« पिछला | मुख्य पोस्ट | अगला »

रूपमती का वीज़ा

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | शनिवार, 15 दिसम्बर 2012, 04:41 IST

31 दिसंबर के इंतजार में उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. कुछ और बदले या न बदले, साल जरूर बदल जाएगा. सुना है कि सब ठीक ठाक रहा तो भारत और पाकिस्तान के बीच कम से कम ये सर्दियां गर्मा-गर्मी बढ़ाने के बजाय गर्मजोशी में इजाफे का कारण भी बन सकती है.

बादल देख कर घड़े फोड़ देने वाले लोग कहते हैं कि नई वीज़ा नीति के तहत बिछड़े हुए खानदानों के लिए बढ़े ना बढ़े, पर दोनों देशों के व्यापारियों के लिए यात्रा सुविधाएं जरूर बढ़ गई हैं.

नई नीति के तहत शहर बेचे और खरीदे जाएंगे. जिसकी इतनी आमदनी होगी, उसे पांच शहरों का पुलिस रिपोर्टिंग वाला वीज़ा मिलेगा, जिसकी उतनी आमदनी होगी, उसे दस शहरों का मल्टीपल पुलिस रिपोर्टिंग से छूट वाला वीज़ा मिलेगा और जो सफेदपोश होगा, वो हमेशा की तरह वीज़ा अफसर के रहमो करम पर होगा.

दूसरी अच्छी खबर ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच मुक्त व्यापार के रास्ते में आने वाली अड़चनें अगर 31 दिसंबर नहीं, तो अप्रैल-मई तक जरूरत खत्म कर ली जाएंगी.

तो जिस तरह वाघा के रास्ते प्याज, टमाटर, चीनी, अनाज, संसदीय शिष्टमंडल, फैज अहमद फैज का 'हम देखेंगे' गाने वाले मशाल-बरदार आ जा सकते हैं, इसी तरह किताबों, पत्रिकाओं और अखबारों से भरे ट्रक भी आ जा सकेंगे?

जिन अड़चनों को दूर करने की बात हो रही है क्या उनमें भारत और पाकिस्तान के खबरिया चैनलों का प्रसारण आर-पार जाने पर लागू घोषित और अघोषित पाबंदी का खात्मा करना भी शामिल होगा?

क्या थियेटर की मंडलियों, गायकों के दलो, शिक्षकों, लेखकों, वैज्ञानिकों और छात्रों की बेरोक टोक आवत जावत को प्राथमिकता सूची में जगह दी जाएगी?

इन सवालों का सबब ये है कि हाल ही में पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी गायकों का एक मुकाबला दुबई में हुआ क्योंकि इसके आयोजक वीजा हासिल करने में आने वाली जिल्लत से बचना चाहते थे.

अभी अभी कराची में जो पांचवी अंतरराष्ट्रीय ऊर्दू कांफ्रेंस खत्म हुई है, उसके लिए भारत से सात विद्वान आना चाहते थे, जिनमें से सिर्फ एक यानी डॉ. शमीम हनफी को ही वीजा मिल सका.

और इस वक्त कराची में जो आठवा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला चल रहा है, इसमें पाकिस्तानी प्रकाशकों के बाद सबसे ज्यादा भारतीय प्रकाशक शामिल होने थे. लेकिन 21 भारतीय प्रकाशकों में सिर्फ सात प्रकाशक ही वीजा पाने में कामयाब रहे. नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया की किताबें तो आ गईं, लेकिन किताबें भेजने वाले दिल्ली में ही अटक गए. ऐसे में उनके स्टॉल का जिम्मा पाकिस्तान के नेशनल बुक फाउंडेशन वाले ही देख रहे हैं.

कराची प्रेस क्लब के सफाई कर्मचारी ज्ञान चंद की 65 वर्षीय मां रूपमती का आधा परिवार विभाजन के बाद मुंबई चला गया था. रूपमती मरने से पहले एक बार मुंबई जाना चाहती है. उसके पास पासपोर्ट भी है. उसने चंद हजार रुपये भी जमा कर रखे हैं. लेकिन तड़पने और फड़कने के बावजूद वीजा के लिए आवेदन करने का हौसला नहीं है.

मैंने पूछा क्यों? कहने लगी कि पहली बार वीजा लेने के लिए इस्लामाबाद जाना पड़ेगा. सारे पैसे तो वहीं खत्म हो जाएंगे. वीजा मिल भी गया तो मुंबई जाने का किराया कहां से लाऊंगी?

आप लाख मशालें जलाते रहें, कबूतर के गले में बांध कर आर पार मुहब्बत के पैगाम भेजते रहे, साझा विरासत, इतिहास और संस्कृति के नारे लगाते रहें, गले से गला मिला कर हवाई चुंबन उछालते रहें, लेकिन आखिरी फैसला तो साउंड प्रूफ शीशे की खिड़की के दूसरी तरफ बैठने वाले वीज़ा अफसर को ही करना है, जिसके एक हाथ में गृह मंत्रालय, दूसरे हाथ में विदेश मंत्रालय और गले में खुफिया विभागों की डोरी बंधी हैं.

