« पिछला | मुख्य पोस्ट | अगला »

एक्टिंग या मजबूरी?

कल्पना शर्मा कल्पना शर्मा | शुक्रवार, 25 जनवरी 2013, 16:52 IST

क्या आपने कभी किसी को मजबूरी में एक्टिंग करते हुए देखा है? मैंने देखा है, इमरान खान को.

'मटरू की बिजली का मंडोला' देखने के बाद सबसे पहला ख़्याल यही आया कि ये इमरान एक्टिंग करते क्यों हैं? भला ऐसी भी क्या मजबूरी? जब पर्दे पर इमरान को एक्टिंग की कोशिश करते देखती हूं तो लगता है अंदर ही अंदर चिल्ला रहे हों, "मुझे बचा लो मुझसे ये नहीं होगा!"

उनके कॉमेडी सीन में भी एक अजीब सी उदासी नज़र आती है.

वैसे बॉलीवुड में इमरान खान पहले शख्स नहीं है जो अपने अभिनय से कम, अपनी किस्मत और कनेक्शन के बल पर ज़्यादा चल रहे हैं. ये तो बहुत पहले से चला आ रहा है.

राजेंद्र 'जुबली' कुमार याद हैं ना? हर फिल्म में राजेंद्र मुझे एक जैसे ही नज़र आए हैं. अगर गौर से देखा जाए तो राजेंद्र की फिल्म को जुबली बनाने में उनसे ज़्यादा उनकी फिल्मों के गानों का अधिक योगदान रहता था.

उस दौर में उनकी फिल्मों को लेकर ऐसी हवाएं भी उड़ी थी कि राजेंद्र अपनी फिल्म के टिकट खुद ही खरीद लेते हैं. हालांकि ये बातें उतनी ही ग़लत हो सकती हैं जितनी गलत राजेंद्र साहब की एक्टिंग होती थी.

वैसे इसी दौर में और भी कई नामी स्टार आए जो अपनी अदाकारी के लिए कम और स्टाइल के लिए ज़्यादा चर्चित रहे जैसे राजेश खन्ना या देव आनंद.

मुझे लगता है कि ये कुछ भी हो सकता है लेकिन एक्टिंग नहीं.

फिर स्टार का मैडल पहने संजय दत्त याद आते हैं जिनके कई प्रशंसक शायद मुझे माफ नही करेंगे पर सच तो ये है कि संजू बाबा अपनी हर फिल्म में एक ही भाव में नज़र आते हैं और शायद आगे भी आते रहेंगे. ठीक है कि बॉलीवुड में उनके 'मुन्ना भाई' की कसम खाई जाती हैं लेकिन ये बात तो खुद संजू भी जानते हैं कि उन्होने इस फिल्म का कल्याण किया या फिल्म ने उनका.

वैसे अभिषक बच्चन को लेकर भी मेरे कुछ ऐसे ही विचार हैं.

इस मामले में हीरो से ज़्यादा हीरोइनों ने बाज़ी मारी है ख़ासतौर से मौजूदा दौर में कटरीना कैफ तो सबसे ऊपर आती हैं. पिछले 12 सालों में वो हिंदी नहीं सीख पाईं लेकिन निर्देशकों का तांता लगा हुआ है.

कैसे भी करके उन्हें लंदन या अमरीका बेस्ड लड़की का रोल दे दिया जाता है ताकि उनकी गिरती पड़ती हिंदी को सही ठहराया जा सके. आज कटरीना के पास गाड़ी हैं, बंगला है, बैंक बैलेंस है, अवार्ड्स हैं, सलमान की दोस्ती है, यश राज की फिल्में हैं पर अफसोस की एक्टिंग नहीं है!

मज़ेदार बात ये है कि आज के दौर में जहां मेरे और आपके बॉस, हमसे 200 प्रतिशत परफॉर्मेंस की अपेक्षा करते हैं, वहीं एक इंडस्ट्री ऐसी भी है जहां औसत दर्जे और कभी कभी औसत से भी कम दर्जे का काम करने वालों को स्टार का ओहदा देने के साथ साथ अवॉर्ड भी थमाया जाता है.

हालांकि बाहर से ये सितारे कितने भी टिमटिमाएं, अंदर से एक्टिंग ना कर पाने की टीस शायद इन्हें भी कचोटती होगी तभी तो शाहरुख़ ख़ान ने एक इंटरव्यू में कहा था "मुझे बुरा लगता है जब समीक्षक मेरी फिल्म की बात करते हैं, मेरी एक्टिंग की नहीं."

