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जिन्ना, जसवंत और पाकिस्तान...

मोहम्मद हनीफ़ मोहम्मद हनीफ़ | सोमवार, 24 अगस्त 2009, 15:59 IST

किताब जसवंत सिंह ने लिखी, उन्हें पार्टी से बीजेपी ने निकाला, किताब पर पाबंदी गुजरात सरकार ने लगाई, लेकिन ख़ुश पाकिस्तानी हैं.

हिंदू संकीर्णता का फ़लसफ़ा जो हमें बचपन से पढ़ाया जाता है हमें उसका जीता-जागता एक और सुबूत मिल गया. मोहम्मद अली जिन्ना की महानता को हमारे दुश्मनों ने भी स्वीकृति दे दी. हिंदू-मुस्लिम ऐतिहासिक दंगल में हमारा पहलवान जीत गया. काफ़िरों ने भी हमारे क़ायद को क़ायदे आज़म मान लिया.

पाकिस्तान हाल के दिनों में इतने आरोपों को झेल चुका है कि हम ख़ुशी का कोई छोटे से छोटा मौक़ा हाथ से नहीं गंवाना चाहते. वर्ल्ड ट्वेंटी 20 का फ़ायनल हो या जश्ने आज़ादी, हम लोग बंदूक़ें निकाल कर हवाई फ़ायरिंग शुरू कर देते हैं. क्या करें मौक़ा भी तो कभी-कभी मिलता है.

लेकिन हवाई फ़ायरिंग के इस सिलसिले को एक लम्हे के लिए रोक कर ज़रा यह भी सोचिए कि क्या हमारे प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ भी कभी ऐसा करेंगे जो जसवंत सिंह ने किया है. क्या मौलाना फ़ज़लुर्रहमान कभी कोई किताब लिख कर गांधी के अहिंसा के फ़लसफ़े का प्रचार करते हुए पाए जाएँगे. क्या कोई मंज़ूर विटू से अपेक्षा करता है कि वह हिंदुस्तान के इंक़िलाब के बारे में एक किताब लिख डालें. क्या शहबाज़ शरीफ़ कभी भूल कर भी कहेंगे कि 'गुड गवर्नेन्स' उन्होंने नेहरू से सीखी.

कहने वाले कहते हैं कि अच्छे दिन में मुल्ला उमर (अफ़ग़ानिस्तान वाले असली मुल्ला उमर, पाकिस्तान की हिरासत में मौजूद तालेबानी प्रवक्ता नहीं) मुसलमानों के लीडर बनने से पहले इस्लामाबाद तशरीफ़ लाए. जिस कमरे में उनकी पाकिस्तान के रहनुमाओं के साथ मीटिंग थी वहाँ दीवार पर एक तस्वीर लगी थी जो हर सरकारी दफ़्तर में होती है. मुल्ला उमर ने फ़रमाया कि तस्वीर उतारी जाए वरना वह उस कमरे में नहीं रहेंगे. अहलकारों ने उन्हें बताया, लेकिन यह तो क़ायदे आज़म की तस्वीर है. मुल्ला उमर ने बड़ी मासूमियत से कहा, वह कौन है?

कभी लगता है कि हर सरकारी दफ़्तर में, हर थाने-कचहरी में, टेलीविज़न पर हर फ़ौजी तानाशाह
के पीछे से झांकता हुआ क़ायदे आज़म का सरकारी पोर्ट्रेट हम से सिर्फ़ यही सवाल पूछता हैः मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?

क्योंकि इस प्यारे देश में मोहम्मद अली जिन्ना ग़रीब की वह जोरू बन कर रह गए हैं कि जिसका जो चाहे नाम रखे और जैसे चाहे इस्तेमाल करे.

मौलाना हज़रात उनके नाम के साथ रहमतुल्लाह की उपाधि लगा कर उन्हें पाँचवां ख़लीफ़ा साबित करने की कोशिश करते हैं. क़ौमी एकता का शग़ल करने वाले उनकी शेरवानी और टोपी दिखा-दिखा कर एक क़ौम बनने और उर्दू बोलने की नसीहत देते हैं. और आज़ाद ख़्याल वर्ग उनके सूटों वाली तस्वीरें, अंग्रेज़ों वाली अंग्रेज़ी और मद्यपान का शौक़ याद दिला कर एक सेक्युलर जन्नत के ख़्वाब दिखाते हैं.

लेकिन जिस समाज में इंक़िलाब अता करने का शौक़ इतना बेताब हो कि अंग्रेज़ी ज़बान में बंगालियों को हुक्म दिया जाए कि उर्दू बोलो, जहाँ बंधुआ मज़दूर को मजबूर किया जाए कि वह पेट पर पत्थर बांध कर न सिर्फ़ अमीरों के महल का निर्माण करे बल्कि उनकी हिफ़ाज़त भी करे और फिर अपनी ख़ुशक़िस्मती पर ख़ुदा का शुक्र भी अदा करे ऐसे समाज में यक़ीनन मोहम्मद अली जिन्ना एक ही वक़्त में रहमतुल्लाह भी हो सकते हैं और काफ़िरे आज़म भी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:04 IST, 24 अगस्त 2009 Md Imdadul Haque:

    यक़ीनन मोहम्मद अली जिन्ना एक ही वक़्त में रहमतुल्लाह भी हो सकते हैं और काफ़िरे आज़म भी.

