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लुंगी भी जाएगी!

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وسعت اللہ خان | सोमवार, 11 मई 2009, 12:02 IST

वुसतउल्लाह ख़ान से

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जैसे ही मैं हावड़ा जंक्शन की भीड़ चीरता हुआ बाहर निकला, एक सफ़ेद बालों वाला पीली टैक्सी समेत टकरा गया.

"हो आए साहब आप शांति निकेतन से?", मैं एकदम ख़ुद से एक अजनबी की इतनी बेतकल्लुफ़ी पर ठिठक गया.

लेकिन फिर उसी बेतकल्लुफ़ी पर रीझ गया. उसने मुझे सोचने का मौक़ा दिए बग़ैर कहा, वैसे तो आप किसी की भी टैक्सी में जा सकते हैं, पर यहाँ सारे खु्श्के हैं.

बात करते हैं तो मानो फावड़ा चला रहे हैं. आप हमारे साथ रहिए, आपको अच्छा लगेगा.

मैंने कहा, ठीक है, अगले आठ घंटों तक आप हमारे साथ रहेंगे. मगर लेंगे क्या, कहने लगा छह सौ नब्बे रुपए, क्योंकि सात सौ कहने से कस्टमर उछल जाता है.

मैंने पूछा, नाम क्या है, कहने लगा पवन कुमार यादव. बाइस साल पहले छपरा से आए थे, तबसे टैक्सी लाइन में हैं.

मैं अगला दरवाज़ा खोल कर पवन कुमार के बगल में बैठ गया. सफ़र के दौरान उससे पूछा, वोट किसे दिया?

कहने लगा पिछली बार डाकू को और अबकी बार चोर को...पिछले ने छह रुपए किलो चावल को 20 रुपए किलो तक पहुँचा दिया, इस बार लगता है, हमारी लुंगी भी जाएगी. कल किसी हराम... ने मोबाइल भी छीन लिया.

मैंने कहा, पवन कुमार पिछले एक महीने से मैं दिल्ली से बंगलौर और बंगलौर से कोलकाता तक सफ़र कर रहा हूँ. जनता तुम्हारी तरह नेताओं को सौ-सौ गालियाँ भी देती है पर वोट की लाइन में भी लगती है, यह क्या है.

"जनता को भी तो मज़ा लगा हुआ है. उसे अपने जैसा मूर्ख नहीं, डेढ़ अक्षर पढ़ा आदमी चाहिए जो एकदम मस्त भासन दे, भले रासन न दे. थके हारों को नौटंकी चाहिए, साहब, नौटंकी. जिसे आप जैसे विद्वान लोकतंत्र कहते हो."

मैंने कहा, पवन कुमार तुम्हें तो लोकसभा या विधान सभा में होना चाहिए. पवन कुमार यादव ज़ोर से हँसा, अगर हम विधायक बन गए तो टैक्सी कौन चलाएगा. नेता लोग तो टैक्सी तक नहीं चला सकते.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:01 IST, 11 मई 2009 samir azad kanpur:

    खान साहब, कुछ समझ में नही आया. ऐसा बुरा भी नही है हमारा लोकतन्त्र.

  • 2. 13:17 IST, 11 मई 2009 शशि सिंह :

    वुसतउल्लाह सा'ब, पिछली पोस्ट में सुशील जी ने बिहार के गौरव की बात और अब आपने भी एक बिहारी से परिचय कराया. कहने की ज़रुरत नहीं कि आप इस टैक्सी ड्राइवर की राजनीतिक मेधा से खासे प्रभावित भी हुए. क्या बात है जनाब? बड़ा लाड आ रहा है बीबीसी को हमारे बिहार और बिहारियों पर... लगता है दुनिया अपना नजरिया बदलने लगी है हमारे बारे में.

  • 3. 14:38 IST, 11 मई 2009 नीरज सिंह:

    वुसतउल्लाह जी, बेशक कामयाब अभिव्यक्ति. लेकिन हर बार की तरह वही आक्रोश और वही कुछ न कर पाने का मलाल. अगर हम नेता बनेंगे तो टैक्सी कौन चलाएगा. हमारी किस्मत में ये कहा, आम आदमी का यह रुदन अब आम हो गया है. लेकिन सवाल यह है कि समाज में जरा भी बदलाव लाने में क्या यह रुदन कभी कामयाब हो पाया है?