क्या आप शाहरुख़ ख़ान की एक्टिंग की बात करना चाहेंगे?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:18 IST, 25 जनवरी 2013 anand:

    एक संकीर्ण लेख. आपने देव आनंद, संजय दत्त, औऱ राजेश खन्ना की तुलना इमरान खान के साथ करके उनके प्रतिभा के साथ न्याय नहीं किया है.
    कई बार एक्टर सिर्फ अपने भाव बेचकर ही काम चला लेता है, जिसमें शाहरूख खान भी शामिल हैं.
    अगर आपको एक्टिंग के नाम पर ही लताड़ना था तो सलमान खान का नाम लेना चाहिए था जिनका चेहरा सीमेंट का बना लगता है.
    आप देवानंद, राजेश खन्ना को गाली देती रही लेकिन सैफ या सलमान का नाम तक नहीं लिया, कमाल की बात है

  • 2. 21:04 IST, 25 जनवरी 2013 kumar:

    यह ठीक वैसे ही है जैसे पत्रकारिता में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिनका पत्रकारिता और भाषा से कोई लेना देना नहीं है.

  • 3. 21:40 IST, 25 जनवरी 2013 Anuj Kumar:

    ब्लॉग लिखने वाले को शायद अच्छी एक्टिंग आती हो लेकिन लिखना बिल्कुल नहीं.
    कुछ एक्टिंग करने वालों के नाम लिखा होता तो समझने में दिक्कत नहीं होती

  • 4. 22:14 IST, 25 जनवरी 2013 naval joshi:

    कल्पना जी, सबसे पहले तो आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि आपने बिना लाग-लपेट और खूबसूरत ढंग से एक मुद्दा उठाया है. अक्सर होता आया है कि हम समस्या को बाहर से पकड़ने की कोशिश करते हैं, कभी बाहरी परत को थोडा खुरच पाते हैं अथवा थोडी बहुत चोट करने में भी सफल हो जाते हैं. लेकिन इससे मूल समस्या में कोई अन्तर नहीं पडता है. बात फिर वहीं की वहीं रह जाती है. अभिनय के बहाने इस प्रवृत्ति को आपने जिस तरह प्रस्तुत किया है वह वाकई एक गम्भीर चुनौती है. और यह न सिर्फ अभिनय क्षेत्र में है बल्कि राजनीति में सोनियां गॉधी से लेकर सिंधिया,पायलट,जितेन्द्र प्रसाद,करूणानिधि से लेकर संगमा ,बादल,चौटाला,के चश्मोचिराग इसी विसंगति का परिणाम है. क्रिकेट में गावस्कर के पुत्र से लेकर लालू के पुत्र और अब सचिन के पुत्र को जिस तरह प्रमोट किया गया और अब भी किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं है. फिल्मी जगत में तो आपने एक फेहरिस्त बताई कि कितने लोग अभिनय करने के लिए अभिशप्त किये जा रहे है आज किसी प्रकाशक और संपादक, संगीतकार यहॉ तक की गीतकार और गायकों के कुलदीपक भी इसी तरह पहले से निर्धारित दायित्वों को झेलने के लिए बाध्य कर दिये गये हैं. इसी कारण हर क्षेत्र में जबरदस्त गिरावट आयी है. आम लोगों के सामने ये परेशानी है कि वे उन्हें कैसे और क्यों झेलें?

  • 5. 00:49 IST, 26 जनवरी 2013 Sandeep:

    आपने बहुत सही बात उठाई है. मैं मानता हूं कि भारतीय सिनेमा ऐसे लोगों से भरी है जिन्हें ऐक्टिंग नहीं आती. सिर्फ़ ऐक्टर ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड में संगीतकार, कहानी लेखक और अन्य लोग भी विदेशी फ़िल्मों को 'कॉपी-पेस्ट' कर देते हैं.

  • 6. 16:33 IST, 26 जनवरी 2013 Saptarshi:

    बातें आपकी सही है, लेकिन शाहरुख इन सबसे अलग है. वो वाकई में अच्छे कलाकार हैं. स्वदेस, दिल से, चक दे इंडिया जैसी फिल्में सिर्फ़ वो ही कर सकते हैं, और कोई नही.

  • 7. 18:06 IST, 26 जनवरी 2013 Tarun:

    आपसे गुज़ारिश है सिर्फ़ लिखने के लिए कुछ भी लिखा छोड़ दें.

