इस विषय के अंतर्गत रखें अक्तूबर 2010

इन खेलों का 'स्वर्णिम' सुख

रेहान फ़ज़ल रेहान फ़ज़ल | सोमवार, 11 अक्तूबर 2010, 22:14

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पिछले दिनों जब राष्ट्रमंडल खेल एक के बाद एक विवाद में फँसते जा रहे थे तो मेरे एक दोस्त ने बहुत ही वाजिब सवाल रखा कि क्या इन खेलों पर क़रीब दस हज़ार करोड़ रुपए ख़र्चना रुपए की बर्बादी और फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है?

हो सकता है कि स्टेडियम और खेल गाँव बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर आयोजन समिति के हवाले किए गए हों या खेलों से मात्र एक सप्ताह पहले मुख्य स्टेडियम के पास दर्शकों के चलने का फ़ुट ओवरब्रिज धराशायी हो गया हो या दिल्ली में आई बाढ़ के पानी से जूझ रहे खेल गाँव में साँप निकल आया हो लेकिन जिस तरह के खेल अब तक हुए हैं और जिस तरह का प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों का रहा है, उसने इन सभी अवरोधों और खिजाने वाली चीज़ों को भुलवा दिया है.

खरबों रुपए की अर्थव्यवस्था में दस हज़ार करोड़ रुपयों की बिसात क्या है? और फिर क्या 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' का मोल रुपयों में लगाया जा सकता है?

देश के एथलीटों के प्रदर्शन के बारे में अख़बारों में पढ़ने और उन्हें अपनी आँखों के सामने या टेलीविज़न पर 'लाइव परफ़ॉर्म' करते देखने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.

अलका तोमर द्वारा एथेंस ओलंपिक की रजत पदक विजेता तोन्या वरबीक को पटखनी देने या विजेंदर के नामीबियाई मुक्केबाज़ को मात्र 98 सैकंडों में स्टेडियम की छत दिखा देने के थ्रिल को सिर्फ़ देख कर ही महसूस किया जा सकता है.

स्टेडियम में दर्शक भले ही नदारद हों( सौजन्य कलमाडी ऐंड कंपनी) लेकिन टेलीविज़न पर जितने लोग इन खेलों का आनंद ले रहे हैं, उसने क्रिकेट के एकाधिकार को ( मोहाली में रोमांचक जीत और सचिन तेंदुलकर के 49 वें शतक के बावजूद) फीका किया है.

दूसरी सबसे बड़ी बात भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलाती हैं.

तीरंदाज़ी, जिमनास्टिक, और पैरा स्विमिंग में भारत को इससे पहले कभी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला.

इन खेलों में कई पदक विजेता बड़े शहरों से न होकर भारत के अनजान गांवों और क़स्बों से आए हैं.

तीरंदाज़ी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीया दीपिका कुमारी झारखंड के रतुचेती गांव की रहने वाली हैं जिनके पिता राँची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे. और इस समय बेरोज़गार हैं.

जिमनास्टिक में रजत और काँस्य पदक जीतने वाले आशीष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश मुज़्तबा इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. ये भी सोचने वाली बात है कि हरियाणा जिसका कि बालिका शिशु हत्या में बहुत ख़राब रिकॉर्ड है, किस तरह से बार-बार इतनी महिलाओं को विजेता पोडियम पर भेज रहा है.

हरियाणा के पुरुष खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी चाहे वो योगेश्वर दत्त हों या रविंदर सिंह या संजय कुमार, महिला खिलाड़ियों से कम नहीं रहा है.

कुछ हल्कों में तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा के खेल कहा जा रहा है.

और जिस तरह से इन खेलों ने दिल्ली का काया-पलट किया है वो भी क़ाबिले-तारीफ़ है. चौड़ी साफ़ सड़कें, ख़ूबसूरत फ़्लाई ओवर, दूरदराज़ के इलाक़ों तक मैट्रो ट्रेन ने दिल्ली की छवि को भारतवासियों के साथ विदेशियों की निगाह में भी उठा दिया है.

साइक्लिंग स्पर्धा के दौरान जब हेलीकॉप्टरों पर रखे कैमरे ऊपर से दिल्ली के दृश्य दिखा रहे थे तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही गंदी अनियोजित दिल्ली है. अपने पूरे वैभव में दिल्ली दुनिया के किसी भी सुंदर नगर से टक्कर ले रही थी.

जश्न के आगे की चुनौती

मुकेश शर्मा मुकेश शर्मा | बुधवार, 06 अक्तूबर 2010, 12:16

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राष्ट्रमंडल खेलों की रंगारंग शुरुआत हो गई और दुनिया भर में उस पर अधिकतर अच्छी प्रतिक्रिया भी आई.

मगर अगले ही दिन से सामने आ गई नई चुनौती और वो थी खेलों से दर्शकों का नदारद होना.

टिकट मिलने में लोगों को कितनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है ये बात भी अलग-अलग माध्यमों से सामने आ रही है और नतीजा ये कि आयोजकों को अब तुरंत क़दम उठाने के बारे में सोचना पड़ रहा है.

खिलाड़ी का मनोबल तभी बढ़ेगा जब उसका प्रदर्शन देखने और उसका उत्साह बढ़ाने के लिए लोग मौजूद हों.

भारत पाकिस्तान हॉकी मैच छोड़कर अभी तक कहीं से भी ये ख़बर नहीं मिल रही है कि सभी टिकट बिक चुके हैं.

ज़रा सोचिए कि किसी संगीतकार या गायक को अगर आठ दस लोगों के सामने अपने हुनर का प्रदर्शन करना पड़े तो कैसी स्थिति बनेगी. ठीक उसी तरह की परेशानी खिलाड़ियों को उठानी पड़ रही है.

एक तरफ़ तो देश में खेलों की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खेलों के आयोजन की दुहाई दी जा रही थी और दूसरी तरफ़ खाली स्टेडियम उन दावों को मुँह चिढ़ाते दिख रहे हैं.

मुक्केबाज़ी, कुश्ती और एथलेटिक्स जैसी लोकप्रिय स्पर्द्धाएँ इस बात का टेस्ट होंगी कि वाक़ई लोग स्टेडियम तक पहुँचेंगे या नहीं.

आयोजकों ने अब कहा है कि वे सुविधाओं से वंचित रहे बच्चों और स्कूली बच्चों को बुलाकर स्टेडियम में बैठाएँगे.

ये फ़ैसला तो अच्छा है मगर टिकट बिक्री की स्थिति देखते हुए पहले ही ये फ़ैसला कर लेते तो शुरू में ही बात नहीं उठती.

पर शुरू में करते कैसे तब तो पैसे पाने पर ध्यान था.

तो अब निष्कर्ष यही लगता है कि देश में खेलों की संस्कृति का विकास और इस आयोजन का ख़र्च निकालना, ये दोनों लक्ष्य हाथ में हाथ डालकर नहीं चल पा रहे.

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