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पनीर मोमोज़

विधांशु कुमार विधांशु कुमार | शुक्रवार, 25 जनवरी 2013, 17:29 IST

पिछली बार जब ''गंगनम' ' मुझसे मिला तो वो बहुत गुस्से में था.

ये यूट्यूब ख्याति वाला 'गंगनम' नहीं, बल्कि मेरा एक दोस्त है. 'गंगनम' का असली नाम कुछ और है लेकिन क्योंकि वो पूर्वोत्तर भारत से है और हम शेष भारत में वहां के बाशिंदों को तरह तरह के नाम से बुलाते हैं, उसका नाम भी ''गंगनम' ' रख दिया गया है.

वैसे तो कभी चीन अपने नक्शे में अरुणाचल प्रदेश या पूर्वोत्तर भारत के किसी दूसरे हिस्से को दिखा दे, या फिर वहां अलग देश की मांग हो तो हमारे जैसे देशभक्त भारतीयों का खून खौल उठता है. लेकिन हम वहां के लोगों को खुद से कुछ कम समझते हैं और तिरछी आंखों वाले और कुछ बेहद भद्दे नामों से पुकारने में कोई हिचक नहीं रखते हैं, ये हमारा 'बड़प्पन' है.

'गंगनम' को भी इन चीज़ों से ऐतराज़ है लेकिन इस बार उसका गुस्सा किसी और वजह से था.

दरअसल बीती रात वो दफ्तर से लंबी शिफ्ट के बाद घर के लिए निकला तो उसे बड़ी भूख लगी थी. चौराहे पर उसे ठिठुरती सर्दी में खड़ा एक लड़का मिला जो मोमो बेच रहा था. उसने एक प्लेट ऑर्डर दिया लेकिन जब उसने पहला ही मोमो मुंह में डाला तो, बकौल उसके, "पूरा स्वाद किरकिरा हो गया. ये कोई मटन या चिकन मोमो नहीं पनीर मोमो था. छी:"

उसने बताया, "मैंने उससे पूछा ये क्या डाल रखा है तो उसने जवाब दिया, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद. अब बताओ उसने एक तो ऐसी चीज़ खिलाई जो कहीं से मोमो से मेल नहीं खाती और दूसरा मुझे बंदर कह दिया."

मैनें पानी का ठंडा गिलास उसे बढ़ाते हुए कहा कि वो लड़का पढ़ा लिखा था, एक मुहावरा कह रहा था ओर तुम्हें बंदर नहीं कहा उसने.

इस पर 'गंगनम' और भड़क उठा. वैसे यहां ये भी बता दूं कि मैं उसे उसके नाम से पुकारना पसंद करता हूं और 'गंगनम' कतई नहीं कहता. लेकिन यहां उसे 'गंगनम' कहना ज़रूरी है क्योंकि उस रात उसने कुछ ऐसी बात कह दी की अगर उसकी पहचान मालूम हो जाए तो वो कई नर्म श्रद्धालुओं के गर्म गुस्से के हत्थे चढ़ जाए.

'गंगनम' कहने लगा तुम दिल्ली वाले भी हर चीज़ में पनीर डाल देते हो- पनीर परांठा तो समझ में आता है - ये पनीर दोसा, पनीर बिरयानी, पनीर अप्पम क्या चीज़ है?

पनीर का नाम सुनकर मेरे मुंह में पानी आ गया लेकिन जिस तरह उसने पनीर को स्वछंद गाली दी थी, दिल्ली के कई सौ क्विंटल पनीर पानी-पानी हो गए होंगे.

मैने पनीर के डिफेंस में कहा , "अरे देवों का आहार है पनीर. जैरी माउज़ से लेकर लिटिल प्रिंस तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक बच्चे बूढ़ों की पसंद है पनीर. फिर ये भी तो देखों कितना प्रोटीन मिलता है इससे वो भी बिना हिंसा किए हुए."

मु्झे अपनी ही दलील पर गर्व महसूस हो रहा था कि मैने 'गंगनम' से बाज़ी मार ली कि उसने एक और शिगूफ़ा छोड़ा.

कहने लगा, "अरे देवों की बात तो तुम छोड़ ही दो. वहां शिलॉन्ग में मैं भी कभी कभी हनुमान जी के मंदिर में जाता था. लेकिन अब तो हर जगह साईं बाबा के मंदिर नज़र आते हैं. वैसे भारत में मोमो ने समोसे को और साईं बाबा ने हनुमान जी को पीछे छोड़ दिया है."

उसकी आखिरी लाइन सुनकर मैं सकते में आ गया. मैनें कहा तुम 'गंगनम' ही ठीक हो. छुपे रहना, कहीं वायरल हो गए तो पता नहीं क्या क्या बदल डालोगे और अगर पकड़ में आ गए तो लोग ही तुम्हें बदल डालेंगे.

मैनें इधर उधर देखा, किसी ने सुना तो नहीं, फिर हाथ पकडकर उसे सीढ़ियों से नीचे ले गया.

घर से थोड़ी दूरी पर साईं बाबा के मंदिर के पास मैंने उसे रिक्शे पर बिठाया, बाबा के दरबार में सर नवाकर दुआ मांगी और फिर लपककर सड़क की दूसरी तरफ एक ठेले की तरफ बढ़ा और बीस का एक नोट बढ़ाते हुए कहा, "एक प्लेट पनीर मोमोज़ देना, लाल चटनी के साथ!"

