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पहले से ही बिके हुए हैं

विनोद वर्मा विनोद वर्मा | मंगलवार, 22 दिसम्बर 2009, 17:16 IST

पिछले दिनों अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक ने 'न्यूज़ फ़ॉर सेल' यानी 'बिकाउ ख़बरों' पर एक अंक निकाला.

इसमें ज़िक्र किया गया है कि किस तरह चुनावों के दौरान ख़बरों के लिए नेताओं को पैसे देने पड़ रहे हैं. किस तरह ख़बरें प्रकाशित-प्रसारित करने के लिए दरें तय कर दी गई हैं. इसमें अख़बारों के साथ टेलीविज़न चैनल भी बराबरी से शरीक हैं.

हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान बीबीसी हिंदी ने भी ख़बरों के विज्ञापन में तब्दील हो जाने की रिपोर्ट छापी थी. दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी ने वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के साथ मिलकर अख़बारों की इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था, जो अभी भी जारी है.

इस बीच भारतीय प्रेस परिषद और चुनाव आयोग के बीच एक बैठक भी हुई है जिसमें दोनों ही संस्थाओं ने अपनी-अपनी तरह से बेबसी ज़ाहिर कर दी है कि वे इसे नहीं रोक सकते.

हो सकता है कि इस घटनाक्रम से कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा हो लेकिन इस पेशे में लंबे समय से होने की वजह से मैं जानता हूँ कि ख़बरों के प्रकाशन के लिए पैसे लिए जाने का सिलसिला नया तो हरगिज़ नहीं है.

मैंने इसे संस्थागत रुप लेते देखा है. चुनाव सुधारों की क्रांति करने वाले दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने पहली बार कहा था कि अख़बारों में दिए जाने वाले विज्ञापनों का ख़र्च या तो राजनीतिक दलों का ख़र्च माना जाएगा या फिर उम्मीदवारों का.

इस घोषणा ने न केवल उम्मीदवारों को साँसत में डाला बल्कि अख़बारों की भी साँसें रोक दीं. एकाएक चुनावी विज्ञापन घट गए. अख़बारों में चुनाव का उत्सवी माहौल ख़त्म होने लगा. और उसी समय शुरु हुआ, उम्मीदवारों से नक़द वसूलने का सिलसिला, इस अलिखित समझौते के साथ कि ख़बरों में विज्ञापन की भरपाई की जाएगी और इस ख़र्च का कहीं ज़िक्र भी नहीं किया जाएगा.

तब टेलीविज़न चैनल नहीं थे इसलिए यह तकनीक अख़बारों ने अपने दम पर विकसित की. धीरे-धीरे नक़द के बदले ख़बरें प्रकाशित करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित रुप दे दिया गया और यह तय कर दिया गया कि कितने पैसे में कितनी जगह मिलेगी. ठीक विज्ञापन की तरह.

जिन दिनों चुनाव नहीं होते उन दिनों भी कई मीडिया ग्रुप ख़बरों के लिए सौदे में लगे रहते हैं. यह सौदा सरकारी विज्ञापनों के अलावा होता है. कभी किसी को अपने लिए शहर की सबसे क़ीमती ज़मीन कौड़ियों के मोल चाहिए होती है, तो कभी अख़बार के कथित घाटे की भरपाई के लिए खदान की लीज़ चाहिए होती है. अब तो मीडिया ग्रुपों की दिलचस्पी कई तरह के उद्योग-धंधों में हो चली है.

सरकारें मीडिया हाउस के मालिकों को उद्योग-धंधों में उचित-अनुचित लाभ देती हैं और बदले में या तो वे सरकार की तारीफ़ में ख़बरें छापते हैं या फिर सरकार की कमियों-कमज़ोरियों को अनदेखा करते चलते हैं.

ग़रीब आदिवासियों की पीड़ा अब अख़बारों में इसलिए नगण्य जगह पातीं हैं क्योंकि इससे राज्य सरकार की किरकिरी हो जाती है.

यह सिलसिला सिर्फ़ सरकार और अख़बार या टेलीविज़न चैनल के बीच नहीं है अब औद्योगिक घराने भी ख़बरें ख़रीदना सीख गए हैं.

सो मीडिया तो बहुत पहले बिक चुका था, दुनिया को इसका पता बाद में चला. और दुनिया को फ़िलहाल जितना पता है, भारत का मीडिया उससे कहीं ज़्यादा बिका हुआ है.

