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इच्छा मृत्यु लेकिन किसकी इच्छा..?

सलमा ज़ैदी सलमा ज़ैदी | सोमवार, 07 मार्च 2011, 12:33 IST

अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लेखिका पिंकी वीरानी की यह अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी कि अरुणा की हालत को देखते हुए उनकी मौत की अनुमति दी जाए.

अरुणा जिस अस्पताल में पिछले 37 साल से बिस्तर पर हैं वहाँ के डॉक्टरों और नर्सों ने इस फ़ैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि वे आजीवन अरुणा की देखभाल करने के लिए तैयार हैं.

अरुणा इस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने की स्थिति में नहीं हैं. यानी उन्हें ज़िंदा रखने या न रखने की बहस में उनका कोई योगदान नहीं है..

अब अरुणा के दिल की हालत कौन समझे. कहते हैं हरेक को जान प्यारी होती है और कोई भी मरना नहीं चाहता.

तो साथ ही यह भी सुना है कि हे ईश्वर, ऐसी ज़िंदगी से तो मौत भली.

अरुणा किस मनोदशा से गुज़र रही हैं यह वह ही जानती हैं.

एक तरह से इच्छा मृत्यु के विरोधियों का तर्क सही है कि अगर एक बार इसकी अनुमति दे दी गई तो ऐसे मामलों का अंबार लग जाएगा और यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि किसमें पीड़ित व्यक्ति की सहमति है और किसमें उसके तीमारदारों का फ़ायदा.

लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि टर्मिनल इलनेस यानी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे और असहनीय पीड़ा भुगत रहे रोगी को कृत्रिम मशीनों के ज़रिए जीवित रखना कितना मानवीय है.

यह एक ऐसा मामला है जिस पर लोग बोलने से कतराते हैं.

ज़रूरत है एक राष्ट्रव्यापी बहस की जिसमें सबको अपनी राय रखने का मौक़ा मिले.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:41 IST, 07 मार्च 2011 priti:

    अगर मरीज़ का कोई नहीं है और उसके पास कोई जमापूँजी भी नहीं है तो उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाए. बस अगर इसमें किसी को आर्थिक लाभ न मिले तो शायद यह मरीज़ को दयनीय जीवन से मुक्ति होगी.

  • 2. 13:46 IST, 07 मार्च 2011 vinay shankar:

    भारत जैसे देश में कानून का उपयोग से अधिक दुरुपयोग होता है. वहाँ इस तरह के कानून न ही बनें तो अच्छा है . नहीं तो अच्छे भले चलते आदमी के नाम कब वारंट निकल जाएगा पता नहीं.

  • 3. 14:22 IST, 07 मार्च 2011 भूपेश गुप्ता :

    अरुणा कोमा में है, फिर भी कभी कभी रोती है, किसी भी पुरुष की आवाज से डरती है. यानी उसका दिमाग समझ सब कुछ रहा है, अलबत्ता प्रतिक्रया नहीं दे पा रहा है. अपनों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है. इसका मतलब ये हुआ की वो घुट-घुटकर ज़िंदा है.
    सलमा जी सवाल अरुणा की दया मृत्यु का फिर भी नहीं बनता, क्योंकि अस्पताल के लोगों का मोह उसके साथ अपनों से भी ज़्यादा है, ये भी अरुणा का दिमाग समझ रहा है. लेकिन सवाल तो उन सैकड़ो लोगों का है जो मृत्यु की शैया पर हैं, और उनके अपने लोग इलाज जारी रखने की हैसियत में भी नहीं रहे. यानी जीते-जी मर रहे है. सरकार से कोई मदद भी नहीं, ऊपर से भ्रष्टाचार के चलते उनका हिस्सा भी सरकारी दामाद हड़प रहे हैं.
    ऐसे कई उदाहरण हैं मेरे और आपके पास. आप ही बताएं - अदालत जाकर दया मृत्यु की याचिका भी ये कैसे लगाए? विरानी जी सिर्फ तारीफ़ के काबिल होकर रह गयीं. लेकिन इन सैकड़ो लोगो की खातिर कोई समाजसेवी आगे आकर भी क्या कर लेगा, सिर्फ प्रशंसा में कुछ कसीदो के सिवा. सलमा जी आइये कुछ देर के लिए हम पत्रकारिता छोड़कर सिर्फ आंसू की कुछ बूंदे गिरा लें, अपने हिन्दुस्तानी समाज की बेबसी पर....