  • 2. 18:25 IST, 24 अगस्त 2009 Shaheer A. Mirza, Sana'a - Yemen:

    मेरा फ़लसफ़ा मुझे यह बताता है कि जब भी कोई मुख़ालिफ़त (विरोध) कामयाब हो जाए तो उसे इंक़िलाब कहो और जब नाकाम हो जाए तो उसे बग़ावत का नाम दे दो. जिन्ना साहेब की बदक़िस्मती कि उन्होंने ऐसी क़ौम के लिए इंक़िलाब का सेहरा पहना जो दीन में एकमत न रही तो दुनिया में क्या ख़ाक एकमत होगी. इस में जितना योगदान जिन्ना साहेब का रहा उतना ही श्रेय उस ज़माने के हालात को जाना चाहिए जिसने जवाहरलाल को पंडित नेहरू, गांधी को बापू और जिन्ना को क़ायद-ए-आज़म के मुक़ाम तक पहुँचा दिया. इस्लाम में मान्यता है कि अल्लाह हर क़ौम पर वैसा ही हाकिम भेजता है जिसके लायक़ वह क़ौम होती है. अब जो जैसा है वह वैसा ही भुगतेगा. अच्छे-बुरे दौर तो आते-जाते हैं लेकिन यह बदनसीबी होती है आम इंसान की जो महज़ अपने मतलब के लिए किसी को ऊँचा और किसी को नीचा दिखाता है. बक़ौल अल्लामा इक़बाल-
    हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
    बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

  • 3. 19:06 IST, 24 अगस्त 2009 santosh sharma:

    हनीफ़ साहब, लिखा तो आपने ठीक ही है. जसवंत सिंह ने जो जिन्ना के बारे में लिखा उससे पाकिस्तान के लोग ख़ुश हो सकते हैं लेकिन गांधी के लिए किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं क्योंकि गांधी और जिन्ना का कोई मेल ही नहीं है. जिन्ना सिर्फ़ एक नेता और व्यक्ति हैं लेकिन गांधी एक विचार है जो मर नहीं सकता. वह आज भी प्रासंगिक है और जीवित है. जब कि जिन्ना को तो पाकिस्तान में ही लोग नहीं जानते. वह तो कब के मर चुके हैं. इसलिए गांधी और जिन्ना की तुलना ठीक नहीं.

  • 4. 19:29 IST, 24 अगस्त 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह मोहम्मद हनीफ़ साहब आप ने शानदार लेख लिखा है लेकिन जिस जगह आपने काफ़िर शब्द का इस्तेमाल किया वह मुझे ग़लत लगा. आपके जिन्ना साहब को क़ायदे आज़म जिन्ना दुनिया कम और पाकिस्तान अधिक मानता है. वह सच भी है क्योंकि जिन्ना साहब ने दुनिया के मुसलमानों के लिए नहीं पाकिस्तान के मुसलमानों के लिए अलग देश बनाया था. जसवंत सिंह की किताब में जो कुछ लिखा है अगर वह सौ फ़ीसदी सच है तो भारतीयों के लिए और ख़ासकर कॉंग्रेसियों के लिए शर्म से डूब मरने की बात है. आपका यह कहना बिलकुल सच है कि जसवंत सिंह जी की तरह आप का कोई भी नेता या मुल्ला गांधी जी या नेहरू की इस तरह तारीफ़ नहीं कर सकता. इसीलिए सच्चाई पर भारत में किताब पर प्रतिबंध और पाकिस्तान में ख़ुशियाँ ईद की तरह मनाई जा रही हैं. रहा सवाल रहमतुल्लाह ख़िताब का तो वह आज के ज़माने में यहाँ सऊदिया में ज़िंदा हैं तो हफ़ीज़ुल्लाह और मरने के बाद रहमतुल्लाह बादशाहों के साथ जोड़ा जाता है. आप का ईमानदारी से यह मानना कि आप लोगों को ख़ुशियाँ कम मिलती हैं इसलिए थोड़ी सी ख़ुशी में ही आप बंदूक़ें छोड़ते हैं यह एक सच है. रहा सवाल कि एक ही समय में जिन्ना साहेब रहमतुल्लाह भी हो सकते हैं और काफ़िर. भी तो यह नहीं हो सकता है.

  • 5. 23:56 IST, 24 अगस्त 2009 shashibhooshan:

    अगर गांधी की हत्या कोई मुसलमान करता, तब भी वह सदी की सबसे बड़ी हत्या ही कहलाती. लेकिन तब बाद की स्थितियाँ ज़्यादा विभाजक, ज़्यादा भयानक होतीं. इसी नज़रिए से गांधी की तारीफ़ पाकिस्तान में न होना बेहतर है. क्योंकि ऐसा हुआ तो भारत के हिंदू चरमपंथी गांधी की विरासत को ज़्यादा नुकसान पहुँचाएँगे.

  • 6. 00:03 IST, 25 अगस्त 2009 atul dube:

    भाई जान आपने लिखा अच्छा है. आपकी विवेचना भी स्वागत योग्य है. भाई साहब गाँधी, जिन्ना, नेहरु आदि सब के सब एक ही सिक्के के पहलू हैं. जो स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक भटक गए थे और थक भी गए थे. वर्ना वर्षों की मेहनत ओर लाखों कुर्बानियाँ देकर मिली आज़ादी पर क़त्लेआम नहीं होता. हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई एक दूसरे के ख़ून के प्यासे नहीं होते. बल्कि दोनों मिलकर ईद-दीवाली मानते. अब चाटुकारों द्वारा जिन्ना को कायदे आजम का खिताब दिया जाए या गाँधी को देश का पिता बना दिया जाए. सत्ता के मोह में फँसे नेहरु को भारत रत्न दे दिया जाए- क्या फ़र्क पड़ता है. इन पर लिखना पढ़ना भी समय को जाया करना होगा. आइए हम दोनों देशों की समस्याओं को सामने लाने में अपना समय लगाएँ. हमारे आपके लिए यही बेहतर होगा. साथ ही दोनों देशों के लिए भी कुछ काम आएगा. काश हमारे बीच सीमा की दीवार न होती. वेसे मेरा ख्याल दीवार को गिराने का है. मैं दुआओं में भी यही मांगता हूँ. आपसे गुजारिश है की आप आमीन कहें.