  • 4. 15:02 IST, 11 मई 2009 mahesh:

    यह है भारत की असली सोच. आगे कुआँ पीछे खाई. खाई में गिरे तो मिलेंगे नहीं तो कुआँ में गिरना है, शायद कोई बचा भी ले. पवन ने नेताओं की एकदम असली तस्वीर बता दी है.

  • 5. 15:15 IST, 11 मई 2009 Anil Bakshi:

    यही भारत माता की असली तस्वीर है. नग्न. जब एमएफ़ हुसैन ने ऐसी ही एक कलाकृति बनाई थी, हमें बुरा लगा था. शुक्रिया जनाब, भारत के लोगों की जड़ों तक पहुँचने के लिए.

  • 6. 15:26 IST, 11 मई 2009 sanjay kumar jat :

    यह ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. आप असली रूप में मज़ाकिया हैं और चुनाव के समय में अपनी फॉर्म में हैं.

  • 7. 15:55 IST, 11 मई 2009 vivek kumar pandey:

    आपका ब्लॉग ज़मीनी सच्चाई पर आधारित है. आप जो देखते हैं उसे बड़े ही सटीक अंदाज़ में लिख भी देते हैं. आपने जो रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने का वर्णन किया है मेरी याद भी ताज़ा हो गई. लिखते रहिए.....

  • 8. 15:58 IST, 11 मई 2009 roni:

    पवन कुमार जी की सोच एक आम सोच है. उनका कहना सही है कि अब राजनीति में सिर्फ चोर उचक्के ही सफल हैं और हमारे ऊपर राज कर रहे हैं. पवन जी जब तक हम जात-पात की राज नीति में धँसे रहेंगे, ये ही हाल होगा. एक शराब की बोतल ,मुर्गे की टांग और कुछ रुपयों के लिए हमारे ग्राम प्रतिनिधि और समाज के नेता अपनी अम्मा को भी बेच दें देश तो चीज़ क्या है. 60 साल से ज़्यादा हो गए और अभी तक हम अपनी ईश्वर प्रदत्त बुद्धि का इस्तेमाल न करके भेड़ बकरियों की तरंह दूसरों के बताये ग़लत लोगों को चुन कर संसद में भेजते हैं. भाई जो बोओगे वो ही काटोगे. फिर रोना किस बात का है.

  • 9. 16:13 IST, 11 मई 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    खान साहब मज़ा आ गया, क्या लिखते हैं आप. बीबीसी का शुक्रिया कि इतने अच्छे लोग उससे जुड़े हुए हैं. पता नहीं इस लोकतंत्र के नेताओं को आम आदमी की सुध कब आएगी और इनका ज़मीर कब जागेगा. इंतज़ार तो करना ही होगा....

  • 10. 17:17 IST, 11 मई 2009 harsh kumar:

    क्या खूब रिपोर्टिंग की है खान साहब. बहुत बढ़िया और दुरुस्त कहा पवन भाई ने. आपको पता है, इस देश का दुर्भाग्य यहाँ के लोग ही हैं. ये लोग अंदर से बेईमान है और दोष नेताओं को देकर खुद मेज़ के नीचे से पैसे लेते हैं. सरकारी बसों को आग लगाने वाले इन लोगों के भीतर कूट कूट के हिंसा और विद्वेष भरा पड़ा है. और दोष नेताओं को दिया जाता है. यदि भारतीय मन से जाति का विरोध करते तो आज वो अंतरजातीय विवाहों को मान्यता दे देते. दहेज़ ख़त्म हो जाता और देश तरक्की करता. ये लोग खुद बड़े चोर हैं और दोष नेताओं पर लगा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं.

  • 11. 17:23 IST, 11 मई 2009 dhiraj:

    मैं पवन कुमार से सहमत हूँ. आज की राजनीति एक बड़ा ड्रामा बन कर रह गई है.,

  • 12. 17:26 IST, 11 मई 2009 N.K.Tiwari:

    सौ-सौ जूते खाएं, तमाशा घुस कर देखें.

  • 13. 19:25 IST, 11 मई 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur, Assam:

    मैं आपका ब्लॉग पढ़ते आ रहा हूँ पर इतनी बेबाक़ी किसी आदमी में नहीं देखी. भारतीय लोकतंत्र पूरे विश्व में बड़ा लोकतंत्र है पर इसकी परिभाषा अब्राहम लिंकन की नहीं बल्कि पवन कुमार की होनी चाहिए. यह ब्लॉग लिखने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद..