  • 8. 20:13 IST, 26 जनवरी 2013 DEVESH GARHWAL:


    मैंने राजेंद्र कुमार जी की जो भी फिल्म देखी हैं सब अच्छी लगी हैं. जहा तक राजेश खन्ना, देव आनंद और शाहरुख़ खान के नाम से कुछ लोगो को आपत्ति हो रही है वो शायद इस लेख को सही सन्दर्भ में नहीं देख रहे.जरा ये बताएँगे की किस फिल्म में काका काका नहीं लगे ?
    किस फिल्म में शाहरुख़ शाहरुख़ से कुछ अलग लगे ?
    वर्सटाइल होने का तमगा कितने प्रशंसक हैं इस बात से तो नहीं मिल सकता.

  • 9. 21:27 IST, 26 जनवरी 2013 umesh raghav:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. ये बात पूरी तरह सच है.

  • 10. 10:45 IST, 27 जनवरी 2013 Sudhanshu Gaur:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं. हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग हैं जिन्हें ऐक्टिंग आती है. बाकी सब को ऐक्टिंग नहीं बल्कि आपसी रिश्तों की वजह से काम मिल रहा है.

  • 11. 12:35 IST, 27 जनवरी 2013 ritesh kumar:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं. लेकिन शाहरुख इन सबसे अलग है.ये बात पूरी तरह सच है.

  • 12. 18:17 IST, 27 जनवरी 2013 Mukesh nyati:

    मैं यह बताने में अपना समय बरबाद नहीं करना चाहता कि मेरे विचार आपसे कितने अलग हैं. मुझे आश्चर्य है कि आप बीबीसी के लिए काम करती हैं. क्या आप अभिनेत्री हैं या लेखक ?

  • 13. 18:47 IST, 27 जनवरी 2013 javed sheikh jhansvi:

    यह बात तो ठीक है कि एक्टिंग के मामले में आपका बयान बहुत खूबसूरत है मगर कई लोगों को बुरा भी लगा होगा. आपने कुछ जानेमाने नाम जो ले दिए. मगर फिर भी जो आपने लिखा है उसकी तारीफ़ ही बनती है. अब रही एक्टिंग की बात तो यह तो होता है कि अल्लाह मेहरबान तो बंदा पहलवान!

  • 14. 20:02 IST, 27 जनवरी 2013 gulzar - harewa salkhoa :

    मैं आपकी बात को मानता हूँ लेकिन आपको शाहरुख खाँ के साथ बॉलीवुड के मिस्टर परफ़ेक्शिनिस्ट आमिर खाँ को नहीं भूलना चाहिए था.

  • 15. 04:34 IST, 28 जनवरी 2013 ashish yadav,hyderabad:

    कल्पनाजी आपकी बात काफी हद तक ठीक है. आज के अनेक स्टार्स से अच्छी एक्टिंग तो मैं खुद कर सकता हूँ.आज एक्टिंग के लिए सिर्फ उछलना कूदना आना चाहिए. लेकिन राजेश खन्ना और देवानंद जैसे एक्टर्स के साथ आप थोड़ा ज़्यादती कर रही हैं. इन लोगों ने इंडियन सिनेमा को बहुत यादगार फ़िल्में दी हैं. देवानंद की गाइड को आप कैसे भूल गईं? और आनंद का रोल राजेश खन्ना से बेहतर क्या कोई कर सकता है ? और रही बात शाहरुख खाँ की तो वो तो ओवर एक्टिंग का शिकार हैं. उन्हें यह गलतफ़हमी है कि वो सब कुछ कर सकते हैं. लेकिन हर कोई मिलेनियम स्टार नहीं बन सकता

  • 16. 14:58 IST, 28 जनवरी 2013 Rakesh Srivastava:

    सौ प्रतिशत सच. ऐसा लगा जैसे कोई मेरे मन की बात कह रहा हो.. सेल्यूट मैडम

  • 17. 15:10 IST, 28 जनवरी 2013 शबनम ख़ान:

    मज़ा आ गया पढ़कर...सीधे सीधे बात कहना इसे कहते हैं.
    दूसरों को अच्छा लगाने के लिए लिखने से बेहतर है कुछ ऐसा लिखे जो भले ही कड़ुवा हो लेकिन सही हो.

