इस विषय के अंतर्गत रखें अगस्त 2012

मनमोहन सिंह का मौन

रेहान फ़ज़ल रेहान फ़ज़ल | बुधवार, 29 अगस्त 2012, 23:58

टिप्पणियाँ (25)

मनमोहन सिंह अच्छी उर्दू जानते हैं. यहाँ तक कि उनके स्वतंत्रता दिवस के भाषण भी उर्दू में लिखे जाते हैं. अपने कई बजट भाषणों में (जब वह वित्त मंत्री थे), उन्होंने कई बार उर्दू के शेर पढ़े हैं. लेकिन कोयला आवंटन के मुद्दे पर उन्होंने बहुत देर से अपनी चुप्पी तोड़ी और वह भी उर्दू के एक लाजवाब शेर के साथ-

"हज़ारों जवाबों से अच्छी है ख़ामोशी मेरी,
न जाने कितने सवालों की आबरू रखे."

राजनैतिक हल्कों में मनमोहन सिंह के शाँत स्वभाव का सम्मान भी किया जाता है और उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है. राजनीतिक विरोधियों पर शाब्दिक बाण चलाने के लिए उन्हे कभी नहीं जाना गया. संसद में भी जब कभी कभार नोकझोंक के मौके आते हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले भी हो रहे होते हैं तब भी वह चुप रहना ही पसंद करते हैं.

गरमागरम बहस में भी उन्हें हस्तक्षेप करते यदाकदा ही देखा गया है. शायद मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे 'चुप्पा' प्रधानमंत्री कहा जाए तो गलत नहीं होगा. उनकी रोबोटनुमा चाल और किसी मुद्दे पर कोई राय न रखने की वजह से अक्सर यह सवाल भी पूछे जाते हैं कि कहीं वह भावनाशून्य इंसान तो नहीं हैं. भारत में अक्सर चुप्पी का मतलब कमजोरी से लगाया जाता है.

मौन रहने वाले व्यक्ति की आम छवि यही बनती है कि उसमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है. एक और प्रधानमंत्री जिन्होंने चुप रहने को एक कला बना दिया था वह थे नरसिम्हा राव. कई मौको पर जब वह कुछ भी बोलना पसंद नहीं करते थे तो अक्सर अपने दोनों होठों को एक खास अंदाज़ में आगे बढ़ा कर 'पाउट' की मुद्रा में गहन चिंतन करते देखे जाते थे. उसकी वजह से उन्हें फ़ैसला लेने का थोड़ा समय भी मिल जाता था और उनके विरोधी भी मुद्दे के प्रति थोड़ा लापरवाह हो जाया करते थे.

नरसिम्हा राव के एक सहयोगी तो यहाँ तक कहा करते थे कि किसी मुद्दे पर कोई फ़ैसला न लेना भी एक फ़ैसला है. भारत में अक्सर प्रधानमंत्री की काबलियत को इस बात से भी आंका जाता है कि वह कितना अच्छा वक्ता है.

प्रणव मुखर्जी ने कई बार स्वीकार किया है कि वह इसलिए प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हो पाए क्योंकि वह हिंदी के अच्छे वक्ता नहीं हैं. इस मापदंड पर भारत के दो पूर्व प्रधानमंत्री पूरी तरह से खरे उतरते हैं - एक तो जवाहरलाल नेहरू और दूसरे अटल बिहारी वाजपेई.

संसदीय परंपराओं के निर्वाह, ज्वलंतशील मुद्दों पर अपनी राय रखने और विरोधियों को भी अपनी बात कह देने में नेहरू का कोई सानी नहीं था. 1957 में जब वाजपेई पहली बार लोक सभा में चुन कर आए थे तो नेहरू उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने ऐलान किया कि एक दिन यह व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बनेगा. लगभग चालीस साल बाद यह बात सच हुई. भारत की राजनीति में आज कितने लोग हैं जो अपने विरोधी के बारे में इतनी ऊँची राय रखते हों, और उससे बढ़ कर उसे सार्वजनिक रूप से कहने की हिम्मत रखते हों.

भाषण देने की कला में अटल बिहारी वाजपेई का कोई सानी नहीं था. भाषण के दौरान एक लंबा ठहराव और फिर एक गूढ़ टिप्पणी या फिर एक मज़ेदार फ़िकरा- इसे वाजपेई से बेहतर कोई नहीं कर सकता था. उनके प्रधानमंत्रित्व काल के आखिरी दिनों में जब लाल कृ्ष्ण आडवाणी का नाम उनके विकल्प के तौर पर लिया जा रहा था तो उन्होंने 'न मैं टायर्ड हूँ और न रिटायर्ड' वाला भाषण दे कर सबको निरुत्तर कर दिया था. लेकिन सिर्फ इस बात पर ही किसी की नेतृत्व क्षमता को नहीं आंका जा सकता कि वह कितना अच्छा वक्ता है. मनमोहन सिंह की 'मौनी बाबा' की अदा को एक बार नजरअंदाज कर भी दिया जाए तब भी उनका राजनीतिक प्राणी न होना और बड़े निर्णय न ले पाना उनके काम में अड़चन जरूर पैदा करता है.