इस ख़रीद-फ़रोख़्त का दुखद पहलू यह है कि उपकृत होने और करने का सिलसिला पहले व्यक्तिगत स्तर पर होता था और बाद में यह मीडिया हाउस के प्रबंधकों और उम्मीदवारों के बीच बाक़ायदा शुरु हो गया. यह धीरे-धीरे उन पत्रकारों तक भी पहुँच गया, जो कभी अपने आपको श्रमजीवी कहते थे.

कुछ ही अख़बार या टेलाविज़न चैनल होंगे जो बिकाउ नहीं हैं, लेकिन सौभाग्य से ऐसे पत्रकार अभी भी कम हैं जो अख़बार के कॉलमों या टीवी के स्लॉट की तरह सहज सुलभ हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:46 IST, 22 दिसम्बर 2009 M Verma:

    बिके हुए खरीदने में भी माहिर होते है.

  • 2. 18:59 IST, 22 दिसम्बर 2009 Sandeep bhatt:

    विनोद, मीडिया बेशक एक विशुद्ध धंधा है. हमें इस बात से कतई एतराज़ नहीं है कि मीडिया मुनाफ़े का व्यापार है. लेकिन एक बात साफ़ है कि इसकी असली ताक़त खब़र ही है. कोई मीडिया घराना सिर्फ़ विज्ञापनों के दम से ही नहीं चल सकता है. अगर ऐसा होता तो आज विज्ञापनों के चैनल और अखबार चल रहे होते. यहाँ खेल ख़बर और विश्वसनीयता के दम पर चलता है. यह ठीक उसी तरह से है जैसे आप किसी राशन वाले से राशन लेते हैं. अगर दुकान वाला मिलावट करने लगेगा तो आप दुकान बदल लेंगे और किसी अन्य से माल खरीदेंगे. ख़बरों में भी ऐसा ही होता है. जब तक आप थोड़ा बहुत भी निष्पक्ष दिखते हैं आपको लोग पसंद करते हैं. आपने समझौता किया कि पाठक और दर्शक दूसरी तरफ गए. ख़बरों की महत्ता के चलते ही विज्ञापन बिक पाते हैं. राजनेताओं ने भी अपना विज्ञापन ख़बर की बतौर बेचना शुरू कर दिया है. यह सूचन माध्यमों की ही ताक़त है. लेकिन यहीं सर्तकता बरतना भी ज़रूरी है. माध्यमों को जान लेना चाहिए कि अगर उनकी ख़बरों में ताक़त है तो जनता ही है जो उनकी ख़बरों को आंकती हैं. अगर आम आदमी का विश्वास डिगता है तो अच्छे-अच्छे धंधे भी मंदी में चले जाते हैं.

  • 3. 19:04 IST, 22 दिसम्बर 2009 bheemal:


    विनोद जी, सबकुछ साफ़-साफ़ है. इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है.

  • 4. 19:29 IST, 22 दिसम्बर 2009 BANWARI YADAV:

    सही बात है बिके हुए तो पहले ही थे पता चलना अब शुरू हुआ है.

  • 5. 20:45 IST, 22 दिसम्बर 2009 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी खोखला और दिखावटी बन चुका है. लोकतंत्र लंगडा हो चुका है और इस ढांचे की बनावट को मज़बूती प्रदान करने वाला चौथा स्तंभ लोकतंत्र के संतुलन को बड़े ही ख़तरनाक तरीके से बिगाड़ रहा है. जब बाड़ ही खेत को खाना शुरू कर दे तो खेत की रक्षा कौन करेगा. आज पत्रकारिता का एक रूप ब्लैकमेलिंग, वसूली, तथ्यविहीन ख़बरों का प्रसारण, किसी मामूली बात को राई का पहाड़ बनाना, राजनितिक और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं और कारपोरेट फ़ायदों के चलते अवैध स्टिंग ऑपेरशन करवाने और रुपए की खनक के आगे कसीदे पढ़ने तक सीमित रह गया है. अनाप-शनाप चुनावी सर्वे, पैसों के बल धन कुबेरों का गुणगान, अंधविश्वाश को बढावा क्या यही पत्रकारिता के मायने रह गए हैं. दरअसल एक दूसरे से आगे निकलने की होड़, क़द ऊंचा करने की कवायद में असल मुद्दे और असल ख़बर बहुत पीछे छूट चुकी है. यह सैलाब असल पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. इसके लिए अच्छी और स्वस्थ पत्रकारिता और मज़बूत राजनितिक इच्छाशक्ति को आगे आना चाहिए व आम जनता को भी चाहिए कि घटिया प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नज़रंदाज़ करे.