  • 7. 00:23 IST, 25 अगस्त 2009 mukesh:

    हनीफ़ भाई, शुक्रिया इस लेख के लिए. मुझे तो लगा कि पाकिस्तान मे सिर्फ़ ज़ैद हामिद जैसे चिंतक ही फलते-फूलते है. जिस मुल्क में विचारधाराओ की तकरार हो, वहाँ अक्सर कट्टरपंथी ही जनता का समर्थन पाते है. भारत और पाकिस्तान दोनों ही इसके उदाहरण हो सकते है. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि हिंदू कट्टरवाद भारत के कुछ राज्यों में ही सफल रहा और पिछड़े समुदायों में कभी पाँव नहीं जमा पाया. विभाजन एक त्रासदी है और शायद टाली भी नहीं जा सकती थी. लेकिन नेहरू, गांधी परिवार की इसके अलावा भी कई उपलब्धियाँ हैं. मसलन सोवियत अर्थव्यवस्था, भाई-भतीजावाद, छद्म युद्ध, भ्रष्टाचार, सिख समुदाय का दमन आदि. इन सब बातों से राष्ट्र अब भी 'थर्ड वर्ल्ड' की श्रेणी में गिना जाता है. विडम्बना देखिए कि आज भी सत्ता का संचालन परदे के पीछे से सोनिया जी ही कर रही है.

  • 8. 00:37 IST, 25 अगस्त 2009 b:

    हनीफ़ साहब. मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि यही तो फ़र्क है हिंदुस्तानियों और ग़ैर हिंदुस्तानियों की सोच में. रही बात पाकिस्तान के ख़ुश होने के बारे में, तो साहब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों? ज़ाहिर सबको मालूम है. जसवंत सिंह ने जिन्ना की तारीफ़ की. यह एक हिंदुस्तानी रिवायत है. उनके साथ जो हुआ वह एक घरेलू मामला है. हर घर में कुछ न कुछ चलता रहता है. गाँधी जी का लोहा सारी दुनिया मानती है. आप ख़ुद ही फरमा रहे हैं कि जिन्ना जी को पाकिस्तान में ही लोग नहीं जानते तो बाक़ी कुछ क्या है सोचने के लिए. बच्चे पैदा करना अलग बात है उनकी परवरिश करना अलग बात है. एक सोच का ही फ़र्क था कि गाँधी जी को सारे जहाँ में एक महात्मा का दर्जा हासिल है.

  • 9. 00:46 IST, 25 अगस्त 2009 SANJAY KUMAR:

    ऐसा क्यों है कि यदि कोई भारतीय नेता जिन्ना की तारीफ़ करते हैं को पाकिस्तान के लोग काफ़ी खुश होते हैं जबकि जैसा कि मैंने सुना है पाकिस्तान में उनके अपने ही लोगों ने अंतिम समय में उनकी घोर उपेक्षा की. मेरे समझ से सच्चाई को सौ बार झूठ बोल कर झूठलाया नहीं जा सकता. लेकिन यह सच है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती. इसलिए बँटवारे के लिए गाँधी-नेहरू के साथ साथ जितने भी उस समय बड़े नेता थे सभी जिम्मेदार थे.

  • 10. 01:58 IST, 25 अगस्त 2009 amit gupta, moradabad, india:

    हनीफ़ साहब शुक्रिया ये कबूल करने के लिए कि पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों को बचपन से हिंदू संकीर्णता के बारे में पढ़ाया जाता है. एक सच पाकिस्तान को और कबूल करना चाहिए वो यह कि क़ायदे आज़म जिन्ना ने पाकिस्तान बनाया नहीं था, पाकिस्तान जिन्ना ने माँगा था नेहरू जी से. इस सच से आप वाकिफ़ होंगे कि जिन्ना जी इंडियन मुस्लिम लीग से जुड़े हुए थे, उनकी भी भारत को आजादी दिलवाने में भूमिका थी. जिन्ना आज़ाद हिंदुस्तान के पहले प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, जब ये मुमकिन नहीं हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान की माँग की. हिंदुस्तान के इतिहास में यह नहीं पढ़ाया जाता कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन है. आपके यहाँ इतिहास पाकिस्तान बन जाने के बाद शुरू होता है. पाकिस्तान में इतिहास को सही से पढ़ाया जाए तो बेहतर होगा.

  • 11. 05:27 IST, 25 अगस्त 2009 Ritesh:

    हनीफजी,

    आपके दूसरे ही वाक्य में पाकिस्तान की वर्तमान परिस्थिति की पूरी कहानी छिपी हुई है | दूसरों की गलतियां पढ़ने या समझने से कोई आगे नहीं बढ़ सकता उसके लिए उसे स्वंय की गलतियां को समझना और उन पर परिश्रम करना ज्यादा जरुरी है | जिस राष्ट्र की बुनियाद केवल नफरत की भावना पर रखी गयी हो वह राष्ट्र कभी प्रगति नहीं कर सकता क्योंकि उसकी सारी उर्जा उस नफरत को पोषण करने में चली जाती है और वह अपनी प्रगति के मार्ग पर चलने की उर्जा नहीं जुटा पाता | मुझे लगता है कि पाकिस्तान के साथ कुछ यही हुआ है | और यहीं मुझे लगता है गांधीजी का भारत को बहुत बड़ा योगदान रहा है | उन्होंने हमें हिंसा और नफरत जैसे नकारात्मक विचारों से बचाए रखने का पूरा प्रयास किया | मेरा तो यही मानना है कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति इस बात का प्रतिबिम्ब है कि उसकी सोच कितनी सकारात्मक है | और यह बात शायद किसी व्यक्ति पर भी उतनी ही लागू होती है | आज अमेरिका और जापान अगर दुनिया के अग्रणी राष्ट्र है तो वह इसलिए है क्योंकि उनके नागरिकों की सोच हमसे कहीं ज्यादा बेहतर है | उसी तरह अगर आप मानते है कि कई मामलो में भारत पाकिस्तान से आगे है तो यह उसकी बेहतर सोच का ही परिणाम है |

  • 12. 05:47 IST, 25 अगस्त 2009 paul:

    काश इस लेख से कोई सीख लेता.