भष्टाचार और घोटालों को बर्दाश्त करने और प्रतिभावान लोगों को आगे न ला पाने की कमजोरी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है. सोनिया गाँधी के साथ सत्ता में भागीदार होने की मजबूरी ने न सिर्फ उनके हाथ बाँध दिए हैं बल्कि कहीं-कहीं यह आभास भी दिया है कि पार्टी नेतृ्त्व के खिलाफ जाने की न तो उनमें इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता.

मिल गई मिल गई...

अविनाश दत्त अविनाश दत्त | शुक्रवार, 24 अगस्त 2012, 11:33

टिप्पणियाँ (13)

कहते हैं ना भगवान् के यहाँ देर है अंधेर नहीं. मुझे आज समझ में आया जब अखबार पढ़ा.

अखबारों को यूँ ही कोई ज्ञान का पुलिंदा, दुनिया की कुंडली और भविष्य का द्वार नहीं कहते.धन्य है उस दिन को जिस दिन मैंने अखबार पढ़ना सीखा.

दरअसल आज अखबार पढ़ा तो ख़बर मिली की बीसीसीआई ने एक निजी कंपनी को चमकाया है क्योंकि उसने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों का इस्तेमाल बुरे ढंग से अपने एक विज्ञापन में किया था.

मामला यह था कि राशन बेचने की एक नई कंपनी आई है उसने अपना गल्ला बेचने के लिए भारतीय खिलाड़ियों से बड़ी नौटंकी कराई थी. क्रिकेट के भगवान् मरघट की मटकी लिए चक्कर काट रहे थे. क्रिकेट के हनुमान व्हीलचेयर को लोगों की झोलियों से बदल रहे थे. क्रिकेट के राजकुमार स्ट्रेचर के साथ लोगों को डरा रहे थे की हमें पैसे देने वाली दुकान का सामान नहीं लिया तो बेटेराम यही होगा तुम्हारे साथ.

बुरी बात थी. लेकिन कहते हैं अच्छाई बुराई की कोख से निकलती है.

सो कई भले मानुसों की तरह बीसीसीआई को भी यह नागवार गुजरा और उसने तय किया कि अब वो और बर्दाश्त नहीं करेगें आखिर नाक का सवाल है, छवि का सवाल है क्रिकेट की, बीसीसीआई की.

जी हाँ वही नाक जिसके बारे में टी-20 वर्ल्ड कप और वीवीएस लक्ष्मण के संन्यास के समय दुरपिटे मुहँ लोग कहते थे कि बीसीसीआई ने अपनी नाक दफ़न कर दी है उनके मुहों पर बीसीसीआई ने मिट्टी मल दी.

बीसीसीआई ने कंपनी को झाड़ा है कहा है अपना इश्तेहार सुधारों.

वाह वाह वाह...बीसीसीआई को अपनी खोई हुई नाक ठीक उसी तरह मिल गई जैसे रामानंद सागर के राम को सीता, हिंदी फिल्मों की सीता को गीता और बीआर चोपड़ा की गीता को कृष्ण मिल गए थे.

अब बीसीसीआई यहाँ नहीं रुकेगी वो छोटे झूठे लांछन लगाने वाले लोगों का मुहँ बंद करने के लिए अपने एक लाड़ले खिलाड़ी को कहेगी कि ऐसी किसी कंपनी का मकान ना बेचो जो ग्राहकों को समय और सही गुणवत्ता वाले आशियाने नहीं देती.

वो अपने एक दूसरे नटखट खिलाड़ी को कहेगी की शराब का विज्ञापन बंद करो और जाओ पद्मश्री लेने. वो अपने तीसरे देवता को कहेगी कि ओये चिरकुट भगवान जी अब ज़मीन पर उतरो और अपनी विदेशी कार पर टेक्स की चोरी करने के 50 बहानों वाली किताब लिखना बंद करो.

वो जल्द ही खेल मंत्री को फटकारेगी और कहेगी कि बकवास बंद मैं आरटीआई के तहत केवल अब जानकारी ही नहीं दूंगी बल्कि अपना सारा हिसाब किताब इंटरनेट पर सार्वजनिक कर दूंगी.

अब से मेरे सारे काम महात्मा गाँधी के जीवन की तरह खुली किताब में दर्ज किए जायेगें. ऐसी किताब जिसे कोई अनपढ़ भी पढ़ सके और जिन पर गूंगे भी टिपण्णी कर सकें.

