इस विषय के अंतर्गत रखें अक्तूबर 2012

रिसता हुआ जख्म है कराची

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | बुधवार, 31 अक्तूबर 2012, 14:19

टिप्पणियाँ (8)

क्या आपने सोचा है कि रवांडा क्यों याद है? इसलिए कि वहां एक साल में आठ लाख लोगों का नरसंहार हुआ था? बोस्निया क्यों याद रहता है? क्योंकि वहां ढाई साल चले नरसंहार में दो लाख लोग मारे गए? अल्जीरिया क्यों नहीं भूलता? क्योंकि वहां भी दस साल के दौरान दो लाख से ज्यादा लोग एक दूसरे के हाथों कत्ल हुए?

श्रीलंका के गृह युद्ध को क्यों दुनिया में सब जानते हैं? शायद ढाई लाख लोगों के मरने की वजह से.. और कश्मीर क्यों नहीं भूलता? क्योंकि वहां भी दस वर्षों के दौरान सत्तर हजार से एक लाख के बीच लोग मारे गए हैं. और लेबनान? क्योंकि पंद्रह बरस के अरसे में हर एक ने उसकी ईंट से ईंट बजा दी थी.

सीरिया बराबर दुनिया भर के मीडिया की सुर्खियों में क्यों है? क्योंकि डेढ़ बरस के दौरान वहां बीस हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और इस वक्त भी रोजाना लगभग डेढ़ सौ लोग मर रहे हैं. लेकिन ये सारी मिसालें तो देशों की हैं. किसी एक शहर की तो नहीं.

अगर मैं कहूं कि इस वक्त दुनिया का सबसे लावारिस, असंवेदनशील और खूनी शहर कराची है. बल्कि शहर क्या, एक रिसता हुआ जख्म है तो क्या आप मान लेंगे?

जाहिर है कि फौरी तौर पर आपको इस बात पर यकीन न आए कि दो करोड़ की आबादी वाला वो शहर जो पाकिस्तान को लगभग साठ फीसदी राजस्व देता हो और पाकिस्तान की ट्रेन का इंजन समझा जाता हो. साथ ही वो देश का इकलौता व्यस्त बंदरगाह भी हो.

थलसेना की पांचवी कोर, वायुसेना की दक्षिणी कमान और नौसेना का संचालन मुख्यालय वहां हो और अर्धसैनिक बल का अहम केंद्र हो. वो भला इतना लावारिस, खूनी और असंवेदनशील कैसे हो सकता है? चलिए इस पहेली को समझने के लिए कुछ पीछे चलें.

ये बात है अब से 27 साल पहले की जब अप्रैल 1985 में मध्य कराची में कॉलेज की एक छात्रा बुशरा जैदी सड़क पार करते हुए एक यात्री गाड़ी की चपेट में आने से मारी गई. तब से कराची ने सुख का दिन नहीं देखा.

हिंसा के तरीके बदलते रहे हैं लेकिन हिंसा नहीं बदली है. पहले नस्ली, फिर धार्मिक, फिर गिरोह, फिर माफियाना, फिर सामूहिक, फिर व्यक्तिगत, फिर नस्ली, फिर धार्मिक, फिर माफियाना, फिर....

पाकिस्तान में जिस जिस संस्था, संगठन, गिरोह या व्यक्ति को अपना निशाना पक्का करना हो या उन्हें निजी, वैचारिक या राजनीतिक बदला लेना हो, डाके और दहशतगर्दी का अभ्यास करना हो, तो उसके लिए कराची सबसे अच्छी अकेडमी और फायरिंग रेंज है.

बात शायद अब भी साफ नहीं हुई. चलिए गणित से कुछ मदद लेते हैं. कराची में 1985 से 2012 तक के 27 वर्षों का औसत निकालें तो इस शहर में हिंसा में रोज दस मौतें होती हैं. मतलब एक महीने में तीन सौ साठ मौतें और एक साल में चार हजार तीन सौ बीस और 27 साल में एक लाख 16 हजार छह सौ चालीस लाशें जो हिंसा का शिकार हुई हैं. क्या आपके जहन में दुनिया का कोई शहर है जहां पिछले 27 बरस से हर रोज हिंसा में औसतन दस लोग मर रहे हैं?

कराची में 1985 में एक नया कब्रिस्तान मोआछ गोठ भी बनाया गया. इस कब्रिस्तान का प्रबंधन और रखरखाव मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्ता ईधी का संगठन संभालता है. कराची के दूसरे कब्रिस्तानों का क्षेत्रफल गैरकानूनी कब्जों के कारण लगातार घट रहा है. लेकिन मोआछ गोठ कब्रिस्तान लगातार बढ़ रहा है. आज ये दस एकड़ से बढ़ कर तीस एकड़ में फैल गया है.