  • 13. 07:20 IST, 25 अगस्त 2009 Rajesh Kapoor:

    अतुल दुबे जी, आपने बहुत बढ़िया और बिलकुल सही कहा. आज की सबसे बड़ी समस्या ही धर्म के नाम पर हो रही राजनीति है. जब तक हम इस समस्या का समाधान नहीं ढूँढते, कुछ नहीं हो सकता.
    आज हर कोई या तो हिंदू है या मुस्लिम और या फिर ईसाई, इंसान तो कोई रहा ही नहीं.

  • 14. 12:00 IST, 25 अगस्त 2009 sanjay purohit:

    आप का लेख अच्छा है. लेकिन आप भी तमाम पाकिस्तानियों की तरह कुएँ के मेंढक निकले. जहाँ भारत की सोच बड़ी होती जा रही है वहीं पाकिस्तानियों की सोच पाताल में जा रही है. आपने काफ़िर शब्द का प्रयोग किया है, बेशक यह हिंदुओं के लिए है. लेकिन हम आपको यह कभी नहीं बताएँगे कि पाकिस्तानियों के लिए हम किस शब्द का प्रयोग करते हैं.

  • 15. 13:26 IST, 25 अगस्त 2009 MD. HAMID RAZA:

    बहुत अच्छा लिखते हैं लिखते रहिए.

  • 16. 13:34 IST, 25 अगस्त 2009 Khushdeep Sehgal, Noida:

    भला उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफेद कैसे. कुछ-कुछ इसी तर्ज़ पर छिड़ी है बहस गांधी और जिन्ना को लेकर. सवाल ये नहीं कि कौन महान है, कौन नायक है और कौन खलनायक. गांधी और जिन्ना दोनों को इस दुनिया को अलविदा कहे 61 साल हो चुके हैं. और आज 2009 में हम उनके विचारों की जगह उनकी शख्सीयत के माइनस-प्लस ढूंढ रहे हैं. इसकी जगह हम उनके ऐसे विचारों पर गौर करें जिससे हमारे आज के मसलों को हल करने में कुछ मदद मिले तो मैं समझता हूं वो ज़्यादा मायने रखेगा. लेकिन क्या करें जनाब, मीडिया को आग में पानी डालने वाला नहीं पेट्रोल छिड़कने वाला मसाला चाहिए होता है.

  • 17. 13:35 IST, 25 अगस्त 2009 Nitin Tyagi:

    जिन्ना ,नेहरु और गाँधी तीनों ही या फिर कहें कि कांग्रेस विभाजन के लिए जिम्मेदार है. कोई कहता है कि सिर्फ जिन्ना ज़िम्मेदार था विभाजन का, तो ये कांग्रेस की मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश है.

  • 18. 13:47 IST, 25 अगस्त 2009 Shahid Salam Buland shahr:

    जिन्ना, नेहरू, गाँधी, अबुल कलाम, पटेल ये सब उस दौर की महान शख्सियतें थी और हमेशा रहेंगी इन्हे किसी एक और दो देश की धरोहरों के रुप में देखना नहीं चाहिये क्योंकि उस वक़्त में कैसे इनके प्रयासों और कुर्बानियो ने देश को गुलामी से बाहर निकाला ये रहस्य इन लोगो की मौत के साथ ही दुनिया से चला गया.हो सकता है आज इतने साल बाद हमें इनके कुछ फैसले सही नहीं लगे मगर उस वक्त क्या हालत थे ये वो ही जानते थे और क्या क्या मजबूरियाँ रही होंगी फैसले लेने की...आज हमें इस्लामाबाद में गाँधी जी और दिल्ली में जिन्ना दिवस मानना चाहिए.

  • 19. 13:59 IST, 25 अगस्त 2009 abhishek triapthi:

    दुख की बात है कि जसवंत सिंह जैसे लोग गाँधी जी में गलती और जिन्ना में खूबी ढूँढ़ते हैं. मैं ये नहीं कह रहा कि जिन्ना अच्छे इंसान नहीं थे, पाकिस्तान के लिए वो मसीहा हैं पर बँटवारे के लिए वो जिम्मेदार हैं इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता.

  • 20. 14:00 IST, 25 अगस्त 2009 himanshu mishra:

    हनीफ़ साहेब आपके पाकिस्तान में जिन्ना साहब ग़रीब की जोरू बन कर रह गए हैं तो हमारे यहाँ महात्मा गांधी. सियासत में ऐसा ही होता है. आप किसी महान व्यक्तित्व का एक टुकड़ा भर चुनते हैं जिससे ख़ुद के तर्कों को उचित ठहरा सकें. मतलब जिन्ना या गांधी के कई टुकड़े कर चुके हैं सियासत में इस्तेमाल के लिए. कोई भी पूरा गांधी या जिन्ना नहीं चाहता.
    एक शेर पेश है
    बात कुछ ऐसी कहें जिस बात के सौ पहलू हों
    कोई एक पहलू तो मिले रंग बदलने के लिए

  • 21. 14:46 IST, 25 अगस्त 2009 Pankaj Parashar:

    हनीफ़ साहिब, बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया है आपने. पाकिस्तान में जितनी अराजकता और संकीर्णता मैंने देखी है, वह नाक़ाबिले बर्दाश्त है. मगर है. जिन्ना का नाम बंगाली मुसलमान जिस तरह से उच्चरित करते हैं उससे उसका अर्थ दूसरा हो जाता है, जिससे शीन-क़ाफ़ दुरुस्त लोगों का अच्छा मनोरंजन होता है. वे बेचारे समझ नहीं पाते कि उनका मज़ाक़ क्यों उड़ाया जाता है?

