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कड़वी व्यवस्था का दंश

पंकज प्रियदर्शी पंकज प्रियदर्शी | शनिवार, 18 दिसम्बर 2010, 09:58 IST

सुना था, पढ़ा था, लेकिन देखा और सोचा नहीं था. आप सोचेंगे मैं क्या पहेलियाँ बुझा रहा हूँ. लेकिन बात ही कुछ ऐसी है.

बहुत पहले कैफ़ी आज़मी ने एक नज़्म लिखी थी...

हुई है अबकी ख़ुदा जाने कैसी चकबंदी
कि मेरी लाश किसी और की मज़ार में है.....

सोचता हूँ वर्षों पहले लिखी इस नज़्म में व्यवस्था पर प्रहार कितना जायज़ था. व्यवस्था को गरियाते-गरियाते वर्षों बीत गए. लोकतंत्र की दुहाई देते-देते दम निकल गया.

लेकिन ऐसी व्यवस्था कड़वे नीम की तरह न सिर्फ़ क़ायम है बल्कि क़दम-क़दम पर लोगों की खटिया खड़ी करने पर उतारू भी है.

पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेल भारत में आयोजित हुए. कई विवाद हुए और विवाद चल भी रहे हैं. चलते रहेंगे. लेकिन मेरे साथ जो हुआ, वो कई मायनों में अनोखा है.

हुआ यों कि राष्ट्रमंडल खेलों की करवेज के लिए हमें तो मीडिया पास मिलने थे, उससे पहले हमारा पुलिस वेरिफ़िकेशन होना था.

पुलिस वेरिफ़िकेशन का क्या हुआ, हमें पता नहीं चला. लेकिन हमें हमारा पास ज़रूर मिल गया. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हमने कवरेज में हिस्सा भी लिया.

बातें पुरानी हो गई, दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की अच्छी-बुराई पर बहस भी थोड़ी थम सी गई. लेकिन मुझे सदमा सा उस समय लगा, जब राष्ट्रमंडल खेल समाप्त होने के दो महीने बाद पुलिस की टीम मेरे बिहार स्थित घर पर पहुँच गई.

माँ का फ़ोन आया- बेटा तुम्हारे बारे में पूछताछ करने पुलिस आई है. मैं थोड़ा घबराया. सोचा ऐसा क्या हो गया कि पुलिस घर पहुँच गई.

बाद में पता चला राष्ट्रमंडल खेलों के मीडिया पास जारी होने से पहले की प्रक्रिया अब पूरी हो रही है. पुलिस हमारे वेरिफ़िकेशन के लिए वहाँ पहुँची थी. वो भी उस समय जब राष्ट्रमंडल खेल ख़त्म हुए दो महीने हो चुके हैं.

पुलिसवालों ने मेरे माँ-बाबूजी से मेरे बारे में सवाल किया....तस्वीरें मिलाई और चलते बने.

मैं सही व्यक्ति तो हूँ, मेरे ख़िलाफ़ कोई गंभीर मामला तो नहीं, कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं- ये सब जानकारी पुलिस उस समय हासिल कर रही है, जब मैं मीडिया पास की बदौलत राष्ट्रमंडल खेल गाँव, स्टेडियम से लेकर सुरक्षा के लिहाज से कई संवेदनशील क्षेत्रों में जा चुका था.

अब मेरे लिखने के लिए कुछ बचा नहीं है. आप ही सोचिए और फिर सोचिए कि दिन-प्रतिदिन, हर मिनट-सेकेंड व्यवस्था को गाली देने वाले कहाँ ग़लत हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:34 IST, 18 दिसम्बर 2010 E A Khan Jamshedpur :

    प्रियदर्शी जी, जो आपके साथ गुज़रा वह तो कुछ भी नहीं है. आपके साथ तो किसी हादसे वगैरह की बात नहीं थी. फिर भी आप पत्रकार हैं इसलिए बच गए. नहीं तो दो चार सौ रुपए की चपत तो आपके परिवार वालों को लगनी ही थी. बिहार में दरोगा का संधि विच्छेद इस प्रकार किया गया है- दा+ रोगा यानी दो चाहे रोकर ही. हिमालय से कन्याकुमारी तक पुलिस एक ही तर्ज़ पर कम करती है.

