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<title>BBC Hindi</title>
<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/</link>
<description>यह बीबीसी हिंदी का ब्लॉग है. आप यहाँ विभिन्न विषयों पर बीबीसी संवाददाताओं के ब्लॉग पढ़ सकते है</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright 2009</copyright>
<lastBuildDate>Mon, 14 Dec 2009 06:25:03 +0530</lastBuildDate>
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	<title>छोटे राज्य, बड़ा खेल</title>
	<description><![CDATA[<p>किसी राज्य की दुर्दशा इस बात पर निर्भर है कि उसे चलाने वालों का दिमाग़ कितना छोटा है, न कि राज्य कितना बड़ा है.</p>

<p>तेलंगाना की चर्चा छिड़ते ही कई और बुझते दीयों को मानो तेल मिल गया है. गोरखालैंड, पूर्वांचल, बुदेलखंड...सभी जाग उठे हैं. </p>

<p>अलग राज्य की उम्मीद लगाए लोग अपने नेता से वैसा ही ज़ोरदार अनशन चाहते हैं, जैसा चंद्रशेखर राव ने किया. </p>

<p>कुछ दिन भूखे ही तो रहना पड़ेगा, लेकिन सोचिए अलग राज्य बन जाने के बाद 'खाने-पीने' की क्या कमी रह जाएगी?</p>

<p>दलील ये है कि दूर लखनऊ या कोलकाता में बैठे नेता-अफ़सर उनके इलाक़े की दुर्दशा क्यों करें, ये काम तो वो ख़ुद ही कर सकते हैं और बखूबी कर सकते हैं. </p>

<p>छोटे राज्य बनने के कई फ़ायदे हैं, अधिक लोगों को मंत्री बनने का मौक़ा मिलता है, अधिक अफ़सरों को नए कैडर में ऊँचे रैंक मिलते हैं, सड़क पर लाल बत्ती वाली गाड़ियाँ दिखती हैं जिससे शहर का रुतबा बढ़ता है. </p>

<p>नई राजधानी बनने से ज़मीन के दाम बढ़ जाते हैं, नई-नई योजनाओं के लिए पैसे आते हैं, पड़ोसी राज्यों से ठेकेदार आते हैं, नई कारों के शोरूम खुलते हैं, होटल-रेस्तराँ-बार, सबका धंधा फलता-फूलता है. </p>

<p>छोटे राज्य की अपनी विधानसभा भी होती है, छोटे राज्य में प्रतिभा पर रोक नहीं होती, निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री तक बन सकते हैं,  राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है. </p>

<p>ग़रीब आदमी के लिए भी कम राहत की बात नहीं हैं छोटे राज्य. जिन दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए पहले सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता था वे काफ़ी नज़दीक आ जाते हैं इसलिए चक्करों की संख्या थोड़ी बढ़ भी जाए तो उतना नहीं खलता,  अपनी भाषा बोलने वाले या अपने जैसे दिखने वाले लोगों को रिश्वत देने में शायद थोड़ी कम तकलीफ़ होती है.</p>

<p>अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है. </p>

<p>लेकिन अगर आप 'आम जनता' हैं और अपने प्यारे से, छोटे से राज्य का सपना देखकर भावुक हुए जा रहे हैं तो आपको भी उसी प्रक्रिया से गुज़रना होगा जिससे मेरे जैसे लाखों झारखंडी गुज़र चुके हैं, पहले लंबा इंतज़ार, उसके बाद मोहभंग.</p>]]></description>
         <dc:creator>राजेश प्रियदर्शी </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-61.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 14 Dec 2009 06:25:03 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>मैं छुट्टी मनाने नहीं जा सकता...</title>
	<description><![CDATA[<p>रूबिया सईद के अपहरण की घटना को पूरे बीस साल हो गए हैं. भारत के तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी और श्रीनगर में मेडिकल की छात्रा रूबिया का 8, दिसंबर 1989 को अपरहरण हुआ था. </p>

<p>कश्मीर घाटी में लोकसभा चुनाव का बहिष्कार एक बड़ी स्टोरी थी, लेकिन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट यानी जेकेएलएफ़ के ज़रिए रूबिया का अपहरण एक राष्ट्रीय उन्माद बन गया. </p>

<p>दो दशक पूर्व, एक युवा पत्रकार के तौर पर मैं 10 दिसंबर को श्रीनगर पहुँचा यह जानते हुए भी कि मुझे घाटी की राजनीति की बहुत कम जानकारी है. लेकिन यह स्टोरी बेहद रोमांचकारी थी और मदद के लिए कई कश्मीरी दोस्तों का सहारा था.</p>

<p>भाग्य की बात कि इंडियन एयरलाइन्स (याद रहे उस समय निजी विमानसेवाएँ नहीं होती थीं) की जम्मू-कश्मीर जाने वाली उड़ान में मेरे बराबर की सीट पर बैठे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपहरण गाथा में प्रगति का क्रमवार विवरण सुनाया जिसके बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी थी.<br />
इसे कहते हैं क़िस्मत!</p>

<p>रूबिया का अपहरण करने वाले जेकेएलएफ़ ने जब उन्हें रिहा किया तो उससे पहले वीपी सिंह सरकार ने कई चरमपंथियों को आज़ाद किया. रूबिया के अपहरणकर्ताओं में से दो-यासीन मलिक और जावेद मीर-इस समय श्रीनगर में मौजूद हैं.</p>

<p>तेरह दिसंबर, 1989 को रूबिया रिहा हुईं और लगा कि जैसे श्रीनगर का हर नागरिक-और बहुत से बाहर वाले भी-सड़कों पर निकल आया है. हवा में जैसे आज़ादी की ख़ुशबू घुल गई थी.</p>

<p>मुझे याद है श्रीनगर अस्पताल के बाहर एक युवा डॉक्टर ने कहा, यह तो फ्रांसीसी क्रांति की तरह का माहौल लग रहा है.</p>

<p>और फिर भारत सरकार की तीव्र प्रतिक्रिया सामने आई-अर्धसैनिक बल के हज़ारों कर्मचारियों की तैनाती. बंकर और सैनिक चारों तरफ़ छा गए.</p>

<p>हज़ारों जानें जा चुकी हैं, भारत सरकार का फिर पूरा नियंत्रण है, आज़ादी पाने की मांग धीमी पड़ गई है. लेकिन इसके बावजूद यह भी सच है कि हर महीने कोई न कोई कश्मीरी रहस्यमय परिस्थितियों में ग़ायब हो जाता है.</p>

<p>घाव पर मरहम लगाना अब भी बाक़ी है, लोगों के चेहरे उतरे हुए हैं. सशस्त्र सेनाओं के पास अब भी विशेषाधिकार हैं.</p>

<p>केंद्र सरकार की सभी समितियों और बयानों के बावजूद, कश्मीरियों की स्वायत्तता की मांग पर क़तई कोई ध्यान नहीं दिया गया है. </p>

<p>पिछली बार जब मैं कश्मीर गया था तो वह 1995 में एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट था. मेरे अंदर से आवाज़ आती है कि मुझे वहाँ छुट्टी मनाने नहीं जाना चाहिए. वहाँ की आबोहवा में बहुत सी दर्दनाक दास्तानें मौजूद हैं.<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>अमित बरुआ </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-60.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 08 Dec 2009 16:49:07 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>ख़ौफ़नाक है यह परिदृश्य</title>
	<description><![CDATA[<p>पर्यावरण परिवर्तन एक कटु सत्य है जिससे आंखे चुराना शुतुर्मुर्ग की तरह अपना सिर रेत में छुपा लेने के बराबर होगा.</p>

<p>पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ये सच है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं ये सच है. ऐंटार्कटिक की बर्फ़ीली परतें तीव्र गति से पिघल रही हैं जिससे समुद्रों का जलस्तर चढ़ रहा है ये सच है. और ये सब हो रहा है हमारी आपकी ज़रूरतों के कारण.वैज्ञानिक जुटे हैं ऐसे तरीक़े खोजने में जिससे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सके. राजनेता नई नीतियों पर विचार कर रहे हैं. और हम....</p>