अब मैं किसी भी स्टेडियम का नाम किसी आदमी के नाम पर महज़ इसलिए नहीं रख दूंगी जिसने बहुत खर्चा किया हो मेरे लिए.

बस इंतज़ार करो ऐसा ही होने वाला है. कोई यह कहने की जुर्रत ना करना कि बीसीसीआई और राशन की दुकान वाले में खटपट हो गई थी बस इसलिए यह सब हो रहा है और आगे जब सब ठीक हो जाएगा तो तो खिलाड़ी पहले आईपीएल के चीयर लीडरों की तरह झूम झूम के पैसे की ताल पर लटके झटके दिखा सकेगें.

कोयला तो कोयला है...

सुशील झा सुशील झा | सोमवार, 20 अगस्त 2012, 12:15

टिप्पणियाँ (20)

बचपन की अधमुंदी आंखों से अभी भी याद है कि घर में कोयला प्लास्टिक के छोटे से बोरे में आता था.

एक चूल्हा हुआ करता था लोहे और मिट्टी का बना हुआ जिसमें लकड़ी और कोयला डाल कर हवा करने पर आग जलती थी. कोयला गोल नहीं होता था. उसका मुंह हम लोगों जैसा ही था. टेढ़ा मेढ़ा बिना किसी आकार का.

जब कोयला जलता तो उसमें से सफेद धुआं उठता और उस धुएं से आंख जलती थी. उस धुएं में हम परियां बनाते और सोचते बड़े होने पर इन परियों से शादी करेंगे.

रात में जलते लाल कोयले पर रोटियां फूल जाया करती थीं. रोटी का वो स्वाद हीटर औऱ गैस पर बनी रोटियों में कभी नहीं आया. सर्द रातों में ये चूल्हा बड़ा काम आता गर्माहट के लिए, कोयला एक बार जलता है तो देर लगती है बुझने में उसे.

कोयले के बोरे में कोयला टकराकर चूरा बन जाता था. मां उस चूरे में भूसी मिलाकर एक पेस्ट जैसा कुछ बनाती और फिर उस पेस्ट से पकोड़े जैसी चीज़ बनती थी. उन काले पकोड़ों को धूप में सुखाकर फिर से कोयले की तरह इस्तेमाल किया जाता था. कोयले का कण-कण काम आता था.

कोयले की कालिख से हम डरते भी नहीं थे क्योंकि वो कालिख हमारे काले बदन पर दिखती नहीं थी. बचपन में एक फिल्म आई थी जिसमें अमिताभ बच्चन कोयला मज़दूर थे. उसके बाद से हमारे पिताजी हमारे लिए अमिताभ बच्चन हो गए थे.

फिर हीटर आया, गैस आई, कोयला छूटा, शहर छूटा और हम शहर में कोशिश करने लगे अपने देह की कालिख छुड़ाने की. हमें क्या पता था कि कोयला उड़ कर राजधानी तक आता है लेकिन बारह सौ किलोमीटर की दूरी तय करने में कोयले का रंग सफेद हो जाता है.

लुटयन की गलियों और नरीमन प्वाइंट पर पहुंचते ही कोयले का रंग बदला-सा लगता है. हमारे लिए कोयला काला था. राजपथ और नरीमन प्वाइंट पर कोयले का रंग झक सफेद. यहां कोयले से लोग न तो रोटी बनाते थे और न ही उसका धुआं देखकर उनके बच्चे नाचते हैं.

यहां कोयले का धुआं फेरारी और मर्सिडीज़ की शक्ल में उड़ता है. पांच सितारा होटलों में बड़े-बड़े सम्मेलनों में कोयले का नाम कोल हो जाता है और इस पर जब रोटियां सेंकी जाती है तो उसे राजनीतिक रोटी कहते हैं.

मुझे बदला हुआ कोयला अच्छा नहीं लगता. मेरा काला कोयला ठीक था. यहां कोयले का सफेद रंग आंखों में चुभता है. कोई कोयले का नाम भ्रष्टाचार और घोटाले से जोड़े तो मेरा दिल कटता है. कोयला मेरे बचपन का खिलौना है. मेरे बाप की मेहनत है. मेरे मुंह का पहला निवाला है और मेरी मां की मांग का सिंदूर रहा है.

कोयला बदनाम हो ये मुझे गवारा नहीं होता लेकिन मैं क्या कर सकता हूं.

हम तो कोयले के साथ काले हो गए. जो ताकतवर थे उन्होंने कोयले को अपने साथ सफेद करने की कोशिश की लेकिन कोयला तो कोयला है......कोयले की दलाली में मुंह काला ही हो सकता है सफेद नहीं रह सकता.

कहाँ गए पाकिस्तान के अल्पसंख्यक

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | बुधवार, 15 अगस्त 2012, 13:54

टिप्पणियाँ (14)

पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे.

