« पिछला | मुख्य पोस्ट

झल्ला की लब्दा फिरे?

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | शनिवार, 16 फरवरी 2013, 18:38 IST

यार संपूरण सिंह तुझे ये क्या सूझी कि ये बॉर्डर पार करते ही तू झेलम के दीना चला गया.
न सिर्फ चला गया बल्कि जन्मभूमि देख कर जज्बाती सा भी हो गया.
ठीक है तू दीना के कलरा गांव में पैदा हो गया था पर है तो तू भारतीय. जैसे मेरा बाप टोंक राजस्थान में पैदा हो गया था पर था तो वो पाकिस्तानी.
जहां तूने 77 में से 70 साल दीना जाए बगैर गुजार दिए, वहां कुछ और साल भी गुज़ार देता तो क्या हो जाता.
वैसे तू दीने से निकला कब था? इस बुढ़ापे में भी जब तू मुंबई के बांद्रा जिमखाने में हर सुबह टेनिस की बॉल उछालता है तो सच्ची सच्ची बता नेट के दूसरी तरफ दीना के अलावा और क्या होता है ???
झल्ला की लब्दा फिरे
यारो ओ घर केहड़ा
लोकां तौं पूछदा फिरे
झल्ला हंसदा फिरे, झल्ला रोंदा फिरे
झल्ला गली गली रल्दा फिरे.
---
मुसाफिर हूं यारो
ना घर है ना ठिकाना
मुझे चलते जाना है..
चलते जाना ..
---
ओ माझी रे..
अपना किनारा
नदिया की धारा है...
---
तुझसे नाराज नहीं हूं जिंदगी
हैरान हूं मैं.. परेशान हूं..
---
कतरा करता मिलती है
कतरा कतरा जीने दो
जिंदगी है पीने दो
प्यासी हूं मैं प्यासी रहने दो..