<p>हम अपनी आदतों से बाज़ नहीं आते. हमारे पास अगर स्कूटर है तो हमें कार चाहिए. अभी तक पंखा चलाने से काम चल रहा था तो एयर कंडिशनर चाहिए. पहले बस में बैठकर पहाड़ों की सैर कर लिया करते थे लेकिन अब नज़र विदेशों की ओर है जहां पहुंचने के लिए विमान यात्रा ज़रूरी है.</p>

<p>तो क्या अब तक जितनी सुख सुविधाएं ईजाद हुई हैं उन्हे तिलांजलि दे दें तभी बचा पाएंगे अपनी पृथ्वी को?</p>

<p>सवाल ये नहीं सवाल दरसल ये है कि पृथ्वी रहने लायक बचेगी तब न. बहुतों का तर्क है  कि अगले कोई दस बीस साल में तो ऐसा होने वाला नहीं तो अगली पीढ़ियों की चिंता हम क्यों करें.</p>

<p>हम अपने बच्चों के लिए धन दौलत और सम्पत्ति छोड़कर जाने में तो विश्वास करते हैं लेकिन रहने लायक ग्रह नहीं. </p>

<p>अगर हिमालय के ग्लेशियर पिघल जाएंगे तो गंगा यमुना में पानी कहां से आएगा. इन जैसी नदियों पर निर्भर करोड़ों लोग कहां जाएंगे. </p>

<p>अगर समुद्रों का जलस्तर और चढ़ा तो बांगलादेश, मालदीव और नौरू जैसे देश जलमग्न हो जाएंगे. वहां रहने वाले लोग पड़ोसी देशों में शरण लेंगे जहां पहले से ही खाने पीने की किल्लत होगी. </p>

<p>पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण भूमध्यरेखा के आस पास के देशों में रहना संभव नहीं होगा तो बड़े पैमाने पर लोग अपेक्षाकृत ठंडे इलाक़ों की तरफ़ पलायन करेंगे. </p>

<p>कल्पना कीजिए ऐसी दुनिया की जहां पानी की भारी क़िल्लत है, रेगिस्तान फैलते जा रहे हैं, खेती मुश्किल से होती है इसलिए अनाज की पैदावार सीमित है, लोग भूखे प्यासे हैं. </p>

<p>जानते हैं भावी युद्ध पानी और ज़मीन के लिए लड़े जाएंगे. </p>

<p>ख़ौफ़नाक है न ये परिदृश्य. आप डरे कि नहीं.....<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>ममता गुप्ता </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-59.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Tue, 08 Dec 2009 10:24:54 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>राम नाम अल्लाह है</title>
	<description><![CDATA[<p>इस बात का कोई महत्व नहीं है कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना को 17 साल पूरे हो गए. अगले साल 18वीं वर्षगाँठ होगी और उससे अगले साल 19वीं. </p>

<p>महत्व किसी बात का हो सकता है तो वह यह है कि क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर 1947 के विभाजन के बाद सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक घाव लगाया है. </p>

<p>इस घटना के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में एक-दूसरे के लिए कट्टरता की भावना बढ़ी है और इस भावना को कम कैसे किया जाए जो देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को दर्शाए. </p>

<p>छह दिसंबर 1992 का दिन असल में इतिहास की वह माता है जिसके तुंरत बाद मुबंई के दंगे और फिर 1993 में मुंबई धमाके, गुजरात नरसंहार, मालेगाँव बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस को आग लगाने जैसी घटनाएँ, सिमी, राम सेना और आज़मगढ़ जैसे नेटवर्क, मोदी स्टाइल राजनीति और कर्नल पुरोहित, वरुण गाँधी और मोहन भागवत जैसे ज़हन को जन्म दिया. </p>

<p>अगर बाबरी मस्जिद की 17वीं वर्षगाँठ याद रहेगी तो केवल इस आधार पर कि लिबरहान अयोग रिपोर्ट ने इस घटना में उन लोगों के शामिल होने की पुष्टि कर दी जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के अगले रोज़ अपने चहरों पर अफ़सोस का भभूत मल कर अख़बारों में तस्वीरें छपवाई थीं. </p>

<p>अगर वाक़ई लिबरहान अयोग की रिपोर्ट से यह परिणाम निलकता है कि यह कोई तुरंत जोशीला अमल नहीं था बल्कि एक योजना के तहत सब कुछ हुआ.</p>

<p>तो फिर इस रिपोर्ट की रोशनी में राष्ट्र और उसकी अदालतों का सिवाए इसके क्या कर्तव्य है कि वह न केवल इस अपराध में शामिल लोगों को कठघरे में लाए बल्कि यह घोषणा भी करें कि इस स्थान पर न केवल टूटी हुई मस्जिद का फिर से निर्माण होगा बल्कि हिंदू और मुसलमान मिल कर मस्जिद के बगल में एक शानदार मंदिर भी बनाएँगे. </p>

<p>ताकि वह राम जिसे मुस्लिम अल्लाह कहते हैं और वह अल्लाह जिसे हिंदू राम के नाम से जानते हैं, साथ-साथ रह सकें. </p>

<p>इस से कम पर तो कलंक का टीका मिटने से रहा.</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-58.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-58.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Sun, 06 Dec 2009 16:47:40 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>क्या बदला भोपाल में?</title>
	<description><![CDATA[<p>भोपाल गैस दुर्घटना के पच्चीस साल. वर्ष 2001 की वे यादें ताज़ा हो गईं जब बीबीसी हिंदी रेडियो की श्रंखला इंसाफ़ की रिकॉर्डिंग के सिलसिले में भोपाल गई थी.</p>

<p>दरअसल भारत में मानवाधिकारों की स्थिति पर आधारित इन रेडियो पैकेज में एक अंक भोपाल त्रासदी के बारे में भी था.</p>

<p>लंदन से भोपाल पहुँचने पर पता चला कि आने से पहले जो भी रिसर्च की थी वह अपर्याप्त थी. ज़मीनी हालात काग़ज़ात में दर्ज आँकड़ों से बहुत अलग थे.</p>

<p>दुर्घटना के 17 वर्ष बीत जाने पर भी पीड़ित मुआवज़े की राशि का इंतज़ार ही कर रहे थे.</p>

<p>वे जो अपना सब कुछ गंवा चुके थे, दरबदर की ठोकरें खाने पर मजबूर थे.</p>

<p>उन्हें यह साबित करने के लिए ज़मीन-आसमान एक करना था कि उनकी दुर्दशा गैस की विभीषिका का ही नतीजा था.</p>

<p>अस्पतालों में लंबी-लंबी लाइनें थीं. सत्रह वर्ष से साँस की तकलीफ़ से परेशान रोगियों का समय घर पर कम डिस्पेंसरियों में ज़्यादा गुज़र रहा था.</p>

<p>भुक्तभोगियों की आपबीती सुन कर रोंगटे खड़े हो रहे थे. एक महिला ने जब बताना शुरु किया कि उसने दो दिसंबर, 1984 की उस रात कौन सी सब्ज़ी बनाई थी और वह अपने पति का खाने पर इंतज़ार कर रही थी कि....</p>

<p>या फिर एक बूढ़ी, निस्सहाय महिला अपने इकलौते बेटे को याद कर के कह रही थी कि वह कॉलेज में पढ़ता था और आज होता तो क्या पता डॉक्टर होता या इंजीनियर. </p>

<p>ये सब आवाज़ें रेडियो पर प्रसारित हुईं तो अनगिनत श्रोताओं के मन को छू गईं. सैंकड़ों पत्र आए जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे श्रोताओं ने मध्यप्रदेश के इस शहर में रह रहे लोगों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कीं.</p>

<p>आज 25 साल बाद एक बार फिर भोपाल पर सबकी नज़र है. कितना कुछ बदला है इसका जायज़ा लेने की कोशिश की जा रही है.</p>

