इस विषय के अंतर्गत रखें सितम्बर 2012

वेबसाइट का नया रुप

Neil Curry Neil Curry | गुरुवार, 27 सितम्बर 2012, 12:00

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किसी भी मौजूदा वेबसाइट, रेडियो- टीवी प्रोग्राम या अख़बार में परिवर्तन दिलचस्प भी होता है और द्वंद्व भरा भी.

एक ओर तो आप चाहते हैं कि श्रोता, दर्शक या पाठक का ध्यान इस ओर आकर्षित भी हो और दूसरी ओर आप चाहते हैं कि वह इसे अनदेखा भी कर जाए. यानी आप नहीं चाहते कि श्रोता, दर्शक और पाठक जिस तरह चीज़ों को देखने के आदि हैं, उसमें कोई खलल पहुँचे लेकिन दूसरी ओर आप चीज़ों को बेहतर भी बनाना चाहते हैं जिससे कि नए लोग इसके प्रति आकर्षित हों.

पिछले दो महीनों से हम bbchindi.com में थोड़े-थोड़े परिवर्तन करते रहे हैं और उम्मीद करते रहे हैं कि ये परिवर्तन लोगों को पसंद आएँगे.

लेकिन सवाल ये है कि क्या आप क्या सोचते हैं? क्या हम अपने प्रयासों में सफल हुए हैं? या मैं आपसे पूछूँ कि आपने इन परिवर्तनों को महसूस किया या नहीं? मुझे लगता है कि आपने इसे महसूस किया है.

इस बीच हमने न केवल सामग्रियों की संपादकीय गुणवत्ता में सुधार किया है बल्कि हमने बीबीसी हिंदी वेबसाइट को नए रूपाकार में पेश करने की भी कोशिश की है. हमें उम्मीद रही है कि इन परिवर्तनों से सुधार आएगा और ये पाठकों को पसंद भी आएगा.

अब जो ताज़ा परिवर्तन बीबीसी हिंदी वेबसाइट पर किए गए हैं उसका उद्देश्य यूज़र-एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाना है. इसके लिए एक ओर हमने इंडेक्स में थोड़ी काट-छाँट की है और दूसरी ओर होमपेज पर सामग्रियों को बेहतर ढंग से उभारने की कोशिश की गई है.

इसलिए अब आपकी राय हमारे लिए मूल्यवान होगी. आप क्या सोचते हैं, ये परिवर्तन आपके लिए अच्छे हैं, बुरे हैं, हास्यास्पद हैं, गंभीर हैं, घिसेपिटे से हैं या दार्शनिक क़िस्म के हैं?

इन परिवर्तनों से पहले हमने व्यापक रिसर्च किया है कि लोग इंटरनेट पर बीबीसी हिंदी से क्या चाहते हैं. ये जानना अच्छा लगा कि लोग हमसे वही चाहते हैं जो हमारी ताक़त है, भारत को वैश्विक परिप्रेक्ष में प्रस्तुत करना और दुनिया को भारत के परिप्रेक्ष्य में पेश करना. इसे 'ग्लोबल इंडिया' या 'वैश्विक भारत' कहना ठीक लगता है.

इसका मतलब ये है कि जब हमारी नज़र दुनिया पर होती है तो नक्शे के बीचो-बीच भारत होता है और हम जब दुनिया के किसी भी हिस्से से जुड़े विषय पर काम करते हैं तो हम ये विचार करते हैं कि इससे भारतवासियों का क्या संबंध हो सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो हम 'हबल टेलिस्कोप' जैसे किसी उपकरण के साथ दुनिया के ऊपर विचरण कर रहे होते हैं लेकिन हमारी नज़र भारत पर और विश्व मंच पर भारत के महत्व पर केंद्रित होती है.

इस दृष्टिकोण को ज़हन में रखते हुए हमने भारत के पन्ने को बदलकर उसे संपूर्ण बनाने की कोशिश की है और एक पन्ना अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का है, जिसमें दुनिया भर की ख़बरें पाठकों की दिलचस्पी के हिसाब से विभिन्न खंडों में प्रकाशित की जाएँगीं. इसके अलावा होमपेज पर छह अलग-अलग विषयों पर सामग्री उपलब्ध होगी. इसमें एक खंड चर्चित चेहरे का होगा क्योंकि हमारा रिसर्च बताता है कि आप चर्चित व्यक्तियों के बारे में ज़्यादा पढ़ना चाहते हैं. इसके अलावा रिसर्च बताता है कि आप को तस्वीरें पसंद आती हैं, इसलिए हमने होमपेज के दाहिने हिस्से में सबसे ऊपर फ़ोटो गैलरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है.

ये थे इस परिवर्तन के पीछे हमारे विचार.

अब आपसे अनुरोध है कि इस नए रुपाकार वाली वेबसाइट पर एक संपूर्ण दृष्टि डालिए और हमें बताइए कि आप इसके बारे में क्या सोचते हैं. हमें आपके विचार जानकर प्रसन्नता होगी.

