इस विषय के अंतर्गत रखें जून 2012

परिवार में दरार....

कहते हैं यात्रा शिक्षा का बड़ा माध्यम होती है. यात्रा के दौरान मिलने-जुलने के क्रम में आप काफी कुछ देखते हैं, सीखते हैं और समझते हैं. सौ फीसदी सच.

इस गर्मी की छुट्टी में घर जाते समय टुकड़ों-टुकड़ों में कई शहरों की यात्रा की. ट्रेन से, बस से और टैक्सी से भी. अनजान भी मिले और कुछ जान-पहचान वाले भी.

पुराने मित्र भी मिले और नए भी. कुछ नए रिश्ते बने, तो कुछ रिश्तों पर जमीं गर्द को हटाकर उन्हें तरोताजा करने की कोशिश भी हुई.

लेकिन इन सबके बीच जिन कुछ कटु सच्चाइयों ने दिल को थोड़ा हैरान-परेशान और लाचार कर दिया, जब कई परिवारों को टूटते देखा.

पता चला एक पुराने सहपाठी ने अपने बूढ़े माँ-बाप को अपने से अलग कर दिया है. उसके माँ-बाप जब किसी परिचित से मिलते हैं, तो उनका रुदन रुकता नहीं.

एक मित्र के पास गया, तो तीनमंजिला इमारत वाली घर में पारिवारिक गठबंधन में इतनी दरारें दिखीं, तो वहाँ से निकल गया.

एक परिचित अपने भाई की बात आने पर कुछ यूँ बोले- तीन साल से घर नहीं आया. माँ-बाप की फिक्र भी नहीं है उसे. जब से शादी हुई है, अपनी नई जिंदगी में ऐसे रमा है कि माँ-बाप भूली-बिसरी कहानी हो गए हैं.

ट्रेन में एक अधेड़ महिला से सामना हुआ. पता चला भाई ने आम खाने के लिए बुलाया है. बातचीत का क्रम चला तो परिवार की बात छिड़ी. लेकिन बहुओं पर बात आकर रुक गई. उन्होंने बहुत कोशिश की ये बताने की कि उन्हें आजकल की बहुओं से ऐतराज है.

लेकिन उनके चेहरे की शिकन बता रही थी कि सब कुछ ठीक नहीं है. दिल्ली में भी कई बार ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं. एक दिन टीवी पर एक बूढ़ी माँ को रोते देखा. पता चला बेटे ने संपत्ति के विवाद के कारण माँ को घर में घुसने नहीं दिया. माँ घर के बाहर बैठकर रोए जा रही है.

बात ये नहीं कि माँ-बाप गलत है या बेटे-बहू. अलग-अलग परिस्थितियों के सच अलग-अलग हो सकते हैं. लेकिन एक बात तो तय है कि आधुनीकिकरण की दौड़ में पारिवारिक रिश्ते गौड़ होने लगे हैं.

हर कोई अपनी अलग दुनिया बनाना चाहता है. अच्छा है. लेकिन रिश्तों की गर्माहट बनी रहे, इसका ख्याल तो उन्हें रखना ही चाहिए. अपना घर और अपनी दुनिया अपने बीवी-बच्चों के आसपास बनाने की होड़ ऐसी है कि अपने माँ-बाप दूर बैठे सिसकते रहते हैं. ऐसी आधुनिकता से क्या फायदा?

झारखंड का विकास

सुशील झा सुशील झा | शनिवार, 23 जून 2012, 13:46

टिप्पणियाँ (25)

झारखंड में विकास जोरों पर है. इसका पता झारखंड जाने वाली ट्रेन में ही लग जाता है. अधिकतर जवान..लेकिन तोंद निकली हुई. छोटे बच्चों से बोगी भरी हुई है. कोई ठेकेदारी करता है तो कोई ट्रकों का धंधा. कोई कोयले की दलाली में है तो कोई सूदखोरी में. सच में विकास जोरों पर है.