ओ संपूरण मुझे एक बात तो बता.. तूने आखिर इतने बरसों में सीखा क्या? इतना तेरा नाम है. कैसी बांकी मन मोहिनी तेरी शक्ल है. एक सौ बीस फिल्मों के तूने गाने, उन्नीस फिल्मों के डायलॉग और इतनी ही फिल्मों की कहानियां लिखीं. बाइस फिल्मों का निर्देशन किया. दो फिल्में जेब से बनाईँ. मिर्जा गालिब समेत तीन टीवी सीरियल पैदा किए. बारह म्यूजिक एल्बम पेश किए. इकत्तीस फिल्म फेयर अवॉर्ड, एक ऑस्कर, एक ग्रैमी और एक पद्म भूषण सीने पर टांग लिया. तीन शायरी के संग्रह और एक कहानी संग्रह छाप मारा. एक जहीन बेटी को दुनिया में लाया.
'अपने आप रातों को सीढ़ियां धड़कती हैं, चौंकते हैं दरवाजे' जैसी तिलिस्मी लाइन नग्मे में डाल दी.. पर नहीं सीखा तो जिंदगी को गुजारने का क ख ग नहीं सीखा.
तुझे अब दीने जाने की आखिर क्या जरूरत पड़ गई थी? वहां क्या रखा है ? हो गया ना एक दफा पैदा तू, हो गया एक दफा बंटवारा, धकेल दिया गया ना तेरे जैसा लाखों परिवारों को इधर से उधर और उधर से इधर. अब क्यों अपने और दूसरों के जख्मों को कुरदने में लगा है.
सात दिन तुझे रहना था पाकिस्तान में. रहता लाहौर की हिप्पी गोलकियों के बीच और कराची के साहित्य मेले में और फिर बंद घरों में अय्याशी के साथ. देता अपनी मर्जी के चैनलों को इंटरव्यू. करता मीठी मीठी मुलायम बातें. और सवार हो जाता जहाज में अपनी नम आंखों के साथ यहां की आओ भगत की तारीफें करते करते.
जब तूने इन लाइनों वाली नज्म भी लिख दी थी कि
आंखों को वीजा नहीं लगता
बंद आंखों से रोज सरहद पार चला जाता हूं
सपनों की सरहद कोई नहीं.
तो इसके बाद खुली आंखों दीना जाने की क्या जरूरत आन पड़ी थी?
तेरा क्या ख्याल था कि वहां जो बच्चे तेरे साथ लकन मिटी खेलते थे उनकी उम्रें जम गई होंगी. वो पेड़ जिन्हें तेरा नाम याद था, उनकी यादाश्त और यादें ताजा होंगी? जिस आंगन में तू दौड़ता था, उसकी ईंटों का रंग वैसा ही लाल लाल होगा? जिस कमरे की दीवारें तेरी सोतैली मां और बहन भाइयों की डांट और प्यार से तेरे बावा ने गूंधी थी, उनका पलस्तर वहीं का वहीं जमा होगा ??
यार सरदार जी तुझे इतनी बात पल्ले नहीं पड़ी कि जिस जगह को छोड़ दो उसकी तरफ मत लौटो. कहीं वो तस्वीर भी बर्बाद न हो जाए जो दिल के ड्राइंग रूम में याद की कील से टंगी है.
अब तू अच्छा रहा.. दिल का दीना भी तेरे हाथ से गया..
संपूरण सिंह एक बात तो मुझे तेरी आज तक समझ नहीं आई. एक तरफ ये मिसरा लिखता है कि -
नजर में रहते हो जब तुम नजर नहीं आते
और फिर इसके बिल्कुल उलट तू दीने चला गया. वो भी अपनी नजरों से देखने.
पता है क्या? अब मैं तुझे थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूं. तू ना हंसने, रोने, चीखने वाला झल्ला बिल्कुल नहीं. तुझे दुख तकलीफें चाहिए. तू वहां इसलिए गया कि गम और दर्द और टूट फूट का ताजा स्टॉक मिल जाए और फिर तू इस कच्चे माल से बाकी बची जिंदगी में गीतों और गद्य के बुत तराशे. ये तुम जैसे रचनाकारों की बड़ी पुरानी तकनीक है ये.
देख अगर तू अपनी खुदगर्जी की कुरबानी दे देता और दीना न जाता तो कितने हजार लोग तुझे लाहौर और कराची में देख कर, सुन कर और सोच कर गुलजार हो जाते. मगर तूने इनके साथ अच्छा नहीं किया. अब तू कह रहा है कि जल्द पाकिस्तान वापस आएगा.. यार संपूरण अपनी उम्र देख और अपने वादे देख.
अब जब कि तू लौट गया है, अब तो बता दे कि तुझे दीना जाने का मशविरा दिया किसने था???

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 22:27 IST, 16 फरवरी 2013 Swarn Singh Manhas:

    शानदार. आपके शब्दों ने दिल को छू लिया.

  • 2. 22:43 IST, 16 फरवरी 2013 Pranav:

    मैं पहले आपके ब्लॉग से असहमत था, लेकिन इस ब्लॉग के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. कृपया बीबीसी हिंदी के लिए नियमित लिखें.

  • 3. 22:49 IST, 16 फरवरी 2013 pranav:

    मुझे आपके कुछ साल पहले का ब्लॉग याद है जिसमें आपने 'फैबइंडिया' टीशर्ट के बारे में लिखा था. जिस तरह आप मुद्दों के बारे में लिखते हैं, वो बहुत अच्छा होता है. मुझे आपके अगले ब्लॉग का इंतजार रहेगा.

  • 4. 23:19 IST, 16 फरवरी 2013 NIKHIL NIRAJ:

    आजकल आप क्या लिख रहे हैं? कभी अफजल को सही तो कभी पाकिस्तान की तरफदारी. आखिर माजरा क्या है?

  • 5. 14:41 IST, 17 फरवरी 2013 Sushma Sharma :

    बहुत सुंदर. बहुत सही लिखा है.

  • 6. 17:44 IST, 17 फरवरी 2013 NIKHIL FROM MEERUT:

    क्या पाकिस्तान जाना गुनाह है? अगर है तो फिर आप लोग यहाँ क्यों आते हैं?