भारत का इतिहास: 2047

सुशील झा सुशील झा | गुरुवार, 27 सितम्बर 2012, 11:53

टिप्पणियाँ (13)

एक जमाने में हमारे देश यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडी का नाम आर्यावर्त और जम्बूद्वीप हुआ करता था. आगे चलकर नाम बदला और इसे हिंदुस्तान कहा जाने लगा. वैसे रथ पर चढ़ कर स्मरण करने वाला एक राजनेता इसे हिंदूस्थान कहता था क्योंकि उसे लगता था कि बार बार झूठ बोलने पर नाम बदल कर सच हो जाएगा. ऐसा हुआ नहीं और कालांतर में देश का नाम भारत और इंडिया हो गया. गरीब लोग इसे भारत कहते और अमीर कहते इंडिया.

आज जो हम राष्ट्र गान गाते हैं उसकी उत्पत्ति भी बहुत मज़ेदार है. हमारे देश में सन 2010 में एक महान संगीतकार का पता चला. उसका नाम धनुष था. उसे पता चल गया था कि इंडिया में एक बहुत बड़ा घोटाला होने वाला है जिसे ध्यान में रखकर उसने एक गीत लिखा....वाय दिस कोलावरी डी. जिसका सीधा अर्थ है इतना कोयला कहां से आया डी--डी फॉर डॉक्टर. इस गाने के आने के कुछ ही दिन बाद कोयला चोरी का एक बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ. तो सारे लोग सवाल पूछने लगे...वाय दिस कोलावरी डी.

धनुष का कोयला चोरी में कोई हाथ नहीं था लेकिन गाना उसी का था. उस समय देश के प्रधानमंत्री डॉ साहब थे जो चुप रहते थे क्योंकि विदेशों से पढ़ कर आए थे.

लेकिन जब उस जमाने की सोशल मीडिया फेसबुक, ट्विटर और उस समय कागज़ों पर छपने वाले अख़बारों में सवाल उठने लगे और सारे लोग यही गाना गाने लगे तो एक दिन डॉ साहब ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि ..मेरे बोलने से अच्छी है मेरी खामोशी..

ये कविता डॉ साहब की थी नहीं किसी की चुराई हुई थी. कोयला चोरी पर चुराई कविता पढ़ना उस समय जुर्म नहीं माना जाता था. डॉ के जवाब पर सवाल बंद नहीं हुए और बवाल मचता रहा तो डॉक्टर साहब के मंत्रियों ने कहा कि फेसबुक और ट्विटर पर जो पूछा जा रहा है उसमें विदेशी ताकतों का हाथ है इसलिए इस गाने पर प्रतिबंध लगना चाहिए. चूंकि धनुष भारतीय नागरिक थे इसलिए प्रतिबंध नहीं लगा.

फिर डॉ के एक विश्वस्त मीडिया मैनेजर ने सलाह दी कि इसे विदेशी फंड से जोड़ना सही रहेगा जिससे सवाल कम उठें. ये तय करते ही डॉ साहब ने फैसला किया कि देश में विदेशों से पैसा आएगा जिसे एफडीआई कहा जाएगा.

ज़ाहिर था कि पैसा आया और फिर किसी ने कोयला चोरी की बात नहीं की क्योंकि सारा कोयला कुछ दिनों बाद विदेश चला गया.

उस कोयले से बिजली बनाई गई और हमें दूर देश से भेजी गई...जिससे हर घर में बिजली आई. जिस देश से ये बिजली पहुंची थी उसका नाम यूनाइटेड स्टेटस ऑफ अमरीका था औऱ उनके इस अहसान को देखते हुए हमारे देश का नाम भी यूनाइटेड स्टेटस ऑफ इंडी कहा गया.

इससे भारत और इंडिया की समस्या सुलझ गई है. सबके लिए एक देश है. अब यहां कोई गरीब नहीं है. सारे गरीबों को अफ्रीका भेज दिया गया है..जो बचे हैं वो बचे हुए जंगलों में चले गए जहां वो पहले रहते थे.

देश ने प्रगति की लेकिन लोगों के जेहन से कोयला नहीं गया इसलिए हमारे देश के विदेश से पढ़ कर आए कुछ नेताओं ने तय किया कि इसी को राष्ट्रगान बनाया जाए...इसलिए हम सब चलो मिल कर गाएं....वाय दिस कोलावरी डी...औऱ हां राष्ट्रीय गान के लिए सीट से खड़े होने की ज़रुरत नहीं है. जो बच्चे न गाना चाहें वो आईपॉड पर गाना चला दें.....उसे बच्चे का गाया हुआ मान लिया जाएगा...

यूनाइटेड स्टेटस ऑफ इंडी में धनुष की याद में एक प्रतिमा बनाई गई है जहां साल में एक बार चढ़ावा दिया जाता है जिसमें आईपॉड सबसे बढ़िया चढ़ावा माना जाता है.

ग़रीब क्यों है बिहार?

Pawan Nara Pawan Nara | सोमवार, 24 सितम्बर 2012, 13:01

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जब मैं दिल्ली में पढ़ाई कर रहा था तो सोचता था कि एक दिन बिहार ज़रुर जाउंगा.

पिछले दिनों वहाँ जाने का मौक़ा मिल ही गया. बीबीसी के बिहार संवाददाता मणिकांत ठाकुर के साथ बच्चेदानी के ऑपरेशन के घोटाले पर काम करना था सो गांव-गांव घूमने का मौक़ा भी मिला.