  • 6. 21:13 IST, 22 दिसम्बर 2009 arun pal singh:

    इस कड़वी सच्चाई से रुबरु करवाने के लिए शुक्रिया.एक सामान्य भारतीय इन बातों को नहीं जानता है. इसके लिए बीबीसी का धन्यवाद.

  • 7. 22:30 IST, 22 दिसम्बर 2009 Kuldeep Chaturvedi:

    आप जैसे संवाददाताओं की हम प्रशंसा करते हैं जिन्होंने इस कड़वी सच्चाई को प्रकाशित किया.

  • 8. 00:45 IST, 23 दिसम्बर 2009 namrata:

    विनोद वर्मा जी, आपने लिखा बहुत दर्द से है, लेकिन इसमें नया क्या है ये तो आप ही बीबीसी के पाठकों को समझा सकते हैं. जो आपने लिखा है वो तो किसी भी छोटे शहर, गाँव या फिर बड़े मेट्रो में लोग भलीभांति जानते-समझते ही हैं. आखिर इस बहस के लिए बीबीसी का एक मूल्यवान ब्लाग क्यों भेंट चढ़ाया जाए जबकि इस बहस और टिप्पणी में कुछ भी उजागर नहीं होता है.

  • 9. 01:11 IST, 23 दिसम्बर 2009 shankar lalsaini:

    बचा क्या हुआ है.

  • 10. 01:22 IST, 23 दिसम्बर 2009 slsaini:

    कृपया अपने अगले ब्लॉग यह बताएँ कि भारत का कौन सा विभाग, संगठन, संस्था और पार्टी अभी बाकी बची है जिसपर दाग़ न लगा हो. इस देश में तो गुडागर्दी, भाई भतीजावाद, रिश्वतखोरी का बोलबाला है. कई घटनाओं को देख कर लगता है कि भारत की तरफ लौट कर नहीं जाना चाहिए.

  • 11. 09:39 IST, 23 दिसम्बर 2009 DHANANJAY NATH:

    विनोद जी, आपने जो कहा है वह मीडिया वालों को नागवार गुजरे लेकिन यह कटु सत्य है. आज जिस तरह आदमी का नैतिक पतन अपने चरम पर है, वैसे में ऐसी घटनाओं पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. यहाँ तो सब बिकाऊं हैं, ख़रीदार चाहिए.

  • 12. 09:54 IST, 23 दिसम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, बहुत शानदार लिखा है आपने. मैं सच्चाई बताता हूँ, मेरा एक पत्रकार दोस्त कहता है कि अगर उसे पता होता कि मीडिया और उसके रिपोर्टर इतने बेइमान है तो वह पंद्रह साल पहले ही इस क्षेत्र में नहीं आता.

  • 13. 10:45 IST, 23 दिसम्बर 2009 Ravi Shankar Tiwari:

    लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी खोखला और दिखावटी बन चुका है. इस कड़वी सच्चाई से रुबरु करवाने के लिए शुक्रिया,मीडिया एक विशुद्ध धंधा है.

  • 14. 11:58 IST, 23 दिसम्बर 2009 karan Singh Bisht:

    आर्थिक विकास के नाम पर नैतिक पतन. यही भारत का भविष्य है. यह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. आपके ब्लॉग ने यह साबित कर दिया है.

  • 15. 12:39 IST, 23 दिसम्बर 2009 jaswinder singh:

    पंजाब में सभी ख़बरें बिकी हुई हैं. इस तरह के ब्लॉग के लिए बीबीसी को धन्यवाद.

  • 16. 12:41 IST, 23 दिसम्बर 2009 ANIL MISHRA:

    आप शत-प्रतिशत सही हैं. जनता यह जानती है कि मीडिया का कई बार दुरुपयोग होता है. जब कोई ख़बर बार-बार दिखाई जाती है तो यह तय है कि वह किसी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए है. भारत में स्वाइन फ़्लू संबंधी खबर सनसनीखेज़ थी. लेकिन जब मैंने पता लगाया तो वैसा कुछ नहीं था. जनता को अब पता चल गया है कि यह दवा कंपनियों का दवाएँ बेचने का तरीका था. इसके बाद भी कुछ मीडिया संस्थान ईमानदारी से काम कर रहे हैं. जनता भी समाचारों का विश्लेषण करती है. मीडिया अब समाज का आइना नहीं रहा.