कराची में रोजाना औसतन 22 से 23 लावारिस लाशें पड़ी मिलती हैं. इसमें चिकित्सा और गैर चिकित्सा, दोनों कारणों से होने वाली मौतें शामिल हैं. इस हिसाब से सालाना आठ हजार चार ऐसी लाशें मिलती हैं जिनका कोई दावेदार नहीं होता.

ये सभी लाशें मोआछ गोठ के कब्रिस्तान में दफन कर दी जाती हैं. कब्र के सिरहाने नाम नहीं होता, बस एक नंबर होता है. बीते 27 वर्षों के दौरान दो लाख से ज्यादा लावारिस लाशें इस कब्रिस्तान में दफन की जा चुकी हैं. क्या दुनिया के किसी और शहर में लावारिस लोगों का इतना बड़ा कब्रिस्तान है???

पाकिस्तान के सबसे बड़े कब्जा माफिया, भत्ता माफिया, सट्टा माफिया समेत किसी भी माफिया की बात हो और कराची का जिक्र न आए, ऐसा क्या मुमकिन है???

सब कहते हैं कि देश में अमन और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति की वजह कबायली इलाकों पर सरकार का नियंत्रण न होना है.

तो क्या कराची भी दक्षिणी वजीरिस्तान में है???

जुड़े हैं भारत और अमरीका के तार

ज़ुबैर अहमद ज़ुबैर अहमद | रविवार, 21 अक्तूबर 2012, 18:18

टिप्पणियाँ (5)

अमरीका में छह नवंबर को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होगा.राष्ट्रपति बराक ओबामा दोबारा राष्ट्रपति बनने के लिए मैदान में आए हैं जबकि मिट रोमनी उन्हें ज़बरदस्त चुनौती दे रहे हैं.

ऊँट किस करवट बैठेगा किसी को नहीं मालूम.चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए मैं अमरीका में हूँ.

मेरे विचार में भारत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि चुनाव में कौन विजयी होगा क्योंकि भारत उन गिने चुने देशों में से है जिसके बारे में अमरीका की दोनों बड़ी पार्टियां यानी डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के बीच कोई मतभेद नहीं. तो कोई भी राष्ट्रपत बने भारत के प्रति उसकी विदेश नीतियाँ नहीं बदलेंगी.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत में अमरीकी चुनाव के बारे में कोई दिलचस्पी नहीं है.

अमरीका चुनाव को लेकर काफी दिलचस्पी है.भारत को इस बात का इंतज़ार होगा कि अगर रोमनी राष्ट्रपति बने तो अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय भूमिका और असर बढ़ाने में मदद होगी?

पाकिस्तान के अंदर आज़ाद घूम रहे भारत-विरोधी चरमपंथियों को पकड़ने के लिए अमरीका पाकिस्तान को मजबूर करेगा ?

भारत और अमरीका के बीच संबंध काफी मज़बूत हैं. भारत अमरीका के लिए एक बड़ी मंडी है जबकि अमरीका भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग का सबसे बड़ा ग्राहक.

इसके इलावा अमरीका चाहता है कि 2014 में अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद भारत वहां एक अहम् भूमिका निभाए.

भारत और अमरीका को आज एक दूसरे की ज़रुरत है. विश्व भर में इस्लाम चरमपंथियों के खिलाफ अमरीका की लड़ाई में भारत आगे है.

अमरीकी चुनाव इस लिए भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत अमरीका की सहायता से पाकिस्तान पर लगाम रख सकता है.

अमरीका में भारत की साख काफी ऊंची है. मैं 2011 में एक साल अमरीका रह कर भारत लौटा हूँ.

इस एक साल के दौरान मैने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ध्यान से देखा,उनकी बातें और उन पर टिप्पणियां ध्यान से सुनीं.

उन्होंने अपने कई भाषणों में भारत और चीन का ज़िक्र किया.ऐसा लगता है कि उन्हें यकीन हैं कि अगर अमरीका ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नई खोज नहीं की तो भारत और चीन अमरीका को पीछे छोड़ देंगे.

अमरीका की दोनों पार्टियाँ भारत को गंभीरता से लेती हैं और भारत के प्रति हमेशा अच्छे शब्द कहे जाते हैं.

इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 2000 से 2010 के बीच एक दशक में तीन अमरीकी राष्ट्रपतियों ने भारत का दौरा किया.

