इस विषय के अंतर्गत रखें दिसम्बर 2011

बल बहुमत का या सत्ता का

मुकेश शर्मा मुकेश शर्मा | शुक्रवार, 30 दिसम्बर 2011, 22:00

टिप्पणियाँ (20)

मैं न तो अन्ना हज़ारे का अंध समर्थक रहा हूँ और न ही लोकपाल के मामले में सरकार के फ़ैसलों को हज़म कर पाया हूँ.

बीबीसी का पत्रकार होने के नाते ये गुण या हर चीज़ को शक़ की निगाह से देखने का दुर्गुण जैसे ख़ून में शामिल हो चुका है.

ऐसे में लोकपाल विधेयक को लेकर संसद में जारी कार्रवाई के बीच ही आंदोलन करने की टीम अन्ना की ज़िद पर एक ओर जहाँ खीझ उठती रही तो वहीं इस विधेयक को टालने की हरसंभव सरकारी कोशिश ने मेरे अंदर के संसदीय लोकतंत्र के समर्थक को कुछ हद तक मौन करने पर मजबूर किया.

अब जबकि संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त हो चुका है या किया जा चुका है मैं कुछ हद तक टीम अन्ना की ज़िद को उनके नज़रिए से समझ पा रहा हूँ.

गुरुवार को दिन भर बहस पर ऑफ़िस में नज़र रखने के बाद देर रात तक घर पर भी टीवी से चिपका मैं वही बहस देख रहा था. उस समय तक कुछ समाचार चैनल ये ख़बरें चलाने लगे थे कि राज्यसभा में हंगामा कराकर कार्यवाही अनिश्चितकाल तक स्थगित करने की साज़िश हो सकती है.

मैं उपहास के नज़रिए से उन ख़बरों को देख रहा था कि सरकार की ओर से इतना बचकाना क़दम तो कम से कम नहीं उठाया जाएगा. पूरा देश इस बहस पर नज़रें लगाए है और इसका ये अंत तो कम से कम नहीं हो सकता.

मगर रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे से जो होना शुरू हुआ वहाँ से वंदे मातरम् तक सिवाय ग़ुस्से के मन में कुछ नहीं आया.

विपक्षी सांसद ये जानने की कोशिश करते रहे कि रात 12 बजे के बाद क्या होगा. माकपा नेता सीताराम येचुरी ने खुलकर ये सवाल किया मगर सभापति की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं था.


मैं अभी तक ये नहीं समझ पाया हूँ कि सदन के नेता ख़ुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वहाँ बैठे थे और इस पूरे दौरान उनके चेहरे के भाव बिल्कुल भी नहीं बदले.

क्या उन्होंने इस बात की ज़िम्मेदारी बिल्कुल भी नहीं समझी कि इस विधेयक पर सरकार के मुखिया होने के नाते उस मौक़े पर उन्हें कुछ कहना चाहिए, हस्तक्षेप करना चाहिए.

विपक्ष रात भर बैठने की चुनौती देता रहा और सरकार ने दंभ भरे स्वर में कहा कि सत्र को लेकर फ़ैसला सरकार का 'विशेषाधिकार' है.

विधेयक को लेकर आए 187 संशोधनों में सरकार को साज़िश दिख रही है मगर क्या उसका दूसरा मतलब ये नहीं था कि विधेयक में ऐसी कमियाँ हैं जिसे ठीक करने के लिए इतने संशोधन प्रस्ताव लाए गए हैं.

अंत के हंगामे के दौरान सरकार की ओर ये कहा जाना कि अगर आप लोकसभा वाला प्रस्ताव जस का तस पारित करना चाहते हैं तो हम अभी मतदान के लिए तैयार हैं- आश्चर्यचकित करता है.

राज्य सभा में अल्पमत वाली सरकार ने बहुमत के नज़रिए को क्या सिर्फ़ अपनी सत्ता और विशेषाधिकार के अहंकार में दरकिनार कर दिया.

सुबह मैंने उस सांसद के दल के एक नेता को टीवी पर सुना जिसने मंत्री महोदय के पास से काग़ज़ लेकर फाड़कर सदन में उछाल दिए थे. बचाव ये था कि आदमी भावावेश में ऐसे कुछ क़दम उठा बैठता है.