मोबाइल फोन पर लगातार बजते हुए गाने साबित करते हैं कि रांची के बच्चे भी छम्मक छल्लो और रा वन से आगे निकल कर रिहाना और लेडी गागा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन हिंदी की चार पंक्तियां भी सही सही बोल लें वही बहुत है.

सत्यमेव जयते का फैन क्लब यहां भी है. लोग रिकार्ड कर के लैपटॉप पर आमिर से ज्ञान ले रहे हैं. दहेज पर. दहेज में लैपटॉप भी मिलता है ऐसा बिहार झारखंड के लोग कहते हैं. दहेज के लैपटॉप पर आमिर का ज्ञान कितना अच्छा लगता है. बोलने में अच्छा लगता है दहेज नहीं लेना चाहिए लेकिन लेने में बुरा किसी को नहीं लगता. दहेज नहीं वो तो विवाह खर्च होता है. बड़े घर में शादियां ऐसे ही होती है. सच में विकास जोरों पर है.

लैपटॉप पर फिल्में चल रही है. कुछ दिन पहले रिलीज हुई इश्कजादे. कोई फोन पर कह रहा है. हमारा पैसा क्यों नहीं दिए. कल आके ठोक देंगे तो ठीक लगेगा. बढ़ी तोंद वाला यह जवान ठेका पाने की खुशी में दारु-मुर्गा का न्योता भी दे चुका है. मसूरी से लौटता यह दंपत्ति दुखी है कि मसूरी में गर्मी थी और गुस्से में कि मसूरी से आगे कुछ देखने के लिए ही नहीं था. मसूरी में गर्मी की छुट्टियां बेकार हो गई हैं. उन्हें कौन बताए कि मसूरी से आगे देखने के हज़ारों खूबसूरत नज़ारे हैं. लेकिन झारखंड की जनता मसूरी जा रही है तो निश्चित है विकास ज़ोरों पर है.

शहर से गांव कस्बों की दूरी झारखंड में अधिक नहीं है. जमशेदपुर में बस से उतरते ही एक ऑडी, एक बीएमडब्ल्यू देखते ही मैं समझ जाता हूं कि मैं एक ऐसे शहर में हूं जो दिल्ली मुंबई के आगे हो जाना चाहता है. मैं मोटरबाइक पर ही निकलता हूं अपने घर की तरफ. छोटे छोटे गांवों से होते हुए कॉलोनी तक पक्की सड़क है लेकिन सड़क पर कारों की भरमार है. सूमो, बोलेरो और कभी कभी स्कार्पियो को भी साइड देना पड़ रहा है. छोटे वाहनों और पैदल चलने वालों की औकात ही नहीं है. ज़ाहिर है विकास जोरों पर है.


सड़क के दोनों ओर तैनात जंगल अब कट गए हैं. टाटा बढ़ रहा है. कटे जंगलों की जगह विकास के सबसे बड़े मॉडल फ्लैट बन रहे हैं. फ्लैट में रहने का पहला मतलब है आप विकसित हैं. बचपन में हम ऐसे घरों को दड़बा कह कर हंसा करते थे. हमें नहीं पता था कि ये हमारा भविष्य है. भले ही इन फ्लैटों के बनने में जंगल के जंगल तबाह हो जाएं लेकिन यही हमारा विकास है. यही झारखंड की प्रगति है.

फ्लैट कम होते जाते हैं और गांव आने लगते हैं. मैं सूकून पाता हूं हरियाली में लौटते ही. सड़कों के किनारे मिट्टी और पत्थरों को मिला कर बनाए गए आदिवासियों के घर मेरे बचपन की यादों का अहम हिस्सा रहे हैं. इतनी सपाट तो सीमेंट की दीवारें नहीं होती. यदा कदा चारखाने की धोती दिखती है. काली गठीली देह पर यह छोटी धोती फबती खूब है. वैसे शर्ट पैंट पतलून का विकास तो पहले ही हो चुका था. अब लोग जूते भी पहनते हैं. मोजे के साथ. सच में विकास जोरों पर है.