<p>आज भी भोपाल में लोग प्रदूषित जल पी रहे हैं और बीमारियों से जूझने को मजबूर हैं. मुआवज़े की राशि आज भी उनकी पहुँच से बाहर है.</p>

<p>अपनों को खोने के दर्द से जूझ रहे इन लोगों को इंसाफ़ मिल पाएगा? और कब?</p>]]></description>
         <dc:creator>सलमा ज़ैदी </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-57.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/12/post-57.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Wed, 02 Dec 2009 17:35:54 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>गंदगी पर साफ़गोई</title>
	<description><![CDATA[<p>गंदगी पर साफ़ शब्दों में बात करना ठीक नहीं. 'गंदगी' नहीं कहना चाहिए, कहना चाहिए 'सफ़ाई का अभाव है', और जब सफ़ाई हो जाए तो कहना चाहिए कि 'गंदगी का अभाव है'. </p>

<p>कहेंगे कि राजनीति में 'सच का अभाव' है तो कोई बुरा नहीं मानेगा, कहेंगे कि 'झूठों की भरमार है' तो नेताओं की भावनाएँ आहत होंगी. </p>

<p>अब मंत्रियों को इतना तो समझना ही चाहिए, ज्यादातर मंत्री समझते भी हैं, लेकिन साफ़-सुथरे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भूल गए कि गंदगी पर उनके बयान से 'गंदे लोगों' की भावनाएँ आहत हो सकती हैं. </p>

<p>उन्हें यह कहने की क्या ज़रूरत पड़ी थी कि गंदगी के मामले में भारत के शहरों का कोई मुक़ाबला नहीं है, भारत के किस शहरी को यह बात मालूम नहीं है.</p>

<p>दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले 'गंदे आदमी' ने मंत्री जी के बयान पर एतराज़ नहीं किया जिसे नहाने के लिए पानी नहीं मिलता, बुरा मान गए नई दिल्ली के सफ़ेद बंगलों में रहने वाले कई लोग. </p>

<p>जाकी रही भावना जैसी...जयराम रमेश ने गंदगी की बात की तो मानो सबको अपनी-अपनी गंदगियों का खयाल आ गया और दिल दुखने लगा. <br />
 <br />
एक पूर्व मंत्री बोले कि इस तरह कचरे की बात करने से देश की साख गिर जाएगी. उन्हें शायद लगता है कि विदेशी पर्यटक आएँगे तो वे कचरे के ढेर को भी 'इक्रेडिबल इंडिया' का टूरिस्ट एट्रैक्शन समझ लेंगे और इंडिया की साख बची रहेगी.</p>

<p>पर्यावरण मंत्री की ही पार्टी के लोग कह रहे हैं कि 'उन्हें सही शब्दों का चुनाव करना चाहिए था', शायद कचरे के बारे में बात करने से पहले थिसॉरस पलटना चाहिए था.</p>

<p>अगर तैमूरलंग के राज में कोई मुहावरे के तौर पर कहता कि 'आपका प्रशासन लंगड़ा है,' तो उसकी क्या दशा होती? गंदगी के राज में ऐसी बात कहना साफ़ दिखाता है कि जयराम रमेश में 'राजनीतिक परिपक्वता का अभाव' है.</p>

<p>राजनीतिक परिपक्वता होती तो किसी ज्वाइंट सेक्रेटरी का लिखा एक साफ़-सुथरा भाषण पढ़ते जिसमें 'सफ़ाई सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार की ओर से उठाए गए महत्वपूर्ण क़दमों' पर प्रकाश डाला गया होता.</p>

<p>एक विपक्षी नेता ने सवाल पूछा कि 'उनकी ही सरकार है, बयान क्यों दे रहे हैं, सफ़ाई क्यों नहीं कराते'? </p>

<p>मेरे ख्याल में यह एक वाजिब टिप्पणी है लेकिन समस्या को स्वीकार किए बिना समाधान की दिशा में कैसे बढ़ा जा सकता है? </p>

<p>वैसे यह हैरत की बात है कि भारत सरकार के एक मंत्री को गंदगी दिख रही है क्योंकि वह जहाँ भी जाता है, कुछ ही घंटे पहले उस जगह को चमका दिया जाता है.</p>

<p>मंत्री जी बयान देने के बाद अब शायद झाड़ू उठाने वाले हों, देखते हैं कहाँ-कहाँ से, कैसी-कैसी और कितनी गंदगी साफ़ करते हैं?</p>]]></description>
         <dc:creator>राजेश प्रियदर्शी </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-56.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-56.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Mon, 30 Nov 2009 00:38:13 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>बदल गई है मुंबई </title>
	<description><![CDATA[<p>26 नवंबर की तारीख़ मेरे दिलो दिमाग पर खुद चुकी है जो मिटती नहीं है.</p>

<p>मुझे रात में टीवी पर फ़िल्म देखते हुए सोने की आदत है और इसी क्रम में चैनल बदलते हुए नज़र पड़ी ख़बरों पर. मुंबई में हमला हो गया है. </p>

<p>मैं क़रीब साढ़े ग्यारह बजे ऑफिस पहुंचा. रात में ही मुंबई जाने को कहा गया.</p>

<p>सुबह की फ़्लाइट में 99 प्रतिशत पत्रकार थे. कई बड़े और दिग्गज़ पत्रकार. कुछ छोटे मुझ जैसे. एयरपोर्ट से ताज तक पहुंचना याद नहीं लेकिन उसके बाद धमाके, पुलिस, लोगों के बयान और पुलिस की कार्रवाई ये सब याद है.</p>

<p>मैं बस घूमता रहता था. ताज से लियोपोल्ड, लियोपोल्ड से नरीमन हाउस और ओबेरॉय. तब तक जब तक घेराबंदी ख़त्म नहीं हुई.</p>

<p>अब साल बीत चुका है और फिर यहां हूं. बहुत कुछ बदला है जो दिखता है. कुछ बदला है जो नहीं दिखता है. </p>

<p>ताज के पास फोटो खींचने वालों की संख्या बढ़ गई है. पहले लोग गेटवे ऑफ इंडिया के साथ फोटो खिंचवाते थे. अब ताज के साथ खिंचवाते हैं. </p>

<p>मरीन ड्राईव पर चलते हुए शायद ही पहले कोई ओबेरॉय-ट्राइडेंट पर ध्यान देता था. अब सबकी नज़र उधर ज़रुर जाती है. </p>

<p>गलियों के भीतर स्थित नरीमन हाउस के बारे में बच्चा बच्चा जानने लगा है और विदेशियों में लोकप्रिय लियोपोल्ड में अब बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी जाने लगे हैं.</p>

<p>पुलिस की भारी तैनाती है और वो हथियारों से लैस अत्यंत सतर्क और तैयार दिखते हैं. </p>

<p>ताज के पास कमांडो की शक्ल के खिलौने बिकने लगे हैं. बीस बीस रुपए में बिकने वाले ये खिलौने बड़ी संख्या में खरीदे जाते हैं.</p>

<p>ताज के पास ही झंडे लग रहे थे. पता चला यहां कोई राजनीतिक दल बड़ा कार्यक्रम करने वाले हैं. मरीन ड्राइव पर लंबे कागज़ लगे हैं जहां आप 26/11 पर अपनी भावनाएं पेंट कर सकते हैं. </p>

<p>कोई किताब लिख रहा है कोई अपने चित्रों का प्रदर्शन कर रहा है. फ़िल्में तो बन ही रही हैं. नए सुरक्षा बल फोर्स वन का उदघाटन हो रहा है जहां उदघाटन के दौरान दो जवान बेहोश हो जाते हैं.</p>

<p>अख़बारों और टीवी चैनलों पर, जिसमें हम भी शामिल हैं, बहसें हो रही हैं.</p>

<p>मैंने भी इंटरव्यू लिए हैं लोगों के और बातचीत के दौरान वो टूटते से लगे. ख़ासकर वो लोग जिन्होंने परिवारजनों को खोया है.</p>