स्वतंत्र भारत में इस दशक से पहले 50 से अधिक सालों में केवल तीन अमरीकी राष्ट्रपति भारत आए थे.

भारतीय सामानों का अमरीका सबसे बड़ा ग्राहक है.दोनों देशों के बीच व्यापार 60 अरब डॉलर सालाना से अधिक का है.

व्यापार का क्षेत्र हो या राजनीति का या पडोसी देश पर निगरानी रखने का मुद्दा..भारत को अमरीकी राष्ट्रपति की मदद की ज़रूरत है.

इसी लिए भारत की भी निगाहें अमरीकी चुनाव पर टिकी हैं.आपकी भी होगी. आप यहाँ से क्या सुनना और पढना पसंद करेंगे? अमरीका चुनाव के दौरान मेरा और आपका अब साथ रहेगा लगभग एक महीने तक.

मलाला बेगुनाह तो नहीं!

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012, 20:11

टिप्पणियाँ (22)

ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्चे या बच्ची पर कैसे हमला कर सकता है? यक़ीकन कोई न कोई वजह ज़रूर होगी, और वजह भी कोई ऐसी वैसी नहीं, बल्कि बहुत ही ठोस.

मिंगोरा में मेरे जितने भी जानने वाले हैं, एक एक से फोन करके पूछ रहा हूं कि पाकिस्तान पर पिछले आठ बरसों में जो तीन सौ बीस अमरीकी ड्रोन हमले हुए हैं, उनमें से कितने स्वात घाटी पर हुए? कोई नहीं बता रहा है. सब कह रहे हैं कि एक भी नहीं हुआ है. सब मुझसे कुछ छिपा रहे हैं. सब मेरा दिल रखने के लिए झूठ बोल रहे हैं. यकीकन स्वात में ड्रोन हमले हुए हैं और मलाला उन्हीं हमलों के पीड़ितों की प्रतिक्रिया का निशाना बनी है.

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है? तो फिर मलाला यक़ीनन अमरीका की जासूस है या रही होगी. मोमिन (मुसलमान) कभी बिना सबूत बात नहीं करता. क्या आपने तालिबान के प्रवक्ता का ये बयान नहीं पढ़ा कि मलाला ने एक बार कहा था कि वो ओबामा को पसंद करती है. इससे बड़ा भी कोई सबूत चाहिए मलाला के अमरीकी एजेंट होने का?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

हा हा हा हा! कौन कहता है कि 14 साल की बच्ची मासूम होती है. अगर 14 साल का लड़का माता पिता की खुशी और अपनी मर्जी से धर्म को पूरा पूरा समझ कर बुराई को मिटाने के लिए बिना ज़ोर ज़बरदस्ती आत्मघाती जैकेट पहनने का स्वतंत्र फैसला कर सकता है तो मलाला कैसे अभी तक बच्ची है? अगर इतनी ही बच्ची है तो सिर झाड़ मुंह फाड़ कर घर से बाहर जाने की बजाय आंगन में गुड़ियों के साथ क्यों नहीं खेलती? घर के काम काज में अपनी मां का हाथ क्यों नहीं बंटाती रही?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

क्या बच्चियां इस तरह चटर पटर मुंहफट होती हैं? बच्ची है तो खिलौनों और गुड़ियों की ज़िद क्यों नहीं करती? बस ज़हरीले पाठ्यक्रम की किताबों, कॉपी, पेन्सिल की बात क्यों करती है? क्या मलाला की उम्र की बच्ची गला फाड़-फाड़ के ज़ोर-ज़बर और बुनियादी स्वतंत्रता जैसे पेचीदा विषयों पर अपनी राय देती है या कभी इस सेमीनार में तो कभी उस कार्यक्रम में या कभी धमाकों की जगह जाकर मोमिनों पर कीचड़ उछाल कर गैरों की तारीफें और तमगे वसूल करती फिरती है?

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

और बंद करो ये बकवास कि पख्तून समाज में औरतें और बच्चे अमन से रह रहे हैं. कोई अमन-वमन नहीं है. पख्तून लोगों का इस्लाम से क्या लेना देना? जो भी धर्म के वर्चस्व के रास्ते में आएगा, उड़ जाएगा. जो हमारे सच्चे रास्ते को अपनाने की बजाय अपनी डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाने की कोशिश कर रहे हैं वो आस्तीन के सांप हैं और इतनी साइंस को हम भी जानते हैं कि सांप पैदा होते ही तो ज़हरीला नहीं बन जाता. तो क्या आप हमसे ये कह रहे हैं कि संपोलियों को छोड़ दें क्योंकि वे बच्चे होते हैं. हा हा हा हा!

