इस विषय के अंतर्गत रखें फरवरी 2012

नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की एक किरण

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | बुधवार, 29 फरवरी 2012, 17:14

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जब जूते ख़रीदने के भी पैसे न हों और कोई हाशिम ख़ान स्क्वॉश के मैदान पर झंडे गाड़ दे और फिर अगले 52 वर्षों तक उनका परिवार यह झंडा न गिरने दे.

जब करोड़ो महिलाएँ अभी केवल सपने में ही विमान उड़ाने का जोखिम कर सकें और कोई शुक्रिया ख़ानम विमान उड़ाने लगे और वह भी आज से 53 वर्ष पहले.

जब 80 प्रतिशत महिलाएँ पुरुष की अनुमति के बिना घर से बाहर न निकल सकें और कोई मिनरा सलीम अन्टार्क्टिका पर क़दम रख दे. जब 95 प्रतिशत बलात्कार से प्रभावित महिलाएँ और उनके परिजन चादर में मुँह छिपाए छिपाए घूमें और कोई मुख़्ताराँ माई सर उठा कर खड़ी हो जाए.

जब जिम्नेज़ीअम जाने के लिए बस का पूरा किराया भी न हो और कोई नसीम हमीद ऐशिया की तेज़ गति से भागने वाली लड़की का ख़िताब ले जाए.

जब देश के 38 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा भी पूरी किए बिना स्कूल से ड्रॉप आउट हो जाएँ और कोई अली मुईन नवाज़िश एक ही साल में 21 विषयों में ए-लेवल पास करने का विश्व रिकॉर्ड बना दे.

जहाँ विज्ञान के प्रयोगशालाओं में एक तकनीशियन के भी लाले पड़े हों वहां कोई बूढ़ा अब्दुल सलाम भौतिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार उड़ा ले जाए.

जहाँ नेत्रहीनों के लिए न शिक्षा की गारंटी हो और न ही रोज़गार की ....वहाँ के नेत्रहीन की क्रिकेट टीम एक नहीं दो विश्व कप जीत जाए.

जहाँ के पहाड़ी लोग विदेशी पर्वतारोहियों की मदद कर घर का चूल्हा जलने पर ख़ुश हो जाएं और उनमें से कोई नज़ीर साबिर और फिर कोई हसन सदपारा माउंट ऐवरेस्ट को सर कर ले.

जहाँ नृत्य की शिक्षा को लूज़ करेक्टर की पहली सीढ़ी बताया जाए, साढ़े सात सौ सिनेमाघर पोने दो सौ में सिकुड़ जाएँ, फिल्मी स्टूडियो गोदाम बन जाएँ.

जहाँ रोना सामान्य बात बन जाए और हंसना ख़तरे से ख़ाली न हो.

ऐसे माहौल में कोई शरमीन ओबैद चिनॉए बसंत के मौसम में सेविग फेस के साथ छम से ऑस्कर के मंच पर आ जाए तो अच्छा क्यूँ न लगे?

इस जीत के मायने

रेहान फ़ज़ल रेहान फ़ज़ल | सोमवार, 27 फरवरी 2012, 07:44

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भारत ने चिली की चार साल पुरानी यादों को धूमिल करते हुए फ्राँस को 8-1 से हरा कर लंदन ओलंपिक के लिए अपना टिकट सुरक्षित कर लिया है.

आठ बार के ओलंपिक चैंपियन के लिए यह उपलब्धि मामूली लग सकती है लेकिन यह जीत भारत में हॉकी के खेल के लिए एक संजीवनी ले कर आई है.

इस जीत के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही पच्चीस हज़ार दर्शकों से खचाखच भरे ध्यानचंद स्टेडियम में अंतिम सीटी बजी भारत के महानतम जीवित हॉकी खिलाड़ी 88 वर्षीय बलबीर सिंह की आँखों से आँसू बह निकले.

वीआईपी इनक्लोज़र में बैठे दूसरे हॉकी के बड़े खिलाड़ी रुंधे गले से इस तरह गले मिल रहे थे मानों भारत ने ओलंपिक पदक जीत लिया हो. सबसे खुश करने वाली बात थी कि भारत ने आक्रामक हॉकी खेल कर यह जीत दर्ज की है.