मगर आज पाकिस्तान के 18 करोड़ नागरिकों में गैर-मुसलमानों की सूची में अहमदी समुदाय को शामिल कर लिए जाने के बावजूद वहां गैर-मुसलमानों की संख्या पांच प्रतिशत से घट कर लगभग साढ़े तीन प्रतिशत रह गई है.

आखिर ऐसा कैसे और क्यों हुआ? कहा जाता है 1947 में कराची और पेशावर में लगभग डेढ़ हजार यहूदी बसा करते थे. ये पाकिस्तानी यहूदी अगले पांच सालों में वापस इसराइल चले गए.

विभाजन के समय कराची और लाहौर में दस हजार से अधिक पारसी मौजूद थे जबकि आज लाहौर में पैंतालीस पारसी भी नहीं बचे हैं. कराची में अगर कुछ पारसी बचे हुए हैं भी तो उनकी उम्र साठ साल से ऊपर की है.

पारसी समुदाय की नई पीढ़ी यहां पल-पल बदल रही स्थानीय परिस्थितियों के कारण देश छोड़कर यूरोप और अमरीका जा चुकी है.

19वीं सदी में गोवा से कराची में आकर रहने वाले रोमन कैथोलिक गोआनीज की आबादी विभाजन के समय 20 हजार से अधिक थी.

ये लोग शिक्षा, दफ्तरी काम-काज, संगीत और खाना पकाने के विशेषज्ञ थे.

हर दिन शाम को गोआ से आई सैकड़ों महिलाएं और पुरुष राष्ट्रपति क्षेत्र में शांति से टहला करते थे. लेकिन 65 सालों में कराची में रहने वाली इस आबादी की संख्या 20 से 40 हज़ार होने के बजाय 10 हजार हो गई.

और इन 10 हजार लोगों की आबादी भी कराची में इस वक़्त है ये कोई नहीं जानता.

हालांकि पाकिस्तान में डिजिटल रूप से हिंदू देश के सबसे बड़े ग़ैर मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, लेकिन हिंदूओं की तुलना में सिखों को पाकिस्तान के मुसलमान समाज ने ज्यादा गर्मजोशी से अपनाया है.

एक सिख नागरिक के साथ पाकिस्तान का एक आम स्थानीय मुसलमान का व्यवहार रुचिकर और उत्सुकता पैदा करने वाला होता है.

हालांकि दो साल पहले ख़ैबर इलाके में तालेबान द्वारा चार स्थानीय सिखों के अपहरण और उनमें से दो के सिर कलम किए जाने की घटना के बाद लगभग 20 हज़ार पाकिस्तानी सिखों में सरगर्मी फैल गई थी.

लेकिन पाकिस्तानी सिखों की संपत्ति पर बहुसंख्यक आबादी द्वारा यदा-कदा कब्ज़ा करने की घटनाओं के अलावा यहाँ आमतौर पर कोई और शिकायत नहीं लगती.

पाकिस्तान में सिखों की ज़्यादातर आबादी खै़बर पख्तूनख्वाह़ प्रांत और ननकाना साहिब में रहती है.

अधिकांश सिखों का परिवार यहां खेतीबाड़ी और व्यापार के काम में मगन है. इनमें से कुछ तो मीडिया के पोस्टर बॉयज भी हैं.

यहां जब भी किसी चैनल पर धार्मिक सहिष्णुता पर वीडियो रिपोर्ट बनाई जाती है तो निर्माता की पूरी कोशिश होती है कि इस वीडियो में पंजाब विधानसभा के सदस्य कल्याण सिंह कल्याण या लाहौर यातायात पुलिस के पहले सिख वार्डन गुलाब सिंह का कोई फुटेज दिखाया जाए.

इसके अलावला पंजाबी पॉप गायिका जस्सी-लाइल-पुरी की संगीत एलबम का भी कोई क्लिप डालने की पूरी कोशिश होती है.

पाकिस्तान में जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से हिंदूओं की संख्या लगभग 30 लाख और पाकिस्तान हिंदू परिषद के अनुसार 70 लाख है.

बहरहाल संख्या जो भी हो पाकिस्तान में रह रहे 94 प्रतिशत हिंदू सिंध में बसते हैं.

विभाजन के बाद से अब तक पाकिस्तानी हिंदू समुदाय कम से कम चार-बार ये सोचने पर मजबूर हुआ कि वे पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या नहीं.

1965 की लड़ाई के दौरान कम से कम 10 हजार के लगभग हिंदूओं की आबादी अपनी संपत्ति छोड़कर भारत चली गई थी.

1971 के युद्ध के दौरान और बाद लगभग नब्बे हजार हिंदू राजस्थान के शिविरों में चले गए. ये लोग थरपारकर इलाके थे जिस पर भारतीय फौज का कब्जा हो गया था.1978 तक उन्हें शिविरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी.