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

क्यों चीख रहे हैं आप इतना मीडिया पर, फेसबुक पर, ट्विटर पर? क्या आपकी किसी बेटी को निशाना बनाया गया है? क्या मलाला आपकी सगी है? मलाला की उम्र के आत्मघाती हमलावर भी तो वहीं के हैं जहां की वो है. 14 वर्षीय शाहीन कुफ्र के किले पर हमला करे तो गलत और गुमराह 14 वर्षीय मलाला अपने विचारों और भाषणों के जरिए बारूद से मोमीनों पर रात में छापे मारे तो हीरो. वाह जी वाह!

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

हम यही तो चाहते थे कि आप मलाला के बहाने अपने आडंबर का लबादा उतार कर सामने आ जाएं और हम देख सकें कि कौन हमारा है और कौन ग़ैर. मगर फिक्र न करें हम मलाला की तरह आपकी किसी बच्ची को निशाना नहीं बनाएंगे. हम भेड़ बकरियों की रेवड़ को नहीं छेड़ते.

हमारी जंग तो उन गड़रियों और उनके बच्चों से है जो आपको तालिबान की मशाल थामने से रोक रहे हैं और कुफ्र के अंधेरों में धकेल रहे हैं.

भला ऐसे कैसे हो सकता है? ख़्वाह मख़्वाह कोई किसी बच्ची को कैसे निशाना बना सकता है?

एक हुआ करते थे जेपी

सुशील झा सुशील झा | गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012, 14:00

टिप्पणियाँ (30)

आज अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है. अगर आप ये बात नहीं भी सुनना चाहेंगे तो आपको सुननी पड़ेगी..जाननी पड़ेगी और इस बारे में सोचना पड़ेगा. मजबूरी है मीडिया में आज अमिताभ छाए हुए हैं.

लेकिन शायद ही किसी को याद होगा कि आज के ही दिन एक और बड़े आदमी का जन्म हुआ था....जिसका नाम जयप्रकाश नारायण था.

जो जयप्रकाश नारायण या जेपी के बारे में नहीं जानते उन्हें सिर्फ इतना बताना ज़रुरी होगा कि ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने देश में भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा बनाया था और इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेता के खिलाफ मोर्चा खोला था.

नेहरु के दौर में राजनीति में बड़ा नाम थे जेपी. विचारों से मार्क्सवादी लेकिन बाद में बिल्कुल गैर राजनीतिक हो गए थे.

लेकिन जब उन्हें लगा कि देश भ्रष्टाचार के गर्त में जा रहा है तो उन्होंने पटना से शुरुआत की थी आंदोलन की जिसे नाम दिया गया था संपूर्ण क्रांति.

नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और कई अन्य नेता इसी आंदोलन की उपज माने जाते है. जेपी का आंदोलन कितना सशक्त था इसका अंदाज़ा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि सारी विपक्षी पार्टियां एकजुट हुई थीं. फिर चुनावों में हारीं इंदिरा गांधी. लगा आपातकाल और जब फिर चुनाव हुआ तो पहली बार भारत में गैर कांग्रेसी सरकार बनी ....जनता पार्टी सरकार.

सरकार में जेपी ने कोई पद नहीं लिया था.

ये देश की विडंबना ही है कि जहां हर दिन एक नया भ्रष्टाचार सामने आ रहा है और इस भ्रष्टाचार पर सबसे अधिक बोलने वाले नेता भी जेपी की दुहाई देते रहे हैं उन्हें भी जेपी की सुध नहीं है.

इंडिया अगेनस्ट करप्शन के फेसबुक पन्ने पर जयप्रकाश नारायण से जुड़ी एक फोटो है...लेकिन ये फोटो उन्होंने नहीं लगाई है. किसी और ने लगाई है जिसे उन्होंने शेयर किया है.

यानी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने वाला और पूरे देश में संपूर्ण क्रांति लाने वाले आदमी से उनका लेना देना कम ही है.

लेकिन इसमें ग़लती उनकी भी नहीं है. सुबह से टीवी चैनलों, वेबसाइटों (जिसमें बीबीसी की वेबसाइट भी शामिल है) अमिताभ बच्चन छाए हुए हैं.

सत्तर के अमिताभ...जयप्रकाश से कहीं अधिक पापुलर हैं. अगर समय आम होता तो कोई बात न होती.

जब हम कहते हैं कि हम सबसे भ्रष्ट दौर में रह रहे हैं तब जयप्रकाश को याद किया जाना ज़रुरी है ....अमिताभ से कोई गिला नहीं शिकवा नहीं लेकिन जेपी को भूल जाने का गिला भी है शिकवा भी रहेगा.