हाड़तोपा के पास तिलका मांझी की एक प्रतिमा मेरे सामने ही लगी होगी. तिलका मांझी चौक बाबा तिलका चौक हो गया है. तिलका मांझी को बाबा तिलका होने में ज्यादा समय नहीं लगा है.. इतने ही कम समय में झारखंड का विकास भी हो गया है.

आगे ही एक मैदान है जहां फुटबॉल के मैच देखने हर रविवार को आया करते थे. मैदान भी है. गोल पोस्ट भी है. खिलाड़ी भी हैं लेकिन फुटबॉल गायब है. क्रिकेट खेला जा रहा है. विकास हो रहा है निश्चित रुप से. फुटबॉल से क्रिकेट तक आना विकास ही कहा जाएगा क्योंकि क्रिकेट तो भद्र लोगों का खेल है. फुटबॉल तो लातिन अमरीका और अफ्रीका के बर्बर देश भी खेलते हैं. मेरा शक सुबहा अब यकीन में बदल गया था कि झारखंड में विकास ज़ोरों पर है.

भाड़ में जाए ये इज्जत !

(वुसतुल्लाह ख़ान के इस ब्लॉग में पाकिस्तान में बनने वाली एशिया की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसायटी बहरिया टाउन का जिक्र है जिसके मालिक रियाज मलिक के टीवी पर एक 'प्लांटेड इंटरव्यू' ने पिछले दिनों पाकिस्तान में खूब सुर्खियां बटोरीं. दरअसल मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के बेटे अरसलान इफ्तिखार पर रियाज मलिक से करोड़ों का फायदा हासिल करने के आरोप लगे हैं)

यार लानत है ऐसे पत्रकार और उसकी पत्रकारिता पर, मैं तो शर्म के मारे किसी से आंख मिलाने के काबिल नहीं रहा!

क्यों? क्या तेरा नाम भी बहरिया टाउन के लेटर हेड पर आ गया है?
नहीं आया ना ! यही तो दुख है. हर कोई तंज कर रहा है कि अबे तुम कैसे पत्रकार हो कि बत्तीस साल से छक मार रहे हो. तुम्हारे बाद इस पेशे में पैदा होने वाले मोटर साइकिल से उतर कर लेक्सस पर चढ़ गए, तीन मरले के मकान से फॉर्म हाउस में शिफ्ट कर गए, गोसिया होटल के बेंच पर चाय सुड़कते सुड़कते नादिया कॉफी शॉप में दरबार लगाने लगे, राष्ट्रपति को आसिफ और प्रधानमंत्री को गिल्लू कह कर पुकारने लगे और तुम आज भी उबेदुल्लाह अलीम के इस शेर को झंडा बना कर घूम कर हो कि:

अभी खरीद लूं दुनिया कहां की महंगी है,
मगर जमीर का सौदा बुरा सा लगता है.

साले ये भी कहते हो कि हमारी मानो तो पत्रकारिता को अच्छा अच्छा कह कर बदनाम करने से बेहतर है कि प्रेस क्लब के सामने बिरयानी का ठेला लगा हो. इतना मुनाफा तो होगा कि वेज बोर्ड भूल जाओगे.

अच्छा तो तुम फिर ऐसे ताने मारने वालों को क्या जबाव देते हो?
जवाब क्या देता हूं. बस शर्मिंदगी से गड़ जाता हूं. इससे पहले सूचना मंत्रालय से सीक्रेट फंड हासिल करने वालों की कई लिस्ट आईं, इनमें भी मेरा नाम नहीं था. लोग पूछते थे कि यार तुम वाकई पत्रकार हो या फिर हमे कार्ड दिखा कर... बना रहे हो. मैं ये कह कर टाल जाता था कि भाइयों में बड़ा पत्रकार हूं, लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि कोई मुझे सीक्रेट फंड की लिस्ट में डाल दे. इस लिस्ट में आने से पहले और बाद में बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं. लेकिन अब मैं लोगों को क्या जबाव दूं? तुम ही इंसाफ करो कि क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि बहरिया टाउन की असली या जाली लिस्ट में भी मेरा नाम आ जाता??