  • 17. 13:28 IST, 23 दिसम्बर 2009 Pankaj Parashar:

    आपने सही मुद्दे पर उंगली रखी है. प्रभाष जी ने इसके लिए एक मुहिम छेड़ी थी. मगर अखबारों ने इस धंधे को जिस तरह पसारा है उसके बाद उसको समेटना उनके लिए बेहद पीड़ादायक है.

  • 18. 13:36 IST, 23 दिसम्बर 2009 JANG BAHADUR SINGH:

    पत्रकारिता पूरी तरह व्यवसायिक है. इस व्यवसायिकता को पैसा प्रभावित करता है. मीडिया के लोग जबतक वहाँ बिकने के लिए रहेंगे, उन्हें कोई भी पैसों के दम पर ख़रीद या बेच सकता है. अख़बार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पैसे की सहायता से ही चल रहे हैं.

  • 19. 15:15 IST, 23 दिसम्बर 2009 mohammad saquib usmani:

    ज़रूरत है लोगों को अपनी सोच बदलने की. यह जो आज कर रहे हैं हमारी सोच की कमियों का फ़ायदा उठाना अच्छी तरह जानते हैं. कहते हैं कि हम यह दिखा रहे हैं क्योंकि लोग देखना चाहते हैं. जबकि ऐसा नहीं है. लोग आज भी कुछ अच्छा और ईमानदार देखना चाहते हैं. पर जब लोगों के पास कोई विकल्प ही नहीं तो मज़बूरी में जो दिखाया जाता है, देखना पड़ता है. इसलिए सबसे अहम हैं अपनी सोच को बदलना अपने दीमाग के दायरे को बढ़ाएँ.

  • 20. 19:17 IST, 23 दिसम्बर 2009 kulwant Happy:

    आपकी बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं, छोटा हो या बड़ा अखबार. किसी न किसी रूप में बिका हुआ है.

  • 21. 19:45 IST, 23 दिसम्बर 2009 nirmla.kapila:

    आज भारत मे क्या बिकाऊ नहीं है? मगर कुछ अच्छे लोग बचे हैं तो देश चल रहा है मगर मीडिया का बिकाऊ होना देश का दुर्भाग्य है. अच्छी पोस्ट है.

  • 22. 20:54 IST, 23 दिसम्बर 2009 mohammed sahul hameed, dantewada:

    विनोद जी धन्यवाद, आपने मेरे शक़ को पुख़्ता कर दिया. इस बार महाराष्ट्र चुनाव में 'अशोक पर्व' को देश के कुछ बड़े अख़बारों ने भी मनाया था. मैंने इस बारे सुना था लेकिन मुझे अब यकीन हो गया है कि देश कि सौ साल पुराने बड़े मीडिया संस्थान भी नेताओं की चौखट चूम रहे हैं. शर्म आनी चाहिए देश के इस चौथे स्तंभ का. हम गर्व करते थे कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है. लेकिन अब मीडिया भी पूँजीपतियों की जेब में समा चुका है. मीडिया भी अब नेताओं की तरह अपनी जेब में लगी हुई है. भारतीय प्रेस परिषद को चाहिए कि इस वह इस दिशा में कुछ क़दम उठाए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो मीडिया को भी लोग नेताओं की तरह संबोधित करेंगे.

  • 23. 21:22 IST, 23 दिसम्बर 2009 himmat singh bhati:

    लगता यह है कि भारत की जनता की गाढ़ी कमाई से टैक्स के रूप में वसूला गया पैसा लूटने के लिए शिष्टाचार के रूप में कोई समझौता हो गया है. नेता काले-कारनामों से कमाई करते हैं और मीडिया उनके काले-कारनामों को छुपाकर उनसे इन शिष्टाचार से कुछ हासिल करने से नहीं चुकते. चुनाव के समय तो यही लगता है कि नेता जितना माल मीडिया को देगा उतना ही उसका बखान समाचारों में होगा. लेकिन अब लोगों का विश्वास ऐसे समाचार पत्रों से उठ रहा है और वे बंद होने के कगार पर भी हैं क्योंकि समाचार छपने से पहले ही लोगों को इंटरनेट पर मिलने लगा है और उनकी विश्वसनीयता भी बढ़ने लगी है. अब तो केवल वही समाचार पत्र चलेंगे जो निष्पक्ष समाचार देंगे. विनोद जी सही कहा है आपने.