पटना में पहले दिन सड़कों पर निकलते ही स्कॉर्पियो जैसी बड़ी गाड़ियाँ इतनी ज्यादा दिखाई दीं कि आश्चर्य हुआ. मैंने रिक्शेवाले से पूछा, पटना में इतनी ज्यादा स्कॉर्पियो गाड़ियां क्यों हैं? रिक्शावाले ने कहा, 'दबंग गाड़ी है न, इसलिए' और मेरे मन ने कहा,'पैसा ज्यादा है इसलिए'. मेरे मन में सवाल आया, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं बिहार ग़रीब है, खास राज्य का दर्जा मिले. देश में आम धारणा भी है कि बिहार ग़रीब है लेकिन पटना की सड़कों पर देखकर तो नहीं लगता कि बिहार ग़रीब है. तो ग़रीबी कहाँ है?

अब बिहार की मेरी पूरी यात्रा इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द पूरी होने वाली थी.

हम समस्तीपुर की ओर चल पड़े. सड़क के किनारे खेतों में धान की फसल लहलहा रही थी. हरियाली देखकर आंखों को सूकून मिल रहा था और मन कह रहा था कि बिहार ग़रीब नहीं हो सकता. लेकिन जैसे-जैसे हम राजधानी पटना से दूर होते गए रौनक इस तरह दूर होती गई मानों हम रोशनी के स्रोत से दूर जा रहे हैं.

समस्तीपुर पहुंचते-पहुंचते तस्वीर साफ़ होने लगी थी. यहां सत्ता का तेज़ नहीं था और सामने था हकीकत का धरातल. बस राहत की बात ये थी कि मुख्य सड़कें अच्छी थीं जिसकी वाहवाही नीतीश कुमार को मिल रही है.

जब हम निजी अस्पतालों में गए तो लगा कि निजी अस्पताल तो यहां खैराती अस्पतालों से भी बुरे हैं.

मुख्य सड़क से उतरते ही देखा कि नाली का काला कचरा सड़क पर जगह-जगह जमा हुआ है. सड़क के दोनों ओर दवाइयों की दुकानें और एक के बाद एक नर्सिंग होम. नर्सिंग होम ऐसे कि खुली दुकान में एक किनारे डॉक्टर बैठा है और सामने एक ओर बिस्तर पर मरीज़ और दूसरी ओर कतार में लगे मरीज़. मन पूछता था कि इतने लोग एक साथ बीमार कैसे हो सकते हैं. 'बिहार ग़रीब क्यों है?' के बाद अब मेरे मन में सवाल ये भी था, 'इतने लोग बीमार कैसे हो सकते हैं?'

जिन महिलाओं की बच्चेदानी ग़लत तरीके से निकाली गई है उनसे मिलने हम कुछ गाँवों में पहुँचे और मेरे सामने बिहार की असल तस्वीर आने लगी.

वहाँ वो तस्वीर दिखी जो अब फ़िल्मों में भी नहीं दिखाई देती. एक झोंपड़ी का दृश्य, एक संदूक, एक चूल्हा, तीन डिब्बी नमक मिर्च मसाले की, कुछ बर्तन और एक छोटा सा आंगन. परिवार का मुखिया दिहाड़ी मज़दूर और और सात बच्चे.

बातचीत में परिवार की महिला ने बताया कि जब से बच्चेदानी निकलवाई है तब से चक्कर आते हैं और अब वो मज़दूरी भी नहीं कर पाती. उसका कहना था कि ऑपरेशन तो बीपीएल कार्ड पर हो गया लेकिन उसके बाद जो दवाइयां खानी पड़ीं, उनकी ख़र्च लगभग हज़ार रुपये हर महीने था.

ग्रामीण इलाक़ों के लिए हर दिन 28 रुपए को पर्याप्त बताने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का चेहरा मेरी नज़रों के सामने से गुज़र गया. सोचने लगा कि इलाज के इस पैसे का इंतजाम कैसे हुआ होगा?

इसके बाद हम एक डॉक्टर के क्लीनिक पहुंचे. वे हमें एक कमरे में ले गए. इसी एक कमरे में एयरकंडीशर था. तब समझ में आया कि ये ऑपरेशन थिएटर है. छत से एक लाइट लटक रही थी. नीचे टूटा हुआ लोहे का पलंग था. औज़ार जमीन पर लकडी़ की एक नीची बेंच पर रखे थे. उनके आस-पास की जगह काली हो गई थी मानो सालों से सफ़ाई न हुई हो.

डॉक्टर से बात करते-करते ही एक चूहा मेरे कदमों के पास से दौड़ लगाता निकला मानो वो भी अपनी हाज़िरी दर्ज करवा रहा हो. दीवार पर लगभग हर भगवान की तस्वीर थी, शिव, लक्ष्मी, काली मां और हनुमान. ये तस्वीर मुझे देर तक याद आती रही और साथ ही याद आता रहा ये जुमला कि सब कुछ भगवान भरोसे है.

डॉक्टर साहब का मुंह पान से रंगा हुआ था, गले में स्टेथस्कोप लटका था और वो दलील दे रहे थे कि कैसे उन्होंने सिर्फ़ ज़रुरी ऑपरेशन ही किए हैं.