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  • 2. 13:25 IST, 18 दिसम्बर 2010 dkmahto:

    आपको क्या लगता है, जितनी ऊर्जा इस ब्लॉग को लिखने में लगाया वो हमारे समाज को बदलने में कुछ कारगर होगा? शायद नहीं. तो क्यों ना आप जैसे बुद्धिमान, ऊर्जावान लोग समाज सुधारक के रूप में सामने आएँ और कुव्यवस्था से दो-दो हाथ करें. हम लोग कब तक ये घड़ियाली आँसू बहाते रहेंगे. शायद जब तक धरती है...तब तक. मिर्ची लगी?

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  • 3. 15:52 IST, 18 दिसम्बर 2010 BHEEM SINGH:

    जाने भी दो यारों. मैं भाजपा को, सीडब्लूसी और सीपीएम, एसपी, आईएस, सचिव, राज्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, प्रधानमंत्री और आम संतरी को भी जानता हूँ. यहाँ तक कि पत्रकार भाई लोगों को भी भली भाँति जानता हूँ. ये सभी लोग वही ब्रांड के पानी पीते हैं, जो मैं पीता हूँ.

    मैंने एक मित्र को पूछा- बड़े दिन बाद मिला. वो बोला- जेल गया था. मैंने पूछा- क्यों भाई. वो बोला- घूस लेते पकड़ा गया. मैंने फिर बोला- जेल से बाहर क्यों घूम रहा है. वो बोला- घूस देकर बाहर आ गया.

    ए राजा और अन्य लोग यही रास्ता अपनाएँ. छोड़िए इन सब चीज़ों को, जाँच से कुछ भी बाहर नहीं आएगा.

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  • 4. 20:09 IST, 18 दिसम्बर 2010 anjani kumar:

    सबसे पहले धन्यवाद. लगातार दूसरा ब्लॉग बिहार पर. लेकिन ज़्यादा ख़ुशी होती अगर आप अपने विभाग में फैले भ्रष्टाचार पर भी कोई ब्लॉग लिखते.

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  • 5. 20:18 IST, 18 दिसम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    पंकज, आपके लेख से यह पता लगा कि आप भी बिहार से हैं. इसलिए बीबीसी पर बिहार की हर तरह की न्यूज़ आती है. रहा सवाल आपके वेरिफ़िकेशन का, तो पंकज जी यही तो महान भारत की पुलिस है. ख़ुशकिस्मत हैं कि आपको आतंकवादी नहीं घोषित किया, अन्यथा यह कहकर घरवालों से भोग चढ़वा कर ले जाते. सोचिए आपकी जगह कोई ग़रीब होता तो क्या होगा.

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  • 6. 00:33 IST, 19 दिसम्बर 2010 raj:

    मैं भी बिहार का हूँ. एक बार मेरा पासपोर्ट चोरी हो गया. पुलिस वेरिफ़िकेशन होने के बाद मुझे पासपोर्ट मिल भी गया. उसके तीन-चार महीने बाद फिर सीआईडी के लोग पहुँचे वेरिफ़िकेशन के लिए.

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  • 7. 00:59 IST, 19 दिसम्बर 2010 anand:

    कोई गंभीर मामला तो नहीं, कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं-........तभी तो पुलिस की हिम्मत आपके घर तक पहुँचने की हुई.

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  • 8. 08:39 IST, 19 दिसम्बर 2010 braj kishore singh, hajipur, bihar:

    पंकज जी आपकी बातों से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के समय सुरक्षा के प्रति कितनी लापरवाही बरती गई. अगर ऐसे मामलों में ज़िम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की परंपरा हमारे देश में रही होती तो शायद वह कुछ नहीं होता जो आपके साथ हुआ. हालांकि आपने जो कुछ भी कहा है वह सच है लेकिन दुर्भाग्यवश मजमून से बेशक वही मज़ा आ रहा है जो परसाईजी या शरद जी की व्यंग्य रचनाओं को पढ़कर आता. जय हो अंधेर नगरी की.