विपक्षी खिलाड़ियों का स्तर भले ही विश्व स्तर का न हो लेकिन अर्से बाद भारतीय फ़ॉरवर्ड्स ने लहरों में हमले कर 70 के दशक की उस फ़ॉरवर्ड लाइन की याद दिला दी जिसमें अशोक कुमार, गोविंदा, फ़िलिप्स और हरचरण सिंह खेला करते थे.

संदीप सिंह ने पेनल्टी कॉर्नर से 16 गोल कर यह बता दिया कि सुरजीत सिंह के बाद भारत को सही मायनों में पहला विश्व स्तर का पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ मिल गया है.

पूरे टूर्नामेंट के दौरान जिस तरह से उप कप्तान सरदारा सिंह मैदान में चारों तरफ़ दिखाई देते थे, 1975 की विश्व विजेता भारतीय टीम के कप्तान अजीतपाल सिंह की याद ताज़ा हो आई. पहली बार ऑस्ट्रेलियाई कोच माइकल नॉब्स ने भारतीय खिलाड़ियों को यह अहसास दिलाया कि वह भी अच्छा खेल सकते हैं.

पहले अक्सर देखा गया है कि बढ़त लेने के बाद भारतीय टीम सुस्त पड़ जाती थी. अनेकों बार विपक्षी टीमों ने आखिरी मिनटों में भारत के ख़िलाफ़ या तो मैच बराबर किया है या जीत दर्ज की है. लगता है कि नॉब्स ने खिलाड़ियों को घुट्टी पिला दी थी कि आधुनिक हॉकी में चार गोल के अंतर को ही सुरक्षित माना जा सकता है.

इस भारतीय टीम का दूसरा सबसे बड़ा गुण है इसकी फिटनेस. नॉब्स ने रोलिंग सब्स्टीट्यूशन का शानदार इस्तेमाल कर किसी खिलाड़ी को एक बार में चार मिनट से ज़्यादा खेलने ही नहीं दिया. नतीजा यह रहा कि जब वह मैदान पर उतरते थे तो बिल्कुल तरोताज़ा रहते थे.

भारतीय हॉकी की असली परीक्षा तो अब शुरू होगी. लंदन ओलंपिक में उनका मुकाबला इससे कहीं तगड़ी टीमों से होगा. लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करना एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है लेकिन भारत में हॉकी की असली वापसी तभी होगी जब लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम विक्ट्री पोडियम पर नज़र आएगी.

जाड़ों की नर्म धूप, और...

अपूर्व कृष्ण अपूर्व कृष्ण | गुरुवार, 23 फरवरी 2012, 05:05

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जाड़े में ख़ूब ठंड लगती है, मगर उसका लोगों को इंतज़ार भी होता है.

जब ट्रंक-आलमारी से नेफ़्थेलीन की गोलियों से गंधाए रंग-बिरंगे स्वेटर-जैकेट-टोपी-मफ़लर निकलते हैं, जब शादी के ज़माने में सिलवाए सूट-कोट के दिन फिरते हैं.

जब सूरज के ठीक सिर के नीचे क्रिकेट खेलने का सुख लिया जाता है, रात को बैडमिंटन के कोर्ट सजते हैं, आलू-छिमी-टमाटर की तरकारी और गाजर के हलवे का भोग किया जाता है.

और जाड़ों की नर्म धूप और...आंगन में ना सही, छत या बरामदे पर लेटकर....इस गाने वाली अनुभूति तो अपनी जगह है ही.

लेकिन इस जाड़े का एक दूसरा चेहरा भी है जो सुहाना नहीं डरावना है. इसने इस साल यूरोप में कोई साढ़े छह सौ लोगों की बलि ले ली.

रूस, यूक्रेन, पोलैंड, चेक गणराज्य, बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, सर्बिया, क्रोएशिया, मॉन्टेनीग्रो, स्लोवेनिया - इन देशों में जाड़ा मौतें लेकर आया.

मगर मरनेवाले कौन थे? अधिकतर ग़रीब और बेघर-बेसहारा लोग. पता नहीं उनकी मौत का बड़ा ज़िम्मेदार कौन है - जाड़ा, या ग़रीबी?