मेरे मन ने कहा कि जब इतने बुरे हालात में किसी स्वस्थ आदमी का भी पेट खोल के रख दिया जाए तो उसका इलाज 'ज़रुरी' होना तय है.

इसी तरह पांच दिन अलग-अलग स्थितियों से मैं गुज़रता रहा.

जब पटना से वापस लौट रहा था तो मेरे मन में एक बात स्पष्ट थी कि ग़रीबों को यहां लूटा जा रहा है और नीतीश कुमार का सुशासन अभी पटना से आगे नहीं बढ़ पाया है.

मन में तरह-तरह के सवाल आते रहे और मैं जवाब ढूंढ़ने की असफल कोशिश करता रहा.

अगर आपके पास इसका जवाब हो तो जरूर बताइएगा.

नो हॉर्न प्लीज़!

Neil Curry Neil Curry | बुधवार, 19 सितम्बर 2012, 12:09

टिप्पणियाँ (23)

जब मैं किसी भारतीय सड़क पर होता हूं, एक लम्हा ज़रुर आता है जब किसी के ज़ोरदार और हिंसक तरीके से हॉर्न बजाने से झल्ला जाता हूं.

मुझे लगने लगता है कि अभी यहां कोई बड़ा दंगा-फ़साद होने वाला है या किसी का शरीर क्षत-विक्षत हो गया है या कम से कम हॉर्न बजाने वाले को सड़क पर कोई दस मीटर गहरा गड्डा दिख गया है. लेकिन ये तो किसी भी आकस्मिक लम्हे की आकस्मिक यात्रा के दौरान कोई भी ड्राइवर (जो हमेशा पुरूष होता है) हो सकता है.

तो जब भी हॉर्न बजता है तो मैं ड्राइवर के चेहरे को देखने के लिए मजबूर हो जाता हूं और जब मुझे उस चेहरे भाव बेपरवाह सा लगता तो मैं सोचता हूं, "जैसे ही कोई भारतीय मर्द ड्राइविंग सीट पर बैठता है तो उसे क्या हो जाता है?"

ठीक है कि ऐसी घटनाएं दक्षिण लंदन के मेरे इलाके में भी होती हैं. लेकिन वो इतनी अधिक तो कतई नहीं होती जितनी आधुनिक शहरी भारत में.

क्या इसकी वजह ये है कि भारत में कारें अब भी सिर्फ़ पांच प्रतिशत लोगों के पास ही हैं और इनके मालिक ख़ुद को ख़ास, ताक़तवर और सड़कों का बादशाह समझते हैं?

दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी चलाने वाले एक आम ड्राइवर के बारे में सोचिए. मसलन वो कितनी बार पीछे घूमकर सावधानी से गाड़ी को सड़क पर मोड़ते हैं? आपको नहीं कि ये लोग सिर्फ़ सामने देखते हैं और हॉर्न बजाते हुए ये उम्मीद करते हैं कि उनके पीछे वाले उनसे दूर रहेंगे और आगे वाले उनके लिए डर के मारे रास्ता छोड़ देंगे.

मुझे एक बार मुंबई में एक टैक्सी वाले ने बताया, "रियर-व्यू मिरर का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सभी हॉर्न बजाते रहते हैं इसलिए आपको हमेशा पता होता है कि कौन कहां है."

साधारण और एक एकदम वास्तविक राय. तो इसका रिश्ता ताक़त या घमंड से नहीं है. इसका मकसद है - आगे निकलना.

इस बीच मैं लाल प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर राज कचौरी का आनंद ले रहा हूं. दक्षिण दिल्ली के छोटे से बाज़ार में मैं कुत्तों के एक झुंड को काफ़ी दिलचस्प और मंनोरंजक पाता हूं.

तभी अचानक ज़ोरदार हॉर्न बजता है.

संजीदा बात तो ये है कि इतनी ज़ोरदार आवाज़ आप तभी सुन सकते हैं जब आपके बोनेट में 'बर्लिनर फ़िलहार्मोनिक ओर्केस्ट्रा' हो. हॉर्न इतना भयानक था कि कुत्तों के भी कान खड़े हो गए. और फिर एक लग्ज़री कार सामने दिखी. शायद बीएमडब्ल्यू या ऑडी. यहाँ सैंट्रों जैसी छोटी गाड़ी मुश्किल से अंदर घुस पा रही थी लेकिन ताकत और उच्च वर्ग की ये निशानी इस रफ़्तार से अंदर आ रही थी कि जैसे वो यूसैन बोल्ट को शर्मिंदा करना चाहती हो.

फिर मैंने उस कार में बैठे आदमी की शक्ल देखी. वो अपने स्मार्टफ़ोन पर गप्पे लड़ाने में व्यस्त था और उसका दूसरा हाथ चमड़े के कवर वाले स्टेयरिंग व्हील पर था.

उसके हाव-भाव साफ़ थे - तुम में से कोई भी मुझे छू नहीं सकता, अगर तुम्हारी तकदीर अच्छी हुई तो तुम मेरे जूते ज़रुर चाट सकते हो.

