होगा.'

इस 'दान देना होगा' में आग्रह नहीं आदेश था. उस पर तुर्रा ये कि दान उनकी बताई राशि के अनुसार देना पड़ेगा जिसमें न्यूनतम स्तर तय था. उससे ज्यादा दे पाएँ तो कहना ही क्या. दान न हुआ मानो इनकम टैक्स हो गया कि न्यूनतम कर देना लाजमी है. अनावश्यक भावनात्मक दबाव बनाने के लिए पंडित बोले मंदिर में संकल्प करो कि बाहर दानपत्र में कितने पैसे दोगे, तभी बाहर जाओ.

क्या इसके लिए आपके मन में धार्मिक ब्लैकमेल के अलावा कोई शब्द उभरता है?

मन खिन्न था कि कैसी लूट-खसोट है. धार्मिक लूट का रैकेट बना रखा है. लेकिन बाद में पता चला कि आदमी तो आदमी वहाँ तो बंदर भी रैकेट में शामिल हैं.

वृंदावन में बंदर बहुत हैं. एक बंदर ने हमारा सामान छीन लिया और छू मंतर हो गया. पलक झपकते ही न जाने कहाँ से बहुत से लड़के भागते हुए आए और कहा 500 रुपए दो तो सामान ला देंगे. जब चेहरे पर न का भाव देखा तो रेट कम हो गया. उनमें से एक ने कहा, "अच्छा 100 रुपए." बात 50 रुपए पर तय हुई. आखिर मुसीबत में फँसा व्यक्ति उस समय करे भी क्या. एक मिनट के अंदर सामान वापस ला दिया गया.

वहाँ फल की दुकान लगाए एक दुकानदार ने बताया कि बंदर प्रशिक्षित हैं. बंदर सामान छीनते हैं और इनके प्रशिक्षक पैसों के बदले में सामान वापस देते हैं. कोई हजार रुपए में फँस जाता है तो कोई 50 रुपए में.

वापस लौटने पर एक सहयोगी ने बताया कि जगन्नाथपुरी जैसी जगहों पर तो हालत इससे भी बुरी है.

इस तरह ठगने वाले लोग धर्म-धर्म में फर्क नहीं करते क्योंकि एक अन्य मित्र ने बताया कि अजमेर शरीफ जैसी जगहों पर भी लोगों को कुछ ऐसे ही अनुभवों से गुजरना पड़ता है.

धर्म मानों धर्म न रहकर धंधा बन गया है.

वैसे धंधा तो सम्मानजनक होता है क्योंकि कोई सामान बेचता है और खरीददार खरीदते हैं. शर्तें तय की जाती हैं और मामला साफ़ होता है. यहाँ तो लूट हो गई है. धर्म की लूट.

लेकिन स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी लोग ऐसे नहीं होते. पर आस्था और धर्म का दोहन करने वालों की भी कमी नहीं है. इन लोगों की महारत इसी से समझ में आ जाती है कि शिक्षित, जागरुक लोग भी इनके झाँसे में आ जाते हैं.

कुछ हद तक मैं भी इस झाँसे में आ ही गई थी. अफसोस कि ये बात थोड़ी देर से समझ में आई.

मंटो की ख्वाहिश

बरखुरदार खुश रहो,

बहुत शुक्रिया कि तुमने मुझे सौंवी सालगिरह पर याद रखा. कुछ देर पहले ही इफ़्तिख़ार आरिफ़ यह बताने आया था कि उसने पाकिस्तानी सरकार को लिखित सिफारिश की है कि मुझे भले दें ना दें मगर वसी शाह, सालेह जाफर और सआदत हसन मंटो को ज़रूर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट एवार्ड से से नवाज दें.

मैंने उनके इस एहसान का शुक्रिया अदा करके बात सुनी अनसुनी कर दीं.

तुमने पूछा है कि दिन कैसे गुजर रहे हैं तो मियां बरखुरदार मुझ जैसे टुच्चे लेखक के दिन कैसे गुजर सकते हैं? कुछ करने को है नहीं, न सोचने को है. जितना कुछ शुरू के 42 वर्षों में कर लिया उसका एक तिहाई भी बाद के 67 साल में नहीं हो पाया.