पश्चिमी देश, यूरोप, अमरीका - ये अमीर हैं, और पुराने अमीर हैं. मगर ग़रीबी यहाँ भी बसती है, और अक्सर दिखती भी है, बशर्ते देखनेवाला देखना चाहे.

लंदन में रनिवास बकिंघम पैलेस और प्रधानमंत्री आवास 10 डाउनिंग के निकट, चमकते-दमकते पर्यटक स्थल ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर के पास, तमाम रंगीनी और रौनक के बीच कहीं दिखाई दे जाएँगे - ग़रीब-होमलेस-बेघर.

कहीं चुपचाप, ठिठुरते, कोई मैग्ज़ीन बेचते खड़े हुए, या कहीं सड़क किनारे, किसी दूकान के पास, किसी कोने में गत्तों के विछौने पर कंबल में लिपटे सोते हुए.

ऐसे बेघरों की सहायता करनेवाले एक चर्चे के पास, एक बोर्ड पर लिखा है, कई होमलेस लोग सारे-सारे दिन एक भी शब्द नहीं बोलते, कोई उनसे बात नहीं करता, बहुतों को डिप्रेशन या दूसरी मानसिक बीमारियाँ हो जाती हैं, बहुतेरे हार जाते हैं, आत्महत्या की कोशिश करते हैं.

वहीं एक बेघर का अनुभव लिखा है - "पहला दिन, जब मुझे सड़क पर सोना था, मैं बहुत झिझक रहा था, मैं सड़क पर बैठा, गत्ते बिछाए, फिर अपने बैग से पानी-कप-चादर-चप्पल जैसे सामान निकालना शुरू किया, डरते-डरते, कि कहीं लोग मेरा वो सामान देख ना लें...थोड़ी देर बाद मैंने देखा, इसकी चिन्ता की कोई ज़रूरत ही नहीं - लोग हम जैसों की ओर देखते ही नहीं."

पिछले दिनों एक पत्रिका में एक युवा टीटीई ने एक घटना के बारे में बताया - एक बार मुझे ट्रेन पर एक बूढ़ी महिला मिली, बेटिकट. मैंने उसे 360 रूपए का फ़ाइन लगाया. उसने बिना कुछ बोले दे दिया. बाद में देखा, वो एक कोने में बैठी रो रही है. मैं उसके पास गया. वो पहले डर गई. फिर बाद में सहज हुई और बताया कि वो दाई का काम करती है, नर्सिंग की पढ़ाई कर रही अपनी बेटी से मिलने जा रही है जिसने पैसे माँगे हैं. उसके पास केवल 500 रूपए थे, जिसमें से 360 उसने मुझे दे दिए थे. मैं परेशान हो गया. मैंने उसे पैसे लौटाने चाहे, मगर उसने मना कर दिया. बोली - "ठीक है बेटा. तुम्हारे मन में दया है. मुझे तो तुम जैसे लोगों से दो अच्छे बोल की भी उम्मीद नहीं रहती."

बेघर-लाचार हर तरफ़ हैं, हर मौसम में - जाड़ा हो, या गर्मी. आँखें धोखा दे देती हैं, उन्हें देखने के लिए दिल चाहिए.

युवराज का दर्द हमारा भी है

पंकज प्रियदर्शी पंकज प्रियदर्शी | गुरुवार, 16 फरवरी 2012, 01:12

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कभी-कभी इसका अंदाज़ा नहीं होता कि आने वाला वक्त कैसा होगा. ऐसे ही आने वाले वक्त से बेख़बर जब एक सुबह टीवी पर निगाह गई, तो हर जगह ख़बरें चल रही थी युवराज को कैंसर है.

कुछ महीनों पहले इस ख़बर ने सभी क्रिकेट प्रेमियों को परेशान किया था कि युवराज को ट्यूमर है, लेकिन साथ ही ये भी सूचना दी गई थी कि कैंसर नहीं है.

और अब सभी क्रिकेट प्रेमियों को सकते में डालने वाली ये ख़बर कि युवराज सिंह को कैंसर है. सहसा यक़ीन नहीं हुआ. होता भी कैसे जिस व्यक्ति ने क्रिकेट के माध्यम से क्रिकेट प्रेमियों को कई जश्न वाले दिन दिए हो, एक सेलिब्रिटी हो और ज़िंदादिली की निशानी हो, उसे इस हाल में देखना किसे पसंद होगा.