खैर मुख्यधारा की मीडिया से अपेक्षाएं कब की खत्म हो चुकी हैं..लेकिन सोशल मीडिया से उम्मीद थी..सुबह से लग रहा था कि कहीं न कहीं लोग जेपी को याद करेंगे लेकिन एक डेढ़ हज़ार मित्रों में शायद कहीं एक पोस्ट जेपी पर दिखा...पोस्ट नहीं शायद फोटो थी....लेकिन जेपी का नाम नहीं..समझने वाले समझ गए थे....लोगों ने टिप्पणी की थी लेकिन ज़िक्र कहीं नहीं था कि जेपी भी आज ही पैदा हुआ था.

राज कचौड़ी का ज़ायक़ा

Neil Curry Neil Curry | सोमवार, 08 अक्तूबर 2012, 23:17

टिप्पणियाँ (7)

मैं हमेशा खाने के बारे में सोचता हूँ लेकिन इस हफ़्ते मैं इस बारे में कुछ हैरान-परेशान हूँ.

मैं ये समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि राज कचौड़ी इतना स्वादिष्ट व्यंजन क्यों है.

क्या ये ठंडे-ठंडे दही और राज कचौड़ी में इस्तेमाल होने वाली करारी चीज़ों का मिश्रण है?

क्या ये इस व्यंजन में पाए जाने वाले आलू के विभिन्न स्वरूप और अंकुरित दाल के मेल से पैदा होने वाला जादू है?

क्या ये इसमें कभी-कभी पाए जाने वाले अनार के दानों और रहस्यमई हरी चटनी का खेल है?

मुझे नहीं पता...और असल में मुझे परवाह भी नहीं...जब तक कि राज कचौड़ी स्वादिष्ट हो...

मुझे नहीं परवाह कि मुझे राज कचौड़ी कहाँ मिलती है और किस तरह की प्लेट में परोसी जाती है.

मुझे इस बात की परवाह भी नहीं कि मैं किस तरह की हिलती-डुलती कुर्सी पर बैठे इसे खाता हूँ या फिर मेरी पसंद के ख़िलाफ़ एक विशालकाय फ़र्राटेदार पंखा मेरे चेहरे और सिर को ही उड़ा देने वाली हवा मुझ पर फेंक रहा हो.

राज कचौड़ी खाते समय मुझे वाहनों के हॉर्न और भौंकते हुए कुत्तों की आवाज़ों का भी कोई एहसास नहीं रहता है.

ये सही है कि जैसे ही आप राज कचौड़ी को खाने लगते हैं तो ये दलदल में ग़ोते लगाने के समान लगता है लेकिन इससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है.

और फिर...भगवान आपका भला करे...लस्सी को कौन भूल सकता है?

मुझे नहीं पता कि आपकी इस बारे में क्या सोच है लेकिन मेरे विचार में बेहतरीन लस्सी के गिलास के ज़रिए आप निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.

यदि मिट्टी का कुल्हड़ और बड़ा हो तो मैं तो उसमें नहाने के लिए भी तैयार हूँ.
मैंने इस बारे में किसी से चर्चा तो नहीं की है लेकिन मुझे लगता है कि असली लस्सी में ठंडे-ठंडे कुल्हड़ में ऊपरी आधा इंच गाढ़ा दही होना चाहिए.
असली लस्सी में तो इतना गाढ़ा होता है कि इसे चम्मच से ही खाया जा सकता है.

बाक़ी की लस्सी तो पी जा सकती है लेकिन ख़ाली कुल्लड़ में चम्मच डाल कर जो कुछ ही उसके भीतर बचा रह गया हो उसे खुरचने से रहा नहीं जा सकता है.

और हाँ...फिर कुल्हड़ का भी सवाल है...ऐसा क्यों कि कोई भी इसे दोबारा इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता? मैं एक दिन काफ़ी सारे ख़ाली कुल्हड़ अपने नज़दीक के ढाबे में ले गया.

लेकिन ढाबे के मालिक ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसे ये कह दिया हो कि उसकी माता जी की रातों-रात दाढ़ी उग आई है.

जब उसने अपने ढाबे के वेटरों से बात की तो वे अचानक ही काम में ख़ासे व्यस्त नज़र आने लगे या फिर ऐसे दिखे जैसे वे बाथरूम जाने का बहाना बना रहे हों.

