« पिछला | मुख्य पोस्ट | अगला »

खिड़की से लटका लड़का और दम तोड़ती उम्मीदें

मोहम्मद हनीफ़ मोहम्मद हनीफ़ | बुधवार, 05 दिसम्बर 2012, 05:23 IST

ना इसे तालिबान ने मारा और ना वो किसी सांप्रदायिक गुट का निशाना बना. ना किसी भाषाई समुदाय से उसे कोई ख़तरा था और न ही कोई भत्ताखोर उसकी ताक में था.

औवेस बेग तो नई नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आया था. इंटरव्यू का भी आखिरी दौर चल रहा और ये तकरीबन तय था कि उसे नौकरी मिलने वाली थी.

इंटरव्यू कराची में स्टेट लाइफ (पाकिस्तान की सरकारी बीमा कंपनी) बिल्डिंग की आठवीं मंजिल पर था. वही स्टेट लाइफ जो हमें बचपन से सुनवाता आया है, ऐ मेरे खुदा, अबु सलामत रहें.

बिल्डिंग में आग लगी. जो लोग बिल्डिंग के अंदरूनी रास्तों को जानते थे, वो या तो सी़ढ़ियों से नीचे आ गए या उन्होंने छत पर जाकर जान बचाई. औवेस बेग बिल्डिंग के अंदरूनी रास्तों से वाकिफ नहीं था. और संभवतः वहां धुआं भरने से ठीक तरह से देख भी नहीं सकता था. इसलिए वो एक खिड़की और आठवीं मंजिल से लटक गया.

बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में कभी कभार ऐसे हादसे हो जाते हैं, लेकिन जैसे ही औवेस बेग खिड़की से लटका, उसके बाद जो कुछ हुआ वो हमारे मौजूदा हालात और हमारी बढ़ती हुई नाउम्मीदी को समझने में मदद करता है.

इस बात पर सहमति नहीं है कि वो कितनी देर खिड़की से लटका रहा. एक अखबार ने पंद्रह मिनट लिखा है तो एक ने आधा घंटा. लेकिन कम से कम इतना वक्त जरूर था कि सैकड़ों लोगों का हुजूम भी जमा हो गया.

फ़िल्म भी बन गई और टीवी चैनलों पर लाइव कवरेज भी शुरू हो गई.

हमें इस बात पर एतराज नहीं है कि मीडिया को ये तस्वीरें दिखानी चाहिए थीं या नहीं. वैसे दुनिया का शायद ही कोई टीवी चैनल या अखबार होगा जो इस तरह की नाटकीय तस्वीरें दिखाने से परहेज बरते.

लेकिन एक दूसरी तस्वीर जो मैंने कहीं नहीं देखी, वो उन सैकड़ों लोगों की है जो हक्के बक्के खड़े थे और आसमान की तरफ नजरें गड़ाए हुए आठवीं मंजिल से लटके इस लड़के को देख रहे थे.

दर्जनों एंबुलेंस गाड़ियां और कई दमकल वाहन अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन इस हुजूम को क्या करना चाहिए था? क्या ये सैकड़ों लोग सिवाय आसमान की तरफ देखने और दिल ही दिल में औवेस बेग की सलामती की दुआ करने के अलावा कुछ कर सकते थे?

एक वक्त था जब पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में और कभी कभार पार्कों में सिविल डिफेंस और फायरिंग ब्रिगेड वाले अपने करतब दिखाया करते थे ताकि आम लोग सीख पाएं कि आग लगने की स्थिति में उन्हें क्या करना है. इसका एक जरूरी हिस्सा ये होता था कि एक वॉलेंटियर को आग से जान बचाने के लिए ऊपर की मंजिल से छलांग लगानी होती थी. नीचे आठ या दस लोग दरी, तिरपाल या किसी कपड़े की चादर पूरी ताकत से तान कर खड़े हो जाते थे और गिरने वाला सुरक्षित जमीन पर पहुंच जाता था.

औवेस बेग को आठवीं मंजिल से लटका देख कर मुझे पहला ख्याल ये आया स्टेट लाइफ बिल्डिंग जीनत मार्केट के बिल्कुल सामने स्थित है और जीनत मार्केट कराची में कपड़ों के बड़े बाजारों में से एक है. यहां पर कालीनों और दरियों की दुकानें हैं.

क्या किसी भी एक आदमी को ये ख्याल नहीं आया कि आसमान की तरफ देखने और दुआ करने के बजाय भाग दौड़ करके एक दरी का इंतजाम किया जाए, जो गिरने वाली की जान बचा सके.

क्या ये हो सकता है कि सैकड़ों के हुजूम में किसी एक भी व्यक्ति ने ऊंची इमारत में फंसे लोगों की जान बचाने का ये आसान सा तरीका जिंदगी भर देखा ही न हो. या सिर्फ कसूर सिर्फ इस हुजूम का नहीं है, बल्कि हम एक राष्ट्र के तौर पर दुआओं से भरे दिल को लेकर अपनी तरफ आती हर मुसीबत को देख आसमान की तरफ नजरें गड़ाए हैं और उम्मीद करते हैं कि अभी कोई चमत्कार होगा और बला टल जाएगी.

आठवीं मंजिल से गिरने वाले व्यक्ति के लिए मजबूत हाथों से तानी गई चादर ही अकेला करिश्मा हो सकता है और ये करिश्मा हुजूम में मौजूद सिर्फ कुछ लोग ही कर सकते हैं, वरना खिड़की से लटके हुए लड़के की बाज़ू आखिरकार कमज़ोर होंगे और नीचे कंक्रीट का फर्श और एक हुजूम की दुआएं उसका स्वागत करेंगीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:02 IST, 05 दिसम्बर 2012 Shailendra Mishra:

    मेरे विचार से इससे बचा जा सकता था. बहरहाल जो भी हुआ वो बहुत दुखद है और आशा है कि इस तरह की घटना दोबारा नहीं होगी.

  • 2. 18:04 IST, 05 दिसम्बर 2012 Shailendra Mishra:

    मेरे विचार से थोड़ी समझदारी से इस दुर्घटना को टाला जा सकता था. पर जो हुआ वो अफ़सोसनाक है और ऐसे उपाय किए जाने चाहिए जिससे ऐसी घटनाएँ फिर न हों.

  • 3. 22:06 IST, 12 दिसम्बर 2012 javed sheikh jhansvi:

    सबसे पहले तो मेरे दोस्त हनीफ मोहम्मद तारीफ के हक़दार हैं. जो इतनी आसानी से इतनी बड़ी बात कहेंगे. टेलीविज़न पर इस तरह के प्रोग्राम दिखाने चाहिए ताकि मासूम लोगों को बचाया जा सके.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.