आज सौ बरस का होने पर यह सोच रहा हूँ कि क्या यह वही मंटो है जो एक सिगरेट की राख झाड़ने से पहले एक कहानी झाड़ कर उठ खड़ा होता था. जिसका कोई भी रेडियो प्ले, स्क्रीनप्ले या कैरी केचर आधी बोतल की मार था.

मगर आज मेरी जिंदगी में अगर कोई लफ्ज बचा है तो वो है - काश. काश मेरी सफिया से शादी न हुई होती. हो भी जाती तो काश वो पहले लाहौर पहुंच कर मुझे वहाँ आने पर मजबूर न करती. मजबूर कर भी लेती तो मेरी बात मान कर मुंबई दोबारा जाने के लिए राजी हो जाती.

लेकिन जब न चाहते हुए एक देश के दो टुकड़े हो जाएं और मियां बीवी भी यह तय नहीं कर पाए कि उन्हें रहना कहाँ है और इस दौरान नुज़हत, निगहत और नुसरत भी हो जाएं तो काश का लफ्ज़ भी उस मुक्के में बदल जाता है जो हारने के बाद अपने ही मुँह पर मार लेना चाहिए.

लेकिन यह भी तो सोचो कि सफिया न होती तो मंटो कैसे होता. कोई और सफिया तो दिखाओ जो मुझ जैसे आग के गोले को अपनी हथेलियों में छुपा ले. कितना कुछ सहन करने वाली औरत थी. कहाँ ताने और नशे से चूर पच्चीस रुपए कमाने वाला एक कहानीकार और कहां सफिया.

यह दस रुपए आपकी बोतल के, यह पांच रुपए आपके आने जाने के और यह दस.....इसमें घर का खर्च चल जाएगा. आप बिल्कुल परेशान ना हों, मैं हूँ न.

लेकिन मैं आज तक इस सवाल के भंवर में हूँ कि सफिया मुझे पाकिस्तान आखिर क्यों लाई. मेरा यहां क्या काम था? भला चमड़े के बाजार में इत्र बेचने और नेत्रहीन समाज में रौशनी बेचना संभव है क्या?

चालीस और पचास के दशक में तो मैंने समाज के साथ और सामाजिक ठेकेदारों ने मेरे साथ जो किया सो किया लेकिन अय्यूब खां के जमाने में तो अल्ताफ़ गौहर ​​और कुदरतुल्लाह शहाब के चाटुकार प्रकाशकों ने तो मेरी तमाम किताबें बाजार से हटवा दीं. मगर इस दौरान बांग्ला पत्रिकाओं में मेरी कहानियों के अनुवाद खूब छपे. उस वक़्त तो मैं समझ नहीं पाया कि बंगालियों को मेरी कहानियों में ऐसा क्या नजर आ गया मगर साल 1971 में ये भी मेरी समझ में आ गया.

जब दौर बदला तो मौलाना कौसर नियाजी की मेहरबानी से पेट की आग बुझाने का इंतजाम तो हो गया लेकिन दिमाग की प्यास फिर भी ना बुझ सकी. लेकिन हसरत मोहानी के बाद ये दूसरे मौलाना हैं जो मुझे जीवन में अच्छे लगे.

एक बात मैंने आज तक किसी को नहीं बताई तुम्हें पहली बार बता रहा हूँ.

हुआ यूं कि एक बार मौलाना जब मुझसे देर रात मिलने आए (वह हमेशा रात ही में मिलने आते थे) तो मैंने उनसे कहा कि करने को कुछ नहीं है. कम से कम कोई साहित्यिक पर्चा ही संपादित कर लूं तो कुछ संतुष्टि हो जाएगी. मौलाना ने पहले तो मुझे टकटकी बांधकर मिनट भर देखा. फिर हंस पड़े जैसे मैंने कोई लतीफ़ा सुना दिया हो. कहने लगे मंटो साहब मौलवी लोग पहले ही हमारे खून के प्यासे हैं. ऐसी ख़तरनाक फरमाइशें ना करें.

उनके जाने के बाद मैंने एक कहानी लिखी 'मुनाफिकस्तान'. मगर पत्रिका के संपादक ने (उनका नाम लेना उचित नहीं) कहानी छापने के बजाय मौलाना को पोस्ट कर दी. उसके बाद संपादक और मौलाना से मरते दम तक मुलाकात नहीं हुई.