ऐसा लगा कि वे कुछ भी करने को तैयार हैं लेकिन लस्सी के दीवाने इस विदेशी व्यक्ति से जूझना नहीं चाहते जो मिट्टी के छोटे-छोटे कुल्हड़ उनके हाथ में थमाने पर आमादा है.

कुछ शर्मिंदगी ज़रूर महसूस हुई लेकिन मुझे लगता है शायद ये ज़रूरी था. पता नहीं मेरे ऐसा करने से कोई सोचने पर मजबूर हुआ या नहीं...

अब बात करें सिज़लर की...ये दुनिया के किस भाग से आया?

भोजन के इस मक्का के इतने सारे रेस्तरां बेहतरीन तरीक़े से बने खाने को धुँए की धुँध में परोसने का पागलपन क्यों करते हैं?

यही नहीं इसे परोसते समय वेटर का वो हाल होता है जैसे उसका दम घुटा जा रहा हो. गुस्ताख़ी माफ़...लेकिन मुझे व्यंजन परोसने का ये तरीक़ा समझ में नहीं आया.

हाँ, मैं खाना गरम परोसने की बात समझ सकता हूँ लेकिन क्या ये ज़रूरी है कि पूरे रेस्तरां को अम्लवर्षा के बादल और गंध सहनी पड़े जबकि केवल प्लेट को ही गरम करने से काम चल सकता हो.

किसी रेस्तरां में बैठे हुए जब भी मैं सिज़लर परोसा जाता देखता हूँ तो मुझे उस रेस्तरां का एक दृश्य याद आ जाता है जहाँ मैं अक्सर जाता हूँ.

रेस्तरां और उसकी किचन के बीच एक घूमने वाला दरवाज़ा है और जब भी वो भयभीत करने वाला क्षण आता है जब किचन से ज्वालामुखी की तरह से निकलने वाली बने हुए खाने के धुँए की लपटें उठती दिखती हैं तो मुझे वो बेचारा वेटर याद आता है जो घूमने वाले दरवाज़े में बनी खिड़की के पीछे खड़ा हुआ नज़र आता है.

उसके खड़े रहने का कारण उस आदेश का पालन करना होता है कि धुँए को कुछ कम होने दिया जाए और फिर ही वे रेस्तरां में अपना सिज़लर लेकर दाख़िल हों...और दाख़िल ऐसे हों जैसे सलामी बल्लेबाज़ छक्का लगाने के बाद मैदान पर नज़र आता है..

उस खिड़की से मैं आम तौर पर शांत और विचलित न होने वाले वेटर को देखता हूँ जो सांस लेने के लिए जूझ रहा होता है और सेकेंड गिन रहा होता है जब वो उस 'नरक' से रिहा होगा.

वाह भोजन आह भोजन! आप उसे पसंद करें या उससे घृणा करें - हर क्षण वो आपको बहला सकता है, लेकिन मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा कि राज कचौड़ी इतनी ख़ास क्यों है?

बुरा देखो, सुनो और कहो

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 02 अक्तूबर 2012, 12:20

टिप्पणियाँ (12)

महात्मा गांधी भारत में कई प्रतीकों के रूप में प्रतिष्ठित हैं.

अहिंसा से लेकर सत्याग्रह तक और सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर सादगी तक.

ये विडंबना है कि लोगों ने गांधी को मजबूरी से भी जोड़ दिया और पता नहीं कब 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' जुमला चल निकला. विडंबना ये भी है कि नोटों पर भी गांधी की तस्वीर छपी होती है और वही नोट भ्रष्टाचार में सबसे बड़ी विनिमय मुद्रा है.

बहरहाल, जब गांधी के सकारात्मक प्रतीकों की बात करें तो उनके तीन बंदर भी याद आते हैं. गांधी के तीनों बंदर याद हैं आपको? 'बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो' वाले बंदर?

गांधी आत्मा की निर्मलता और स्वच्छता के हिमायती थे. उनके तीनों बंदरों के प्रतीक का संदेश भी आत्म शुद्धि से ही जुड़ा हुआ है. लेकिन इस बात से शायद इनकार नहीं किया जा सकता कि व्यापक रूप में इस संदेश को इस रूप में भी पढ़ा गया कि बुराइयों से दूर रहना ही बेहतर है.

लेकिन कई बार ये जिज्ञासा होती है कि अगर आज गांधी होते तो क्या अब भी इन बंदरों को प्रतीक के रूप में स्वीकार करते? क्या वे इस बात से विचलित नहीं होते कि बुराइयों से दूर रहने के फेर में लोग आत्मकेंद्रित हो रहे हैं और बुराइयों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति स्वीकारोक्ति की तरह देखी जाने लगी है?