मुझे सहज याद आया कि ये सभी वही सांसद हैं जिन्होंने अन्ना हज़ारे के मंच से सांसदों पर हुई कुछ अशिष्ट टिप्पणी पर विशेषाधिकार हनन के नोटिस जारी करवाए थे. ऐसा नहीं है कि मैं उन टिप्पणियों का समर्थन कर रहा हूँ मगर स्पष्ट है कि वो टिप्पणी करने वाले लोग भावावेश में कुछ भी बोलने के हक़दार नहीं हैं.

कुछ और सृजनात्मक काम के लिए मैं जीवन के किसी मोड़ पर राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाला वो व्यक्ति हूँ जो इन सब घटनाओं के बाद ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि लोकतंत्र में बहुमत का बल होता है या सिर्फ़ सत्ता का.

हंगामा है क्यूँ बरपा

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | शुक्रवार, 23 दिसम्बर 2011, 14:04

टिप्पणियाँ (18)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस परिषद के वर्तमान प्रमुख मार्कंडेय काटजू ने भारत रत्न को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है.

एक ओर वे ग़ालिब और शरत चंद्र को भारत रत्न देने की वकालत कर रहे हैं दूसरी ओर खिलाड़ियों और फ़िल्मी कलाकारों को यह सम्मान देने का विरोध कर रहे हैं.

खिलाड़ियों के विरोध को सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के विरोध के रूप में देखा जा रहा है. और शायद दिलीप कुमार को भी.

भारत सरकार ने हाल ही में भारत रत्न की पात्रता की शर्तों में बदलाव किया है और प्रथमदृष्टया दिखता है कि सचिन तेंदुलकर को ही ध्यान में रखकर ये बदलाव हुआ है.

इस बीच ध्यानचंद से लेकर अभिनव बिंद्रा तक को भारत रत्न देने की मांग की जा चुकी है.

देश में बहुत से लोग होंगे जो मार्कंडेय काटजू की तरह सोचते होंगे. उनके मन में भी सवाल उठते होंगे कि आख़िर सचिन तेंदुलकर का सामाजिक सरोकार कितना है? वो तो अपने लिए खेलते हैं और अपने लिए पैसा कमाते हैं. लेकिन ऐसा सोचने वाले अल्पमत में ही हैं क्योंकि इस देश का बहुमत सचिन को ईश्वर मानता है.

ये मानने को जी नहीं चाहता कि मार्कंडेय काटजू को इस देश में (और बहुत हद तक दुनिया भर में) पुरस्कारों की राजनीति की जानकारी नहीं है.

राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के डॉक्टरों को किस तरह पद्म सम्मानों से नवाज़ा जाता रहा है इसे क्या वे नहीं जानते? क्या वे नहीं जानते कि मुख्यमंत्री किस तरह से चाटुकार क़िस्म के दोयम दर्जे के कवियों, लेखकों और कथित संस्कृतिकर्मियों को भी पद्मश्री दिलवाते रहे हैं.

ये मानना होगा कि कुछ ऐसे लोग भी इस बीच इस सम्मान के लिए चुने गए हैं जो वाकई इसके हक़दार थे.

भारत रत्न की सूची में कुछेक नामों को छोड़कर बाक़ी के बारे में कोई विवाद नहीं हो सकता.

विवाद इस बात पर भी नहीं हो सकता कि जीवन की हर किसी चीज़ की तरह पुरस्कार और सम्मान भी देश-काल की राजनीति के आधार पर तय होते हैं. ख़ासकर इस आधार पर कि इस देश-काल की राजनीति में उम्मीदवार की राजनीति क्या है.

शासक-प्रशासक अक्सर रेवड़ियाँ बाँटने के अंदाज़ में फ़ैसला लेते हैं. इसके पीछे किसी सुविचारित प्रक्रिया की उम्मीद उनसे नहीं की जानी चाहिए.

जब देश के बहुमत का राजनीतिज्ञों के ऊपर भरोसा ही उठ गया है तो फिर इस बात की ज़िद ही क्यों करना कि वे पुरस्कारों और सम्मानों के लिए सही या क़ाबिल लोगों को ही चुनेंगे.