  • 4. 15:06 IST, 07 मार्च 2011 Raj:

    उसे इतनी दयनीय अवस्था से मुक्ति दिलाई जानी चाहिए.

  • 5. 15:23 IST, 07 मार्च 2011 Neena Pant Bhatt:

    पहले हम हर जीने की चाह रखने वाले जरूरतमंद को तो बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सुवि‍धांए उपलब्‍ध कराना सुनि‍श्‍चि‍त करें तब ऐसे कानून का समय आएगा, ऐसी तकनीकें भी वि‍कसि‍त करना होंगी जि‍ससे यह मापा जा सके कि‍ मरीज के लि‍ये पीड़ा से अच्‍छा वि‍कल्‍प मृत्‍यु होगी।

  • 6. 15:55 IST, 07 मार्च 2011 naval joshi:

    यह खतरनाक स्थिति है कि इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देना पडा। किस तरह इच्छा मृत्यु के पक्ष में लोग अदालत में बहस कर पाये होगें यह कल्पना से बाहर की बात है।बहस तो केवल उन्हीं विषयों पर होती रही है, जिसमें अपना और दूसरों के हित टकराते है।बहस करने वाले अच्छी तरह समझते है कि यदि वे सत्य के साथ है भी तो केवल अपने स्वार्थ के कारण। इनका सत्य से कुछ भी लेना देना नहीं ,सत्य की केवल दुहाई दी जाती है।राजनीतिक मंचों आर्थिक लाभ या फिर निहित स्वार्थों के लिए बहस होती रहती है, लेकिन इच्छा मृत्यु के लिए बहस करना असम्भव है। और यह असम्भव कार्य अरूणा के नाम पर दूसरों ने कैसे किया होगा यह आश्चर्य है।
    दरअसल इच्छा मृत्यु कोई बात होती ही नहीं है।यदि मृत्यु की भी इच्छा है, तो स्पष्ट है कि इच्छा करने वाला मन तो अभी सजग है ।अन्यथा इच्छा की बात कौन कर रहा है?और जब तक मन सक्रिय है तब तक मृत्यु की इच्छा कैसे हो सकती है। कुछ लोग रोगी की पीडा का हवाला देते हैं,इसका मतलब यह हुआ कि पीडाओं से मुक्ति के लिए मौत को जायज मान लिया जाए, इस तरह तो देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की पीडा के लिए कोई समाज और सरकार कोई कसूरवार नहीं होगा जो पीडित है उसे मर जाना चाहिए। लेकिन इस तर्क का एक और पक्ष झूठा है जो कहता है कि उसको असह्य पीडा में जीना पड रहा है। जब पीडा असह्य होगी है तो उसका स्वाभाविक परिणाम मौत है ही फिर उसे जहरीला इंजैक्शन क्यों दिया जाना चाहिए।
    कहीं ऐसा तो नहीं कि यह स्थिति से उकता गये लोगों की दलील हो।कुछ लोग परिस्थितियों से निराश हो सकते है। इसमें कोई शर्म नहीं होनी चाहिए,लेकिन इसके पक्ष में दलीलें पेश करना तो निश्चित ही शर्मनाक है।

  • 7. 16:54 IST, 07 मार्च 2011 Bhim Kumar Singh:

    आपने ठीक ही कहा है, मरने की इच्छा शायद किसी को नहीं होती। फिर बहस किस बात का। यदि लाइलाज बीमारी या असह्यï पीड़ा का हवाला देकर मृत्यू की इच्छा जाहिर की जाती है तो बहस इस बात की नहीं होनी चाहिए कि उसे इसकी अनुमति दी जाए अथवा नहीं, बल्कि बहस का मसला यह होना चाहिए कि इस हालत तक लोग पहुंचते कैसे हैं? कौन जिम्मेदार है इस तरह की हालत पैदा होने के लिए। जो किसान आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाते हैं, उन्हें उस हालात तक पहुंचाने वाले कौन लोग हैं और उन्हें किस तरह की सजा मिलनी चाहिए। इस मसले पर बहस होनी चाहिए। मैं समझता हूं कि सर्वोच्च अदालत अपनी जगह सही है। यदि किसी भी तरह की इच्छा जाहिर हो रही है, तो समझा जाएगा कि इंसान जीने के काबिल है, ऐसे में उसे मार डालने की अनुमति देने या न देने पर बहस करना तो दुर्भाग्यपुर्ण ही माना जाएगा।

  • 8. 16:54 IST, 07 मार्च 2011 braj kishore singh.hajipur,bihar:

    सलमा जी मेरे हिसाब से किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति को ईच्छा-मृत्यु की अनुमति या इसका अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए. जीवन अनमोल है और इसे देने और लेने का अधिकार सिर्फ ईश्वर को है इसलिए तो हत्या करनेवाले को सजा का प्रावधान है. फिर इस अधिकार का दुरुपयोग भी हो सकता है और इसकी आड़ में एक तरफ तो आत्मा हत्या तो दूसरी ओर हत्या के मामले बढ़ जाएँगे.

  • 9. 17:24 IST, 07 मार्च 2011 RAJ KISHORE JHA:

    यह सच है कि हमारा क़ानून दया मृत्यु की इजाज़त नहीं देता. पर कुछ ऐसा तो करना ही होगा कि जिस दरिंदे ने अरुणा की यह हालत की उसे भी मौत की भीख मांगनी पड़े. क्या सात साल की सज़ा काफ़ी है. इस पर भी तो बहस हो तो बेहतर होगा.

  • 10. 17:28 IST, 07 मार्च 2011 इन्दु भूषण ओझा:

    कोमा मेँ जी रहे व्यक्ति के लिए जीवन मरण की बात ही बेमानी है ।लगातार यंत्रणा भुगत रहे लोगोँ के लिए कुछ तो रास्ता निकाला ही जाना चाहिए।

  • 11. 20:07 IST, 07 मार्च 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, अरुणा को इस हालत में लानेवाले इंसान को सिर्फ़ सात साल की सज़ा और निर्दोष अबल अरुणा 37 साल से सज़ा भुगत रही है. कौन से क़ानून का इंसाफ़ है यह. अगर जज साहब को फ़ैसला ही देना था तो यह देना चाहिए था कि अरुणा की पूरी देखभाल उसकी यह हालत करने वाले के परिवार को करनी पड़ेगी. मैं सैल्यूट करता हूँ अरुणा के अस्पताल के स्टाफ़ को जिन्होंने अरुणा की ऐसी सेवा की है जो आज के ज़माने में बच्चे भी अपने माँ-बाप की नहीं करते.

  • 12. 21:21 IST, 07 मार्च 2011 SHAHNAWAZ ANWAR, MUNGER_ SAHARSA (BIHAR):

    सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला बिलकुल सही है. हर एक को अपनी ज़िंदगी प्यारी है. लेकिन वह जान जिसे न अपनी हालत की ख़बर है और न ही अपने आप की, उस बेज़ुबान को हम अपनी अपनी सहूलत के हिसाब से मार दें यह कैसी इंसानियत है. एक तरफ़ ख़ुद को ज़िंदा रखने और दुनिया के ऐशो आराम के लिए शरीर के बेजान अंगों को बदल कर कृत्रिम अंग लगा लेते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ हम मौत चाहते हैं. शर्म आती है ख़ुद को मानव कहने पर.