  • 22. 16:32 IST, 25 अगस्त 2009 firoz:

    मेरे विचार में लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मुल्ला उमर का एतराज़ किस बात को लेकर था. शायद लेखक यह नहीं कहना चाहता कि वह जिन्ना को नहीं जानते थे लेकिन वह फ़ोटो लगाने के सिद्धांत के खिलाफ़ थे क्योंकि वह ग़ैर-इस्लामी है. किसी ने सही लिखा है कि यदि पाकिस्तान में कोई गांधी की सराहना करे तो गांधी के हत्यारे वहाँ पहुँच जाएँगे.

  • 23. 17:31 IST, 25 अगस्त 2009 Samir Azad:

    लेख अच्छा लिखा है।

  • 24. 18:01 IST, 25 अगस्त 2009 Sanjay Gautam,:

    मौलाना हनीफ़ साहिब आप का ब्लॉग भी आप के एक्सप्लोडिंग मैंगोज़ की तरह बिखरा हुआ है. आपने सारी बातें गुंड-मुंड कर दी हैं. चलिए एक एक बात का जवाब देते हैं. अगर जसवंत सिंह को पार्टी से नहीं निकाला जाता तो समझ में आत कि भारत पाकिस्तान के मुक़बाले समझदार हो गया है. क्या आप सोच सकते हैं कि कोई भरातीय गांधी जी या नेहरू या सरदार पटेल पर वैसा उपनयास लिख सकता है जैसा आपने ज़ियाउलहक़ का मुर्ग़ा बनाया और फिर बिना किसी फ़साद के आराम से रोज़े में मज़ा ले रहे हैं. क्या आप सोत सकते हैं कि कोई मनमोहन सिंह जी, आडवाणी या फिर नरेंद्र मोदी जैसे जनतांत्रिक नेताओं के ख़िलाफ़ वैसा बोल सकता है जिस तरह आप अपने तानाशाहों के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं और मुशर्रफ़ तो इसकी ताज़ा मिसाल हैं जो एक बंजारा गाए जीवन के गीत सुनाए दर दर भटक रहा है.
    रही ख़ुशी मनाने की बात तो आपको भी बहाना चाहिए और हमें भी. ग़रीबी दोनों देश का मुक़द्दर है और ऐसे में चलनी सूप से बोले भी तो क्या बोले. अगर मुल्ला उमर ने क़ायदे आज़म को नहीं पहचाना जो जोशे जुनूँ में उनकी तस्वीर उतरवादी तो आप ख़्वाह मख़्वाह नाराज़ हो रहे हैं. हम तो कपड़े उतारने वाले नेताओं की पूजा आरती करते हैं.
    रहमतुल्लाह अलैह और काफ़िरे आज़म की ख़ूब कही. भाई वो तो अपनी मौत मरे लेकिन हमारे यहां तो राष्ट्रपिता को मौत के घाट उतार दिया गया. महात्मा की उपाधी के साथ-साथ बंदूक की गोली क्या कहती है. हां तो मौलाना हनीफ़ साहिब बात ख़त्म करने से पहले याद आया कि आपने उर्दू के बारे में भी कुछ कहा है. भाषा का मामला अजीब है, यह हमेशा थोपी जाती रही है. कहते हैं कि जनता बादशाह की भाषा सीख लेती है और वही भाषा चलती है जिसके बोलने वाले मज़बूत होते हैं. कहां गई प्राकृत या पाली कुल मिलाकर बची है तो संस्कृत. आप तो पढ़े लिखे हैं और पढ़े लिखों को कौन समझा सका है. वैसे ख़ुश होने की एक और बात है दिल्ली में रोज़ अब्र और शबे माहताब है इन दिनों. लेकिन आपको उर्दू में पढ़ कर कौन सुनाएगा ये मुहब्बतनामा.

  • 25. 18:30 IST, 25 अगस्त 2009 anil:

    आपका कहना है भारत आपका दुश्मन है. यदि आपके जैसे मशहूर पत्रकार ही इस तरह की बात लिखने लगे तो दोनों देशों के संबंध कैसे सुधरेंगे?

  • 26. 19:06 IST, 25 अगस्त 2009 pragati singh:

    आमीन ...इंशाल्लाह! आपके खयालात बड़े ही नेक और कबीले-तारीफ है | काश लोग इन सब बातों को भूलकर दोनों देशो के हित और तरक्की के विषय में सोचे |

  • 27. 19:07 IST, 25 अगस्त 2009 pavan:

    जिन्ना जो भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को करना चाहते थे...क्या यह बात आप बेहद यक़ीन के साथ कह सकते हैं. या हमारे भारत के लोग ही हिंदू-मुसलमान को अलग करना चाहते थे...