लेकिन ये सब हो क्या रहा है? आप इतने-सारे लोगों को अपने चेहरे पर ऐसे भाव के साथ क्यों देखते हैं जैसे कि वो कह रहे हों कि 'मैं अपने आस-पास के लोगों से अधिक महत्वपूर्ण हूं.'

गुड़गांव के एक्सप्रेस-वे पर ट्रक हों, दिल्ली की सड़कों पर बसें या टैक्सियां, सभी दबादब हॉर्न बजाते हैं. इस धातु बक्से के भीतर बैठते ही लोगों को कुछ हो जाता है. जैसेकि ये बक्सा यानी उसका वाहन कह रहा हो, "मैंने तुम्हें चुना है, तुम ख़ास हो, तुम्हें बिल्कुल सीधे उस पैदल यात्री की ओर गाड़ी चलाने का हक़ है क्योंकि अगर उसे बचना है तो हट ही जाएगा."

इस समाज में जाति और वर्ग बहुत महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन शायद आम सोच रखने वाले लोग ऐसा कभी ना करें.

ओह...कोई मध्यम दर्जे का सियासतदान बहुत-सी छोटी सुज़ुकी जीपों के काफ़िले के साथ गुज़र रहा है और साथ है कुछ एबेंसेडर गाडियाँ - अपने रहस्यमयी लंबे एंटिना के साथ.

कुत्ते भी अब खिसक रहे हैं. हम भी खा-पीकर निकलते हैं.

सवाल से नाराज़

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 11 सितम्बर 2012, 18:40

टिप्पणियाँ (12)

उद्योगपति और सांसद नवीन जिंदल एक टेलीविज़न चैनल से नाराज़ हो गए और कैमरामैन पर झपट पड़े.

चैनल का कहना है कि कोयला घोटाले से जुड़े सवालों पर नवीन जिंदल नाराज़ हो गए.

नवीन जिंदल की अब तक की छवि एक ऐसे राष्ट्रभक्त की रही है जिसने लोगों को अपने घरों पर तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाया. सुप्रीम कोर्ट में नवीन जिंदल की याचिका पर फैसला होने से पहले सिर्फ़ सरकारी इमारतों पर झंडा फहराने का अधिकार था.

अब उन्हीं नवीन जिंदल की कंपनियों पर कोयला घोटाले को लेकर कई आरोप हैं. पिछले दिनों छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक कई प्रदेशों में उनकी कंपनी के ख़िलाफ़ कई आंदोलन भी होते रहे हैं.

घोटालों के आरोपों और आंदोलनों ने नवीन जिंदल नाराज़ नहीं हैं. एक और टीवी चैनल पर उन्होंने कहा कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है.

लेकिन वो सवाल पूछे जाने से नाराज़ हैं.

ये नवीन जिंदल की समस्या नहीं है. समाज की समस्या है.

पता नहीं कब हमारे समाज में सवाल पूछा जाना ग़लत ठहरा दिया गया. इसका ब्यौरा समाजशास्त्री और इतिहासकार दे सकते हैं.

लेकिन अब हमारे समाज में सवाल से हर कोई नाराज़ हो जाता है.

घर पर सवाल पूछो तो पिता नाराज़ हो जाता है. सवाल पर जवाब मिलने की बजाय झिड़क दिया जाता है, "ज़बान लड़ाते हो?"

स्कूल में टीचर से सवाल पूछें तो जवाब की जगह डांट मिलती है, "ज़्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करो."

दफ़्तर में बॉस से सवाल पूछो तो वह अक्सर कहता कुछ नहीं लेकिन उसका ख़ामियाजा तनख़्वाह और प्रमोशन सबमें भुगतना पड़ता है.

हमारे आसपास लोग तभी तक भले रह पाते हैं जब तक सवाल न पूछे जाएँ. या तो आप सहमत हो जाएँ या फिर अपनी असहमति को मन में दबाकर रखें.

इतिहास गवाह है कि विज्ञान से लेकर दर्शन तक जितने भी नए सिद्धांत प्रतिपादित हुए हैं, सवाल पूछे जाने से ही संभव हुए हैं.

ये बेवजह नहीं है कि शून्य का आविष्कार करने वाले, अर्थशास्त्र का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाले, शास्त्रार्थ करने वाले और दुनिया को भाषा देने का दावा करने वाले भारत में पिछले कुछ सौ सालों में ऐसा कुछ भी नया नहीं हुआ, जिसका आप गर्व से गुणगान कर सकें.

ऐसे किसी समाज में किसी नए की उम्मीद कैसे की जा सकती है जो सवाल पूछे जाने का विरोध करता हो.

नवीन जिंदल एक उदाहरण हैं. ऐसे नवीन जिंदल तो हम सबके मन में हैं, सवाल पूछे जाने से नाराज़ होते हुए.

मेरी अंजुला मिस...