  • 13. 22:12 IST, 07 मार्च 2011 Satnam Singh:

    मैं समझता हूँ कि अरुणा को मौत मिलनी चाहिए क्योंकि अब उनके जीने का मक़सद क्या रह गया है. तो फिर ज़िंदा रह कर क्या करेंगी. उनके लिए रफ़ी साहब के यह शब्द याद आते हैं कि, 'यह दुनिया यह महफ़िल मेरे काम की नहीं'. पर मैं जानना चाहता हूँ कि अब यह मानवाधिकार संगठन वाले कहाँ गए हैं. जब किसी को फाँसी की सज़ा होती है तो चीख़ते हैं कि फाँसी नहीं मिलनी चाहिए, यह अत्याचार है. पर इस सब के लिए ज़िम्मेदार कौन है. जो ज़िम्मेदार है उसको सज़ा मिली और आज आज़ाद घूम रहा होगा. पर उस लड़की का क्या क़सूर था जिसकी ज़िंदगी ही ख़त्म हो गई.

  • 14. 06:56 IST, 08 मार्च 2011 Najim:

    अदालत का फ़ैसला सही है.

  • 15. 11:56 IST, 08 मार्च 2011 Gurpreet:

    मुझे लगता है पिंकी वीरानी सस्ती लोकप्रियता पाना चाहती हैं. डॉक्टर कह ही चुके हैं कि अरुणा को डर महसूस होता है, खाने और लोगों के लिए पसंद या नापसंद है तो वह दिमाग़ी तौर पर कैसे मर चुकी हैं? उनके अंदर अब भी कुछ ज़िंदा है. पिंकी को कुछ रचनात्म करने में समय व्यतीत करना चाहिए अरुणा को मारने के प्रयास में नहीं क्योंकि एक दानव पहले ही ऐसा कर चुका है.

  • 16. 12:06 IST, 08 मार्च 2011 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है ! हमारे देश में यह अपने आप में अनछुआ पहलू है व इसके पक्ष व विपक्ष के तमाम पहलुओं पर बहस होना आवश्यक है ! अंतत: जीवन और मृत्यु पर इंसान फैसला करने वाला कौन होता है ? फिर भी क़ानून व इंसानियत के दायरे में लिए गए फैसले सर्व माननीय होने चाहिए ! ऐसे क़ानून बनाते समय रोगी व परिवार की दशा व सहमती को ध्यान में रखकर सकारात्मक फैसलों की आवश्कता होनी चाहिए ! इच्छा मृत्यु का कानून बने और इस बाबत सकारत्मक सोच को प्राथमिकता दी जाए ! वैसे देखा जाए तो इसके विपक्ष में बोलने वालों की भी कमी न होगी ! और कन्या भ्रूण हत्या में ऐसे ही लोग लिप्त मिलेंगे!

  • 17. 12:45 IST, 08 मार्च 2011 MD ZAKI:

    सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लेखिका पिंकी वीरानी की अर्ज़ी नामंज़ूर करना एक स्वागतयोग्य एवं महत्वपूर्ण कदम है। शानबाग दिमागी रूप से सक्रिय हैं, और अपनी प्रतिक्रिया भी देती हैं। साथ ही जब अस्पताल के डॉक्टर और नर्स आजीवन अरुणा की देखभाल करने के लिए तैयार हैं, तो उनको मौत देने की अनुमति लेना ही नहीं चाहिए था। लेकिन अगर कोई व्यक्ति जिनकी हालत में सुधार की कोई गुंजाइश न हो और सिर्फ लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने भर से उनकी मौत हो जाए। तो ऐसी हालत में उसे पैसिव युथनेसिया की कैटिगरी में लाए जाने चाहिए। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इच्छा मृत्यु पर अभी देश में कोई कानून नहीं है, इसलिए जब तक संसद कानून नहीं बनाती है उसका फैसला मान्य रहेगा।
    लेकिन अगर कोई व्यक्ति सालों से निष्क्रिय अवस्था में लाइफ सपोर्ट पर पड़ा है और रिकवरी की कोई संभावना नहीं है, तो अवश्य ऐसी मांग पर विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए डॉक्टरों के एक पैनल यह तय करने के लिए बनाना चाहिए कि उस व्यक्ति के बचने और जीवन में लौटने की कोई संभावना बची है या नहीं। अगर ऐसी कोई संभावना नहीं है, तो ऐसे में मृत्यु कई समस्याओं से छुटकारे के रूप में सामने आती है। लेकिन इसके लिए भी देश में कायदे - कानून और दिशानिर्देश तय किए जाने चाहिए और यह काम कोर्ट पर नहीं छोड़ा जाना जाना चाहिए।

  • 18. 16:47 IST, 08 मार्च 2011 shambhu kumar:

    देखिए, यूथेनेसिया या इच्छा मृत्यु पर जितनी बहस की जाए कम है. लेकिन मुझे लगता है कि पीड़ित की स्थिति को देखते हुए यह फ़ैसला लेना चाहिए. इसमें कुछ क़ानूनी प्रबंधन करने की आवश्यकता है. सरकार को इस मुद्दे पर एक ज़ोरदार बहस करानी चाहिए और आम आदमी को राय भी मांगनी चाहिए.