आशा, निराशा और हताशा के बीच जब आख़िरकार 28 साल बाद भारत ने पिछले साल क्रिकेट का विश्व कप जीता था, तो सभी क्रिकेट प्रेमियों की तरह हमने भी जम कर जश्न मनाया था.

सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह को गले लगकर फूट-फूट कर रोते देखकर शायद ही कोई भारतीय क्रिकेट प्रेमी भावुक नहीं हुआ होगा. अगर क्रिकेट भारत के नस-नस में बसा है, तो सच है वो क्षण रोने वाला ही था.

थोड़ा और पीछे चलते हैं जब वर्ष 2002 में नैटवेस्ट सिरीज़ के फ़ाइनल में युवराज सिंह ने मोहम्मद कैफ़ के साथ मिलकर भारत को शानदार जीत दिलाई थी. वो दिन भी झूमने के थे.

वो दिन भी याद कर लेते हैं जब 2007 में क्रिकेट विश्व कप में हार से भारत का हर क्रिकेट प्रेमी निराश था. इसी साल महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी कप्तानी में कुछ अनुभवी तो कुछ युवा खिलाड़ियों की बदौलत भारत को ट्वेन्टी-20 विश्व कप में जीत दिला दी.

उसी प्रतियोगिता में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मैच में जब युवी का बल्ला चला और ऐसा चला कि स्टुअर्ट ब्रॉ़ड के एक ओवर में छह आसमानी छक्के देखने को मिले. किसने उस बेहतरीन क्षण का लुत्फ़ न उठाया होगा.

लेकिन हम ही कई बार खिलाड़ियों और उनके खेल को लेकर इतने आलोचनात्मक हो जाते हैं कि हमें अंदाज़ा ही नहीं होता कि वे कितने दबाव में, कितनी विपरीत परिस्थितियों में खेलते हैं.

पिछले साल के विश्व कप को याद कीजिए और याद कीजिए युवराज की कई बेहतरीन पारियाँ. भारत जीता. किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि मैदान पर खाँसते, उल्टियाँ करते युवराज कितनी बड़ी बीमारी पाले हुए हैं.

युवराज और उनके परिवार को पता था कि युवराज की बीमारी गंभीर है, लेकिन युवराज ने खेलने का फ़ैसला किया. ख़िताब जीतने के बाद उनकी आँखों से लगातार निकलती अश्रुधारा सारी कहानी बयां कर रही थी.

लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को इसका अंदाज़ा बहुत बाद में हुआ कि युवराज अपनी ज़िंदगी को दाँव पर लगाकर विश्व कप में खेल रहे थे.

वही युवराज आज अपने जीवन के अहम मोड़ पर हैं. डॉक्टर कह रहे हैं घबराने वाली बात नहीं, युवराज ठीक हो जाएँगे और फिर मैदान पर आ सकेंगे. युवराज ने भी ट्विटर पर संदेश लिखकर लोगों को भरोसा दिया है कि वे फ़ाइटर हैं और मज़बूत होकर वापस आएँगे.

एक विज्ञापन में युवराज को ये कहते सुना जाता है- जब तक बल्ला चल रहा है....ठाट हैं. जब बल्ला नहीं चलेगा फिर....?????? सफलता में तो सब साथ होते हैं, लेकिन जब चोट लगती है तो ख़ुद को मालूम होता है उसके बारे में.

आज हमें ये जताने की ज़रूरत है कि उनकी इस पीड़ा में हम उनके साथ है. युवराज के चलते क्रिकेट प्रेमियों ने खुशियों के क्षण जिए हैं. अब एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते हमें युवराज को ये बताने की ज़रूरत है कि हमारे लिए उनकी कितनी अहमियत है.

बलवान समय की 'लाचारी'

सुशील झा सुशील झा | रविवार, 12 फरवरी 2012, 14:46

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मैं समय हूं....कुछ लोग कहते हैं कि मैं बलवान हूं लेकिन मैं अक्सर खुद को बहुत असहाय महसूस करता हूँ. ये अहसास कोई नया नहीं है लेकिन रह रहकर ये मुझे अपनी क्षुद्रता का भान कराता है.