1970 में दो त्रासदी हुईं. मेरी सफिया का इस दुनिया से जाना और ज़िया उल हक का आना. एक ने मुझे बिल्कुल अकेला कर दिया और दूसरे ने उस तन्हाई को और बढ़ा दिया.

लेकिन मियां बरखुरदार वर्ष 1970 मेरी ढलती जिंदगी के सीने पर लगा ऐसा पत्थर है जिसका बोझ कब्र के सिवा कोई हल्का नहीं कर सकता.

मैं आज 35 साल बाद भी यह तय नहीं कर पाया कि दोनों में से कौन सी त्रासदी अधिक संगीन थी.

जब 1983 में एक सैन्य अदालत ने मेरी एक कहानी 'एक भेंगे की सरगुज़श्त' पर पांच कोड़ों की सज़ा सुनाई उसके बाद से तुम तो जानते ही हो कि मैंने ऐलान कर दिया कि अब लिखने पढ़ने को जी नहीं चाहता.

लेकिन चुपके-चुपके लिख-लिख कर दराज में रखता जाता हूँ. लेकिन सुनाने या प्रकाशित कराने की इच्छा मर चुकी.

मगर आजकल यह चिंता सताए जा रही है कि इस पुलिंदे का क्या करूँ, किसके सुपुर्द करूँ क्योंकि मैं जहां रहता हूं वहां तो सिर्फ कागज के लिफाफे बनाने का रिवाज है.

बरखुरदार, सब कुछ देखते ही देखते कैसा बदल गया. इस्मत ​​जब भी पाकिस्तान आती थी ज़रूर मिलती थी. फिर वो भी चल बसी.
मुझे यकीन है कि उसे बुला कर ऊपरवाला भी पछता रहा होगा. और अली सरदार जाफ़री ... हाय क्या आदमी था. अब तो गुमान होता है कि सभी चले जाएंगे.

रह जाएगा तो एक लाल बैग और दूसरा सआदत हसन मंटो.

तीन साल से तीन कहानियों पर काम कर रहा हूँ. एक कहानी गायब लोगों पर आधारित है और मैंने उसका शीर्षक 'साये का साया' सोच रखा है.

एक कहानी आत्मघाती हमले में दोनों टाँगें गंवाने वाले ढाई साल के एक बच्चे की जिंदगी के ईर्द गिर्द घूमती है. इसका शीर्षक मैंने 'बदसूरत खूबसूरती' सोचा है.

तीसरी कहानी एक ऐसी औरत के बारे में है जिसका 1947 में बतौर लड़की, 1971 में बतौर एक अलगाववादी की पत्नी और 1985 में अपने पोते के पाप की सजा के तौर पर बलात्कार हुआ. इसका शीर्षक मैं 'हैट्रिक' रखना चाहता हूँ.

चौथी कहानी अभी केवल मेरे ज़ेहन में है. यह कब्र खोलकर महिलाओं के शव निकाल कर 'काले जादू' का कारोबार करने वालों के बारे में है. लेकिन मैं अब किसी नंगी लाश की चर्चा तो दूर, उसके बारे में सोचते हुए भी डरने लगा हूँ.

शायद इस गुमान का कारण यह है कि अब जो हालात मेरे सामने हैं उनसे निपटना तो दूर उन्हें समझना ही मुझ जैसों के बस से बाहर है.

निगहत, नुजहत, नुसरत और उनके बच्चे मेरा बहुत खयाल रखते हैं. बस उस सवाल पर कभी कभी उनसे कड़वा हो जाता है कि बाबा आप हमारे साथ क्यों नहीं रहते. उन्हें कैसे कहूँ कि बाबा तो अपने साथ नहीं रह पा रहे किसी और के साथ क्या रहेंगे.

हाँ कभी कभी अदनान नाम का एक नौजवान मेरे लिए कुछ शराब ले आता है.

पिछले साल जब मैं 99 साल का हुआ तो अदनान मुझे 2005 में मेरे जन्मदिन पर छपने वाला सरकारी डाक टिकट फ्रेम करवा कर और एक मोबाइल फोन तोहफे में दे गया.