  • 7. 17:48 IST, 17 फरवरी 2013 NIKHIL FROM MEERUT:

    वहाँ हमारे लोगों के लिए दिलों में इतनी ही नफरत है.

  • 8. 00:53 IST, 18 फरवरी 2013 यूसुफ अली अजीमुदीन खाँ, रियाद:

    बिना मतलब का और आग में घी डालने वाला ब्लॉग है.

  • 9. 08:55 IST, 19 फरवरी 2013 yudhishthir:

    निहायत घटिया लेख. ओछी बुद्धि. साहब आप नहीं समझेंगे. गुलजार साहब की खुले आम बेइज्जती. और उनकी भावनाओं का मजाक. बहुत दुख होता है.

  • 10. 18:15 IST, 19 फरवरी 2013 Ghalib Ayaz:

    यह सचमुच एक दुखद घटना है. पता नहीं लोग क्यूँ भूल जाते हैं कि साहित्य और कला के लिए कोई सीमा नहीं होती. दोनों देशों के बीच रिश्तों में जो मधुरता आने लगी थी वो कम से कम अभी तो पैदा होने वाली नहीं है . जाने कब मुहब्बत की हवा बहेगी.

  • 11. 13:29 IST, 20 फरवरी 2013 Ravi Bakr:

    गुलजार साहब.

  • 12. 16:01 IST, 20 फरवरी 2013 mritunjay:

    कृपया, हर चीज की धर्म की नजर से नहीं देखें.

  • 13. 19:23 IST, 20 फरवरी 2013 अभिषेक मिश्र :

    सही कहा है आपने कि - "...कि जिस जगह को छोड़ दो उसकी तरफ मत लौटो. कहीं वो तस्वीर भी बर्बाद न हो जाए जो दिल के ड्राइंग रूम में याद की कील से टंगी है..."

  • 14. 03:46 IST, 21 फरवरी 2013 MAHARSHI SUBHASH:

    श्रीमान वुसतुल्लाह खान जी, आपने ये लेख बहुत अच्छा लिखा है. शायद इस लेख को श्री संपूर्ण सिंह कालरा जी पढ़ लें. मैं तो यही कहूँगा, ये दो देश, पानी पर खींचे गए लकीरों से ज्यादा कुछ नहीं है.
    दोनों के दिल में वही ईश्वर-अल्लाह बसता है. मैं आशा करता हूँ कि एक न एक दिन हम एक होंगे.

  • 15. 12:21 IST, 21 फरवरी 2013 zaigham:

    शानदार. आपकी क़ल़म वाकई एक अच्छे और सच्चे पत्रकार की क़ल़म है.

  • 16. 16:36 IST, 21 फरवरी 2013 Arpna:

    वाह... वुसतुल्लाह साहब... दिल छूने वाला लेख है...

  • 17. 16:17 IST, 22 फरवरी 2013 santosh shukla:

    वाह क्या बात है.

  • 18. 16:46 IST, 22 फरवरी 2013 gaurav bhatt:

    वाह, वाह, खान साहेब, बहुत ही बढ़िया बात लिखी आपने.

  • 19. 02:29 IST, 23 फरवरी 2013 imran khan:

    बहुत ही शानदार लिखा है सर.

  • 20. 16:45 IST, 23 फरवरी 2013 शाश्वत शुक्ला :

    बेहतरीन! आपको पढ़ कर एक पुराना शेर याद आ गया:
    हज़ारों सरहदों की बेड़ियाँ लिपटी हैं क़दमों से,
    हमारे पाँव को भी पर बना देता तो अच्छा था

    परिंदों ने कभी रोका नहीं रस्ता परिंदों का,
    ख़ुदा दुनिया को चिड़ियाघर बना देता तो अच्छा था!

  • 21. 09:27 IST, 24 फरवरी 2013 Prem Verma:

    बहुत खूब. क्या जादू बिखेरा है.

  • 22. 06:33 IST, 25 फरवरी 2013 Ashutosh Kaul:

    वुसतुल्लाह साहेब, ये वाला ब्लॉग जम रहा है.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.