इनमें से बहुत से पाकिस्तान लौटना चाहते थे. बाद में भुट्टो सरकार ने इलाका वापस ले लिया लेकिन सरकार ने लोगों को वापस लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई.

फिर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पाकिस्तान में जो प्रतिक्रिया हुई उसके परिणाम में अगले पांच साल के दौरान लगभग सत्रह हजार पाकिस्तानी हिंदू भारत चले गए.

इस बार अधिकांश पलायन करने वालों का संबंध पंजाब से था. 1965 और 1971 में पाकिस्तान से जाने वाले हिंदूओं को आख़िरकार दो हजार चार में भारतीय नागरिकता मिल गई लेकिन बाबरी मस्जिद की प्रतिक्रिया के बाद जाने वाले पाकिस्तानी हिंदूओं को अब तक नागरिकता नहीं मिल सकी है.

आज भी लगभग एक हज़ार हिंदू परिवार पाकिस्तानी पासपोर्ट पर रह रहे हैं और नागरिकता की मांग कर रहे हैं.

अब एक बार फिर उत्तरी सिंध में अपहरण की बढ़ती घटनाओं, संपत्तियों पर कब्जे, धार्मिक चरमपंथ और हिंदू लड़कियों के इस्लाम अपनाने ने हिंदू समुदाय को भयभीत कर दिया है.

जहां तक ​​हिंदूओं के बाद पाकिस्तान की दूसरी बड़ी अल्पसंख्यक यानी ईसाइयों का मामला है तो सरकारी अनुमान के अनुसार लगभग पौने दो प्रतिशत पाकिस्तानी नागरिक ईसाई हैं.

पाकिस्तान क्रिसचियन कांग्रेस नामक संगठन के प्रमुख नज़ीर भट्टी ने तीन दिन पहले लगभग ढाई सौ हिंदूओं की भारत प्रस्थान पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि वह तो भारत जा सकते हैं. हम कहां जाएंगे.


कहाँ गए पाकिस्तान के अल्पसंख्यक

वुसतुल्लाह ख़ान वुसतुल्लाह ख़ान | बुधवार, 15 अगस्त 2012, 13:54

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पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे.

मगर आज पाकिस्तान के 18 करोड़ नागरिकों में गैर-मुसलमानों की सूची में अहमदी समुदाय को शामिल कर लिए जाने के बावजूद वहां गैर-मुसलमानों की संख्या पांच प्रतिशत से घट कर लगभग साढ़े तीन प्रतिशत रह गई है.

आखिर ऐसा कैसे और क्यों हुआ? कहा जाता है 1947 में कराची और पेशावर में लगभग डेढ़ हजार यहूदी बसा करते थे. ये पाकिस्तानी यहूदी अगले पांच सालों में वापस इसराइल चले गए.

विभाजन के समय कराची और लाहौर में दस हजार से अधिक पारसी मौजूद थे जबकि आज लाहौर में पैंतालीस पारसी भी नहीं बचे हैं. कराची में अगर कुछ पारसी बचे हुए हैं भी तो उनकी उम्र साठ साल से ऊपर की है.

पारसी समुदाय की नई पीढ़ी यहां पल-पल बदल रही स्थानीय परिस्थितियों के कारण देश छोड़कर यूरोप और अमरीका जा चुकी है.

19वीं सदी में गोवा से कराची में आकर रहने वाले रोमन कैथोलिक गोआनीज की आबादी विभाजन के समय 20 हजार से अधिक थी.

ये लोग शिक्षा, दफ्तरी काम-काज, संगीत और खाना पकाने के विशेषज्ञ थे.

हर दिन शाम को गोआ से आई सैकड़ों महिलाएं और पुरुष राष्ट्रपति क्षेत्र में शांति से टहला करते थे. लेकिन 65 सालों में कराची में रहने वाली इस आबादी की संख्या 20 से 40 हज़ार होने के बजाय 10 हजार हो गई.

और इन 10 हजार लोगों की आबादी भी कराची में इस वक़्त है ये कोई नहीं जानता.

हालांकि पाकिस्तान में डिजिटल रूप से हिंदू देश के सबसे बड़े ग़ैर मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, लेकिन हिंदूओं की तुलना में सिखों को पाकिस्तान के मुसलमान समाज ने ज्यादा गर्मजोशी से अपनाया है.

एक सिख नागरिक के साथ पाकिस्तान का एक आम स्थानीय मुसलमान का व्यवहार रुचिकर और उत्सुकता पैदा करने वाला होता है.

हालांकि दो साल पहले ख़ैबर इलाके में तालेबान द्वारा चार स्थानीय सिखों के अपहरण और उनमें से दो के सिर कलम किए जाने की घटना के बाद लगभग 20 हज़ार पाकिस्तानी सिखों में सरगर्मी फैल गई थी.

लेकिन पाकिस्तानी सिखों की संपत्ति पर बहुसंख्यक आबादी द्वारा यदा-कदा कब्ज़ा करने की घटनाओं के अलावा यहाँ आमतौर पर कोई और शिकायत नहीं लगती.