  • 28. 21:00 IST, 25 अगस्त 2009 Pradeep:

    सब से पहले मुझे अल्लामा इक़्बाल का ये पंक्तियाँ पेश करने दें
    यूनानो-मिस्रो-रोमा सब मिट गए जहाँ से
    बाक़ी मगर है अब तक नामो-निशाँ हमारा
    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
    सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहाँ हमारा
    सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा
    इंडिया जो कि भारत है सिर्फ़ एक देश नहीं, इसका हज़ारों साल का अपना इतिहास है, अपनी संस्कृति है जबकि पाकिस्तान एक नवजात शिशु है सिर्फ़ 63 साल का. पाकिस्तान को अपनी सभ्यता और संस्कृति के नाम पर कहने के लिए कुछ नहीं है. सारे पाकिस्तानी अपनी ही ख़्यालों की दुनिया में हैं. पाकिस्तान और पाकिस्तानियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख गंवाई है. न ही जिन्नाह और न ही पाकिस्तान समस्या है. हर भारतीय चाहे वह नेता हो या नहीं वह विभाजन के सच को सामने लाना चाहता है. इसका कौन ज़िम्मेदार है. जिन्ना, गांधी, नेहरू या सामूहिक नेतृत्व. कुछ जिन्ना को इसका सूत्रधार मानते हैं तो कुछ नेहरू को और कुछ तो गांधी पर भी उंग्ली उठाते हैं और कुछ इसे ब्रितानी साज़िश बताते हैं. 1857 में सारे भारतीय ब्रितानी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे. वहां कोई सांप्रदायिक भेद भाव नहीं था. हिंदू मुसलमान, सिख सभी एक टीम की तरह मिलकर साथ साथ लड़ रहे थे. ऐसा क्या हो गया कि जिन्ना ने विभाजन का मुद्दा खड़ा कर दिया.

  • 29. 02:14 IST, 26 अगस्त 2009 Muzaffar Adnan:

    जनाब हनीफ़ साहब, आपने ये लेख तो बहुत ही अच्छा लिखा है जो पाकिस्तान के लोगों की मानसिकता दिखाती है. मेरे विचार से ये सिर्फ़ राजनीति का खेल है जिसमें हर कोई अपनी दुकान चलाने की कोशिश कर रहा है. वरना एक तरफ़ आडवाणी ने उस व्यक्ति के लिए जो बयान दिया वो तो माफ़ कर दिया गया लेकिन उसी क़सूर के लिए जसवंत सिंह को घर से बाहर कर दिया गया, आख़िर ये राजनीति नहीं तो और क्या है. आज प्रश्न ये है कि जिन्ना क्या थे, उनका व्यक्तित्व कैसा था बल्कि प्रश्न ये है कि एक आम इंसान को पेट भरने के लिए रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए एक छत चाहिए जो न भारत के नेता दे रहे हैं और न पाकिस्तान के. हनीफ़ साहब मैं आपको पढ़ कर हैरान भी हुआ कि जहां आप एक तरफ़ जिन्ना को क़ायदे-आज़म मानते हैं वहीं आप ये भी लिख रहे हैं कि जिन्ना एक ऐसी हस्ती हैं जिसे लोग पाकिस्तान में भी नहीं पहचानते. और अंत में मैं बस यही कहना चाहुंगा कि आप रहमतुल्ला का मतलब अच्छी तरह जानते तो ये कभी नहीं लिखते.

  • 30. 13:45 IST, 26 अगस्त 2009 abhishek triapthi:

    मोहम्मद हनीफ़ साहब जैसे लोग ख़ुश होते हैं तो इसमें ग़लती क्या है. जबतक उनके जैसे पढ़े लिखे लोग भी काफ़िरों की मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं तो बाक़ी लोगों की सोच का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, फिर बेचारे मुल्ला उमर को कोसने का क्या फ़ायदा, उसका तो काम ही यही है. साहब इतनी ही अगर आप अपने देश के बारे में सोच लेते तो ग़रीबों का कुछ भला हो जाता. जहां तक जिन्ना की बात है जसवंत सिंह ने कहा तब जाकर आपको जिन्ना पर विश्वास हुआ तो ये अपने आप में शर्म की बात है. मतलब जिन्ना पर विश्वास करने के लिए भी आपको (आपके अनुसार) काफ़िरों की ज़रूरत पड़ती है. जसवंत सिंह कोई भारत के नुमाइंदे नहीं हैं कि उनकी राय पूरे भारत की राय हो और जिन्ना के बारे में आप ज़्यादा बेहतर जानते हैं कि वे कितने सेकूलर थे. दुख की बात है कि जसवंत सिंह जैसे लोग गांधी में ग़लती और जिन्ना में ख़ूबी ढूंढते हैं. मैं ये नहीं कह रहा कि जिन्ना अच्छे नहीं, पाकिस्तान के लिए तो वह मसीहा हैं लेकिन बटवारे के लिए वो ज़िम्मेदार थे इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. दुख इस बात का भी है कि जसवंत सिंह जी और देश के सारे नेता चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी जिन्ना पर सोच कर समय बर्बाद कर रहे हैं. हमारे पास करने को और बहुत कुछ है. इतने लोग स्वाइन फ़्लू जैसी महामारी से मर रहे हैं पर किसे परवाह है. अकाल पड़ा है पर जिन्ना बड़ा है.

  • 31. 18:24 IST, 26 अगस्त 2009 nitin:

    बहुत ही हो हल्ला मचना शुरू हो गया है. जैसे कf जसवंत सिंह ने जिन्ना को 1947 के बटवारे का अपराधी न मानकर कोई बहुत ही बड़ा अपराध कर दिया हो। लेकिन हाँ ,सरदार पटेल को इस कीचड में धकेल कर जसवंत सिंह ने जरूर अपराध किया है। बxटवारे का अपराधी अगर ढूँढने की कोशिश की जाय तो हमें उन कारणों को देखना पड़ेगा जो इस संसार में इस्लाम के साथ आए । जिन्ना ने अपने मुस्लिम लीग के सम्मलेन में दिए गए एक भाषण में कहा था कि जिस दिन भारत में पहले मुसलमान ने कदम रक्खा था पकिस्तान के निर्माण की नींव उसी दिन रक्खी गई थी।लेकिन बाद में जिन्ना से दो कदम आगे बढ़कर गाँधी जी के प्यारे शिष्य नेहरू ने अपने सपनो को पूरा करने के लिए भारत के बटवारे में जिन्ना का पूरा साथ दिया,और समर्थन मिला उन्हें भारतीय मुसलमानों का।बटवारे के जितने भी कारण रहे उनमे बड़ा कारण था भारत में ३०% मुसलमानों की आबादी। अंत में एक ही बात कहना चाहूँगा कि जसवंत सिंह पूरे भारत से छमा मांगे क्यों कि वह तुच्छ मनुष्य,सरदार पटेल की पाँव की धूलि के बराबर भी नही है।