फ्रेम तो मैंने लटका दिया लेकिन मोबाइल फोन वैसे का वैसा डिब्बे में बंद है . भला फोन मेरे किस काम का? मैं किसे फोन करूँ? साथ के दोस्त दुश्मन सभी तो मर गए. एक दिन अदनान कह रहा था कि उसने मेरी वेबसाइट बना दी है. एक दिन कह रहा था कि फेसबुक पर मेरा पेज बना दिया है. मुझे तो उसकी बातें पल्ले नहीं पड़तीं, बस हूँ हाँ करता रहता हूँ.

अकेलापन और बढ़ती उम्र वैसे भी इंसान को बुजदिल बना देती है. कभी कभी साहित्य से शौक रखने वाले कुछ सनकी बच्चे कहीं से पता खोजते हुए मुझ तक पहुंच जाते हैं. मगर सबका यही सवाल कि आज का नौजवान सआदत हसन मंटो कैसे बन सकता है?
मैं उनसे कहता हूं कि शर्म करो और शुक्र करो तुम में से कोई मंटो नहीं, क्या नसीहत देने के लिए एक काफी नहीं.

मैं नहीं चाहता कि उनकी हिम्मत टूटे इसलिए उनसे ये भी नहीं कह सकता कि मंटो के चक्कर में न पड़ो. इस समाज में रहना है तो डॉक्टर नहीं कसाई बनो, बाग़ी नहीं दलाल बनो, दिल को ताला लगा दो, दिमाग में भूसा भर लो और भेजा फ़्राई पेट भर के खाओ. शराब पीनी है तो ट्रांसपेरेन्ट पियो और मिनरल वाटर की बोतल में पिओ.

मगर ये साले मंटो बनना चाहते हैं!!! देखते नहीं कि मैं ही वह मनहूस हूँ जिसने अपनी जीवन में ही इस धरती और समाज को 'टोबा टेक सिंह' बनते देख लिया बल्कि इस टोबा टेक सिंह में नया कानून तो दूर जंगल का कानून तक नहीं.

सड़क पर चलते आदमी को पता ही नहीं चलता कि कब 'ठंडा गोश्त' बन गया. आपने किसी से धार्मिक और राजनीतिक मतभेद जाहिर किया नहीं कि आपकी सलवार उतरी, भले उसका रंग कैसा ही हो.

वह भी क्या जमाना था कि मंटो तीस मिनट में कहानी लिख मारता था. आज यह स्थिति है कि तीन साल से तीन कहानियों पर काम कर रहा हूँ. लेकिन तीनों की तीनों अभी तक पूरी नहीं हो सकीं.

बरखुरदार अब कब लाहौर आना होगा. इस दफ़ा लक्ष्मी मैंशन की तरफ मत जाना. उसे लालची प्लाजों ने घेर लिया है. सीधे कल्मा चौक आ जाना जहां लोग मेरे घर का पता बता देंगें. घर क्या है. एक बंगले के पिछवाड़े में बने दो कमरों में रहता हूँ.

अब तो बस एक ही ख्वाहिश है कि 101 वें जन्मदिन ऐसी जगह मनाऊँ जहाँ मेरे सिवा कोई ना हो.

केवल तुम जैसों का,

सआदत हसन मंटो.

हैप्पी बर्थडे मंटो

मंटो मियां बधाई. आज जीवित होते तो एक सौ कैंडल साथ जलाकर केक काट रहे होते.

अगर यह सोच कर परेशान हो कि इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान के सबसे बड़े जज तुम्हारे जन्मदिन पर क्यों खुश हैं, बधाई क्यों दे रहे हैं तो मियाँ बात यह है कि हमारे ब्रदर जजों के साथ तुम्हारे कुछ दिन बीते हैं. यह अलग बात है कि वह न्यायाधीश की कुर्सी पर थे और तुम अभियुक्तों के कठघरे में.

फिर तुम्हारे खिलाफ फैसला देने से पहले और एकाध बार बरी करने से पहले अपने चेंबर में बैठकर तुम्हारी अश्लील कहानियों के मजे भी लिए हैं, कानों को हाथ लगाकर अल्लाह से माफी भी मांगी है, तो इतना अधिकार तो बनता ही है कि 'हैप्पी बर्थ डे' बोल दें.