पाकिस्तान में सिखों की ज़्यादातर आबादी खै़बर पख्तूनख्वाह़ प्रांत और ननकाना साहिब में रहती है.

अधिकांश सिखों का परिवार यहां खेतीबाड़ी और व्यापार के काम में मगन है. इनमें से कुछ तो मीडिया के पोस्टर बॉयज भी हैं.

यहां जब भी किसी चैनल पर धार्मिक सहिष्णुता पर वीडियो रिपोर्ट बनाई जाती है तो निर्माता की पूरी कोशिश होती है कि इस वीडियो में पंजाब विधानसभा के सदस्य कल्याण सिंह कल्याण या लाहौर यातायात पुलिस के पहले सिख वार्डन गुलाब सिंह का कोई फुटेज दिखाया जाए.

इसके अलावला पंजाबी पॉप गायिका जस्सी-लाइल-पुरी की संगीत एलबम का भी कोई क्लिप डालने की पूरी कोशिश होती है.

पाकिस्तान में जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से हिंदूओं की संख्या लगभग 30 लाख और पाकिस्तान हिंदू परिषद के अनुसार 70 लाख है.

बहरहाल संख्या जो भी हो पाकिस्तान में रह रहे 94 प्रतिशत हिंदू सिंध में बसते हैं.

विभाजन के बाद से अब तक पाकिस्तानी हिंदू समुदाय कम से कम चार-बार ये सोचने पर मजबूर हुआ कि वे पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या नहीं.

1965 की लड़ाई के दौरान कम से कम 10 हजार के लगभग हिंदूओं की आबादी अपनी संपत्ति छोड़कर भारत चली गई थी.

1971 के युद्ध के दौरान और बाद लगभग नब्बे हजार हिंदू राजस्थान के शिविरों में चले गए. ये लोग थरपारकर इलाके थे जिस पर भारतीय फौज का कब्जा हो गया था.1978 तक उन्हें शिविरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी.

इनमें से बहुत से पाकिस्तान लौटना चाहते थे. बाद में भुट्टो सरकार ने इलाका वापस ले लिया लेकिन सरकार ने लोगों को वापस लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई.

फिर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद पाकिस्तान में जो प्रतिक्रिया हुई उसके परिणाम में अगले पांच साल के दौरान लगभग सत्रह हजार पाकिस्तानी हिंदू भारत चले गए.

इस बार अधिकांश पलायन करने वालों का संबंध पंजाब से था. 1965 और 1971 में पाकिस्तान से जाने वाले हिंदूओं को आख़िरकार दो हजार चार में भारतीय नागरिकता मिल गई लेकिन बाबरी मस्जिद की प्रतिक्रिया के बाद जाने वाले पाकिस्तानी हिंदूओं को अब तक नागरिकता नहीं मिल सकी है.

आज भी लगभग एक हज़ार हिंदू परिवार पाकिस्तानी पासपोर्ट पर रह रहे हैं और नागरिकता की मांग कर रहे हैं.

अब एक बार फिर उत्तरी सिंध में अपहरण की बढ़ती घटनाओं, संपत्तियों पर कब्जे, धार्मिक चरमपंथ और हिंदू लड़कियों के इस्लाम अपनाने ने हिंदू समुदाय को भयभीत कर दिया है.

जहां तक ​​हिंदूओं के बाद पाकिस्तान की दूसरी बड़ी अल्पसंख्यक यानी ईसाइयों का मामला है तो सरकारी अनुमान के अनुसार लगभग पौने दो प्रतिशत पाकिस्तानी नागरिक ईसाई हैं.

पाकिस्तान क्रिसचियन कांग्रेस नामक संगठन के प्रमुख नज़ीर भट्टी ने तीन दिन पहले लगभग ढाई सौ हिंदूओं की भारत प्रस्थान पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि वह तो भारत जा सकते हैं. हम कहां जाएंगे.


मिस्ड कॉल की राजनीति

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | शुक्रवार, 10 अगस्त 2012, 22:13

टिप्पणियाँ (7)

आचार्य ने चहककर कहा, "सुना तुमने, सरकार अब हर ग़रीब को मुफ़्त मोबाइल देगी."

पलटकर कृपाचार्य ने पूछा, "हाँ, सुना तो, लेकिन इससे क्या होगा?"

आचार्य ने थोड़ा तमककर कहा, "अरे दिन फिर जाएँगे उनके, तुम तो निराशावादी ही हो गए हो."

दोनों की बातचीत आगे चल निकली.

"निराशावादी तो नहीं हुआ हूँ लेकिन इसका मतलब समझ में नहीं आया."

"अरे, सोचो, फ़ोन होगा तो ग़रीब क्या-क्या नहीं कर सकेंगे."