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:37 IST, 25 जनवरी 2013 amit:

    बकवास! आप बीबीसी वाले अपने को क्या समझते हैं. हर बात में हिंदुओं के धार्मिक भावनाओं को ठेस पंहुचाना ज़रूरी है क्या...

  • 2. 22:44 IST, 25 जनवरी 2013 Bibek Dahal:

    मंगलबाज़ार, ललितपुर, नेपाल आइएगा तो सही में पनीर मोमो मिलेगा

  • 3. 23:08 IST, 25 जनवरी 2013 दीनानाथ:

    एक शानदार लेख ।

  • 4. 02:30 IST, 26 जनवरी 2013 Nikhil:

    क्या बकवास ब्लॉग आपने पोस्ट किया है!

  • 5. 12:05 IST, 26 जनवरी 2013 Sun:

    श्रीमान आप जितना बुद्धिमान अपने आप को दिखा रहे हैं उतने आप हैं नहीं .अगर आप उत्तर पूर्व के लोगों के साथ सहानुभुति दिखाना चाहते हैं तो उस दिन आप कहां थे जब बैंगलौर और हैदराबाद में वहां ेकलोगों को धमकाया जा रहा था.

  • 6. 12:24 IST, 26 जनवरी 2013 Pradeep:

    वाह कितनी खूबसूरती से तुमने उत्तरपूर्व के लोगों के बहाने हिंदुओं और उनके देवताओं का अपमान किया है. अगर तुम लोगों को वहां के लोगों के बारे में जरा बी ख्याल होता तो तो आंध्र प्रदेश में और पूरे देश में उन्हें धमकियां नहीं मिलती.

  • 7. 13:37 IST, 26 जनवरी 2013 Chandan Prasad:

    आज के समय में पनीर का बहुत महत्व है,जैसे शादी और किसी भी तरह के समारोह हो पनीर के बगैर फीका ही लगता है जैसे की अगर पनीर न हो तो समारोह को बुरा लग जायेगा, पनीर को प्रोटीन से भरपूर माना गया है,लेकिन जहाँ इसकी माँग में वृद्धि हुई है इसके नकली होने के प्रमाण भी उसी अनुरूप बढ़ रहे हैं! आज की तारीख में त्योहारों के समय में इसे काफी दिनों पहले से ही जमा किया जाता है, कहीं कहीं सुनने को आया है की ये नकली का प्रचलन जोरों पे है! आपके घर कोई मेहमान आये और अगर आपने पनीर से स्वागत किये हैं तो आप अच्छे मेजबान हैं वरना पता नहीं आपकी शिकायत सभी सगे-सम्बन्धियों में फ़ैल जायेगी की आपने फलां का अच्छे से स्वागत नहीं किये, और नकली पनीर सस्ता भी हो गया है,बड़े-बड़े रेस्तंरा में भी इसकी माँग बढ़ गयी है और वो ठेले-खोमचे वाले के भाव में बेच नहीं सकते हैं सो पनीर का इस्तेमाल कर के ऊँचे दरो पे पनीर मोमो की बिक्री करते हैं!

  • 8. 19:29 IST, 26 जनवरी 2013 anand:

    इतना जटिल व्यंग्य भी न लिखा करें कि बहुत सारे लोगों की समझ में नहीं आए. ये मत भूलिए कि हम नकली पढ़े-लिखे लोगों के युग में जी रहे हैं.

  • 9. 22:57 IST, 26 जनवरी 2013 nathmal didel:

    सच कहा विधांशु जी, उत्तर-पूर्व को बाकी भारत के साथ जोड़ने की ज़रूरत है. हमें उनके साथ किसी तरह का भेद-भाव नहीं करना चाहिए. उत्तर-पूर्व के बाशिंदे भारतवासी ही हैं.

  • 10. 12:29 IST, 28 जनवरी 2013 vimal:

    एक दम पते की बात कही है भाई, हमारे देश में ऐसा ही हो रहा है मुझे खुद को नहीं पता कब हमारे पास वाले संतोषी मत के मंदिर को बदल कर साईं मंदिर बना दिया गया और अब वहाँ जो भीड़ होती है उतनी भीड़ मैंने तब नहीं देखी जब वहा संतोषी माता रहती थी .......
    ऊपर जो कुछ भी लिखा गया है वो एक कड़वा सच है , हमारी विदेशी सरकार देशवासियों को जो पाठ पढ़ा रही है देशवासी उसे ही पढ़े जा रहे हैं और बढे जा रहे है पतन की ओर ..
    ब्लोगर को गालियाँ देने से जादा बेहतर होगा की सब लोग अपने आस पास हो रहे पाश्चात्य बदलाव को रोकने की कोशिश करें वर्ना एक दिन ऐसा आएगा कि आप खुद को ही गाली दे रहे होंगे कि किस घटिया देश में जन्म ले लिया.

  • 11. 10:50 IST, 30 जनवरी 2013 anand:

    विमल जी साई बाबा पाश्चात्य बदलाव कैसे हो सकते हैं... सांई बाबा पूरे देशी हैं. आपने शायद लेख को पूरा नहीं समझा...ये एक सकारात्मक लेख है... जो हर नई चीज़ कुछ बदलाव कर अपनाने की बात कर रहा है... चाहे वो मोमोज़ हों या फिर धर्म...

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