आख़िर में वही शेर याद आता है, जिससे मार्कंडेय काटजू ने एक अख़बार में अपना लेख शुरु किया था -

जब तवक़्क़ो ही उठ गई ग़ालिब
क्यूँ किसी का गिला करे कोई.

तंगहाली में नैतिकता

राजेश प्रियदर्शी राजेश प्रियदर्शी | गुरुवार, 22 दिसम्बर 2011, 23:44

टिप्पणियाँ (8)

ब्रिटेन अमरीका के बारे में हम ऐसी ही बातें जानते-सुनते आए थे कि लोग अख़बार उठाकर बगल में रखे डिब्बे में पैसे डाल देते हैं, निगरानी करने या पैसे माँगने के लिए किसी आदमी की ज़रूरत नहीं होती.

हर घर के बाहर दूध की भरी और ख़ाली बोतलें पड़ी रहती हैं उन्हें कोई नहीं छूता, घर के बाहर खड़ी साइकिल में कोई ताला नहीं लगाता वग़ैरह, वग़ैरह...

इन बातों को विकसित देशों के लोगों को उच्च नैतिक आचरण, सिविक सेंस और शिष्टाचार के उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता रहा है, मगर असल में यह एक समृद्ध देश की तस्वीर है जहाँ मामूली चीज़ों के लिए किसी को नीयत बिगाड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

मगर पिछले कुछ महीनों से ब्रिटेन के अख़बारों में जिस तरह की ख़बरें छप रही हैं उन्हें पढ़कर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि इन बातों का कितना ताल्लुक लोगों के रवैए से है, और कितना उनकी ज़रूरतों से.

लंदन और आसपास के इलाक़ों में चोर बिजली के तार काटकर ले जा रहे हैं, जो ब्रिटेन में पहले कभी नहीं सुना गया. एक अस्पताल में इसी वजह से बिजली की सप्लाई ठप हो गई और कई ऑपरेशन रद्द करने पड़े.

पुलिस एक महिला की तलाश कर रही है जिसकी सीसीटीवी से ली गई तस्वीरें अख़बारों में छपी है, इस महिला ने कब्रों पर चढ़ाए गए फूल चुराकर बाज़ार में बेचने का धंधा शुरू किया है.

मेनहोल के ढक्कन चोरी होने शुरु हो गए हैं, एक ख़बर ये भी आई कि एक सुपरस्टोर के कचरे से खाने-पीने की चीज़ें बीनने के चक्कर में दो गुटों लड़ाई हो गई और तीन लोग घायल हो गए.

इस तरह की ख़बरें कुछ समय पहले तक लंदन के अख़बारों में देखने को नहीं मिलती थीं मगर अख़बारों का कहना है कि आर्थिक मंदी की वजह से कुछ लोग ऐसी 'गिरी हुई हरकतें' करने पर मजबूर हो रहे हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि ये सब पूर्वी यूरोपीय देशों से आए लोगों के कारनामे हैं जिन्हें आर्थिक मंदी की वजह से कोई नौकरी नहीं मिल रही और परदेस में गुज़ारा चलाने के लिए वे इस तरह के रास्ते अपना रहे हैं.

एक समाचार ये भी है कि पिछले एक दशक में ब्रिटेन में तलाक के इतने मामले कभी नहीं हुए जितने इस वर्ष हुए हैं, उसका संबंध भी मंदी से बताया जा रहा है.

सरकारी ख़र्च में कटौती, कुछ हज़ार नौकरियों के बंद होने और आर्थिक विकास की दर शून्य के नज़दीक पहुँचने के बावजूद ब्रिटेन एक विकसित देश है जहाँ आम नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं की तुलना भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों से नहीं की जा सकती.

छोटी-मोटी चोरी-धोखाधड़ी की घटनाएँ भारत में रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं मगर भारत में जितनी बड़ी विपन्न आबादी है क्या ऐसी घटनाओं का अनुपात बहुत कम नहीं है?