वैसे तुम्हें यह भी बताना था कि हमारी सारी कोशिशों के बावजूद तुम्हारी किताबें माशाअल्लाह खूब छप रहीं हैं और बिक भी रही है. पता नहीं तुम्हारे परिवार को रॉयल्टी मिलती है या नहीं लेकिन जिसे देखो मंटो छाप रहा है. हाल ही में एक किताब की दुकान पर तुम्हारी लिखी एक भारी भरकम किताब नजर आई. इसे उठाकर कुछ पन्नों पर नजर डाली तो इस दुबले-पतले बदन में वही सनसनी दौड़ गई जैसे साठ साल पहले अपने चेंबर में दौड़ी थी.

फिर दिल में कुछ हलचल होने लगी, किताब बंद की तो कीमत पर नज़र पड़ी 750 रूपए. बधाई मंटो मियां अब यह हिसाब करने मत बैठ जाना कि 750 रुपए में तुम शराब के कितने अध्धे खरीद सकते हो. मियां आजकल पीने के लिए पैसे के साथ दिल और गुर्दा भी चाहिए.

पहले अपने आप को शरीफ़ नागरिक साबित करना पड़ता है. हां लेखकों और पत्रकारों को आजकल साहित्यिक मेलें में बुलाकर खूब पिलाई जाती है. और अगर अंग्रेजी में लिखते हो तो ऐसी-ऐसी मिलती है कि तुम ने मम्मी के कोठे पर नहीं देखी होगी. लेकिन तुम्हें कोई काहे को बुलाए, क्योंकि तुम तो पीने से पहले ही साहित्यिक मेले के व्यवस्थापकों और उनके प्रायोजकों के माँ बाप की शान में गुस्ताखियाँ करने में लगे थे जैसे हमारे सम्मानित जज भाइयों की शान में करते थे.

मंटो मियाँ तुम्हें अपनी कलम से खींच कर पीने की आदत थी और फिर उसके बारे में लिखने की भले लोगों में बात करने की आदत थी. आजकल जो पीते हैं वो इस बारे में बात नहीं करते जो नहीं पीते वह झूम-झूम कर उपदेश करते हैं.

मियां सच्ची बात तो यह है कि साहित्यिक दुनिया में तुम्हारी भी गुस्ताखियां ही तुम्हें ले डूबीं. जिस महफ़िल में लोग होंठों के प्याले से जरा लेने की बात करते थे तुम वहाँ पर अपना ठर्रा खोल कर बैठ जाते थे.

अब तुम्हारे भतीजे की बेटी और तुम जैसी ही निडर इतिहासदान आयशा जलाल ने शोध से साबित किया है कि पाकिस्तान आने से पहले तुम सिर्फ शराब पीते थे, पाकिस्तान आकर तुम पक्के शराबी बन गए. यानी कि पाकिस्तान ने तुम्हें एक पूरा शराबी बना दिया.

जाहिर है तुम्हारा खून है दोष तो हमें ही देगी.

याद है जब उपर तले और बीच वाला मामला भुगतने कराची आए थे और सफर के खाने में केवल बीयर की दस बोतलें थीं. मियां अगर आज लिख रहे होते तो ऊपर नीचे और बीच पर तो माफी हो जाती लेकिन दस बीयर पीने की पता है कितनी सज़ा है? और अगर इस्लामी गणतंत्र के मुख्य न्यायाधीश को खबर हो जाती तो आधे पर भी ऐसा टांगता कि सारी उम्र तारीखें भुगतते रहते.

क्या-कहा एक-आधे पर?

अगर मेरी बात पर विश्वास नहीं रहा तो अतीखा ओढो से पूछ लो.

यह अतीखा ओढो कौन है?

अब पूछो कि मुख्य न्यायाधीश कौन है और क्या चाहता है और कोई कहानी जोड़ने बैठ जाओगे. मंटो मियां तुम्हारे साथ तो वैचारिक बातचीत करते भी पेंशन खतरे में पड़ जाती है. अब तुम्हारे आधे या बीयर की बोतल या मुख्य न्यायाधीश का उल्लेख नहीं होगा. और भी विषय हैं जैसे कि 'शलवार' को 'शलवार' कहने पर क्यों आग्रह है?