  • 24. 21:58 IST, 23 दिसम्बर 2009 तेजपाल सिंह हंसपाल, रायपुर (छत्तीसगढ़):

    मीडिया की विश्वसनीयता को बचाए रखने के लिए अब कुछ करना ही होगा. जिस हिसाब से समाज में विकृतियाँ आ रही हैं उसका यह एक रूप है कि ख़बरें तो ख़बरें, लोग और संस्थाएँ भी बिक रही हैं. छोटे राज्यों में तो मीडिया पर पकड़ बनाना और भी आसान हो गया है. ख़बरों को पहले पा जाने की होड़ और अपनी छबि बनाने की प्रवृति के कारण मीडिया संस्थानों में व्यावसायिकता आ रही है. बढ़ते चैनल और अख़बारों की संख्या भी इस प्रवृति को बढ़ा रही है. मीडिया की ऐसी बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के बारे में सोचना होगा. ऐसे में मीडिया की विश्चसनीयता कम और निष्पक्षता गायब हो रही है. अब तो विज्ञापन समाचारों के रूप में छपते हैं और समाचार विज्ञापन के रूप में. विश्वसनीयता बनी रहे इसके लिए बहुत जल्दी ही कुछ नहीं वरन बहुत कुछ करना होगा. लेकिन सवाल यह है कि शुरुआत कहाँ से होगी और कौन करेगा.

  • 25. 05:27 IST, 24 दिसम्बर 2009 jigyasa:

    यह बहुत पीड़ादायक है. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को चंद रुपए के लिए ईमान बेचना ठीक नहीं है. जनता की हर समस्या को उजागर करना पत्रकार का धर्म है. अगर वह ही बिक जाएगा तो आम लोग कहाँ जाएँगे. मुझे लगता है आजकल पत्रकार नौकरी सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि बॉस को ख़ुश रखा जाए. इसके बाद कैसी जनता और कैसी उसकी समस्या.

  • 26. 12:00 IST, 24 दिसम्बर 2009 संदीप द्विवेदी :

    सच्चाई बहुत कड़वी होती है.पहले इस बारे में कोई नहीं बोलता था लेकिन अच्छी बात है की आजकल इस बारे में चर्चा हो रही है.

  • 27. 12:12 IST, 24 दिसम्बर 2009 parvez:

    अख़बारों में निष्पक्षता की बात करना बेमानी होगी. हर अख़बार के पीछे किसी राजनीतिक पार्टी का प्रतीक लगना दुखद है. विज्ञापन के चक्कर में नेताओं की मनमाफ़िक ख़बर लिखना ही निष्पक्षता को तार-तार करता है. इन सब के पीछे कवरेज़ करने वालों में स्वार्थ मज़बूती से सामने आता है या कहा जाए कि बूद्धिजीवियों के हांथों से पूंजीपतियों के हांथों में अख़बार और चैनलों का हस्तांतरण होना ही पत्रकारिता के आस्तित्व को जमीदोज़ होने की ओर बढ़ना कहा जा सकता है.

  • 28. 13:08 IST, 24 दिसम्बर 2009 मनोज कुमार:

    मीडिया कब बिकाऊ नहीं रहा लेकिन ऐसा शायद पहली बार हो रहा है जब क्षेत्रीय भाषाओं की पत्र-पत्रिकाएँ भी बिकाऊ हो गईं हैं. अंग्रेज़ी मीडिया को क्षेत्रीय भाषाओं के बिकाऊपन से पेट में दर्द होने लगा. ऐसा इसलिए कि क्षेत्रीय भाषाओं की पत्र-पत्रिकाएँ भी पैसा कमाने लगीं. इसलिए अंग्रेज़ी मीडिया ने क्षेत्रीय मीडिया के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया.
    आख़िर अंग्रेज़ी मीडिया क्यों सोनिया गांधी को संत बना देती और राहुल को क्यों मूक क्रांतिकारी बना देती है. क्यों बड़े औद्योगिक घरानों के कुकर्मों का परदाफ़ाश अंग्रेज़ी मीडिया नहीं कर पाती है.

  • 29. 15:14 IST, 24 दिसम्बर 2009 vinit kumar upadhyay:

    आज का मीडिया एक बिकाऊ सामान हो गया है. किस भी तरह वहाँ बड़े पैमाने पर पैसा शामिल है. यह एक बहुत बड़ा मिथक है कि कोई व्यक्ति नैतिकता के आधार पर काम करता है. हमें समाचार के व्यापार पर नज़र रखने के लिए 'सेबी' जैसी किसी नियामक संस्था की ज़रूरत है.