भारत का निम्म-मध्यम वर्ग जिसे अक्सर हिकारत की नज़र से देखा जाता है, कई बार ऐसा लगता है कि ब्रिटेन जैसे देशों के लोग उनसे एक बात ज़रूर सीख सकते हैं, वह है अभाव में सदभाव से रहने का गुर.

घबराइए कि आप दिल्ली में हैं

अविनाश दत्त अविनाश दत्त | गुरुवार, 15 दिसम्बर 2011, 19:27

टिप्पणियाँ (46)

नई दिल्ली के सौ साल साल पूरे हो गए, चारों तरफ़ धमाचौकड़ी मची हुई है.

कोई चचा ज़ौक की पंक्तियाँ दोहरा रहा है कि कौन जाए ज़ौक पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर. कोई दिलवालों की दिल्ली को लेकर तुकबंदियां गढ़ रहा है.

पर तमाम दिल्ली प्रेमियों से क्षमायाचना सहित मैं कुछ कहना चाहता हूँ.

मुझे दिल्ली में रहते सात-आठ साल हो गए और मुझे लगता है कि कौन जा पाएगा दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर.

यहाँ तो आदमी की हालत राशन की दुकान में रहने वाले चूहे जैसी है. यहाँ रहे तो किसी न किसी दिन किसी शिकंजे में फंस कर मारे जाएँगे. छोड़ कर चले गए तो भूख से मरेंगे.

अटाटूट भरी दिल्ली की इस दुकान में जो है बस पेट में है, लेकर कहीं नहीं जा सकते.

मैं जबलपुर-भोपाल से आया हूँ, गाँव देखे हैं, पत्रकारिता में बाल पूरे तो सफ़ेद नहीं हुए, मगर खिचड़ी हो चले हैं.

राजनीति और शासन-प्रशासन के पीछे-पीछे ख़बर की तलाश में घूमा हूँ. भारत के कुछ देहात घूमे हैं. एक बात कह सकता हूँ कि दिल्ली का और भारत का कोई ख़ास रिश्ता नहीं है.

भारत के गाँवों में बहुत विविधता है लेकिन मुझे एक दृश्य हर जगह मिल जाता है. हर गाँव में पानी के पास भैस को कीचड़ में पड़े अलसाते पगुराते देखा जा सकता है. कीचड़ से लथपथ उस भैंस के ऊपर अमूमन झक सफ़ेद बगुला बैठा होता है जो कि भैंस की पीठ पर बैठा-बैठा भैंस के बदन पर चिपके कीड़े ख़ा रहा होता है.

बगुले की आँखों में भैंस के प्रति कोई कृतज्ञता या दया नहीं होती, वो भैस के ऊपर ऐसे संभल कर खड़ा होता है कि कहीं उस पर गंदगी का एक छींटा भी ना पड़ जाए.  

यह दृश्य देख कर मुझे हमेशा दिल्ली की याद आती है. भारत एक विशाल भैंस है, गरीबी पिछड़ेपन की गंदगी में सराबोर पर अपने सुख दुख में आप ही रमी हुई. दिल्ली इस पर बैठा सफेद बगुला है.

दिल्ली में रहने वाले चाहे पत्रकार हों, नेता हों या अधिकारी, ज़्यादातर का भारत के प्रति वही रुख है जो बगुले का भैंस के प्रति होता है. उसी भैंस के कीड़ों पर पलते हैं पर उससे कोई वास्ता नहीं रखते.

भोपाल सहित ऐसे शहरों में जहाँ पठान बसते हैं वहां एक कहावत पाई जाती है "शेख़ अपनी देख" मेरे हिसाब से यह दिल्ली और दिल्ली वालों का मूलमंत्र है.

दिल्ली बड़ी बेदर्द है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक बहुत भले और बड़े इतिहासकार हैं मुकुल केसवन उन्होंने एक बार मुझसे पूछा कि दिल्ली कैसी लगी मैंने ईमानदारी से बता दिया.

केसवन दिल्ली वाले हैं पर उन्होंने बुरा नहीं माना और एक अनुभव बताया. केसवन इतिहास के छात्र हैं और उन्होंने भारत में कई दंगा पीड़ित जगहों पर घूम-घूम कर दंगों के बाद शोध किया है.