<p>कुछ अटपटा सा लगता है. मैं कभी ये सवाल नहीं पूछता कि आपको कैसा लग रहा है.</p>

<p>अक्सर बिना सवाल पूछे जवाब मिल जाते हैं उनकी आंखों से ही.. मेरा काम आसान हो जाता है. </p>

<p>मैं सोचता हूं अगर प्रभावितों का दुख, गुस्सा या नाराज़गी, संबंधित अधिकारियों तक मेरे ज़रिए पहुंच जाए तो मैं अपने काम को सफल मानूंगा.</p>

<p>किसी हादसे का व्यवसायीकरण कितना सही है ये विवाद का विषय है लेकिन इस व्यवसायीकरण को रोक पाना मुश्किल ही नहीं असंभव सा लगता है..  </p>]]></description>
         <dc:creator>सुशील झा </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-55.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-55.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Thu, 26 Nov 2009 04:46:56 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>उस भयावह रात की आँखो-देखी</title>
	<description><![CDATA[<p>मैं पिछले साल 26 नवंबर की रात एक दोस्त के साथ बहुत ही आराम से खाना खा रहा था. दिन भर का काम ख़त्म करके फिर काम पर लौटने की सोच दिमाग़ में आ ही नहीं सकती थी. </p>

<p>अचानक एक के बाद एक 'दक्षिण मुंबई में अंडरवर्ल्ड गुटों के बीच मुठभेड़' के टेक्स्ट मैसेज आने शुरू हो गए. <br />
 <br />
फिर एक दोस्त ने फ़ोन करके कहा "आतंकवादियों ने मुंबई के कई इलाक़ों पर हमला कर दिया है. ताज और ट्राइडेंट में भी घुस आए हैं".</p>

<p>यह सुनना था कि मैंने खाना अधूरा छोड़ा और अपने दोस्त से बिदाई ली. दिल्ली और लंदन में अपने साथियों को ख़बर दी, गाड़ी स्टार्ट की और दक्षिण मुंबई की तरफ चल पड़ा. <br />
 <br />
हमलों की ख़बर जंगल में आग की तरह फैल गई थी इसलिए सड़कें ख़ाली थीं. कुछ देर बाद मैं ट्राइडेंट होटल के सामने खड़ा था. </p>

<p>होटल के बाहर या तो पत्रकार खड़े थे या फिर पुलिस वाले. माहौल काफ़ी डरावना था. कहीं से भी गोलियां हमारी तरफ आ सकती थीं. </p>

<p>मैं एक पुलिस की गाड़ी के क़रीब खड़ा था. पुलिसवालों की वॉकी-टॉकी में बातचीत से हमें पता चला कि हमले कई जगह हुए हैं.<br />
 <br />
मेरे लिए यक़ीन न करने वाली ख़बर थी एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे की मौत. उसी दिन शाम सात बजे मैंने उनसे फ़ोन पर बात की थी. </p>

<p>मैं उनसे मालेगांव बम धमाके के केस के सिलसिले में बात करना चाहता था. उन्होंने केवल इतना कहकर फ़ोन रख दिया था कि वे एक मीटिंग में हैं और देर रात में फ़ोन करने को कहा था. </p>

<p>जब मुझे बंदूकधारियों के हाथ उनकी मृत्यु का पता चला तो उनके शब्द याद आए. मैं तो भूल गया था कि उन्होंने देर रात को फ़ोन करने को कहा था.          <br />
 <br />
होटल के अंदर से रुक-रुक कर गोलियाँ और धमाकों की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं.</p>

<p>एक कैमरामैन ने होटल की ऊपर वाली मंजिलों पर जूम किया तो एक बंदूकधारी खिड़की के उस पार साफ़ दिखाई दे रहा था. </p>

<p>नीचे की कुछ खिड़कियों से कुछ लोग सफ़ेद रुमाल लहराकर हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे. </p>

<p>वो लोग अंदर कई घंटों से बंधक बने थे. उनके लिए बाहर निकलने के सारे रस्ते बंद थे.</p>

<p>उधर ताज होटल से भी धमाकों की आवाजें साफ़ सुनाई दे रही थीं. और एक ज़ोरदार धमाके के बाद मालूम हुआ कि ताज की पुरानी और ऐतिहासिक इमारत के एक गुम्बद में धमाके से काफ़ी क्षति पहुंची है. </p>

<p>मैं लगातार आठ घंटे वहां खड़ा रहा. खाना, पीना और अन्य ज़रूरतें सब भूल गया था. बस सही ख़बरें आप तक पहुँचाने की कोशिश में लगा था.  <br />
 <br />
मैं पिछले 21 वर्षों से पत्रकार हूँ और इस लंबे अरसे में मैं पंजाब, कश्मीर, दिल्ली, मुंबई और पूर्वोत्तर भारत में चरमपंथी घटनाओं की रिपोर्टिंग करता आया हूँ. </p>

<p>तीन साल पहले मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाकों में मरने वालों को बिल्कुल क़रीब से भी देखा है.<br />
 <br />
लेकिन पिछले साल 26 नवंबर को हुए हमले कई मायनों में अलग थे. आम तौर से बम के धमाके होते हैं और फिर रिपोर्टर घटना स्थल पर पहुँचते हैं. </p>

<p>धमाके करने वाले आराम से फरार हो जाते हैं, लेकिन 26 नवंबर के हमलों में आप हमावारों को अपनी आँखों से देख सकते थे. </p>

<p>वो दिलेरी से गोलियाँ चला रहे थे. पुलिसवालों को भी मार रहे थे और आम निहत्थे लोगों को भी. यह सब लाइव टीवी पर दिखाया जा रहा था. <br />
 <br />
मुश्किल बात यह थी कि हमले जारी थे और 60 घंटों तक चलते रहे जिसके दौरान लोग मरते जा रहे थे. </p>

<p>ऐसे में मरने वालों की सही संख्या का पता लगाना मुश्किल हो रहा था. अधिकारियों के पास भी ख़बरें सही नहीं थीं. </p>

<p>उदाहरण के तौर पर एक समय में उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री आरआर पाटिल ने कहा 25 बंदूकधारी शहर में हमले कर रहे हैं, जबकि बाद में यह मालूम हुआ कि उनकी संख्या केवल 10 थी. <br />
 <br />
दूसरी दिक्कत यह पेश आ रही थी कि 60 घंटों तक हमले जारी रहने के कारण कई तरह की अफ़वाहें फैल रही थीं. </p>

<p>सच क्या है और झूठ क्या. इसका पता लगाना मुश्किल हो रहा था. दूसरी तरफ टीवी चैनलों में आपसी मुक़ाबलों के कारण कुछ चैनल अफ़वाहों को सही ख़बर की तरह प्रसारित कर रहे थे. </p>

<p>अफ़वाहों की पुष्टि करने वाले अधिकारी मैदान में थे इसलिए जिसकी मर्ज़ी में जो आ रहा था वो कर रहा था.<br />
 <br />
दूसरी तरफ सभी ख़बरें बेबुनियाद नहीं थीं. जैसे कि अजमल कसाब की गिरफ़्तारी के बाद उसका यह स्वीकार करना की वो पाकिस्तान के पंजाब का है. </p>

<p>लेकिन हमारे लिए दिक्कत यह थी कि बिना किसी अधिकारी की पुष्टि के यह ख़बर हम नहीं चला सकते थे. <br />
 <br />
बहरहाल इन हमलों ने पहली बार मुंबई के अमीरों की बस्तियों में दहशत फैला दी थी. पहली बार बड़े-बड़े होटलों को निशाना बनाया गया था. शायद पहली बार अमीर लोगों के सगे-संबंधी हमलों में मारे गए थे. <br />
 <br />
मैं यहाँ अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जिनके या तो रिश्तेदार या दोस्त या जान-पहचान के लोग इन हमलों में या तो मारे गए या बंधक बनाए गए थे. </p>