मेरा ख्याल है कि तुमने संजीदगी से कोशिश नहीं की होगी!
उड़ाले उड़ाले तू भी मेरा मजाक उड़ा ले. जाहिर है मुझे अपने बच्चों के भविष्य की क्या परवाह. जिस स्तर की शिक्षा पीले स्कूल की लंगड़ी बेंच पर टूटी हुई खिड़की के जरिए आती है, वो पब्लिक स्कूलों के बंद एयर कंडीशंड क्लास रूम में कहां से घुसेगी. जाहिर है जो सुकून दो कमरे वाले फ्लैट में है, वो दो कनाल की कोठी में कहां और जैसी उम्दा हवा होंडा मोटर साइकल पर लगती है, वो होंडा अकॉर्ड वालों को कहां नसीब.

अबे कोशिश. मुझसे ज्यादा कोशिश किसने की होगी. एक दफा एक इंटेलिजेंस एजेंसी का सादा सा मेजर मिला. कहने लगा सर मैं आपके लेखों का प्रशंसक हूं. मैंने कहा कि अगर मैं इतना ही काबिल हूं तो फिर आप मुझे मुल्क और कौम की खिदमत करने का खास तौर से मौका दें और अपने साथ रख लें. मेरा ख्याल था कि मेजर इशारा समझ गया है और मेरी पेशकश पर खुशी से उछल पड़ेगा. लेकिन पता है, उसने क्या कहा?

खान साब, हा हा हा हा.. जितने बढ़िया आपके लेख होते हैं, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प आपकी बातें हैं. ये कह कर वो बस हाथ मिला कर निकल लिए.
पता है मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा कब आता है?

जब लोग कहते हैं कि खान जी आपने अपनी कलम से माशा अल्लाह बहुत इज्जत कमाई है. आपके तो हजारों प्रसंशक हैं.

मियां भाड़ में जाए ऐसी इज्जत और ऐसा गरीब प्रशंसक. अगर मैं इतना ही बड़ा कलमी सर्जन हूं तो फिर कोई दो नंबर ताकतवर और पैसे वाला आदमी मुझे क्यों नहीं बुलाता. मेरा कलमी मुजरा क्यों नहीं करवाता. मेरे फिक्रे की काट पर नौलखा हार उतार कर कदमों में क्यों नहीं फेंकता. मेरी दलील के ठुमको पर प्राडो की चाबी मखमले डिब्बे में रख कर पेश क्यों नहीं कर देता. मेरे अंदाजे बयां पर इतने ही अभिभूत हैं तो मुझे सरकारी खर्चे से हज पर क्यों नहीं भिजवा देते हो.

मेरी बीवी के सामने मुझसे आखिर क्यों नहीं कहता कि बस खान साब आप चुप रहें, ये चार कनाल मैंने अपनी बहन को दिए हैं. आप बहन भाई के मामले में अपने उसूलों की टांग न अड़ाएं.
आप कहते हैं कि मैं इन पत्रकारों की निंदा करूं?

क्यों करूं भला?
भाई ये मुझ जैसे सल्फेट थोड़े ही हैं. ये बड़े लोग हैं, जीने का हुनर जानते हैं.

प्रधानमंत्री की पेशी

लोकतंत्र को चारित्रिक पतन से बचाने के लिए संस्थाओं और उनके शीर्ष पर बैठे नेताओं की समय-समय पर धुलाई-सिंकाई ज़रूरी होती है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पाँच घंटे की अपनी पेशी में पत्रकारिता-राजनीति के 'अवैध संबंधों' पर अपना इक़बालिया बयान और सफ़ाई दोनों पेश की है.

लेविसन जाँच आयोग के सामने बाइबल की शपथ लेकर कैमरन ने माना कि "ब्रिटेन में मीडिया और सत्ता के आपसी रिश्ते ख़राब हो गए हैं."

ख़राब का मतलब ये है कि संबंध बहुत मधुर हो गए थे, दोनों तरफ़ के लोग अपनी सीमाओं और मर्यादाओं को तोड़कर 'एक दूसरे की मदद कर रहे थे.'