मैं उस दिन बहुत असहाय था जब मुहम्मद गौरी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा था. कई बार यह लूट चलती रही और मैं मंदिर के बुर्ज पर खड़ा यह लूट देखता रहा. मैं उस दिन भी बहुत असहाय था जब पोरबंदर के एक दुबले पतले लाठी लेकर चलने वाले सत्यवादी व्यक्ति को दिल्ली के बिड़ला हाउस में गोली मार दी गई थी.
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मैं उस दिन बहुत कमज़ोर था जब दिल्ली में सिक्खों को घर से निकाल- निकाल कर मारा गया था. मैं उस दिन भी बहुत कमज़ोर था जब अयोध्या में एक मस्ज़िद को तोड़ कर मिट्टी में मिलाया गया था.

मैं सरयू के पास बैठा यह नज़ारा देखता रहा लेकिन कुछ कर न सका. लेकिन इसके दस साल बाद जो गोधरा में हुआ उसे देखकर मेरी कमज़ोरी भी कमज़ोर हो गई है.

अयोध्या से लेकर गोधरा के बीच मेरी उम्र दस साल बढ़ गई लेकिन मैं इन दिनों बहुत बूढ़ा हो गया हूं क्योंकि मैं भी अब औरों की तरह इंतज़ार में हूँ.

दस वर्षों में सरयू और साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका है. सत्ता बदली है फ़िज़ा भी बदली है लेकिन अगर कुछ नहीं बदल सका है तो मेरा कमज़ोर दिल जो अब भी धड़कता है इस डर में कहीं फिर अयोध्या और गोधरा न हो क्योंकि कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है.

मैं नहीं चाहता कि ये इतिहास दोहराया जाए. आदमी से आदमी को फिर लड़ाया जाए और लाशों की आंच में राजनीति की रोटियां सेंकी जाए.

धर्म के नाम पर राजनीति लंबे समय से देखता रहा हूं. मैंने बुद्ध को देखा है, महावीर को देखा है. शंकराचार्य को भी देखा है. मैंने अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया को भी देखा है. अकबर और औरंगजे़ब को भी देखा है. लेकिन ये दौर-ए-मोदी है जहां हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है.

मैं नहीं जानता इतिहास अयोध्या या गोधरा को याद रखेगा या नहीं लेकिन इतना ज़रुर जानता हूं कि मैं इन्हें ज़रुर याद रखूंगा क्योंकि मेरी यादों की पोटली में ये दो सबसे दुखद स्मृतियों में से है.

मैं जानता हूं साबरमती ट्रेन में मारे गए 59 कारसेवकों को भी कोई याद नहीं रखेगा और न ही दंगों में मारे गए 2000 लोगों को. इन पर आयोग काम करेगा. कोर्ट काम करती रहेगी. राजनेता इनके नाम लेते रहेंगे लेकिन न्याय करने वाले मेरा नाम लेकर कहेंगे कि मैं सारे घाव भर देता हूँ.

मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अब मैंने घाव भरने बंद कर दिए हैं. मैंने अपनी आंखें भी बंद कर ली हैं क्योंकि न्याय का इंतज़ार करते लोगों की नज़रें मुझसे अब बर्दाश्त नहीं होती हैं.


इस जग में बदलाव के सपने

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | गुरुवार, 09 फरवरी 2012, 17:55

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ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन और बहरीन में पिछले एक साल के दौरान मरने वालों की संख्या में फ़र्क़ हो सकता है लेकिन समस्या के प्रकार में कोई फ़र्क़ नहीं.

पाँचों देशों में लोग जारी सैन्य शासकों से जान छुड़ाना चाहते थे या हैं.

ट्यूनीशिया में जनता जल्द ही ज़ैनुल आबदीन की तानाशाही से कुछ सौ लोगों की जान की क़ीमत देकर छुटकारा पाने में कामयाब हो गई.

मिस्र में आंशिक कामयाबी मिली और हुस्नी मुबारक की जगह सैन्य शासकों ने ले ली. मिस्र में संसदीय चुनाव तो सफलतापूर्वक हो चुके हैं लेकिन जब तक राष्ट्रपति चुनाव और संविधान बनाने की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से पूरी नहीं हो जाती मिस्र के लोकतांत्रिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा.