दिल्ली के 1984 के सिख विरोधी दंगों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया है.

केसवन ने कहा कि और जगहों और दिल्ली के दंगों में फ़र्क था. आम तौर पर और जगहों में दंगा पीड़ित कहते हैं कि अनजान हमलावर बाहर से आए थे. पीड़ित शक जताते हैं कि कुछ लोग मोहल्ले के उन्हें पता बताने में शामिल हो सकते हैं.

लेकिन दिल्ली में सिखों पर उन लोगों ने हमला किया जो सालों से उनके साथ एक ही थाली में खाना खाते थे, उनके घर पर टीवी देखने आते थे और जो उनके बच्चों के साथ पले-बढ़े थे.

शायद यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं हैं कि मिथकों से लेकर लिपिबद्ध इतिहास तक दिल्ली के किस्से खून से लिखे हैं. कहानी है कि पांडवों को अपनी राजधानी इंद्रप्रस्थ बनाने के लिए जगह मिली तब जब उन्होंने जंगल को जला दिया जो उनके भीतर था सबको जला कर ख़ाक कर दिया.

कहते हैं यह दिल्ली उसी इन्द्रप्रस्थ की वंशज है.

दिल्ली के इतिहास में शायद ही कोई सदी ऐसी गुजरी होगी जब इस शहर ने खून की होली नहीं हो. भाई ने भाई का क़त्ल न किया हो.

विलियम डालरिम्पल की किताब लास्ट मुग़ल में ज़िक्र है कि 1857 के ग़दर में दिल्ली के  मूल बाशिंदों ने किस तरह से ग़दर करने वालों से अपनी जान छुड़ाई. किसी ने पैसा दे कर तो किसी ने अपना तख़्तोताज दे कर.

इसे चाहे दिल्ली की दरियादिली कहिए या बेदिली. मुझे भरोसा है कि इतना सब कह कर भी मैं बच जाऊँगा. कोई मुझे पीटेगा नहीं, कोई मेरे घर या दफ़्तर पर हमला नहीं करेगा.

इसीलिए इस बड़े शहर में छोटा आदमी होने के कुछ फायदे भी हैं जो कि मैं उठा रहा हूँ.

'' मुस्कुराइए जनाब ये.... ''

पारुल अग्रवाल पारुल अग्रवाल | सोमवार, 12 दिसम्बर 2011, 12:09

टिप्पणियाँ (21)

मेरा ननिहाल लखनऊ का है. गर्मियों की छुट्टियों में लखनऊ जाना, तपती दोपहर में दशहरी आम की दावत उड़ाना और नानी के साथ अमीनाबाद, हज़रतगंज की सैर का हमें साल भर इंतज़ार रहता था.

हम उन दिनों एक छोटे शहर में रहते थे और लखनऊ हमारे लिए बड़े शहर की वो खिड़की थी जिससे हर पल कुछ नया, कुछ रंगीन दिखता था.

गर्मियों की ऐसी ही एक शाम अमीनाबाद की भीड़भाड़ से गुज़रते हुए अचानक मेरी नज़र चाय की एक दुकान पर पड़ी जिसके एक कोने में लटकी तख़्ती पर लिखा था, ''मुस्कुराइए जनाब ये लखनऊ है.....''

गलियों, दीवारों, जगहों से प्यार हो जाने की मेरी आदत पुरानी है और इस एक पंक्ति ने जैसे लखनऊ शहर के लिए मेरे प्यार को शब्द दे दिए.

पिछले 16 साल से मैं दिल्ली में रह रही हूं लेकिन इसे मेरी बेरुखी कहें या इस शहर में बस आगे बढ़ते रहने की गफ़लत कि 16 साल तक दिल्ली से मेरा नाता केवल बस और उसके कंडक्टर सा रहा. जो बस में सफ़र तो हर दिन करता है लेकिन पहुंचता कहीं नहीं.

लेकिन नई दिल्ली के सौ साल की कहानी को बीबीसी के पाठकों से साझा करने के लिए पिछले कुछ महीनों में इस शहर को मैंने जिस नज़रिए से देखा और महसूस किया उसे शब्दों में बयां करना ही इस ब्लॉग को लिखने का मकसद है.