जो लोग ये मानने को तैयार नहीं होते कि परचून की दुकान की व्यावसायिकता और मीडिया की व्यावसायिकता में अंतर होता है, उन्हें लेविसन जाँच पर ग़ौर करना चाहिए.

वैसे किराना स्टोर एथिक्स भी कालीमिर्च में पपीते के बीज मिलाने या कम तौलने की इजाज़त नहीं देते.

मीडिया अगर सिर्फ़ कारोबार है तो लोकतंत्र का 'चौथा स्तंभ' कहलाने का दंभ छोड़ देना चाहिए, क्यों कोई पत्रकार ख़ुद को आम आदमी से अधिक अहमियत का हक़दार समझता है, अगर वो अपने दर्शकों/पाठकों का प्रतिनिधि यानी जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक दुकानदार है?

संयम और संतुलन के मामले में पत्रकारिता एक कठिन पेशा है. रात-दिन नेताओं के मिलने-जुलने वाले पत्रकार से यही उम्मीद की जाती है कि वह उनके प्रलोभन या बहकावे में आए बिना जनता के हित की बात करेगा.

असंभव है कि नेताओं से दूर रहकर पत्रकार ख़बरें बाहर निकाल पाएगा, मगर वह हमेशा याद रख सकता है कि किस हद को पार करने पर शिष्टाचार व्याभिचार में बदल जाता है.

भारत में इन दिनों मीडिया के रेगुलेशन की बातें हो रही हैं, मीडिया की नैतिकता, सार्थकता और निष्पक्षता पर कहीं गंभीर और कहीं फ़ालतू बहसें चल रही हैं.

भारत की स्थिति ब्रिटेन के मुक़ाबले कहीं अधिक जटिल है. बीसियों नेताओं के अपने चैनल चल रहे हैं, बड़े औद्योगिक घराने मीडिया संस्थानों के मालिक हैं, बड़े मीडिया संस्थान दूसरे धंधों में हाथ-पाँव फँसाए बैठे हैं... मुद्दे अनेक हैं और ठोस समाधान किसी के पास नहीं है.

शायद इतना याद रखना ही मददगार हो--- नैतिकता विचार नहीं, आचरण है.

शौचालय के बहाने

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | बुधवार, 06 जून 2012, 22:53

टिप्पणियाँ (23)

मेरे एक मित्र सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे मीडिया पर भी नज़र रखते हैं.

वे अक्सर कहते हैं कि एक व्यापक षडयंत्र के तहत ग़ैर ज़रुरी विषयों को मीडिया में उछाला जाता है. वे मानते हैं कि कई ज्वलंत मुद्दों को पृष्ठभूमि में धकेलने के लिए कई बार सरकार भी इस षडयंत्र में शामिल होती है.

मैं एक मीडियाकर्मी की तरह उनसे सहमत नहीं हो पाता. लेकिन कई बार अपनी बिरादरी पर ही शक होने लगता है.

योजना आयोग के शौचालय पर मीडिया में छिड़ी बहस ऐसा ही एक मुद्दा है.

इसी योजना आयोग ने ग़रीबी की परिभाषा तय करते हुए कह दिया था कि शहरों में हर दिन 32 रुपए कमाने वाला ग़रीब नहीं है. वह घोर आपत्ति की बात थी. योजना आयोग की संवेदनहीनता थी.

हमारी स्मृति छोटी होती है. हम भूल जाते हैं कि ग़रीबी की परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने हमेशा ही इसी तरह की कल्पनाशक्ति का परिचय दिया है.

जहाँ तक 35 लाख रुपए लगाकर शौचालय की मरम्मत की बात है यक़ीन मानिए सरकारी भवनों में इस तरह का ख़र्च कोई असामान्य बात नहीं है.

शक हो तो सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता आवेदन लगा कर देख लें कि एक-एक अधिकारी और मंत्री के कार्यालयों पर कितना खर्च होता है. उनके बंगलों का हिसाब निकाल कर देख लें.