  • 14. 19:49 IST, 11 मई 2009 naresh:

    पवन सही कह रह है. भारत इतना बड़ा लोकतंत्र है फिर भी ग़रीब रोज़ मर रहा है. सरकार सो रही है.

  • 15. 19:59 IST, 11 मई 2009 Mudassir Husain Ashiq Al Salah:

    सही ही तो कहा है....ये लोकतंत्र नहीं है बंदर और बंदरिया का नाच है.....बस फ़र्क इतना है कि नाचने वाले और डुगडुगी बजाने वाले की भूमिका बदलती रहती है....

  • 16. 22:11 IST, 11 मई 2009 umesh:

    ये खूब कही...ग़रीब को नौटंकी चाहिए..कोई अजब बात नहीं है कि लोकतंत्र एक नौटंकी ही रह गय़ा है....नेता लोग स्टेज पर चढ़ कर नौटंकी ही तो कर रहे हैं...और जनता मज़ा ले रह है हालांकि यह नौटंकी बहुत ख़तरनाक है देश के लिए. जोकरों को ही देश चलाना है तो फिर हो गया कल्याण!!!!!

  • 17. 04:03 IST, 12 मई 2009 राजीव रंजन:

    बहुत ही बढिया! यह ब्ल़ॉग आपने बहुत ही बेबाकी से लिखा है. मेरी राय में सभी भारतीय नेताओं को यह ब्लॉग पत्र के रूप में भेजना चाहिए ताकि भारतीय नेता कुछ तो आम जनता के बारे में विचार करें.

  • 18. 05:55 IST, 12 मई 2009 Sandeep Sharma:

    पवन की सोच एकदम आम भारतीय वाली है. हर हिंदुस्तानी नेताओं को गालियाँ देता है और जी भरकर कोसता भी है, लेकिन फिर भी चुनाव में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता है. इन्हीं गालियाँ खाने वाले नेताओं में से एक को चुनने के लिए.........अच्छा है, लिखते रहिए..

  • 19. 05:59 IST, 12 मई 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    पवन कुमार यादव ने एकदम ठीक कहा है कि नेता लोग तो टैक्सी तक नहीं चला सकते. बहुत ग़रीब हैं हमारे नेता लोग. ज़्यादातर के पास तो अपना कोई वाहन ही नहीं है, ऐसा उनकी सम्पत्ति के ब्यौरे बताते हैं. अब जिनके पास ग़ाड़ी नहीं है, वे बेचारे गाड़ी चलाना कैसे जानेंगे.

  • 20. 06:10 IST, 12 मई 2009 balram kumar, motihari:

    क्या बात कही है पवन भाई ने. मैं पवन जी से बिलकुल सहमत हूँ. आपका ब्लॉग लिखने का अंदाज़ बहुत ही निराला है. आप सचमुच बधाई के पात्र हैं. ऐसे ही बेबाक़ टिप्पणियाँ लिखते रहें.

  • 21. 06:59 IST, 12 मई 2009 Dhananjay Nath:

    क्या कमाल की बात कही है आपने. पवन की बातें लोकतंत्र के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों के लिए करारा तमाचा है.

  • 22. 08:15 IST, 12 मई 2009 Suresh Chandra Lal:

    बहुत बेहतरीन, पवन जी ने सचमुच आज के भारत की तस्वीर दिखा दी. वोट देना ज़रूरी है पर किस को दें. सारे उम्मीदवार तो चोर उचक्के ही हैं. वोट न दें तो कहेंगे कि वोट नहीं देते हैं. वोट देना ही है इस चोर को दें या उस चोर को. मरेंगे तो आम आदमी ही. नेताओं को थूक कर चाटने की आदत हो गई है. चुनाव से पहले दूसरी पार्टी को गाली देंगे और चुनाव के बाद उन्हें ही साथ लेकर सरकार बना लेंगे. सिर्फ़ एक मंत्री पद चाहिए, जनता जाए भाड़ में...

  • 23. 10:13 IST, 15 मई 2009 RAM S KUSHWAHA:

    सोलह आने सच बात है..तुम्हारे पास कोई विकल्प ही नहीं होता...हमें वोट तो किसी न किसी को देना ही होता है.....वरना पप्पू कौन बने?

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