<p>ऐसा अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ. मेरी भी 20 साल पुरानी एक पत्रकार दोस्त ताज महल होटल में मारी गईं.<br />
 <br />
इस शहर में अक्सर लोग यह कहते हैं कि ये हमले उनके लिए निजी क्षति थी. </p>]]></description>
         <dc:creator>ज़ुबैर अहमद </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-54.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-54.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 06:28:35 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>वंदे मातरम् का चाबुक!</title>
	<description><![CDATA[<p>भारत से दूर रहकर भी अक्सर खीज होती है कि वंदे मातरम का भूत जब-तब डिब्बे से निकल आता है. यूँ भी कह सकते हैं कि अब यह भूत ना रहकर चाबुक बन चुका है. ये चाबुक कभी ग़ैरमुसलमानों के हाथ में होता है तो कभी मुल्ला मौलवियों के हाथ में. </p>

<p>देवबंद में वंदे मातरम नहीं गाने वाला प्रस्ताव पारित करने की शायद ज़रूरत या कोई प्रासंगिकता नहीं थी लेकिन दूसरी तरफ़ बात ये भी है कि क्या ऐसे किसी प्रस्ताव पर इतनी हाय-तौबा मचाने की ज़रूरत भी थी. मेरे ख़याल से मीडिया ने बिना वजह राई को पहाड़ बना दिया. </p>

<p>लेकिन मैं सोच रहा था कि भारत के मुसलमान अगर वंदे मातरम गा भी दें तो क्या उन पर 'ग़द्दार' होने का शक हट जाएगा, क्या उनकी ग़रीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा, सिस्टम में भागीदारी जैसी समस्याएँ दूर हो जाएंगी. </p>

<p>सिर्फ़ मुसलमानों की बात क्यों की जाए, भारत में पाँच साल से कम उम्र के छह करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, लगभग चालीस करोड़ लोगों को शिक्षा और प्रगति के अवसर मिलना तो दूर की बात है, उन्हें भरपेट खाना नसीब नहीं होता. भारत की पूरी आबादी अगर वंदे मातरम गाकर समस्याओं से छुटकारा पा सकती है तो इससे आसान रास्ता और क्या हो सकता है, लेकिन इसकी गारंटी कौन देगा ?<span class="mt-enclosure mt-enclosure-image" style="display: inline;"><img alt="मुसलमानों का पिछड़ापन उनकी प्रगति में बाधा है" src="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/muslim226.jpg" width="226" height="170" class="mt-image-right" style="float: right; margin: 0 0 20px 20px;" /></span></p>

<p>मुद्दा ये है कि जो लोग वंदे मातरम गाते हैं क्या वे सचमुच देश के लिए वफ़ादार हैं. ये कहना ज़रूरी नहीं है कि ये वफ़ादारी सिर्फ़ सीमा पर दुश्मन के ख़िलाफ़ बिगुल बजाने से ही साबित नहीं होती, देश के भीतर या बाहर रहते हुए भी देश की भलाई के बारे में सोचना और करना ज़रूरी है.<br />
 <br />
ऐसे लोग आपसे छुपे नहीं हैं जो बेईमानी, भ्रष्टाचार, लोगों के अधिकारों का हनन करके देश को दीमक की तरह चाटकर खोखला कर रहे हैं. ऐसे लोग लोकतंत्र को बदनाम करते हैं. इनमें बहुत से वो विधायक, सांसद, मंत्री और अधिकारी भी शामिल हैं जो हर रोज़ वंदे मातरम् गाते हैं मगर हद दर्जे के भ्रष्ट और बेईमान हैं.  भारत में इतना भ्रष्टाचार फैला है कि इससे छुटकारा पाने के लिए उसे पूरी दुनिया में कम से कम 83 देशों से मुक़ाबला करना है. भारत के निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन में भी कम भ्रष्टाचार है.</p>

<p>यदि धर्म को एक तरफ़ रख दें तो भी किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ कोई काम करने के लिए मजबूर करना सीधे-सीधे उसके व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करना है, जिसकी गारंटी उसे संविधान या अंतरराष्ट्रीय संधियों में दी गई है. मैं अगर सिगरेट नहीं पीना चाहता या गोश्त नहीं खाना चाहता या... तो क्या कोई मुझे मजबूर कर सकता है. यहाँ इंग्लैंड के सरकारी स्कूलों में तो किसी धर्म का कोई तराना नहीं गाया जाता यहाँ तक कि महारानी की प्रशंसा वाला राष्ट्रगान भी नहीं क्योंकि बच्चे कहते हैं कि अगर किसी एक धर्म का गीत गाया जाए तो अन्य धर्मों के बच्चों की भावनाओं को ठेस पहुँचेगी. </p>

<p>तो वंदे मातरम् गाया जाए या नहीं, इसका बहिष्कार किया जाए या नहीं और इसे अनिवार्य बनाया जाए या नहीं, इस बहस को छोड़ कर कुछ और रचनात्मक बात पर बहस-मुबाहिसा हो तो क्या सबके हित में नहीं होगा.  </p>]]></description>
         <dc:creator>महबूब ख़ान </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-53.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-53.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Fri, 20 Nov 2009 06:00:00 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>जो दिख रहा है बस उतना ही नहीं है</title>
	<description><![CDATA[<p>मराठी बनाम हिंदी. राज ठाकरे बनाम अबु आज़मी. बाला साहब बनाम सचिन तेंदुलकर. महाराष्ट्रीय बनाम भारतीय. कल्याण सिंह बनाम मुलायम सिंह.</p>

<p>इन सब मामलों पर पिछले दिनों इतना कुछ लिख दिया गया है कि इन किस्सों और किस्सों के पीछे की राजनीति को दोहराने का लाभ नहीं है. </p>

<p>आप सब इन मुद्दों की बारीकियों से अवगत हैं. कब कल्याण सिंह को लोध वोट बैंक ज़रुरत बन जाता है और कब मुसलमानों की नाराज़गी भारी पड़ने लगती है.</p>

<p>आप यह भी जानते हैं कि मामला किसी के मराठी प्रेम या हिंदी प्रेम का नहीं है. हर किस्से के पीछे मकसद सिर्फ़ एक है. कैसे यह राजनेता इन मुद्दों पर जनता को उकसाएँ, उनकी भावनाएँ भड़काएँ और अपना उल्लू सीधा करें.</p>

<p>राज ठाकरे के मराठी प्रेम का असली निशाना शिवसेना है. उनके विधायकों ने अबू आज़मी को कटघरे मे खड़ा कर मराठी मानुष को लामबंद करने की कोशिश की तो बालासाहब ठाकरे की शिवसेना ने अपने पैरों तले और ज़मीन खिसकने के डर से सचिन तेंदुलकर को ही आड़े हाथों ले डाला.</p>

<p>अब इसको आप एक चतुर राजनीतिक पलटवार कहेंगे या हताशा में अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला देने का एक अनूठा उदाहरण, यो तो आपकी राजनीतिक सूझ-बूझ और समझ पर निर्भर करता है पर एक बात तय है.</p>

<p>भारतीय राजनेताओं ने जैसे कसम खा ली है कि अपने स्वार्थ और हित के लिए वह किसी भी स्तर तक गिरने और कुछ भी करने के लिए तैयार हैं.  अवसरवादिता की राजनीति चरम पर है.</p>

<p>आप देख रहे हैं कि कैसे कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने राज ठाकरे का इस्तेमाल शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को निपटाने के लिए किया. बेचारे उद्धव ने कुछ सौम्य और सभ्य रहने की कोशिश की तो तमाम पंडितों ने यह लिख मारा कि उनमें बाला साहब वाले तेवर और पकड़ नहीं है. </p>

<p>अब सचिन के मुक़ाबले स्वयं मैदान में उतरे बाला साहब स्वयं अपनी ही विरासत की लड़ाई लड़ रहे हैं. </p>