ये सवाल सिर्फ़ अधिकारियों के उपयोग के लिए अलग शौचालय और भेदभाव का भी नहीं है. हम जिस समाज में रहते हैं वह बहस के लिए समानता की बात करता है लेकिन जीता इसी भेदभाव के साथ है. यह हमारी विरासत का हिस्सा है और आधुनिक समाज में अपना अस्तित्व बनाए हुए है.

कितने लोग अपने घरेलू नौकरों को अपने शौचालयों का उपयोग करने देते हैं? इस कथित समतामूलक समाज का समाजवाद तब अचानक ग़ायब हो जाता है.

बहुत मजबूरी न हो तो हमारे यहाँ कोई सार्वजनिक शौचालय का उपयोग भी नहीं करता.

इतिहास के छात्र बता सकते हैं कि समाज में शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच एक गहरी खाई हमेशा से रही है. दोनों का जीवन और जीवन स्तर अलग-अलग ही रहा है. आज भी है. लोकतंत्र बहुत से आश्वासन दे सकता है लेकिन ये आश्वासन आज भी नहीं दे सकता कि वह दोनों वर्गो के बीच की खाई को पाट देगा.

मैं जानता हूँ कि ऐसा कहना बहुत से लोगों को नागवार गुज़रेगा लेकिन सच है कि ये बेवजह की बहस है.

ऐसे समय में जब महंगाई जानलेवा हो रही है और बेरोज़गारी का साया दिनों दिन बड़ा होता जा रहा है. ऐसे समय में जब सरकार असहाय दिख रही है और विपक्ष लाचार. ऐसे समय में जब स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक बहुत से सवाल मुंह बाए खड़े हैं. ये निहायत ही ग़ैर-ज़रुरी बहस है.

आपको ज़रुर लग सकता है कि योजना आयोग के शौचालय ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है, लेकिन सच ये है कि शौचालय ने एक-दो-तीन दिनों के लिए ही सही, सरकार को कई ऐसे सवालों से बचा लिया है जो ज़्यादा असुविधाजनक हैं.

क्या हम किसी दिन मूल सवालों पर लौटकर इस सरकार से उसी तरह जवाब मांगेगे जिस तरह से मोंटेक सिंह अहलूवालिया एंड कंपनी के शौचालयों पर मांग रहे हैं?

वज़न जैसा हल्का मामला

वंदना वंदना | शनिवार, 02 जून 2012, 13:15

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फिल्म अभिनेत्री और पूर्व मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय के 'मोटापे' को लेकर छप रही खबरों से मुझे खुजली तो कई दिनों से मच रही थी. लेकिन तिल का ताड़ बनाने वाले लोगों की फितरत समझकर मैने इस खबर को थोड़ा नजरअंदाज करने की कोशिश की.

लेकिन फिल्म और फैशन का तड़का लिए कान फ़िल्म फेस्टिवल के खत्म होते होते बात हद से आगे बढ़ गई. अब हाथ की खुजली मिटते नहीं मिट रही है.

कान में फिल्मों के मामले में भारत का मामला आमतौर पर ठन ठन गोपाल वाला ही रहता है. हाँ रेड कार्पेट पर छटा बिखेरने में जरूर भारतीय अभिनेत्रियाँ अपना जलवा दिखाती रही हैं.

ग्लैमर किसी भी फिल्म फेस्टिवल और रेड कार्पेट का अहम हिस्सा होता है. इसलिए ये बात तो कुछ हद तक समझ में आती है कि किस हसीना ने रेड कार्पेट पर कौन सी डिजाइनर ड्रेस पहनी है..इस पर 'गिद्द भरी' नजर सभी गढ़ाए रहते हैं.

लेकिन इस बात से क्या मतलब निकाला जाए जब भारत में आधे से ज्यादा लोगों की नज़रें सिर्फ इस बात पर लगी रहीं कि नई नवेली माँ बनी ऐश्वर्या राय कान में कितनी मोटी या पतली दिखेंगी या अपने मोटापे को छिपाने के लिए वे कैसे कपड़े पहनेंगी ?