  • 30. 15:42 IST, 24 दिसम्बर 2009 ashok mishra :

    यह खेल बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन आजकल खुलेआम चल रहा है.

  • 31. 19:17 IST, 24 दिसम्बर 2009 himmat singh bhati:

    मीडिया नहीं ये विज्ञापन का व्यापार हो गया है, जिसमें कुछ घटाओं का ज़िक्र होता है. सच बात ये है कि विज्ञापन के साथ कुछ समाचार या ख़बरों को बेचा जाता है. जनता से जुड़े समस्याओं का यहाँ कोई ज़िक्र नहीं होता. ये सब तकलीफ़ देने वाला है.

  • 32. 21:39 IST, 24 दिसम्बर 2009 sushil dev:

    वाक़ई. आपने मीडिया के मौजूदा हाल पर बेहतर लेख लिखा है. इस लेख को पढ़ने के बाद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को परिभाषित करने में मुश्किल हो जाएगी. ये बेहद दुखद है.

  • 33. 06:55 IST, 25 दिसम्बर 2009 sharad :

    दरअसल अब प्रबंधन ने संवाद सूत्र और संवाददाता (सभी नहीं ) कि कमाई पर डकैती डाल रखा है. एक ज़माने से ये लोग नेताओ कि प्रेस कांफेरेंस में नोटों के लिफाफे लेते रहे है अब वो लिफाफे मालिक सीधे लेने लगे हैं. इसमें कोई हाय तौबा कि बात नहीं है. विरोध का एक ही तरीका है चुनाव में सिर्फ सुचना पर ध्यान दे. और सारी खबरों को उपेक्षित करके उन पर हसे.

  • 34. 23:57 IST, 25 दिसम्बर 2009 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    बिल्कुल सही कहा आपने. आज के दौर में अख़बार और टीवी चैनल भरोसे के लायक नहीं रहे. या तो वे बिकी हुई ख़बरें दिखाते हैं या फिर झूठ और अफवाहें. दूरदर्शन के अलावा भारत का कोई भी टेलीविज़न चैनल सही नहीं है. टीवी चैनल ख़बरें कम और बकवास ज़्यादा दिखाते हैं. सरकार भी इनके ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठा रही है. भारत में सरकारी तंत्र भ्रष्ट है और अब मीडिया भी भ्रष्ट है.

  • 35. 17:50 IST, 26 दिसम्बर 2009 vinay shankar:

    समस्या यह नहीं है की मीडिया, कार्यपालिका, न्यायपालिका और संसद बिका हुआ है. समस्या यह है की उनके बीके होने का पता होने पर भी उन्हें हम स्वीकार लेते है.

  • 36. 11:37 IST, 27 दिसम्बर 2009 डॉ.लाल रत्नाकर :

    अखबारों /चैनलों के लोगों की सोच को क्या हो गया है गौरव और गरिमा दौलत बनाने से आती होती तो वेश्याएं गौरवमयी होती, पर उपकार कर्म सुकर्म ईमानदारी चरित्र आदि की जो भी गति हो, पर मिडिया देश चलाने की दशा में जो योगदान करने के लिया बना था अब उसके बारे में आपने लिख ही दिया है

  • 37. 11:24 IST, 30 दिसम्बर 2009 ankiet:

    आज की मीडिया को केवल अपने राविए पर चिंता करने की सबसे अधिक ज़रूरत है. मीडिया यह भूल जाता है कि अपना दृष्टिकोण बताना उसका संवैधानिक अधिकार है तो दूसरे लोगों का भी उतना ही अधिकार है. इसके बाद भी आज की मीडिया को देखते हुए लगता है कि वह ब्लैकमेलर या समानांतर सरकार बनाने की कोशिश कर रही है.

  • 38. 14:02 IST, 30 दिसम्बर 2009 dinker srivastava:

    भाई साहब दुनिया भले लोगों की बदौलत ही चल रही है. अच्छे-बुरे लोग तो हर जगह होते हैं.

  • 39. 19:53 IST, 03 जनवरी 2010 surendra :

    एकदम सही लिखा है आपने विनोद जी.

  • 40. 19:16 IST, 07 जनवरी 2010 naresh singh rathore:

    सत्य वचन है! बहुत बढ़िया लेख लिखा है.

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