सौ साल की इस कड़ी ने पहली बार मुझे उस दिल्ली से रूबरू कराया जो गुमनाम इतिहास की तरह सड़कों के किनारे, गलियों के बीच, घरों के पिछवाड़े हर जगह बसती है. ये वो दिल्ली है जिसके दरवाज़े कभी लाहौर, तुर्क़िस्तान, कश्मीर या अजमेर को जाया करते थे, वो दिल्ली जिसमें सराय थे, किले थे, रौशनारा बाग़ थे.

ये वो दिल्ली है जिससे बुलबुल-ए-खाना की गलियों से गुज़रते अचानक मुलाकात हो जाती है. जो मुझे ले जाती है मलिका-ए हिंदुस्तान रज़िया सुल्तान की उस गुमशुदा कब्र पर जिसकी आखिरी सल्तनत अब वाकई सिर्फ़ दो गज़ ज़मीन है.

इतिहास के ऐसे कितने की पीले पन्ने इस शहर में बिखरे पड़े हैं लेकिन अफ़सोस कि उन्होंने सहेजने का टेंडर अभी पास किया जाना बाकी है! रज़िया सुल्तान को वहीं सोता छोड़ कर और इतिहास के इन पन्नों के कोने मोड़कर हर बार मैं आगे तो बढ़ी लेकिन वापस लौटने के कई वादों के साथ.

कुलमिलाकर दिल्ली अब मेरे लिए सिर्फ़ घर का पता नहीं है. ये वो शहर है जिसकी कई गलियों, बाज़ारों ने मुझसे अपने सुख-दुख की कहानी बांटी है. यही वजह है कि इस शहर की हवा अब मेरे लिए और ज़्यादा ताज़ी है.

इस शहर के हर बुज़ुर्ग से अब किस्से-कहानियों की महक आती है और सड़कों से गुज़रते अब मुझे लगता है कि हर खंडहर-इमारत से मेरी पुरानी रिश्तेदारी है.

दिल्ली के सामने अब मैं भले ही खुद को बहुत छोटा और बौना महसूस करती हूं लेकिन यही वो एहसास है जिसके साथ इस शहर में बाकी की उम्र गुज़रेगी. शहर की भीड़ में अब मैं जब-जब अकेली पड़ूंगी इन गलियों, इलाकों, इमारतों से ही गुफ़्तगू होगी.

सफ़र अभी लंबा है और दिल्ली की ये कहानी सिर्फ एक पड़ाव था. खबरें और होंगी, श्रृंखलाएं और बनेंगी लेकिन इस शहर में जीते जी सबसे पहले अब मेरी खोज एक ऐसे कोने की है जहां मैं भी हर आने-जाने वाले के लिए लिख सकूं, मुस्कुराइए जनाब ये दिल्ली है.....

ये दिल्ली और वो दिल्ली!

शालू यादव शालू यादव | बुधवार, 07 दिसम्बर 2011, 19:49

टिप्पणियाँ (17)

जब दिल्ली के बारे में अपने विचार काग़ज़ पर उतारने का मौक़ा मिला, तो यमुना किनारे जाने से ख़ुद को रोक नहीं पाई...क्योंकि शायद यमुना नदी ही सबसे बड़ी गवाह है दिल्ली में तेज़ी से हुए बदलाव की.
 
मजनूँ का टीला गुरुद्वारे के पास और तिब्बती कॉलोनी के ठीक पीछे, सड़क की भीड़-भाड़ से दूर एक ठहराव है, जो मजबूर करता है अपने अतीत को फिर से जीवित करने को.

कहने को तो मैं 'असली दिल्लीवाली' हूं, क्योंकि मेरा जन्म और परवरिश यहीं हुई, लेकिन जिस दिल्ली में मैंने बचपन गुज़ारा, वो आज की दिल्ली से बहुत अलग है.

मुझे याद है, जब मैं पांच साल की थी, तब इसी दिल्ली में मेरे दादा-दादी के पास खेत और गाय-भैंसें हुआ करती थीं. शहर का जो इलाक़ा आज रोहिणी के नाम से जाना जाता है, वो एक समय जंगल हुआ करता था. वहीं हमारे खेत थे, जो बाद में सरकार ने ज़बरन ख़रीद लिए थे.