नवंबर में माँ बनने के बाद जब कभी ऐश्वर्या किसी कार्यक्रम या पार्टी में दिखाई दी, तब तब उन्हें अपने मोटापे के लिए मी़डिया और आम लोगों दोनों की तंज भरी फब्तियों का शिकार होना पड़ा.

मानो वज़न बढ़ाकर ऐश्वर्या ने कोई गुनाह कर दिया हो, मानो छरहरे बदन वाली अपनी पुरानी फिगर में न दिखकर उन्होंने कोई राष्ट्रीय नियम तोड़ दिया हो, मानो ऐश्वर्या के ऐसा करने से राष्ट्र हित को कोई भारी धक्का लगा हो.

माँ बनने के बाद वजन बढ़ना न ही कोई नई बात है और न ही कोई अनहोनी बात. फिर माँ बनने के बाद एक अभिनेत्री के वज़न बढ़ने को लेकर इतना हंगामा क्यों बरपा है. वे तो अभी कोई फिल्म भी नहीं कर रही कि उनके वजन का असर फिल्म में उनकी निभाई भूमिका पर पड़ रहा हो.

हाल के दिनों में अखबारों की तस्वीरों और चैनलों पर नज़र डालें तो ऐश्वर्या को लेकर छपी खबरें बेहद हास्यास्पद और बचकाना तो दूसरी ओर दिल दुखा देने वाली लगीं.

उनके फूले हुए चेहरे का क्लोज़ कप और डबन चिन दिखाना, कमर पर बार-बार कैमरा चमकाना..ये सब क्या दर्शाता है ? किसी ने तो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते हुए ये तक लिख दिया कि क्य ऐश्वर्या दोबारा गर्भवती हैं.

यू ट्यूब पर उपलब्ध उस वीडियो पर क्या कहेंगे जहाँ 'मोटी' ऐश्वर्या की तस्वीरें हैं, बैकग्राउंड में हाथी की आवाज़ डाली गई है. वीडियो में उन्हें काजोल की मिसाल देते हुए सलाह दी गई है कि समय आ गया गया है कि ऐश्वर्या जिम जाना शुरु कर दें.

बतौर अभिनेत्री मैं कतई ऐश्वर्या की फैन नहीं हूँ. दो तीन फिल्मों को छोड़ दें तो मुझे उनका अभिनय कभी जानदार नहीं लगा. उनकी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल उठाए तो बहुत से लोग उनकी हिमायत शायद ही करें. लेकिन यहाँ माजरा दूसरा है.

माँ बनना, बनने के बाद काम दोबारा कब शुरु करना, वजन घटाना या बढ़ाना ये बहुत ही निजी सवाल होते हैं. ऐश्वर्या भले ही पब्लिक पर्सनेलिटी हैं लेकिन मामृत्व के बाद उन्हें अपना फिगर किस कदर मेनटेन करना है ये तय करने की भारी भरकम जिम्मेदारी उनकी खुद की है.

बाहरी लोगों को फ़ज़ूल का एडवाइज़र बनने की ज़रूरत नहीं है. लग रहा है जैसे एक अभिनेत्री के बढ़े हुए वज़न तले देश की उम्मीदें दबी जा रही हैं.

बात सिर्फ एक नामचीन अभिनेत्री की नहीं है. वे तो पूरी समस्या का नमूना भर है. ऐश्वर्या के वज़न पर ये राष्ट्रीय ऑबसेशन महिलाओं को लेकर भारतीय समाज की अजीबोगरीब सोच दर्शाती है.

ग्लैमर, सेलिब्रटी और सुपरमॉडल तो लोगों को चाहिए लेकिन जब वो महिला सेलिब्रिटी माँ बन जाए तो उनके 'बेडौल, मोटे शरीर' का क्या करें लोगों को पता नहीं.

लगता तो यही है कि जब भारत में भविष्य में कोई सेलिब्रेटी माँ बने तो साल दो साल खुद पर कर्फ्यू लगा ले...जब लोगों की फैंटसी को लुभाने लायक फिगर हो जाए तभी बाहर निकलने की जुरर्त करें..और ये सब वज़न जैसे हल्के मामले के कारण.

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