लीबिया में अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और अरब लीग की मदद से आया परिवर्तन संदिग्ध है. लीबिया गद्दाफ़ी के शासन के मलबे से निकल कर किसी पश्चिम समर्थक तानाशाही की चादर ओढ़ लेगा या वहाँ की आम जनता को अपना भविष्य ख़ुद तय करने की अनुमति मिल पाएगी. जवाब के लिए कम-से-कम एक से दो वर्ष की ज़रुरत है.

यमन में हालाँकि अली अब्दुल्ला सालेह ने हिंसक संघर्ष के बाद सत्ता अपने सहयोगी के हवाले कर दी है लेकिन पुराना तंत्र अपनी जगह बरक़रार है. बहरीन में बदलाव की इच्छा इतनी ही गंभीर है जितनी किसी और अरब देश में, लेकिन बहरीन की क्रांति को फिलहाल पश्चिम समर्थन से सऊदी चादर में लपेट कर पीटा जा रहा है.

सीरिया में पिछले 11 महीनों में बदलाव की इच्छा करने वालों की जितनी हत्याएं हो चुकी हैं इतनी किसी अरब देश में नहीं हुई. लेकिन वहाँ ईरान, चीन और रूस परिवर्तन की राह में बाधा हैं. क्योंकि राष्ट्रपति बशा अल असद फ़िलहाल ईरान के एकमात्र अरब दोस्त हैं.

इसी तरह रूस का देश से बाहर एकमात्र नौसैनिक अड्डा सीरिया में है. चीन के सीरिया में व्यापारिक हित हैं लेकिन चीन और रूस वहाँ परिवर्तन का विरोध कर अमरीका और अन्य देशों को यह संदेश देना चाहते हैं कि हर बार केवल आपकी मनमानी नहीं चलेगी.

चीन और रूस को यह भी आशंका है कि लीबिया की तरह पश्चिम देशों को अगर सीरिया में खुले हस्तक्षेप की अनुमति दे दी गई तो फिर अगला लक्ष्य ईरान होगा जो रूस और चीन के लिए आर्थिक, राजनीतिक और भौगोलिक तौर पर सीरिया से ज़्यादा महत्वपूर्ण देश है.

सुरक्षा परिषद में अब तक रूस 124, अमरीका 82, ब्रिटेन 35, फ्रांस 18 और चीन सात बार वीटो अधिकार का प्रयोग कर चुके हैं. हर बार वीटो किसी नेक मक़सद के लिए नहीं बल्कि कुछ बेचने और कुछ ख़रीदने के लिए इस्तेमाल हुआ है.

ऐसी दुनिया में भी अगर कोई समूह, वर्ग या देश अपने सपने साकार कर लेता है तो सलाम है ऐसे समूह, वर्ग और देश के लिए.

अराजक स्वामी

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | सोमवार, 06 फरवरी 2012, 19:34

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बात थोड़ी पुरानी है. एक दशक से थोड़ी ज़्यादा पुरानी. चर्चित वकील राम जेठमलानी उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे. उन्हीं दिनों सुब्रमण्यम स्वामी भी लोकसभा में चुनकर पहुँचे थे.

सुब्रमण्यम स्वामी ने खड़े होकर आरोप लगाया कि राम जेठमलानी और हथियारों के सौदागर अदनान खाशोगी में दोस्ती है. राम जेठमलानी ने तमतमाकर आपत्ति दर्ज की और कहा कि स्वामी झूठ बोल रहे हैं.

लेकिन स्वामी कहाँ चुप रहने वाले थे. उन्होंने पहले एक तारीख़ बताई कि किस दिन जेठमलानी और खाशोगी की मुलाक़ात हुई थी. फिर जगह का नाम बताया. फिर ये बताया कि वह एक याट (छोटी नौका) थी जहाँ दोनों मिले थे. स्वामी एक नई जानकारी देते और जेठमलानी तिलमिलाकर खड़े होकर उसे चुनौती देते.

फिर स्वामी ने बताया कि वह जेठमलानी की वकील बेटी रानी जेठमलानी का जन्मदिन था. जेठमलानी ने कहा कि वे स्वामी उनकी अवमानना कर रहे हैं और अध्यक्ष को उन्हें संरक्षण देना चाहिए. लेकिन स्वामी अनवरत जारी रहे. उन्होंने अपनी फ़ाइल से एक फ़ोटो निकाली और संसद को दिखाया. प्रेस गैलरी से फ़ोटो बहुत साफ़ नहीं दिख रही थी लेकिन ये सभी ने देखा कि उसके बाद जेठमलानी ने एक बार भी नहीं कहा कि स्वामी झूठ बोल रहे हैं.