कृपाचार्य थोड़ी देर चुप रहे, फिर कहा, "बात तो सही है, वह मौसम विभाग से फ़ोन करके पूछ सकेगा कि साहब, आपने तो कहा था समय पर पूरी बारिश होगी, लेकिन ये बादल कहाँ गए. फिर कृषि मंत्री को फ़ोन करके पूछ सकेगा कि साहब, सूखा कब घोषित कर रहे हो?"

आचार्य कुछ कहते इससे पहले कृपाचार्य ने फिर बातचीत का सिरा थाम लिया.

"हाँ, वो मनरेगा के अफसर से पूछेगा कि साहब जी, पिछले काम का पैसा आठ महीनों से मिला नहीं, कोई उम्मीद है या नहीं? फिर वो सरपंच से पूछेगा कि पिछली बार हमारी बीबी और बेटे के नाम से पता नहीं किसे काम दिया था, इस बार जो भी लेना देना हो पहले कर लो लेकिन दोनों का नाम मस्टर रोल में चढ़ाओ तो काम भी दे देना."

"वो राशन वाले को फ़ोन करके कह सकेगा कि भैया वो दो रुपए किलो वाला चावल तीन महीनों से आया ही नहीं, बीडीओ दफ़्तर तो कहता है कि हर महीने का कोटा जा रहा है. तो हम तक कब पहुंच सकेगा ये अनाज?"

"बच्चा बीमार पड़ेगा तो किसी पाँच सितारा अस्पताल में फोन करके उसके लिए बिस्तर बुक करवा सकेगा."

"हां, वो योजना आयोग के उपाध्यक्ष को फ़ोन करके कह सकेगा कि साहब 26 रुपए रोज़ से ज़्यादा कमा रहे हैं फिर भी गरीब के गरीब हैं, कोई तरकीब बता दो तो हम भी इस जंजाल से छूट जाएँ."

आचार्य और कृपाचार्य की बातचीत चल ही रही थी कि एक रुदन सा व्याप गया.

दोनों ने झाँककर देखा कि भंग हो गई टीम अन्ना के कुछ सदस्य समर्थकों से गले मिलकर रो रहे हैं. एक सद्स्य ने दूसरे से कहा, "सरकार कितनी षडयंत्रकारी है. पहले ग़रीबों को मोबाइल दिया होता तो हम उन्हें भी एसएमएस करके आंदोलन में बुलाते. किसान आते, ग़रीब आते तो दृश्य ही बदल जाता. अन्ना अकेले बेचारे से नहीं दिखते, ढेर सारे बेचारे हो जाते. और फिर जब हम पूछते कि राजनीति करें या न करें तो करोड़ों ग़रीब हमें एसएमएस करके बताते कि भैया, और कोई चारा तो दिख नहीं रहा है, अब ये भी आजमा लो."

एक दूसरे सदस्य ने कहा, "अगर ज़्यादा भीड़ आती तो अन्ना कुछ दिन और अनशन कर लेते या ज़्यादा मैसेज आते तो अन्ना शायद टीम को भंग भी न करते."

आचार्य और कृपाचार्य एक दूसरे का मुंह ताकने लगे थे कि रामलीला मैदान की ओर से शोर शराबा सुनाई पड़ने लगा.

सुना कि फ़र्ज़ीवाड़ा करने के आरोप में जेल चले गए अपने सखा बालकृष्ण को शहीदों के साथ खड़ा करके बाबा रुपी रामदेव हुंकार रहे हैं.

आचार्य और कृपाचार्य ने देखा कि वे इस बार भगवा ही पहने थे, किसी महिला का सफ़ेद सूट नहीं. पिछली बार चार दिन में अस्पताल पहुँचने से सबक लेकर उन्होंने तीन ही दिन का अनशन रखा था.

दस सीढ़ियाँ चढ़कर मंच पर चढ़कर हाँफ़ रहे योग गुरू ग़रीबों को मोबाइल देने की सरकार की घोषणा से ही हकबकाए हुए हैं. वे कह रहे थे, "अगर आप सरकार से काला धन वापस मंगवाना चाहते हो तो हमें मिस्ड कॉल लगाओ."

कृपाचार्य ने कहा, "पिछले साल जून में इसकी एक कॉल सरकार के मोबाइल पर मिस्ड कॉल रह गई थी. इस साल टीम अन्ना की कॉल मिस्ड कॉल रह गई. तो इन्होंने ख़ुद मिस्ड कॉल को फ़ॉर्मूला बना लिया है."

हमारे एक मित्र ने आचार्य और कृपाचार्य के संवाद के बीच में कहा, "यह देश मिस्ड कॉल के ही काल में रह रहा है. अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक सब मिस्ड कॉल से चल रही है. अब बाबा मिस्ड कॉल की अपेक्षा कर रहे हैं तो आपत्ति क्यों?"