<p>क्या विडंबना है. कहते हैं न कि शेर की सवारी...अपने ही तैयार किए गए भतीजे और राजनीतिक चेले से निपटने के लिए बालासाहब को अपनी ही उपज से ज्यादा उग्रवादी बनना पड़ रहा है.</p>

<p>उधर कुछ राजनीतिक समीक्षकों के लगातार यह अंदेशा जताते रहने के बावजूद कि राज ठाकरे नए भिंडरावाले हो सकते हैं और कांग्रेस को समय रहते चेत जाना चाहिए, कांग्रेस है कि ख़तरे के तमाम सिगनल देखते हुए भी अनदेखा करना चाह रही है.</p>

<p>और क्यों न करें. उनका राजनीतिक उल्लू तो राज ठाकरे की प्रासंगिकता से सध ही रहा है. देश की चिंता तब कर ही लेंगे जब बहुत देर हो चुकी होगी. </p>

<p>कितनी बार पहले भी तो देश को विनाश के कगार तक तकरीबन धकेल कर, भारत के महान नेताओं ने अंतिम समय में देश को हमेशा बचा ही लिया है.   <br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>संजीव श्रीवास्तव </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-52.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-52.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 18:42:10 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>वो सबका हीरो है</title>
	<description><![CDATA[<p>क्रिकेट धर्म है और सचिन भगवान... ये कहावत पुरानी हो चुकी है. मैं इस कहावत में यक़ीन नहीं रखता लेकिन इतना जानता हूं कि जब मैंने पहली बार अपने होशो हवास में भगवान को याद किया था तो उसकी वजह सचिन ही थे.</p>

<p>मैं ना ही बहुत बड़ा क्रिकेट भक्त हूं और न ही मेरी याददाश्त तेंदुलकर जैसी है. मुझे तारीख भी याद नहीं. बस इतना याद है कि उस पूरे वनडे मैच में मैं एक ही मुद्रा में तब तक बैठा रहा जब तक सचिन ने शतक पूरा नहीं कर लिया.</p>

<p>ये याद है कि वनडे में सचिन इससे पहले कई बार अस्सी के आस पास आउट हो चुके थे और मुझे लग रहा था कि अगर मैं हिला डुला तो सचिन आउट हो जाएंगे. </p>

<p>इसके बाद तो सचिन ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. रिकार्ड पर रिकार्ड बनते चले गए. क्रिकेट में दिलचस्पी नहीं बढ़ी लेकिन सचिन की बल्लेबाज़ी से प्यार बढ़ता चला गया. अगर वो क्रीज़ पर हैं तो मैं टीवी के सामने.</p>

<p>सचिन के अस्सी का स्कोर पार करते ही हिलना डुलना अब भी बंद हो जाता है और भगवान का नाम अब भी लेने लगता हूं.</p>

<p>मैं न तो क्रिकेटर हूं न ही कमेंटेटर और न ही एक पत्रकार के रुप में मैंने कभी सचिन का इंटरव्यू किया है या उनको नज़दीक से जाना है. लेकिन फिर भी हर आम हिंदुस्तानी की तरह मुझे भी लगता है कि सचिन से मेरा एक रिश्ता है जिसे समझा पाना मुश्किल है. </p>

<p>जब क्रिकेट पर सट्टेबाज़ी का साया छाया तो क्रिकेट से बहुत लोगों का ( जिसमें मैं भी शामिल हूं) रिश्ता बदला. कुछ लोगों ने क्रिकेट देखना बंद कर दिया तो कुछने भारत के खेलने पर रातों की नींद हराम करने को वक्त गंवाना समझा. इसके बावजूद सचिन से लगाव जारी रहा. कई मैचों में सचिन का शतक बनते ही टीवी बंद करना याद है. कई बार भारत की हार जीत बेमानी होती थी.</p>

<p>सचिन ख़राब फॉर्म में हो और इस पर ऑफिस में बहस हो रही हो तो कुछ भी बोल दूं दिल से लगता था कि सचिन के चार पाँच शतक और बन जाएं तभी वो खेलना छोड़ें.</p>

<p>सचिन अब 36 के हैं. मैं उनसे तीन साल छोटा हूं लेकिन जब सचिन को खेलते देखता हूं तो लगता है वो अभी 17 साल के ही हैं और उन्हें बहुत खेलना है.</p>

<p>जब कभी सचिन शून्य पर या कम रनों पर आउट होते थे और मैं गुस्सा होता था तो मेरी अनपढ़ मां मुझे डांटती थी कि अरे, क्या वही हर मैच में अच्छा खेलेगा, बाकी क्या करेंगे. मेरे पापा अगर सचिन से नाराज़ हों तो मैं उनपर गुस्सा हो जाता था.</p>

<p>मुझे लगता था कि मेरे परिवार में ही ऐसा होता है लेकिन धीरे धीरे पता चला कि भारत के लगभग सभी घरों में सचिन वैसे ही लोकप्रिय हैं जैसे मेरे घर में. </p>

<p>एक बार मेरे एक खेल पत्रकार मित्र ने ( जो सचिन से कई बार मिल चुके हैं) कहा कि वो मुझे सचिन का ऑटोग्रॉफ ला देंगे. मैंने कहा, नहीं मुझे ऑटोग्रॉफ की ज़रुरत नहीं क्योंकि वो तो मेरे परिवार के सदस्य हैं. </p>

<p>सचिन असली हीरो हैं क्योंकि भारत का हर परिवार सचिन को अपने परिवार का सदस्य समझता है और भले ही वो कुछ भी कहें वो दिल से चाहते हैं कि सचिन अभी और खेलते रहें. <br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>सुशील झा </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-51.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-51.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 13:02:27 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>धन-तन फूँक तमाशा देख!</title>
	<description><![CDATA[<p><span class="mt-enclosure mt-enclosure-image" style="display: inline;"><img alt="कहते हैं कि शराब आदमी को खा जाती है" src="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/youth_drinking.jpg" width="226" height="170" class="mt-image-right" style="float: right; margin: 0 0 20px 20px;" /></span>माफ़ कीजिएगा, मैं फिर से साइकिल का ज़िक्र छेड़ रहा हूँ. लगता है साइकिल सचमुच मेरे दिमाग़ पर तारी हो गई है. बात ये है कि जब साइकिल चलाने का मौक़ा नहीं मिलता है तो मैं घर से बुश हाउस का सफ़र उसी तरह तय करता हूँ जैसे लंदन में लाखों लोग करते हैं यानी भूमिगत रेल के ज़रिए जिसे अंडरग्राउंड कहा जाता है. </p>

<p>अभी कल ही डिब्बे के भीतर एक विज्ञापन-तख़्ती पर नज़र पड़ी जिस पर लिखा था - "शराब के दुरुपयोग की वजह से इंग्लैंड की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा पर हर वर्ष दो अरब 70 करोड़ पाउंड का बोझ पड़ता है." </p>

<p>मेरे ख़याल से इसे रुपए में आँकने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि नुक़सान तो यहाँ इंग्लैंड में ही हो रहा है. इस समस्या से भारत में होने वाला जान-माल का नुक़सान आपसे छुपा नहीं. </p>

<p>दरअसल बात ये है कि ब्रिटेन सरकार इस समस्या को लेकर ख़ासी परेशान है कि लोग देर रात तक शराब पीते हैं और अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा पीते हैं. अब किस आदमी को कितनी शराब पीने की ज़रूरत है, ये कौन तय करे. शराब पीने वाले कहते हैं कि दो-चार-छह गिलास पी लेने से कुछ नहीं होता लेकिन सरकार और अनेक संगठनों का कहना है कि इससे शराब पीने वालों (मैं 'शराबी' नहीं कहना चाहता) की सेहत तो ख़राब होती ही है, समाज को भी नुक़सान होता है. </p>

<p>अब कोई सरकार से पूछे कि शराब पीने वाले ख़ुद का धन ख़र्च करते हैं तो समाज का नफ़ा-नुक़सान इसमें कहाँ से आ गया.</p>