सुशील झा सुशील झा | बुधवार, 05 सितम्बर 2012, 09:51

टिप्पणियाँ (17)

टीचर्स डे याद आते ही मन में गुदगुदी सी होती है. मुझे ये याद नहीं आता कि उस दिन टीचर पढ़ाने नहीं आते. मुझे ये भी याद नहीं आता कि उस दिन दसवीं-बारहवीं के कौन से सीनियर पढ़ाने आते थे. याद आती है तो बस अंजुला मिस. (नाम बदला हुआ)
अंजुला मिस बस दो साल ही स्कूल में रहीं लेकिन सबकी फेवरिट. गजब सुंदर. हमको अंजुला मिस से सुंदर दुनिया में कोई नहीं लगती थी. सातवीं आठवीं में होंगे हम. छोटे से. अंजुला मैम की शादी हुई नहीं थी. लंबी चोटी, बाल एकदम नए स्टाइल में. बाल लहरा कर चेहरे पर आते तो वो बाल झटक देती थीं और क्लास के बच्चे मैम को देखते और बस देखते ही रह जाते.

मैम साइंस पढ़ाती थीं और उनकी क्लास में कोई बच्चा अनुपस्थित नहीं होता था. हम तो मैम को देखते ही रहते. उनकी क्लास में कोई केमिस्ट्री-फिजिक्स समझ में नहीं आता था. मैम की क्लास खत्म होती तो मन करता मैम के पीछे पीछे दूसरी क्लास में चले जाएं.

मैम की स्कूटी के पीछे पीछे तेज़ तेज़ साइकिल चलाना अभी भी नहीं भूले हैं. तब समझ में नहीं आता था कि ये क्या हो रहा है. कुछ दिनों बाद पता चला कि मैम की शादी हो रही है तो उस दिन सीने में दर्द भी हुआ था. लेकिन मैम फिर भी अच्छी ही लगी थी. अंजुला मैम ने जिस दिन स्कूल छोड़ा तो मैंने कहा भी था-मैम आप हमको बहुत अच्छी लगती हैं.

मैम बोलीं- मैं समझ सकती हूं. बड़े हो जाओगे तब मैं नहीं कोई और अच्छी लगेगी. अंजुला मैम की ये बात जब भी याद आती है तो बस मुस्कुरा उठता हूं.

इस बात को पता नहीं कितने साल हो गए. शिक्षक दिवस पर कई और शिक्षकों की याद आती है. किसी ने पढ़ाया. किसी ने समझाया. किसी ने डांटा. किसी ने पीटा. सबकी याद दिमाग के एक एक कोने में है लेकिन अंजुला मिस दिल के किसी कोने में कहीं छुप बैठी हैं.

मुझे पहले लगता था कि ऐसा मेरे साथ ही हुआ है. कल दफ्तर में दोस्तों से ऐसे ही ज़िक्र किया तो पता चला मैं अकेला नहीं हूं. लगभग सभी के मन में किसी न किसी टीचर के प्रति ऐसा लगाव होता ही है. अब आप उसे क्रश कह लीजिए.....लड़कपन कह लीजिए या जो मन है वो कह लीजिए...मेरे लिए तो एक कसक है जो मुझे अच्छी लगती है.

कौन है अक्षम?

राजेश प्रियदर्शी राजेश प्रियदर्शी | मंगलवार, 04 सितम्बर 2012, 03:40

टिप्पणियाँ (8)

पाँचवीं कक्षा में संस्कृत में पढ़ा था-- 'आलस्यम् हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान रिपु:' लेकिन इस नीति वचन का अपने ऊपर कोई ख़ास असर नहीं होने दिया.

अपने आलसी होने पर मैं आसानी से शर्मिंदा नहीं होता, मगर इन दिनों पैरालिंपिक्स देखकर ख़ासा शर्मसार हूँ, जिन लोगों को शारीरिक तौर पर अक्षम कहा जाता है वे ही मुझे अक्षमता का एहसास करा रहे हैं.

सोचता हूँ कि क्या बढ़ी हुई तोंद एक तरह की विकलांगता नहीं है? शायद ज़्यादा बुरी विकलांगता है क्योंकि अक्सर इनसान इसके लिए ख़ुद ज़िम्मेदार होता है.

'एबल बॉडीड' यानी स्वस्थ सबल आदमी माना जाता हूँ मगर बीस-तीस मीटर दौड़ना पड़ जाए तो हालत बिगड़ जाती है. दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के ऑस्कर प्रिस्टोरियस हैं जो घुटने के नीचे, दोनों पैर कटे होने के बावजूद 400 मीटर की दौड़ 45 सेकेंड में पूरी कर लेते हैं.

चीन के तैराक जैंग ताओ ने स्वर्ण पदक जीता है, मगर वे अपने पदक को हाथों से छू नहीं सकते. सीटी बजने पर उनके कोच उनके पेट के नीचे हाथ रखकर उन्हें पानी में उतारते हैं क्योंकि उनके दोनों हाथ कंधे से कटे हुए हैं. एक मैं हूँ जिसे स्विमिंग पूल के गहरे हिस्से में जाने से डर लगता है.

टीवी पर एक साइकिलिस्ट को देख रहा था, वेलोड्रम में साइकिल तेज़ी से चल रही थी, मुझे लगा कि शायद मूक-बधिर साइकिलिस्ट होंगे, जब कैमरे का एंगल बदला तो पता चला कि वे साइकिल एक पैर से चला रहे थे.

सच ये है कि अब से पहले पैरालिंपिक्स पर मैंने ख़ास ध्यान नहीं दिया, यही सोचता था कि उसमें देखने को कुछ ख़ास नहीं होगा, मगर इस बार कुछ ऐसे दृश्य देखे हैं जिन्हें भूलना आसान नहीं होगा.