एक बार ग़रीबों को फ़ोन मिल जाने दीजिए, फिर देखिएगा, हर पाँच साल बाद चुनाव आयोग भी कहेगा, "अपना मत डालने के लिए फलाँ, फलाँ नंबर पर मिस्ड कॉल डालिए."

चुनाव परिणाम आपके मोबाइल पर मिस्ड कॉल से बताए जाएँगे.

आम आदमी की कौन सुने

सुशील झा सुशील झा | शुक्रवार, 03 अगस्त 2012, 17:09

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मैंने अन्ना के आंदोलन का कभी समर्थन नहीं किया. आलोचना करता रहा हूं. लेकिन आज लगता है कि कहीं कुछ टूट गया है. कहीं कुछ छूट सा गया है.

जिसका डर था शायद आज वही हुआ है. जिस राजनीति को गालियां दी जा रही थी वही करने की घोषणा हो चुकी है तो फिर लोग ठगे हुए से क्यों न महसूस करें.

असल में आम आदमी कभी अन्ना या आंदोलन के साथ नहीं था. वो हमेशा भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ था और उसे लगता था कि अन्ना के नाम की टोपी लगा लेने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.

मुझे पूरी सहानुभूति है उन लोगों से जो समझते थे कि जंतर मंतर पर अनशन करने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा...उन लोगों से भी जिन्हें लगता था कि भारत माता की जय बोलने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा.......जो अन्ना के सामने हाथ जोड़ कर ऐसे सर झुका रहे थे मानो वो अन्ना नहीं भगवान का अवतार हों...और सर झुकाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा......मुझे उन सभी लोगों से भी सहानुभूति है जो वोट करने नहीं निकले थे लेकिन जंतर मंतर पर आए थे क्योंकि उन्हें आंदोलन से एक उम्मीद जगी थी......इस उम्मीद से मेरी सहानुभूति है..

कई लोगों को लगता है कि अन्ना की टीम ने इस उम्मीद के साथ दगा किया है. कई लोगों को लगता है कि ये एक विश्वासघात है और लोगों को मझधार में छोड़ दिया गया.

रामलीला मैदान में जहां साफ साफ कहा गया कि राजनीति के मैदान में उतरना उद्देश्य नहीं है आंदोलन का. मुझे याद है कि आम जनता ने किस उत्साह से समर्थन दिया था.

कहां तो बात हुई थी कि ये आज़ादी का दूसरा आंदोलन होगा. अगस्त क्रांति यही कहा था न अन्ना ने. कहां बात हुई थी व्यवस्था बदल देने की और आज लगता है अन्ना खुद बदल गए.

आज अन्ना और उनके साथी भी उसी जमात में खड़े होने को चल दिए, जिस जमात को गालियां देते अन्ना टीम की जुबान नहीं थकती थी

वो तालियों की गड़गड़ाहट, वो भारत माता के जयकारे, वो तिरंगे का हिलाना, वो जनता का जुनून और वो टीवी वालों की चीखो पुकार. मुझे तो नहीं लेकिन आम जनता को लगा था कि कुछ तो बदलेगा.


लोग गांवों से पैदल चल कर आए थे आपका समर्थन करने. भूखे प्यासे लोगों ने आपके साथ अनशन भी किया था.

लेकिन फिर क्या हो गया. साल भर में ही ऐसा क्या हो गया कि अन्ना भी उनके साथ ही खड़े होने को राज़ी हो गए. माना कि नेता लोगों के पास पैसे हैं गाड़ी है लेकिन कहते हैं कि अन्ना को तो कुछ नहीं चाहिए.

तो क्या अन्ना के साथ के लोगों को कुछ चाहिए. आम लोगों को भ्रष्टाचार के बिना जीवन चाहिए.

लेकिन शायद गलती आम जनता की थी. वो शायद ये भूल गया था कि आम आदमी आखिरकार आम आदमी ही है और आम आदमी की बात नेता क्या टीम अन्ना भी नहीं सुनती.


मैं मानता हूं कि ये आने वाले दिनों में किसी भी जनांदोलन के लिए एक बड़ा धक्का है. चाहे जो भी हो कम से कम अन्ना के नाम पर लोग अपने घरों से निकले थे. लोगों ने ईमानदार होने की एक छोटी सी कोशिश की भी होगी अपने अपने स्तर पर.

अब वो शायद कभी किसी पर विश्वास न करें और मान लें कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. मैं नहीं मानूंगा कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. मैं अपने स्तर पर जो संभव है करुंगा. मैं अपना अन्ना खुद बनूंगा और ईमानदार रहने की हर कोशिश करुंगा.

शायद अब यही एकमात्र रास्ता बचा है हर आम आदमी के लिए कि वो उसके अधिकारों के लिए किसी दूसरे का मुंह देखना बंद कर करे और खुद अपनी राह तय करे.

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