आमिर एव जयते

सुशील झा सुशील झा | सोमवार, 07 मई 2012, 09:25

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बॉलीवुड स्टार आमिर खान के शो सत्यमेव जयते ने टीवी पर धूम मचा रखी है लेकिन क्या टीवी पर शो हो जाने से भ्रूण हत्याएं रुक जाएंगी.

क्या आमिर के कहने से हमारा सभ्य समाज बदल जाएगा और भ्रूण हत्याएं होनी बंद जाएंगी. ये एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब किसी के पास नहीं है..

हालात तो ये हैं कि जब मैंने ये सवाल सोशल मीडिया पर उठाए तो कहा गया कि मैं नेगेटिव सोच वाला पत्रकार हूं.

मेरी समस्या न तो आमिर खान से है और न ही उनके कार्यक्रम सत्यमेव जयते से जिसमें कन्या भ्रूण हत्या को एक मुद्दा बनाया गया है.

समस्या इस बात से है कि क्या हमारा समाज इस हालत में पहुंच गया है कि किसी स्टार को बताना पड़ेगा कि कोई मुद्दा कितना गंभीर है या किस मुद्दे पर हमें सोचना चाहिए.

स्वदेश सिंह ने हवाला दिया अनपढ़ जनता का जिसे जागरुक किए जाने की ज़रुरत है लेकिन ये देखना भी ज़रुरी है कि भ्रूण हत्याओं का गढ़ हमारे गांव नहीं बल्कि शहर हैं जहां भ्रूणों की पहचान होती है.

सोशल मीडिया पर भ्रूण हत्या का विरोध करने वाले और टीवी पर कार्यक्रम देखकर आंसू बहाने वालों में कई वो लोग भी शामिल हैं जो लड़कियों को बोझ के तौर पर देखते होंगे.

क्या आपको लगता है कि वो टीवी पर शो देखकर लड़कियों के प्रति अपना दुराग्रह बदल लेंगे.

अगर हमारी मानसिकता यही रह गई है कि जो स्टार बोलेगा उसे ही मानेंगे तो फिर ऐसे समाज के बारे में कुछ कहने की ज़रुरत नहीं.

वैसे सोचने की ज़रुरत भी क्या है. आमिर खान ने कोक बेचा था तो हमने पिया ही था हो सकता है कि भ्रूण हत्या पर उनकी बात भी हम मान ही लें.

लेकिन मुझे लगता है कि ये क्षणिक आवेग है जो टीवी के ज़रिए लोगों के आंसूओं में तब्दील होकर निकला है.

इस शो ने उन लोगों को अपनी आत्मग्लानि आंसूओं के ज़रिए निकालने का मौका दिया है जो जानते हैं कि भ्रूण हत्याएं हो रही हैं लेकिन वो कुछ कहना नहीं चाहते. रोना आसान उपाय है.

ये आत्मशुद्धि का दौर है. फेसबुक एकटिविज्म का दौर है. एक मित्र संजय करीर ने सही कहा ये फेकबुक है.

भ्रूण हत्या की गंभीरता को समझने के लिए आमिर की ज़रुरत पड़ना ही दर्शाता है कि समाज कहां जा रहा है.

मां-बहन-बीवी-भाभी के साथ रहते रहते भी अगर हम औरत के महत्व को नहीं समझते हैं और इसके लिए आमिर की ज़रुरत पड़ती है तो क्या कहने हैं इस समाज के.

गलत साबित होना किसी को अच्छा नहीं लगता लेकिन मैं चाहता हूं मैं इस मुद्दे पर ग़लत साबित हो जाऊं. लोग आमिर के ज़रिए ही सही मुद्दे की गंभीरता को समझें और कुछ ऐसा हो कि ये भ्रूण हत्याएं रुक जाएं.

दिल्ली, पंजाब की गलियों में फैले डॉक्टरों की वो दुकानें बंद हों जहां लिंग परीक्षण होता है तभी मैं समझूंगा कोई बात बनी है. इस मुद्दे पर गलत साबित होने में मुझे बेहद खुशी होगी.

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