क्या सच में ये संभव है कि अपने आसपास की बातें नागवार गुज़रे और आप किसी को बुरा न कहें? साझा हित के ख़िलाफ़ कोई कुछ भी कहे जा रहा हो और आप उसे ना सुनें? या अपने आसपास की सारी बुराइयों को देखकर भी आप अनदेखा कर सकते हैं?

मुझे लगता है कि तीनों बंदरों की मूर्तियाँ अब अप्रासंगिक हो गई हैं. या उनके संदेश अप्रासंगिक हो चुके हैं.

हमारे आसपास इतनी बुराइयाँ बिखरी हुई हों वहाँ आप अपनी आत्मा को बचा भी लें तो क्या?

इसलिए अब संदेश बदला जाना चाहिए. बुरा देखो, बुरा सुनो और बुरा कहो. लेकिन साथ में ये याद रखना होगा कि बुरा देखो और सुनो तो उसे सुधारने के प्रयास करो. यदि इस प्रयास में किसी को बुरा कहना पड़े तो वो भी करो.

समस्या की जड़ बुराई है. उसे ख़त्म करने के लिए अगर बुराई से दो चार होना पड़े तो वो भी सही.

बुरा देखकर और बुरा सुनकर ही मोहनदास करमचंद गांधी ने विद्रोह का रास्ता चुना था. अगर ऐसा न होता तो चैन से बैरिस्टरी करते रह जाते. बुरे लोगों के ख़िलाफ़ बुरा कहकर ही उन्होंने आज़ादी की लौ जलाई थी.

यक़ीन करने को जी चाहता है कि यदि आज गांधी होते तो अपने बंदरों के आंख, कान और मुंह से हाथ हटाकर कहते कि अगर बुरा को बुरा नहीं कहोगे, उसका विरोध नहीं करोगे तो लोकतंत्र के निरीह नागरिक की तरह एक दिन मारे जाओगे.

बुरा देखो, सुनो और कहो

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 02 अक्तूबर 2012, 12:20

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महात्मा गांधी भारत में कई प्रतीकों के रूप में प्रतिष्ठित हैं.

अहिंसा से लेकर सत्याग्रह तक और सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर सादगी तक.

ये विडंबना है कि लोगों ने गांधी को मजबूरी से भी जोड़ दिया और पता नहीं कब 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' जुमला चल निकला. विडंबना ये भी है कि नोटों पर भी गांधी की तस्वीर छपी होती है और वही नोट भ्रष्टाचार में सबसे बड़ी विनिमय मुद्रा है.

बहरहाल, जब गांधी के सकारात्मक प्रतीकों की बात करें तो उनके तीन बंदर भी याद आते हैं. गांधी के तीनों बंदर याद हैं आपको? 'बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो' वाले बंदर?

गांधी आत्मा की निर्मलता और स्वच्छता के हिमायती थे. उनके तीनों बंदरों के प्रतीक का संदेश भी आत्म शुद्धि से ही जुड़ा हुआ है. लेकिन इस बात से शायद इनकार नहीं किया जा सकता कि व्यापक रूप में इस संदेश को इस रूप में भी पढ़ा गया कि बुराइयों से दूर रहना ही बेहतर है.

लेकिन कई बार ये जिज्ञासा होती है कि अगर आज गांधी होते तो क्या अब भी इन बंदरों को प्रतीक के रूप में स्वीकार करते? क्या वे इस बात से विचलित नहीं होते कि बुराइयों से दूर रहने के फेर में लोग आत्मकेंद्रित हो रहे हैं और बुराइयों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति स्वीकारोक्ति की तरह देखी जाने लगी है?

क्या सच में ये संभव है कि अपने आसपास की बातें नागवार गुज़रे और आप किसी को बुरा न कहें? साझा हित के ख़िलाफ़ कोई कुछ भी कहे जा रहा हो और आप उसे ना सुनें? या अपने आसपास की सारी बुराइयों को देखकर भी आप अनदेखा कर सकते हैं?

मुझे लगता है कि तीनों बंदरों की मूर्तियाँ अब अप्रासंगिक हो गई हैं. या उनके संदेश अप्रासंगिक हो चुके हैं.

हमारे आसपास इतनी बुराइयाँ बिखरी हुई हों वहाँ आप अपनी आत्मा को बचा भी लें तो क्या?

इसलिए अब संदेश बदला जाना चाहिए. बुरा देखो, बुरा सुनो और बुरा कहो. लेकिन साथ में ये याद रखना होगा कि बुरा देखो और सुनो तो उसे सुधारने के प्रयास करो. यदि इस प्रयास में किसी को बुरा कहना पड़े तो वो भी करो.