  • 32. 20:50 IST, 26 अगस्त 2009 कुशल पटेल:

    साफ़ है कि आपका देश रसातल से भी नीचे की किसी जगह की तलाश में है. वैसे आप तमाम बातों पर लिखते हैं लेकिन नेहरु के गुड गवर्नेंस या गांधी की अहिंसा नीति पर क्यों नहीं लिखते? पाकिस्तानी स्कूलों में विभाजन से पहले के सौ वर्षों के विकृत इतिहास की पढ़ाई में उचित बदलाव के मुद्दे पर भी आवाज़ उठाने की ज़रूरत है.

  • 33. 00:17 IST, 27 अगस्त 2009 rahul upadhyaya:

    हम थे अलग
    इसलिए हुए अलग
    या
    हुए अलग
    इसलिए अब हैं अलग?

    'बिग बैंग' के नाद ने हमें
    कर दिया जिनसे दूर
    कोशिश उनसे मिलने की
    हम करते हैं भरपूर

    लेकिन पास-पड़ोस में जो रहते हैं
    उनसे करें न प्यार
    खड़ी हैं कई दीवारें
    जिनके बंद पड़े हैं द्वार

    छोटी सी इस धरती पर
    जब-जब खींची गई रेखाएँ
    नए-नए परचम बने हैं
    और गढ़ी गई कई गाथाएँ

    अब सब खुद को हसीं बताते हैं
    और औरों की हँसी उड़ाते हैं
    हम ऐसे हैं, हम वैसे हैं
    कह-कह के वैमनस्य बढ़ाते हैं

    हम सही और तुम गलत
    जब राष्ट्र-प्रेम के परिचायक बन जाते हैं
    तब इस वाद-विवाद की वादी में
    हम सुध-बुध अपनी खोने लगते हैं
    और दूर दराज के ग्रहों पर
    विवेक खोजने लग जाते हैं

  • 34. 01:56 IST, 27 अगस्त 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    क्या ख़ूब लिखा है आपने. अगर सबको जसवंत सिंह के लिखने पर इतना एतराज़ है तो हम ख़ुद क्यों नहीं इतिहास उठा कर देख लेते कि भारत के विभाजन में किसका कितना हाथ था. अगर हम सच्चे मन से उन सब लोगों की किताबें पढ़ लें जो उस दौर के बारे में लिखी गई थीं तो सच्चाई अपने आप खुल कर सामने आ जाएगी.

  • 35. 15:42 IST, 27 अगस्त 2009 Rajnandan :

    ...मन को समझाने के लिए अभी इतना हीं काफी है कि आजादी की लड़ाई में दो तरह के लोग थे १.स्वतंत्रता सेनानी २. सत्ता सेनानी...! आगे की लकीर पिटना व्यर्थ है क्योंकि साँप बहुत आगे निकल कर अपने मकसद में कामयाब हो चुका है.

  • 36. 17:32 IST, 27 अगस्त 2009 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":

    वाह जनाब क्या लेख लिखा है आपने. इसे कहते हैं इंसाफ़ की आंखों से लोगों को देखने के लिए प्रेरित करना. देखिए अगर पाकिस्तान में इस तरह का माहौल है तो इसके लिए कई लोग ज़िम्मेदार हैं, वहां के मौलवी हज़रात, वहां की सरकार और माता-पिता क्योंकि शिक्षा लोगों के सोचने का नज़रिया बदल देती है. शिक्षित व्यक्ति काफ़ी ऊपर उठ कर हर पहलू पर सोचता है वह सिर्फ़ मज़हब की बातें नहीं करता बल्कि व्यवहारिक सतह पर सोचता है, यही वजह है कि हिंदुस्तान में लोगों का नज़रिया बदला है, चाहे कोई भी राजनीतिक पार्टी हो. कभी-कभी कुछ पार्टियों की मजबूरी हो जाती है लेकिन हक़ीक़त वो भी जानते हैं.

  • 37. 20:04 IST, 27 अगस्त 2009 manish:

    जिन्ना का जिन, यह सब भारतीय राजनीतिक नाटक है. कोई और मुद्दा नहीं है. बीजेपी तो गई.

  • 38. 20:20 IST, 27 अगस्त 2009 jai khohali:

    हनीफ़ साहब, लिखा तो आपने ठीक ही है. जसवंत सिंह ने जो जिन्ना के बारे में लिखा उससे पाकिस्तान के लोग ख़ुश हो सकते हैं लेकिन गांधी के लिए किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं क्योंकि गांधी और जिन्ना का कोई मेल ही नहीं है. जिन्ना सिर्फ़ एक नेता और व्यक्ति हैं लेकिन गांधी एक विचार है जो मर नहीं सकता. वह आज भी प्रासंगिक है और जीवित है. जब कि जिन्ना को तो पाकिस्तान में ही लोग नहीं जानते. वह तो कब के मर चुके हैं. इसलिए गांधी और जिन्ना की तुलना ठीक नहीं.