याद है मुझे, मेरी मां खेत से लौटते हुए अपने सिर पर गाय-भैंसों के लिए चारा लेकर आती थी. हमारे 'घेर' (तबेले) में चार भैंसे और एक गाय थी. मुझे और मेरे भाई-बहनों को हर साल बस नए बछड़े या बछिया को देखने की उत्सुकता रहती.

अब न तो वो 'घेर' अपनी जगह है, न ही वो हमारा वो देहातनुमा जीवन... हम अब 'रोहिणी वाले' जो हो गए हैं.

अजीब विडंबना है कि जिस ज़मीन पर कभी हमारे ही खेत होते थे, उसी ज़मीन की एक टुकड़ी हमें सरकार से ख़रीद कर अपना आशियाना बनाना पड़ा.

इसकी पृष्ठभूमि ये है कि उस समय दिल्ली में हो रही 'उन्नति' की लहर ने मेरे मां-बाप के सपनों को भी छुआ.

और फिर एक दिन उन्होंने ठानी कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और प्रगतिशील वातावरण देने के लिए उन्हें गांव (समयपुर, बादली) से निकल कर किसी मॉडर्न कॉलोनी में जा कर बस जाना चाहिए. और फिर हम रोहिणी आ गए.

यहां आकर हमें दिल्ली की 'शहरी हवा' लगी और उसके अनुरूप हमने अपनी ज़िंदगी को ढाल लिया.

ये ब्लॉग लिखते समय मैं ये दावे से कह सकती हूं कि दिल्ली में ऐसे सैंकड़ों नौजवान होंगें, जिनके जीवन ने भी मेरे जीवन जैसा ही मोड़ लिया होगा.

आख़िरकार, ऐसे कितने ही जंगलों और खेतों में इस शहर का विस्तार हुआ है पिछले कुछ दशकों में.

मेरी नज़र में दिल्ली उस विशाल वृक्ष का नाम है, जिसकी शाखाएं तेज़ी से फैल रहीं हैं, लेकिन फिर भी इसकी छाया सभी पर एक समान नहीं पड़ती.

इस पेड़ पर 'सपने' नामक करोड़ों रंग-बिरंगे फल लटकते हैं. किसी की छलांग उन फलों को लपक लाती है, तो किसी को सिर्फ़ उन फलों को दूर से देखकर ललचाने का ही मौक़ा मिल पाता है. 

बड़ा ही विचित्र शहर है दिल्ली.

यहां की सड़कें और चौड़े फ़्लाईओवर दिन के उजाले में इसकी समृद्धि बयान करते हैं, तो रातों को वही सड़कें और फ़्लाईओवर चीख-चीख कर यहां की ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते हैं.

आज तक ये 'दिल्लीवाली' भी इस शहर के विरोधाभासी स्वरूप को समझ नहीं पाई है. आख़िर है क्या दिल्ली?

ये सवाल ख़ुद से करते ही, मेरे दिमाग़ में विभिन्न तस्वीरें उभर आती हैं--

दिल्ली उस गुफ़्तगू में बसती है, जो डीटीसी की बसों में बैठे सरकारी 'बाबुओं' के बीच होती है.

दिल्ली उस मेट्रो ट्रेन में बसती है, जिसमें अमीर से अमीर और ग़रीब से ग़रीब लोग एक दूसरे से चिपक कर सफ़र करते हैं.

दिल्ली उस नन्हे से बच्चे में बसती है, जो चंद रुपए कमाने के लिए सड़क के बीचों-बीच कलाबाज़ियां दिखाता है.

दिल्ली उस मध्यम-वर्गीय इंसान में बसती है, जो नोएडा, गुड़गांव या ग़ाज़ियाबाद में एक घर ख़रीदने का सपना रखता है.

दिल्ली उस बूढ़ी अम्मा में बसती है, जो निज़ामुद्दीन दरगाह आने वालों के जूते-चप्पल संभालने के लिए तीन रुपए चार्ज करती है लेकिन आशीर्वाद मुफ़्त देती है.