समस्या की जड़ बुराई है. उसे ख़त्म करने के लिए अगर बुराई से दो चार होना पड़े तो वो भी सही.

बुरा देखकर और बुरा सुनकर ही मोहनदास करमचंद गांधी ने विद्रोह का रास्ता चुना था. अगर ऐसा न होता तो चैन से बैरिस्टरी करते रह जाते. बुरे लोगों के ख़िलाफ़ बुरा कहकर ही उन्होंने आज़ादी की लौ जलाई थी.

यक़ीन करने को जी चाहता है कि यदि आज गांधी होते तो अपने बंदरों के आंख, कान और मुंह से हाथ हटाकर कहते कि अगर बुरा को बुरा नहीं कहोगे, उसका विरोध नहीं करोगे तो लोकतंत्र के निरीह नागरिक की तरह एक दिन मारे जाओगे.

बुरा देखो, सुनो और कहो

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 02 अक्तूबर 2012, 12:20

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महात्मा गांधी भारत में कई प्रतीकों के रूप में प्रतिष्ठित हैं.

अहिंसा से लेकर सत्याग्रह तक और सांप्रदायिक सद्भाव से लेकर सादगी तक.

ये विडंबना है कि लोगों ने गांधी को मजबूरी से भी जोड़ दिया और पता नहीं कब 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' जुमला चल निकला. विडंबना ये भी है कि नोटों पर भी गांधी की तस्वीर छपी होती है और वही नोट भ्रष्टाचार में सबसे बड़ी विनिमय मुद्रा है.

बहरहाल, जब गांधी के सकारात्मक प्रतीकों की बात करें तो उनके तीन बंदर भी याद आते हैं. गांधी के तीनों बंदर याद हैं आपको? 'बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो' वाले बंदर?

गांधी आत्मा की निर्मलता और स्वच्छता के हिमायती थे. उनके तीनों बंदरों के प्रतीक का संदेश भी आत्म शुद्धि से ही जुड़ा हुआ है. लेकिन इस बात से शायद इनकार नहीं किया जा सकता कि व्यापक रूप में इस संदेश को इस रूप में भी पढ़ा गया कि बुराइयों से दूर रहना ही बेहतर है.

लेकिन कई बार ये जिज्ञासा होती है कि अगर आज गांधी होते तो क्या अब भी इन बंदरों को प्रतीक के रूप में स्वीकार करते? क्या वे इस बात से विचलित नहीं होते कि बुराइयों से दूर रहने के फेर में लोग आत्मकेंद्रित हो रहे हैं और बुराइयों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति स्वीकारोक्ति की तरह देखी जाने लगी है?

क्या सच में ये संभव है कि अपने आसपास की बातें नागवार गुज़रे और आप किसी को बुरा न कहें? साझा हित के ख़िलाफ़ कोई कुछ भी कहे जा रहा हो और आप उसे ना सुनें? या अपने आसपास की सारी बुराइयों को देखकर भी आप अनदेखा कर सकते हैं?

मुझे लगता है कि तीनों बंदरों की मूर्तियाँ अब अप्रासंगिक हो गई हैं. या उनके संदेश अप्रासंगिक हो चुके हैं.

हमारे आसपास इतनी बुराइयाँ बिखरी हुई हों वहाँ आप अपनी आत्मा को बचा भी लें तो क्या?

इसलिए अब संदेश बदला जाना चाहिए. बुरा देखो, बुरा सुनो और बुरा कहो. लेकिन साथ में ये याद रखना होगा कि बुरा देखो और सुनो तो उसे सुधारने के प्रयास करो. यदि इस प्रयास में किसी को बुरा कहना पड़े तो वो भी करो.

समस्या की जड़ बुराई है. उसे ख़त्म करने के लिए अगर बुराई से दो चार होना पड़े तो वो भी सही.

बुरा देखकर और बुरा सुनकर ही मोहनदास करमचंद गांधी ने विद्रोह का रास्ता चुना था. अगर ऐसा न होता तो चैन से बैरिस्टरी करते रह जाते. बुरे लोगों के ख़िलाफ़ बुरा कहकर ही उन्होंने आज़ादी की लौ जलाई थी.

यक़ीन करने को जी चाहता है कि यदि आज गांधी होते तो अपने बंदरों के आंख, कान और मुंह से हाथ हटाकर कहते कि अगर बुरा को बुरा नहीं कहोगे, उसका विरोध नहीं करोगे तो लोकतंत्र के निरीह नागरिक की तरह एक दिन मारे जाओगे.

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