ये दृश्य मेरे भीतर एक तरह की हीनभावना पैदा करते हैं और ये भी बताते हैं कि समस्या शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक है. हिम्मत और लगन, हाथ-पैर या आँख-कान के मोहताज नहीं.

मन शरीर का 'अंग' नहीं है इसलिए टूटे हुए मन या पस्त हौसले वाले व्यक्ति को विकलांग नहीं कहा जाता, मानसिक सबलता को भी देखा जाए तो, न जाने कितनी बड़ी आबादी विकलांग साबित होगी.

ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अपंग-विकलांग लोगों का हौसला बढ़ाने वाला साइडशो है पैरालिंपिक्स. किसी भी स्पर्धा को ठीक से देखिए तो आपकी राय बदल जाएगी.

जिन देशों में विकलांग कहे जाने वाले लोगों के प्रति दुर्भावना ज़्यादा दिखाई देती है उन देशों में आवश्यक रूप से पैरालिंपिक्स दिखाया जाना चाहिए ताकि लोग समझ सकें कि इन लोगों को दया नहीं, सम्मान चाहिए.

इस दृष्टि से पैरालिंपिक्स बहुत अच्छा नाम नहीं है, यह सिर्फ़ पैरेलल ओलंपिक नहीं है, इसका नाम 'करेज ओलंपिक' या 'डिटरमिनेशन ओलंपिक' जैसा कुछ होना चाहिए था, यह शारीरिक क्षमता की प्रतियोगिता नहीं है बल्कि मनुष्य के मनोबल का सबसे बड़ा शो है.


सबल शरीर को आदर से झुकाकर, इन एथलीटों के बुलंद जज़्बे को सलाम, और दुनिया भर के उन लोगों को भी सलाम जिन्होंने पैरों के बिना दुनिया की बड़ी बाधाएँ लाँघी हैं, जिन्होंने आँखों के बिना बड़े सपने देखे हैं, जिन्होंने हाथों के बग़ैर उन्हें साकार किया है.

कौन है अक्षम?

राजेश प्रियदर्शी राजेश प्रियदर्शी | मंगलवार, 04 सितम्बर 2012, 02:41

टिप्पणियाँ (1)

पाँचवीं कक्षा में संस्कृत में पढ़ा था-- 'आलस्यम् हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान रिपु:' लेकिन इस नीति वचन का अपने ऊपर कोई ख़ास असर नहीं होने दिया.

अपने आलसी होने पर मैं आसानी से शर्मिंदा नहीं होता, मगर इन दिनों पैरालिंपिक्स देखकर ख़ासा शर्मसार हूँ, जिन लोगों को शारीरिक तौर पर अक्षम कहा जाता है वे ही मुझे अक्षमता का एहसास करा रहे हैं.

सोचता हूँ कि क्या बढ़ी हुई तोंद एक तरह की विकलांगता नहीं है? शायद ज़्यादा बुरी विकलांगता है क्योंकि अक्सर इनसान इसके लिए ख़ुद ज़िम्मेदार होता है.

'एबल बॉडीड' यानी स्वस्थ सबल आदमी माना जाता हूँ मगर बीस-तीस मीटर दौड़ना पड़ जाए तो हालत बिगड़ जाती है. दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका के ऑस्कर प्रिस्टोरियस हैं जो घुटने के नीचे, दोनों पैर कटे होने के बावजूद 400 मीटर की दौड़ 45 सेकेंड में पूरी कर लेते हैं.

चीन के तैराक जैंग ताओ ने स्वर्ण पदक जीता है, मगर वे अपने पदक को हाथों से छू नहीं सकते. सीटी बजने पर उनके कोच उनके पेट के नीचे हाथ रखकर उन्हें पानी में उतारते हैं क्योंकि उनके दोनों हाथ कंधे से कटे हुए हैं. एक मैं हूँ जिसे स्विमिंग पूल के गहरे हिस्से में जाने से डर लगता है.

टीवी पर एक साइकिलिस्ट को देख रहा था, वेलोड्रम में साइकिल तेज़ी से चल रही थी, मुझे लगा कि शायद मूक-बधिर साइकिलिस्ट होंगे, जब कैमरे का एंगल बदला तो पता चला कि वे साइकिल एक पैर से चला रहे थे.

सच ये है कि अब से पहले पैरालिंपिक्स पर मैंने ख़ास ध्यान नहीं दिया, यही सोचता था कि उसमें देखने को कुछ ख़ास नहीं होगा, मगर इस बार कुछ ऐसे दृश्य देखे हैं जिन्हें भूलना आसान नहीं होगा.

ये दृश्य मेरे भीतर एक तरह की हीनभावना पैदा करते हैं और ये भी बताते हैं कि समस्या शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक है. हिम्मत और लगन, हाथ-पैर या आँख-कान के मोहताज नहीं.

मन शरीर का 'अंग' नहीं है इसलिए टूटे हुए मन या पस्त हौसले वाले व्यक्ति को विकलांग नहीं कहा जाता, मानसिक सबलता को भी देखा जाए तो, न जाने कितनी बड़ी आबादी विकलांग साबित होगी.

ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि अपंग-विकलांग लोगों का हौसला बढ़ाने वाला साइडशो है पैरालिंपिक्स. किसी भी स्पर्धा को ठीक से देखिए तो आपकी राय बदल जाएगी.

जिन देशों में विकलांग कहे जाने वाले लोगों के प्रति दुर्भावना ज़्यादा दिखाई देती है उन देशों में आवश्यक रूप से पैरालिंपिक्स दिखाया जाना चाहिए ताकि लोग समझ सकें कि इन लोगों को दया नहीं, सम्मान चाहिए.

इस दृष्टि से पैरालिंपिक्स बहुत अच्छा नाम नहीं है, यह सिर्फ़ पैरेलल ओलंपिक नहीं है, इसका नाम 'करेज ओलंपिक' या 'डिटरमिनेशन ओलंपिक' जैसा कुछ होना चाहिए था, यह शारीरिक क्षमता की प्रतियोगिता नहीं है बल्कि मनुष्य के मनोबल का सबसे बड़ा शो है.

सबल शरीर को आदर से झुकाकर, इन एथलीटों के बुलंद जज़्बे को सलाम.

असल में पागल कौन?

मोहम्मद हनीफ़ मोहम्मद हनीफ़ | सोमवार, 03 सितम्बर 2012, 13:04

टिप्पणियाँ (4)

जब भी कोई 14 वर्षीय बच्ची रिम्शा के मानवाधिकारों के बारे में दलीलें देते हुए उसकी मानसिक स्थिति का जिक्र करता है तो मुझे खुद अपनी दिमागी हालत पर संदेह होने लगता है.

पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों की संख्या इतनी कम है कि हममें से ज्यातार कुफ्र के खिलाफ जंग के लिए तो हर वक्त तैयार रहते हैं, लेकिन हममें से बहुत कम ने काफ़िर देखे हैं. शायद इस कमी को पूरा करने के लिए हम अच्छे भले मुसलमानों को भी काफ़िर करार देने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं.

हमने काफ़िर ज्यादातर या तो फिल्मों में देखें हैं या फिर अपनी सड़कों पर झाड़ू देते हुए. हालांकि इसमें भी थोड़ी गलतफ़हमी है क्योंकि जमीन पर कूड़ा इतना बढ़ गया है और नौकरियां इतनी कम है कि अब हज़ारों सफाई कर्मचारी मुसलमान हैं. हम अलबत्ता कलमे के पाबंद इन भाइयों को भी अछूत ही समझते हैं.

तो हमने कभी किसी गैर मुसलमान से सलाम दुआ की हो या ना की हो, लेकिन हमें ये यकीन है कि पाकिस्तान में हर ईसाई, हर हिंदू हर रात को सोने से पहले सोचता है कि कल उठ कर कौन सी ऐसी गुस्ताखी करूं कि सोई हुई उम्मत ए मुसलमान गफ़लत के ख्वाब से जग जाए, क्या ऐसा करूं कि मुहल्ले में रहने वाले मुसलमान मेरे घर पर चढ़ाई कर दें, मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से मेरे खिलाफ फतवे जारी होने लगें. मुझे मेरी अपनी हिफाजत के लिए जेल में डाल दिया जाए.

अगर कोई ऐसा सोचता है कि तो उसकी मानसिक स्थिति संदेह के दायरे में है. और अगर हम उनके बारे में ये सोचते हैं तो हमारी दिमागी हालत का सर्टिफिकेट कौन जारी करेगा.

आपने जिंदगी में कभी काफ़िर देखा हो या न देखा हो, 14 साल के बच्चे तो देखे होंगे. अगर आपके अपने बच्चे नहीं हैं तो बहन भाइयों के होंगे, मुहल्ले में खेलते देखा होगा.

जो खुश नसीब होते हैं, उन्हें सुबह सुबह स्कूल की वर्दी पहने गाडियों और बसों में स्कूल जाते देखा होगा. जो कम नसीब हैं उन्हें चाय के होटलों पर और मोटर वर्कशॉप पर डांट खाते सुना होगा. ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते देखा होगा या फिर अपने से बड़े आकार वाले थैले उठाए कचरे के ढेरों से कचरा उठाते देखा होगा.

क्या कभी इनको देख कर ऐसा लगा कि ये इस्लाम धर्म को नुकसान पहुंचा सकते हैं. खुदा की खुदाई में बाधा डाल सकते हैं या पैगंबर इस्लाम की शान में कोई गुस्ताखी कर सकते हैं. दुनिया के हर धर्म, हर राजनीतिक व्यवस्था और हर दर्शन में बच्चे मासूम समझे जाते हैं.

तो फिर हम इस हाल में कैसे पहुंचे कि 14 साल की रिम्शा को मासूम साबित करने के लिए पहले ये जरूरी है कि उसे मानसिक रोगी साबित किया जाए. जो जज और डॉक्टर साहेबान रिम्शा के 14 वर्षीय दिमाग की खराबी ढूंढ रहे हैं, उन्हें एक नजर हमारे दिमाग पर भी डालनी चाहिए और हमें बताएं कि असल में मानसिक रोगी कौन है.

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