  • 39. 21:50 IST, 27 अगस्त 2009 Shailendra Pratap Singh:

    आप का ब्लॉग अच्छा लगा. आपसे बस इतना ही कहना है कि ये हिंदुस्तान की ताक़त है जहाँ बीजेपी के नेता जसवंत सिंह सरीखे तरह के लोग भी जिन्ना के संबंध में अच्छी राय रखते हैं. हो सके तो ये देखें कि पाकिस्तानी स्कूल में कैसा इतिहास पढ़ाया जा रहा है और क्या पाकिस्तानी बच्चे और अवाम इतिहास की सही समझ के साथ अपनी राय़ रखने में आज़ाद रहेंगे?हिंदुस्तान सेकुलर है जहां सभी धर्मों के लोगों को अधिकार है और ये हमारी सोच का परिणाम है. कृपया हमारी ताक़त को सही समझें और इसे काफ़िर की तरह नहीं देखें.


  • 40. 11:46 IST, 29 अगस्त 2009 Pawan singh (ara) bihar:

    हिन्दू संकीर्णता का पाठ आपको बचपन में पढाया गया है, संम्भव है ज़्यादातर मुसलमानों को ये पाठ पढ़ाया जाता हो और हमें दुश्मन तथा काफिर कहने वाले संकीर्ण मानसिकता रखते हैं
    हनीफ़ साहब आपको नहीं लगता है कि ये संकीर्णता ही बँटवारा, युद्ध तथा नफ़रत की जड़ हैं जो पाकिस्तान के लिए विनाश का कारक बन रहा है. जिन्ना जसवंत नेहरु विवाद ये सब राजनीतिक ढोल है इसमे जश्न मनाने वाली कोई बात नहीँ है. आपको बता दूँ कि जिसे आपने काफिर कहा उन्हे बचपन मे संकीर्णता का पाठ नही पढ़ाया जाता. मुझे याद है दादा जी के साथ दरागाह या मस्जिद के सामने से गुज़रते वक़्त सर झुकाने को कहा करते थे. आशा करता हूँ आप अपने स्तर संकीर्णता कम करने की कोशीश करेंगे.

  • 41. 13:19 IST, 29 अगस्त 2009 naveen sinha:

    भारत और पाकिस्तान का विभाजन क्यों हुआ, क्या कारण थे. बंटवारे के लिए ज़िम्मेदार की बहस से आगे बढ़ने की आवश्यकता है और फिर ये जानने की ज़रूरत है कि दोनों देशों के रिश्तों में इस क़दर करवाहट क्यों है. आज़ादी के बाद जहाँ नेहरू भारत को एक आधुनिक देश बनाने की सोच रहे थे लेकिन उसी समय पाकिस्तानी नेताओं को कश्मीर की बात याद आ रही थी. आख़िर अब पाकिस्तान कहाँ और भारत कहाँ है. हम आसानी से देख सकते हैं.

  • 42. 14:25 IST, 29 अगस्त 2009 Prashant :

    हनीफ साहब एक हिन्दू पार्टी का नेता जिन्ना की तारीफ कर सकता है पर आप जैसा पत्रकार हिन्दू को संकीर्ण और काफिर मान कर अपनी बात रख रहा है, हम जिन्ना की तारीफ कर सकते है. सर्व धर्म सम्भाव को स्वीकार कर सकते है, अपवाद को छोड़कर सब के साथ सहर्ष भावः से रह सकता है और आप अपने देश की हालात न देख हमे संकीर्ण और काफिर के नाम से संबोधित कर रहे है, और रही बात गाँधी औरर जिन्ना की तो गाँधी एक व्यक्तित्व नहीं बल्कि एक जीवंत वैश्विक विचार है औरर जिन्ना केवल एक राजनैतिक ज़िद है जिसे उनके ज़िद का हिस्सा बने पूर्वी पाकिस्तान ने भी नकार दिया. हम भारतीय तो फिर भी अपने इतिहास को हर कोने से पढ़ना चाहते हैं, उस पर बहस भी करते है पर आप अपने देश मे क्या पढ़ सकते है उस पर विचार करे और तब संकीर्ण और काफिर शब्दों का इस्तमाल करे.


  • 43. 23:48 IST, 29 अगस्त 2009 Mukesh Sakarwal:

    देश में अकाल पड़ा है और मीडिया और राजनेताओं के लिए जिन्ना बड़ा मुद्दा है.

  • 44. 21:17 IST, 24 सितम्बर 2009 Hussain Ali:

    आप सभी की बात से मैं सहमत हूँ. और मुझे अच्छा लगा कि आप बुद्धिमान लोग भी इस दुनिया में हैं पर क्या आप लोगों ने इतिहास पढ़ा भी है या यूंही किसी के कहे पर उछल रहे हैं? भारत-पाकिस्तान का बटवाला उस समय के नेताओं की मनमानी थी, उन्होंने सोचा कि अब तो हिंदुस्तान अपने पापा का हो गया है चाहो जिसे भी घुमा दो, जिसे चाहो बर्बाद कर दो कौन बोलने वाला है और उन लोगों ने वही खिचड़ी पकाई. लेकिन कभी उन लोगों ने आम जनता से नहीं पूछा कि तुम क्या चाहते हो? जो आज हो रहा है वही हिंदुस्तान पाकिस्तान में उस समय भी हुआ था. आज भी हम दोनों देश के एक लोग एक दूसरे से मिलना चाहते हैं, पहले भी हम मिलना चाहते थे पर ये नेता दिलों पर दीवार उठा देते हैं.

  • 45. 05:48 IST, 04 अक्तूबर 2009 सचिन देव:

    प्रशांत भाई, हनीफ जी का कटाक्ष उन पाकिस्तानियों पर है जो इस प्रकरण में भी भारत की गलतियाँ निकालने से नहीं चूकेंगे। कृपया लेख दुबारा पढिये और लाठी चलाने से पहले देख लें कि वास्तव में साँप है या रस्सी। वैसे मैं आपके मंतव्य से सहमत हूँ और आपकी राजनैतिक जिद वाली बात बहुत उपयुक्त और अच्छी लगी।

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