<p><span class="mt-enclosure mt-enclosure-image" style="display: inline;"><img alt="लंदन मेयर ने एक जून 2008 से सरकारी बसों और अंडरग्राउंड ट्रेन में शराब पीने पर पाबंदी लगा दी" src="http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/youth_drinking226.jpg" width="226" height="170" class="mt-image-right" style="float: right; margin: 0 0 20px 20px;" /></span> लंदन के मौजूदा मेयर बोरिस जॉन्सन ने तो एक जून 2008 से लंदन में सरकारी बसों और रेलगाड़ियों में शराब पीने पर ही पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी. उनके ख़याल में लोग शराब पीकर बसों और अंडरग्राउंड रेलगाड़ियों में हुड़दंग करते थे. यहाँ लंदन पुलिस भी कूद पड़ती है, जो कहती है कि ज़रूरत से ज़्यादा शराब पीने के बाद लोग रात को मयख़ानों-क्लबों के आसपास और सड़कों पर हुड़दंग करते हैं जिससे सामाजिक माहौल में ख़लल पड़ता है. </p>

<p>बहरहाल, मुझे ये सोचकर तो बहुत तसल्ली होती है कि यहाँ इंग्लैंड में ज़हरीली शराब को किसी की जान लेते नहीं देखा है, जैसाकि भारत में अक्सर होता है. </p>

<p>भारत की ही बात आगे बढ़ाएँ तो सड़कों पर हर कोस-दो कोस के फ़ासले पर शराब की दुकानें नज़र आ जाएंगी जो ठंडी-चिल्ड बीयर और देसी शराब धड़ल्ले से बेचती हैं. मैं सोच रहा था कि भारत में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों के बजाय क्या वाक़ई शराब की दुकानों की इतनी ज़रूरत है. </p>

<p>क्या कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है जिसमें लोगों को बोतलबंद पानी और महंगे कोल्ड ड्रिंक्स पर अपनी कमाई ना ख़र्च करनी पड़े और मुफ़्त मिलने वाला पानी बीमारियों और उनकी मौत का कारण ना बनें...</p>

<p>मेरे ख़याल से अगर शराब इतनी ही ज़रूरी है तो सरकार को चाहिए कि लोगों को शराब मुफ़्त बाँटने लगे! इससे उनका धन तो बचेगा जो रोटी-पानी ख़रीदने के काम आएगा! मुझे तरस इस बात पर भी आता है कि ऐसे लोग अपनी भलाई के बारे में सोचने की ज़िम्मेदारी किसी और पर क्यों छोड़ देते हैं. वे शराब पर अपना पैसा भी ख़र्च करते हैं और डॉक्टरों की बात मानें तो ख़ुद ही अपनी जान के दुश्मन भी बनते हैं. ये तो वही बात हुई - धन-तन फूँक तमाशा देख. </p>

<p><strong>आप क्या कहते हैं....</strong></p>]]></description>
         <dc:creator>महबूब ख़ान </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-50.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-50.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 20:58:13 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>मैं बर्लिन वासी हूँ</title>
	<description><![CDATA[<p>9 नवंबर को 140 किलोमीटर लंबी 12 फुट ऊँची बर्लिन की दीवार ढहने की 20वीं वर्षगाँठ पर सब ख़ुश हैं. </p>

<p>बहुत से टीवी चैनल को जॉन एफ़ केनेडी की 26 जून, 1963 का वह लोकप्रिय भाषण बार बार याद आ रहा है जब उन्होंने बर्लिन की दीवार के साए में बने हुए मंच पर वामपंथी तानाशाही को ललकारते हुए कहा था कि आज मैं बड़े गर्व से कहता हूँ, "ईख़ बिन आईन बर्लिनर" (मैं बर्लिन वासी हूँ).</p>

<p>लेकिन आज किसी को याद नहीं कि पूर्वी जर्मनी की वामपंथी सरकार ने अगस्त 1961 में बर्लिन के विभाजन के लिए बाड़ लगाने का काम शुरु किया तो कुछ महीनों बाद वाशिंगटन की ओर से क्रेमलिन को संदेश भेजा गया कि अमरीका बर्लिन की दीवार को एक अंतरराष्ट्रीय यथार्थता के रूप में स्वीकार करता है और इस प्रक्रिया को ताक़त के ज़रिए चुनौती नहीं दी जाएगी.</p>

<p>केनेडी प्रशासन की ओर से दिलाए गए आश्वासन के 25 साल बाद 12 जून, 1987 को उसी बर्लिन की दीवार के साए में एक और अमरीकी राष्ट्रपति रोनॉल्ड रेगन ने कहा, "गोर्बाचौफ़ इस दीवार को गिरा दो." </p>

<p>लेकिन बर्लिन की दीवार ढहने से दो महीने पहले रेगन की प्रिय मित्र ब्रितानी प्रधानमंत्री मार्गरेट थेचर ने मिख़ाइल गोर्बाचौफ़ से मॉस्को में मुलाक़ात के दौरान कहा कि हम एक संयुक्त जर्मनी नहीं चाहते. इससे विश्व युद्ध के बाद की सीमाएँ परिवर्तित होनी शुरु हो जाएँगी. हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते. इस प्रकार की प्रगति से न केवल अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा को हानि पहुँचेगी बल्कि हमारी संप्रभुता भी ख़तरे में पड़ सकती है.</p>

<p>मार्गरेट थेचर और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ़ाँसवा मितराँ को यह साझा ऐतिहासिक डर लगा हुआ था कि संयुक्त जर्मनी यूरोप का सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश बन जाने के बाद दूसरे विश्व युद्ध से पहले के जर्मनी के मुक़ाबले में महाद्वीप में ताक़त का संतुलन बिगाड़ने की ज़्यादा बेहतर स्थिति में होगा.</p>

<p>बर्लिन की दीवार के ढहने की 20वीं वर्षगाँठ के जश्न में अमरीकी विदेश मंत्री हेलरी क्लिंटन ने भी भाग लिया. </p>

<p>यह वही हिलेरी क्लिंटन हैं जिन्होंने 2005 में बतौर सेनेटर कहा था कि फ़लस्तीनी पश्चिमी तट और इसराइल के बीच उठाई जाने वाली 703 किलोमीटर लंबी, 30 फुट ऊँची दीवार और रुकावटें उठाने की शेरोन की परियोजना के पक्ष में हैं.</p>

<p>हालाँकि वे अच्छी तरह जानती थीं कि 2003 में संयुक्त राष्ट्र महासभा और 2004 में अंतरराष्ट्रीय अदालत एक ऐसी दीवार के निर्माण को अवैध क़रार दे चुकी थी जिसके नतीजे में प्रस्तावित फ़लस्तीनी राज्य का क्षेत्र न केवल साढ़े आठ प्रतिशत और घट जाएगा बल्कि लगभग पौने तीन लाख फ़लस्तीनी या तो इसराइल और पश्चिमी तट के आरपार विभाजित हो जाएँगे या दीवार के कारण पूरी तरह घिर जाएँगे. </p>

<p>सिद्ध क्या हुआ? सिद्ध यह हुआ कि बर्लिन की दीवार शीतयुद्ध की ज़रूरत भी थी और पश्चिमी देशों के हाथ में वामपंथियों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार का ऐसा हथियार भी जिसे वह आख़िर तक खोना नहीं चाहते थे. </p>

<p>लेकिन इसराइल और फ़लस्तीन के बीच उठाई जाने वाली दीवार अगर बर्लिन की दीवार से कहीं बड़ी और ऊँची हैं, इसके बावजूद कोई यूरोपीय और अमरीकी नेता इस दीवार के साए में यह नारा लगाने पर तैयार नहीं कि "ईख़ बिन आईन फ़लस्तीनियन" (मैं फ़लस्तीन वासी हूँ).<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>वुसतुल्लाह ख़ान </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-49.html</link>
	<guid>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-49.html</guid>
	<category></category>
	<pubDate>Tue, 10 Nov 2009 12:31:47 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>निशाना मधु कोड़ा पर ही क्यों!</title>
	<description><![CDATA[<p>मधु कोड़ा प्रकरण जिस तरह सुर्ख़ियों में है, कुछ अजीब लगता है.</p>