  • 18. 07:24 IST, 29 जनवरी 2013 Anup Adhyaksha:

    आपके विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ.शाह रुख खान को ओवर एक्टिंग की बीमारी है. ये सब मुकद्दर के सिकंदर हैं. दिलीप और अमिताभ जी को छोड़ दें तो आज के दौर में कुशल और प्रतिभाशाली अभिनेता और अभिनेत्री घास चरते हैं. नसीरुद्दीन शाह , ओम पुरी, इरफ़ान, मनोज वाजपेयी, आमिर खान, एवं अभिनेत्रियों में वहीदा रहमान, नूतन, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, जया भादुरी जैसे नाम उल्लेखनीय हैं.

  • 19. 09:33 IST, 29 जनवरी 2013 Sandeep:

    लो भाई, भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के सौ सालों के इतिहास में एक नई एक्टिंग समीक्षक का उदय हो गया है... जो न सिर्फ इमरान खान की एक्टिंग को लताड़ सकती हैं, बल्कि राजेश खन्ना से शुरू करके राजेंद्र कुमार, संजय दत्त से होते हुए, शाहरुख खान को भी लपेटे में लेके सभी को एक्टिंग का पाठ पढ़ा सकती हैं !

  • 20. 17:14 IST, 29 जनवरी 2013 Ravi :

    हाहाहा ! ये सब पढ़ कर बस मुझे रामाधीर सिंह( गैंग्स ऑफ़ वासे पुर वाले) की बात याद आ गई कि 'बेटा रहने दो, तुमसे नहीं होगा.'

  • 21. 17:45 IST, 29 जनवरी 2013 mukesh mondal:

    आपने जो लिखा बिल्कुल गलत है. हर कोई अपने फ़ील्ड में अच्छा करने का प्रयास करता है. वो बात अलग है कि कोई दो बार ठोकर खा कर संभलता है तो कोई चार बार. वैसे भी राजेंद्र कुमार, देवानंद और राजेश खन्ना जैसे ओल्ड स्टार के बारे में गलत टिप्पणी नहीं करनी चाहिए और रही बात आज के हीरों की तो जो ठोकर खा कर संभल जाएगा वो हीरो बन जाएगा वर्ना पब्लिक उसे ठोकर मार देगी.

  • 22. 21:59 IST, 29 जनवरी 2013 आदित्य नारायण शुक्ला 'विनय':

    कल्पना शर्मा का यह ब्लॉग पढ़कर उनकी लेखनी और बुद्धि दोनों पर तरस आया. यहाँ अमेरिका में जो हिंदी फिल्म दर्शक और बी.बी.सी.हिंदी के पाठक हैं उन्हें यह लेख बिलकुल ही बेहूदा लगा. 50 और 60 के दशक में दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद के समकक्ष कोई और फिल्म कलाकार लोकप्रिय थे तो वे राजेंद्र कुमार थे. प्रसिद्ध और लोकप्रिय फिल्म कलाकार भले ही करोडपति-अरबपति होते हों किंतु फिर भी किसी की ऐसी कुवत नहीं कि कोई अपनी ही फिल्म की टिकिटें खरीद कर उसे हिट / सफल करवा सके,जबकि राजेंद्र कुमार की तो एकसाथ 7- 8 फ़िल्में सिनेमा हालों में सफलतापूर्वक चलती रहती थीं और जुबली पर जुबली मनाते रहती थीं.उन्हें जुबली कुमार व्यर्थ ही नहीं कहा जाता था. 'किस्मत और कनेक्शन' की बदौलत एकाध-दो फ़िल्में मिल सकती हैं किन्तु बगैर प्रतिभा और लोकप्रियता के फिल्म-जगत में कोई भी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता.

  • 23. 06:18 IST, 30 जनवरी 2013 Dr.Lal Ratnakar :

    कल्पना जी, कमोबेश यही हाल हर जगह हैं जिनको खेती नहीं आती ओ जमींदार(किसान) हैं, जिनको पढ़ाना नहीं आता ओ प्राध्यापक हैं, जिनको राजनीति नहीं आती वो नेता हैं, जिन्हें पत्रकारिता नहीं आती वो पत्रकार हैं,जिन्हें अफसरी नहीं आती ओ अफसर हैं, कलाकार,संगीतकार,कवि हैं, जज हैं डॉक्टर हैं और क्या क्या........दर्ज करूँ ! जब देश ही ऐसे लोगों से चल रहा हो तो, अभिनय भी वैसा ही होगा.

  • 24. 08:52 IST, 31 जनवरी 2013 Ramesh Mishra:

    सच लिखा है आपने.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.