उन्होंने दूसरा आरोप लगाया, "ये फ़ोटो मेरे घर से चोरी हुई है." और स्वामी ने मुस्कुराकर कहा, "आप इस चोरी के लिए एफ़आईआर करवा सकते हैं."

वही स्वामी चीख़-चीख़कर कह रहे थे कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में घोटाला हुआ और सरकार इसे स्वीकार करने की जगह कह रही थी कि स्वामी देश को गुमराह कर रहे हैं. अब सरकार ठीक उसी तरह से चुप हो गई है जिस तरह संसद के भीतर जेठमलानी हो गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने तस्वीर दिखा दी है.

सुब्रमण्यम स्वामी यूँ तो अर्थशास्त्री हैं. इस नाते वो आईआईटी और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स से लेकर हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी तक पढ़ाते रहे हैं.

लेकिन चर्चा में वे अपने विचारों की वजह से रहे हैं. एक समय वे आर्थिक उदारता की वकालत कर रहे थे और तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके विचारों को अवास्तविक बता रही थीं. लेकिन आख़िर वही बाद में वास्तविकता बनी. आर्थिक उदारीकरण ने देश का कितना भला किया, यह विवाद अभी जारी है लेकिन ये विवाद कब का ख़त्म हो गया कि इसके हीरो मनमोहन सिंह थे.

वे विदेश मामलों के जानकार हैं. भारत से चीन और इसराइल के संबंध सुधारने में उनकी भूमिका की चर्चा की जाती है.

स्वामी जनसंघ के सदस्य रहे हैं और इस समय वे हिंदूवादी पार्टी भाजपा के बहुतेरे सदस्यों से ज़्यादा कट्टर हिंदूवादी हैं. पिछले दिनों उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो लिखा वह ज़ाहिर तौर पर इतना सांप्रदायिक था कि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के पद से हटा दिया.

कई बार लगता है कि सुब्रमण्यम स्वामी किसी अतिवादी की तरह सोचते हैं. वे राजनीति के मध्यमार्ग को नकारते चलते हैं.

चाहे वो एलटीटीई के विरोध का मामला हो या फिर सोनिया गांधी का.

वे जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं. उनकी पार्टी की वेबसाइट पर सोनिया गांधी पर उनके जो लेख उपलब्ध हैं उनको पढ़कर कुछ लोगों को सिहरन होती है लेकिन ज़्यादातर लोग उसे हँसी में उड़ा देते हैं. लेकिन वही स्वामी जयललिता और सोनिया के बीच सेतु भी बन जाते हैं.

उनकी साफ़गोई अक्सर बद्तमीज़ी के हद तक चली जाती है और नतीजा मानहानि के मुक़दमे पर ख़त्म होता है. न जाने कितने मानहानि के मुक़दमे उन पर अब भी चल रहे हैं. हर मुक़दमे में वो अपने वकील ख़ुद होते हैं और अब तक वे ख़ासे सफल दिखते हैं.

स्वामी अब 72 वर्ष के हो गए हैं. लेकिन उनकी मुस्कान की कुटिलता अभी भी जवान सी है. पत्रकारों से लेकर राजनीतिज्ञों तक हर कोई उन्हें पहली फ़ुर्सत में 'पागल' क़रार देता है.

वे भारतीय राजनीति का एक ऐसा चरित्र है, जिसे अंग्रेज़ी में 'मैवरिक' कहा जाता है. इतने स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचार कि अक्सर अराजक दिखता है.

उनकी इस अराजकता की वजह से, सांप्रदायिकता की वजह से और अप्रत्याशित होने की वजह से कोई उनके क़रीब नहीं होना चाहता. कोई नहीं कहना चाहता कि वह स्वामी को पसंद करता है.

लेकिन उन्हें कोई अनदेखा भी कैसे कर सकता है?

क्या होगा यदि हमारे लोकतंत्र में ऐसे दो चार स्वामी और पैदा हो जाएँ?

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