दिल्ली उस रिक्शेवाले में बसती है, जो यहां रहते-रहते, यहां के तेज़ी से भागते संघर्ष का आदी हो गया है.

वैसे दिल्ली उस मिज़ाज में भी बसती है, जिसमें हर नियम का तोड़ किसी न किसी तरीक़े से निकाल ही लिया जाता है.

मेरे दिमाग़ में घूम रही इन सभी तस्वीरों के बीच का आपस में एक नायाब कनेक्शन है, जो कई ख़ामियों के बावजूद भी इस शहर को सही मायनों में 'सपनों का शहर' बनाता है.

यूं ही नाराज़ हो रहे हैं सिब्बल

सुशील झा सुशील झा | मंगलवार, 06 दिसम्बर 2011, 13:25

टिप्पणियाँ (31)

प्रिय कपिल सिब्बल जी,

मुजे आज भी याद है जब मैं आपको कांग्रेस के प्रवक्ता के तौर पर टीवी पर देखा करता था और आपके हर तर्क पर मुग्ध हो जाता है ये सोच कर कि ये आदमी कितने अच्छे से कितनी विनम्रता से अपनी बात कहता है.

ये बात अधिक पुरानी भी नहीं है दस बारह साल पहले की है. आज जब आपको टीवी पर एक मंत्री की हैसियत से कुछ कहते हुए देखता हूं तो बड़ी कोफ्त होती है.

इंटरनेट पर आपत्तिजनक तस्वीरों आदि आदि पर आप इतने नाराज़ क्यों हैं. ये मेरी समझ से बाहर है. फेसबुक, गूगल और सोशल नेटवर्किंग कंपनियों के अधिकारियों ने आपकी घुड़की नहीं मानी आप उससे भी नाराज़ लगते हैं.

जिस तरह से आप अपने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के साथ घटिया व्यवहार कर रहे थे वो भी कई लोगों को आपत्तिजनक लग सकता है लेकिन आपके लिए कोई नियम लागू नहीं होता क्योंकि मंत्री तो आज़ाद है और देश भी स्वतंत्र है.

आप तो टेलीकॉम मिनिस्टर हैं लेकिन लगता है कि आपको इंटरनेट की दुनिया के बारे में शायद ही कुछ पता है. इस दुनिया में मेरे जैसे छोटे मोटे लोग भी गालियां खाते हैं और आलोचना सहते हैं.

आपके बयान पर जाने माने एक पत्रकार ने ट्विटर पर आपका समर्थन किया तो उनको मिनटों के भीतर गालियां पड़ी लेकिन उन्होंने पलट के ट्विटर को नियंत्रित करने की बात नहीं कही.

लेकिन आप तो मंत्री हैं आप कुछ भी कर सकते हैं. सूचना की लड़ाई है कपिल जी...आपको लड़ना है तो आइए इस युद्धभूमि में. सूचना को सूचना से काटिए अपनी कुर्सी की ताकत से नहीं.

आपत्तिजनक फोटो हैं उसकी शिकायत कीजिए. सरकारी कार्यलय तो नहीं लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर इसे ब्लॉक भी किया जा सकता है.

मैंने खुद कई बार उन तस्वीरों पर आपत्ति जताई है जिसमें से शायद कुछ तस्वीरें आपने भी पत्रकारों को दिखाई हों.

हां और अगर आप सोच सकें तो थोड़ा सोचें कि लोग सोशल नेटवर्किंग पर ही सरकार को क्यों निशाना बना रहे हैं क्योंकि शायद अख़बार लोगों की बात नहीं सुन रहा है और उनकी बात लिख नहीं रहा है.

सरकारों का प्रवक्ता बन चुकी मीडिया के युग में सोशल नेटवर्किंग ने एक हथियार दिया है आम लोगों को. इस हथियार को छीनने की कोशिश मत कीजिए. लड़ना है तो इस क्षेत्र में उतरिए और लड़िए.

आशा है आप ये पत्र नहीं पढ़ेंगे क्योंकि ये पत्र भी ऑनलाइन छापा जाएगा और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटों पर शेयर किया जाएगा....जो आप खुद शायद ही देखते होंगे..

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