आंखों पर घोषित और अघोषित निर्देशों का काला चश्मा है और कानों में विकृत इतिहास की रुई ठुंसी है.

ऐ डेढ़ अरब इंसानों के नीति निर्माता क्लर्क राजनेताओ... चरमपंथियों को वीजा की जरूरत नहीं होती.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:46 IST, 15 दिसम्बर 2012 Narendra Kumar:

    पाकिस्तान से दोस्ती में हमेशा ही भारत को नुकसान हुआ है. पाकिस्तान दोगला है. यकीन से कह सकता हूँ यदि ये वीजा कानून लागू हुआ तो एक औऱ मुंबई होगा.

  • 2. 13:56 IST, 15 दिसम्बर 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    जनाब, कुछ बारीकी से स्टडी करके ब्लॉग सर्व किया है. आपका धन्यवाद. आप पत्रकार लोगों को सरकारी बाबू, और अफसरों को दर्द क्या पता कि गलती कहीं भी हो, साजिश कोई भी करे, फांसी का फंदा सिर्फ नौकरीपेशा लोगों, बाबू अफसरों के गले में फिट बैठता है. एक और बात. मुझे इतना समझ में आया है कि भारत और पाक के नेतालोग अमरीका के पिट्ठू हैं. सिर्फ उतना ही करते-कहते हैं जितना की सैम अंकल बोले.

  • 3. 23:28 IST, 15 दिसम्बर 2012 Vijay Singh:

    वुसतुल्लाह साहब, आपने खूब लिखा है. मुझे पूरी उम्मीद है कि नए वीजा नियमों के बाद कुछ बिछड़े परिवार अपनों से मिल सकेंगे.

  • 4. 17:46 IST, 16 दिसम्बर 2012 himmat singh bhati:

    खान साहब, सरकारों की कथनी और करनी में इमानदारी नहीं है. बोलती कुछ हैं करती कुछ.

  • 5. 19:16 IST, 16 दिसम्बर 2012 सुधीर कुमार:

    पाकिस्तान से दोस्ती भी बुरी, दुश्मनी भी बुरी. क्या करे हमारा देश.

  • 6. 10:42 IST, 17 दिसम्बर 2012 Rutwik :

    वासतुल्ला खान जैसे लोग भावनाओ को जगाने में लगे है क्योंकि ये चाहते हैं कि पाकिस्तानी खुले आम भारत में घूम फिर सकें. ये बात क्यों नही करे कि पाकिस्तान ने अभी तक 26/11 और ऐसे अन्य लोगो के खिलाफ अब तक कार्यवाही क्यों नहीं की? जिस देश में ओसामा बिन लादेन मिला उसके नागरिक अब जो हिन्दुओ से बेंइन्तहा नफरत करते है, भारत म बेख़ौफ़ घूमेंगे. इन्हें नरेन्द्र मोदी की राजनीति नफ़रत की राजनीति लगती है, और लश्कर-इ-तोएबा की बात तक नहीं करना चाहते.

  • 7. 16:46 IST, 17 दिसम्बर 2012 Anuj:

    आपका व्यंग और लेखनशैली अच्छी है. मैं बचपन से सब देख रहा हूँ. कहीं कुछ नहीं बदला. पाकिस्तान से दोस्ती कभी भी भारत के लिए ना अच्छी थी और ना होगी. दोस्ती के नाम पर कुछ और देशभक्त सैनिकों और पुलिसवालों की जान जाएगी और नेताओं का फायदा होगा.

  • 8. 10:56 IST, 18 दिसम्बर 2012 Suhan:

    जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच कुछ अच्छा होता है, बहुत से भारतीय और पाकिस्तानी पुराने अनुभवों के आधार पर इसका विरोध करते हैं. लेकिन भारत में पंजाबी औऱ सिंधी शरणार्थियों और पाकिस्तान में मोहाजिरों के बारे में कोई नहीं सोचता. मैं ऐसी ही पंजाबी परिवार से हूँ जिसने 1947 में पाकिस्तान के झांग (अब फैसलाबाद) जिले को छोड़कर भारत का रुख किया था. मुझे अभी भी उम्मीद है कि एक दिन मैं अपने दादा-परदादा के पैतृक स्थान जा पाउँगा. पाकिस्तान को देखना मेरा सपना है. सरकार को सीमा-पर पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए. हमें अपनी सभ्यता पर गर्व है.

  • 9. 17:57 IST, 18 दिसम्बर 2012 उमेश कुमार यादव:

    बहुत पहले एक चुटकुला पढ़ा था...जो एक ग़ल्ती करे वो इंसान, जो दो ग़ल्ती करे वो शैतान और जो ग़ल्ती पर ग़ल्ती करे वो पाकिस्तान और जो हर ग़ल्ती को माफ़ कर दे वो है हमारा महान हिंदुस्तान.

  • 10. 07:59 IST, 19 दिसम्बर 2012 dkmahto Ranchi:

    ख़ान साहब चिंता न करो जी एक दिन सब ठीक हो जाएगा.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.