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  • 9. 08:56 IST, 19 दिसम्बर 2010 Rajesh Arora:

    पंकज जी, इससे पता लगता है कि दिल्ली से बिहार सूचना जाने में कितना समय लगता है पुलिस विभाग में. वो भी आज के ज़माने में, जहाँ इंटरनेट से ख़बर सेकेंडों में पहुँच जाती है. लगता है दारोगा लोगों को भी दो घंटे का इंटरनेट/ईमेल सेशन देना पड़ेगा.

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  • 10. 09:18 IST, 19 दिसम्बर 2010 Amit Rai:

    इसका मतलब आतंकवादी सीरियस नहीं थे. इन सुरक्षा कमियों का फ़ायदा नहीं उठा पाए.

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  • 11. 14:22 IST, 19 दिसम्बर 2010 Chandan mishra:

    दिल्ली पुलिस हो या किसी और राज्य की पुलिस, सबका यही हाल है मेरे भाई. शुक्र मनाओ कि तुम्हे आतंकवादी नहीं घोषित किया. जय हो पुलिस महाराज की.

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  • 12. 15:14 IST, 19 दिसम्बर 2010 Sandeep Mahato:

    पंकज जी हम सब जानते हैं कि देश में सुरक्षा व्यवस्था की हालत ठीक नहीं है और हर तरफ भ्रष्टाचार है. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार ही भारत उन देशों में से है जहाँ भ्रष्टाचार की चर्चा सबसे ज़्यादा होती है. corruption Index 2010 के अनुसार भारत का स्कोर 3.3 है जो सबसे अधिक भ्रष्ट देशों में आठवें नंबर पर है. लेकिन इनका रोना रोने से क्या फ़ायदा. इससे अच्छा होता कि आप लोगों को बताते कि इसके ख़िलाफ़ उन्हें क्या करना चाहिए. बस हम नेताओं को गलियां देते रहते हैं और करते कुछ नहीं.

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  • 13. 16:21 IST, 19 दिसम्बर 2010 Deepak:

    बस ब्लॉग लिख दिया. हो गया कर्तव्य की इतिश्री. आप तो पत्रकार हैं साहब. वर्चुअल दुनिया से बाहर निकलकर कुछ करिए. वरना यहाँ तो रिकॉर्ड में ज़िंदा साबित करने में लोगों की ज़िंदगी निकल जाती है.

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  • 14. 02:23 IST, 20 दिसम्बर 2010 Sanjay:

    मैंने अपने बेटे के पासपोर्ट के लिए उस समय आवेदन किया था, जब वो सिर्फ़ एक महीने का था. पुलिस वेरिफ़िकेशन के लिए आई और कहा कि मेरे बेटे को पुलिस स्टेशन आकर रिपोर्ट करनी होगी. मैं वेरिफ़िकेशन की बात समझ सकता हूँ लेकिन एक महीने के बच्चे को पुलिस वेरिफ़िकेशन के लिए पुलिस स्टेशन आने को कहने का क्या मतलब था. इसके बाद भी उन्होंने वेरिफ़िकेशन के लिए घूस लिया.

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  • 15. 10:38 IST, 20 दिसम्बर 2010 rajeev:

    देश की पुलिस व्यवस्था पर आपकी टिप्पणी लाजवाब है.

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  • 16. 11:22 IST, 20 दिसम्बर 2010 md.imteyaz alam:

    नमस्ते पंकज जी, आपने सही कहा यहाँ पुलिस वेरिफ़िकेशन में बहुत वक़्त लगता है. ऐसे मुद्दे उठाने के लिए शुक्रिया. आपकी तस्वीर देखी...लगा मैं ही हूँ....

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  • 17. 11:33 IST, 20 दिसम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    पंकज जी, जहाँ हज़ारों पत्रकार थे, वहाँ घर-घर जाकर वेरिफ़िकेशन करना ना तो आसान था और ना ही इसकी कोई ज़रूरत थी. लेकिन इन सबसे पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली का पता चलता है. आपने बीबीसी के मंच से ये बात उठा कर सरकारी विभाग को जो आईना दिखाया है, वो सराहनीय है.