  • 19. 16:58 IST, 08 मार्च 2011 shanbhu kumar:

    सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला अपनी जगह सही है लेकिन वास्तविकता अपनी जगह. जो शख़्स 37 साल से ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा हो, जिसे हर पल डॉक्टर की निगरानी में रखा हो, क्या वह ऐसी ज़िंदगी से मौत को बेहतर नहीं समझेगा. मैं हर किसी की भावनाओं का आदर करता हूँ. पर इसे हक़ीक़त से जोड़ कर नही देखना चाहिए. क्योंकि 37 साल बहुत होते हैं और इस दरमियान कोमा में रहना, इससे अच्छी तो मौत है. पर हमेशा ऐसा नहीं होता. यह मरीज़ की हालत को देख कर फ़ैसला लेना चाहिए.

  • 20. 15:16 IST, 09 मार्च 2011 Manu:

    आम आदमी की राय के अलावा पीड़ित के हर क़रीबी व्यक्ति की राय पर गहरी सकारात्मक सोच के बाद ही कोई फ़ैसला होना चाहिए.

  • 21. 06:25 IST, 15 मार्च 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    सलमा जी राष्ट्रीय बहस कराकर स्थितियों से नहीं निपटा जा सकता 'आज बहस इस पर होनी चाहिए की राष्ट्रीय है क्या ?' ईक्षा मृत्यु दरअसल जीवन की हार का हर स्तर पर होना ही है. यदि हम चाहते हैं की यह हार न हो तो बीमार देश का 'इलाज' ढूढ़ना होगा,क्योंकि अस्पताल 'अरुणा' के हाल पर जो कुछ कर रहा है वह तो बेमिशाल है. पर बीमार देश के साथ...............!

  • 22. 11:18 IST, 18 मार्च 2011 Yogesh Srivastava:

    बहस से ज़्यादा ज़रूरी है जल्द फ़ैसला.

  • 23. 21:53 IST, 19 मार्च 2011 awanish kumar :

    इच्छा मृत्यु ठीक है या ग़लत ये बात हालात पर निर्भर है. जैसा कि अरुणा मामले में अदालत ने फ़ैसला सुनाया है. लेकिन मेरे विचार से अगर किसी को ऐसा रोग हो गया है जिसका उपचार नहीं है तो उसे सारे नैतिक मुल्यों को सामने रखते हुए इच्छा मृत्यु मुनासिब ढंग से दी जानी चाहिए.

  • 24. 12:13 IST, 21 मार्च 2011 anubha gupta:

    अरूणा की ज़िंदगी और मौत के फ़ैसले से ज़्यादा ज़रूरी है उसके पापी को सज़ा देना जो बेख़ौफ़ आज़ाद घूम रहा है.

  • 25. 11:00 IST, 24 मार्च 2011 Namaskar Meditation:

    जब किसी को भगवान् नहीं मार रहा है तो इन्सान कोन होता है उसकी मौत के बारे में निर्णय लेने वाला |

  • 26. 21:47 IST, 02 अप्रैल 2011 Prashant Kumar:

    आपने जो राष्ट्रीय बहस की ज़रूरत समझाई है वह बिलकुल लाज़मी है लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इससे मुद्दों का समाधान निकाला जा सकता है क्योंकि यहाँ अलग-अलग मुद्दों पर हरेक की अलग-अलग राय है.

  • 27. 14:46 IST, 23 सितम्बर 2011 kartik chaaran jnu:

    मेरा मानना है कि इच्छा मृत्यु को क़ानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए .

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