<p>मधु कोड़ा ने ग़लत किया या नहीं, वह निर्दोष हैं या दोषी- यह सब बातें तो अदालत में तय होंगी.</p>

<p>अदालत का फ़ैसला जब भी आए, जिस तरह की हैरतअंगेज़ बातें मीडिया में छप रही हैं, उनमें अगर कुछ प्रतिशत भी सच्चाई है तो यह समझ में आ जाता है कि भ्रष्टाचार नापने के हर अंतरराष्ट्रीय मापंदड पर क्यों भारत का नाम भ्रष्ट व्यवस्था वाले राष्ट्रों की सूची में प्रथम पंक्ति में आता है.</p>

<p>पर फिर भी मधु कोड़ा का क़िस्सा जिस तरह उछल रहा है उससे कई प्रश्न और खड़े होते हैं.</p>

<p>पहला प्रश्न तो यही कि कोड़ा पर पड़े आयकर विभाग के छापों की टाइमिंग के पीछे भी क्या कोई राजनीति है.</p>

<p>क्यों यह क़िस्सा एक ऐसे समय सुर्ख़ियों में आया जब इससे एक बड़ा मामला सुर्ख़ियों में था.</p>

<p>केंद्रीय मंत्री ए राजा- जिनका नाम कुछ अख़बारों में तो स्पेक्ट्रम राजा रख दिया था, के विभाग की हो रही सीबीआई जाँच, डीएमके और कांग्रेस की इस मसले पर खींचतान और स्पेक्ट्रम घोटाले के तार अन्य दलों के नेताओं से जुड़ने की अटकलें- सभी कुछ कोड़ा कांड की सुर्खियों के पीछे जैसे छिप गया है.</p>

<p>यह भी एक दिलचस्प बात है कि कोड़ा पर सरकारी एजेंसियों की गाज उस समय गिरी जब झारखंड चुनावी मूड में है. क्या कोड़ा पर कार्रवाई निर्दलीय विधायकों और छोटे दलों को किसी तरह की चेतावनी है.</p>

<p>इस लेख का अर्थ कृपया यह नहीं लगाएँ कि कोड़ा की हिमायत की जा रही है. बिल्कुल नहीं.</p>

<p>सवाल सिर्फ़ यही है कि क्या हम यह मान लें कि देश में मुख्यधारा से जुड़ी राजनीतिक पार्टियों के सभी नेता क्या दूध से धुले हुए हैं. या फिर- "जिनके घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारें" वाली बात सिर्फ़ बड़ी पार्टियों पर लागू होती है.</p>

<p>मतलब यह कि गंदे तालाब या भ्रष्ट सागर की सभी बड़ी मछलियाँ या मगरमच्छ एक दूसरे का तो ध्यान रख लें और कहीं न कहीं 'राज के प्रसाद' को बाँटकर खाने पर अघोषित सहमति बना लें, पर किसी छोटे-मोटे क़द और हैसियत वाले राजनेता के ख़िलाफ़ जितनी चाहे सख़्त कार्रवाई करें.</p>

<p>मैं एक बार फिर यह साफ़ करना चाहता हूँ कि हम कोड़ा के ख़िलाफ़ जो कुछ हो रहा है उसे ग़लत नहीं मानते.</p>

<p>प्रश्न सिर्फ़ यह है कि अगर मधु कोड़ा कांग्रेस, बीजेपी या वाम मोर्चा या किसी भी अन्य बड़े दल में होते तो क्या यह सब होता जो हो रहा है.</p>

<p>होना यही चाहिए था- पर शायद होता नहीं.</p>

<p>चलते-चलते एक बात और.</p>

<p>राजनीति जनता की सेवा के लिए नहीं अपना उल्लू सीधा करने के लिए ज़्यादातर राजनेता करते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है.</p>

<p>पर पैसे और पद की जिस तरह की नंगी भूख पिछले दिनों कर्नाटक और महाराष्ट्र में देखी गई उसकी भी बहुत ज़्यादा मिसाल हमें देखने को नहीं मिली है. एनसीपी और कांग्रेस के बीच विभागों की खींचतान का एकमात्र मुद्दा यही था कि कौन सा विभाग और मंत्रालय कितना 'कमाऊ पूत' है. यही भूख और लालच कर्नाटक में बीजेपी सरकार पर आए संकट का केंद्र बिंदु थे.</p>

<p>पर चूँकि इन दोनों ही राज्यों में राष्ट्रीय दल इस घिनौनी खींचतान में शामिल थे, मीडिया की चाबुक कोड़ा पर ही अधिक चली.</p>]]></description>
         <dc:creator>संजीव श्रीवास्तव </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/koda-corruption.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 15:43:40 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>जब देता है छप्पर फाड़ कर देता है...</title>
	<description><![CDATA[<p>मन ही मन सब चाहते हैं कि बस एक बार लॉटरी लग जाए तो वारे-न्यारे हो जाएं. </p>

<p>यहाँ तक कि मुझ जैसे लोग भी जीवन परिवर्तन के सपने देखते हैं जबकि लॉटरी का टिकट नहीं ख़रीदते. जब कभी ख़रीदा भी तो छह में से एक नंबर भी नहीं लगा. </p>

<p>लेकिन मैं उन दो ब्रिटिश नागरिकों के बारे में सोच रही हूँ, जिन्होंने यूरो मिलियन्स लॉटरी का जैकपॉट जीत कर अलग-अलग साढ़े सात करोड़ डॉलर जीते हैं. </p>

<p>मेरा हिसाब यूं भी ज़रा कमज़ोर है. ऊपर से इतनी मोटी रक़म का क्या मतलब हुआ इसे समझने के लिए मुझे दिमाग़ पर बहुत ज़ोर लगाना पड़ रहा है.</p>

<p>सोचती हूँ क्या करेंगे वो इतने धन का. ब्रिटन के किसी शानदार इलाक़े में एक आलीशान मकान, रोल्स रॉएस कार, डिज़ाइनर कपड़े, नवीनतम उपकरण, दुनिया की सैर. सूची चाहे जितनी लंबी बना लें लेकिन कहीं तो रुकेगी. उसके बाद.....</p>

<p>दुनिया के सभी देशों में लॉटरी खेली जाती है और कुछ भाग्यवान लोग जीतते भी हैं. लेकिन इस खेल में बड़ा असंतुलन है. </p>

<p>ब्रिटन की राष्ट्रीय लॉटरी में छह अंक होते हैं. तीन नंबर लगने से कोई 10 पाउंड मिलते हैं, चार लगने से कोई 75, पांच लगने से हज़ार डेढ़ हज़ार और अगर छह के छह लग जाएं तो आप एक पल में करोड़पति बन जाते हैं. </p>

<p>जिस सप्ताह किसी का जैकपॉट नहीं लगता तो वो राशि अगले हफ़्ते के जैकपॉट में जमा हो जाती है.</p>

<p>मुझे यह बहुत ही अन्यायपूर्ण लगता है. सरकार किसी एक को करोड़पति बनाने को उत्सुक रहती है लेकिन दस-पचास को लखपति या हज़ारपति नहीं बनाना चाहती. </p>

<p>अगर ऐसा हो तो इसके दो फ़ायदे होंगे. एक तो धन का अधिक न्यायपूर्ण वितरण होगा और दूसरा जीतने वालों के सामने ये धर्मसंकट नहीं आएगा कि साढ़े सात करोड़ डॉलर जैसी भारी भरकम राशि कैसे ख़र्च करें.</p>

<p>आपका क्या ख़्याल है....</p>]]></description>
         <dc:creator>ममता गुप्ता </dc:creator>
	<link>http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2009/11/post-48.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 03:47:45 +0530</pubDate>
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