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  • 18. 15:33 IST, 20 दिसम्बर 2010 jay bharat:

    हमें शर्म आनी चाहिए कि हमारी व्यवस्था इतनी लचर और ख़राब है. हम क्यों ख़ुद जग हंसाई पर तुले हैं.

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  • 19. 18:39 IST, 20 दिसम्बर 2010 Anmol Ratan:

    यह कुछ भी नहीं है. वाशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास ने हमारे दोस्त को पासपोर्ट के नवीनीकरण से पहले काफ़ी सताया. उनको बताया कि लखनऊ से पुलिस जाँच नहीं हो सकती. मेलबॉर्न और अन्य जगहों पर भी कमोबेश यही स्थिति है.

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  • 20. 02:23 IST, 21 दिसम्बर 2010 Sharma:

    आप अपने ब्लॉग में इतना सही लिखते हैं, मुझे समझ नहीं आता कि लोग समझते क्यों नहीं. लोग सच को स्वीकारते क्यों नहीं.

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  • 21. 01:12 IST, 25 दिसम्बर 2010 Tej Bahadur Yadav :

    ग़रीब और लाचार आदिवासियों के बीच रहकर उनकी तीमारदारी करने वाले एक डॉक्टर (बिनायक सेन) को शुक्रवार के दिन (24-12-2010) देशद्रोही करार दे दिया गया है. समाज ने कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया और ख़ुशियां ज़ाहिर की है, क्योंकि पूंजीपतियों का तलवा चाटते नज़र आने वाले समाज को अब एक मज़बूत न्यायिक आधार मिल गया है. छत्तीसगढ़ पुलिस ने जिस जनसुरक्षा अधिनियम के तहत बिनायक सेन को गिरफ़्तार किया गया था, उस क़ानून का वे तब से विरोध कर रहे थे, जब सरकार ने इसे लागू करने का फ़ैसला किया था, क्योंकि इस क़ानून में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के ख़िलाफ़ दुरुपयोग किए जाने की पर्याप्त धाराएँ हैं.

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  • 22. 01:34 IST, 26 दिसम्बर 2010 Pramod kumar, kaler, Arwal, Bihar:

    चलिए इसी बहाने लोगोँ का धयान तो इस ओर किया ना, दो दिन पहले कि बात है मुझसे बिहार विद्यालय परीक्षा समिति मेँ अपने सटिंफिकेट के सिलसिले मेँ संबंधित अधिकारी से मिलने के लिए गेट पर तैनात गार्डों द्वारा पैसा मांगा गया, नहीं देने पर नहीं जाने दिया, क्योंकि मेरे पास भाड़े से ज़्यादा पैसे नहीं थे. मै इस संदेश के ज़रिए प्रसाशन प्रमुख से कहना चाहता हूँ कि कब तक हम ठोकरें खाते रहें, कब तक हम आज़ाद रह कर भी ग़ुलामी की क़हर झेलें.

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  • 23. 02:29 IST, 09 जनवरी 2011 Narendra Yadav:

    पुलिस वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया ज़्यादातर मामलों में काफ़ी धीमी प्रक्रिया होती है. उदाहरण के लिए जब आप तत्काल सेवा के तहत पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं, तो पासपोर्ट पहले पहुँच जाता है, वेरिफ़िकेशन बाद में होता है. लेकिन देरी करने से फिर फायदा क्या. लगता यही है कि बिहार पुलिस भी इसी तरह धीमी है.

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  • 24. 01:01 IST, 20 जनवरी 2011 sunil kr srivastava:

    ये भारतीय पुलिस है पंकज जी. जब उसको फ़ुर्सत होगी वो अपना काम करेंगे. अच्छा हुआ कवरेज़ के दौरान आपने कोई क्राइम नहीं किया था. यूपी में कानपुर और बांदा ज़िले का दिव्या और शीलू कांड पढ़िए, आप को ख़ुद ही मालूम पड़ जाएगा कि पुलिस क्या करती है.

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