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गे ग्लोबलाइजेशन का जश्न

राजेश प्रियदर्शी राजेश प्रियदर्शी | रविवार, 05 जुलाई 2009, 05:06 IST

अब से दसेक साल पहले तक लोग आँख मारकर कहते थे, "इनके शौक़ ज़रा अलग हैं." 'नवाबी शौक़', 'पटरी से उतरी गाड़ी', 'राह से भटका मुसाफ़िर' जैसे जुमलों में तंज़ था लेकिन तिरस्कार या घृणा की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी थी.

हमारे स्कूल में बदनाम मास्टर थे, हमारी गली में मटक-मटकर चलने वाले 'आंटी जी' थे, भारत की राजनीति में कई बड़ी हस्तियाँ थीं जिनकी 'अलग तरह की रंगीन-मिजाज़ी' के क़िस्से मशहूर थे लेकिन धारा 377 का नाम अशोक राव कवि के अलावा ज्यादा लोगों को पता नहीं था.

भारत ऐसा देश है जहाँ अर्धानारीश्वर पूजे जाते हैं, किन्नरों का आशीर्वाद शुभ माना जाता है, बड़े-बड़े इज़्ज़तदार नवाब थे जिनकी वजह से 'नवाबी शौक़' जैसे मुहावरे की उत्पत्ति हुई, वहीं छक्के और हिजड़े दुत्कारे भी जाते हैं.

ये सब अलग-अलग दौर की, अलग-अलग तबक़ों की, अलग-अलग सामाजिक संरचनाओं की बातें हैं लेकिन भारतीय चेतना में विवाह के दायरे में संतानोत्त्पति से जुड़े सर्वस्वीकृत विषमलिंगी सेक्स के इतर एक पूरा इंद्रधनुष है जिसमें सेक्स और मानव देह से जुड़े सभी तरह के रंग रहे हैं, उसकी बराबरी किसी और समाज में नहीं दिखती.

लेकिन नए मिलेनियम में ऐसा कैसे हुआ कि क्वीर, ट्रांसवेस्टाइट, ट्रांससेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, थर्ड सेक्स, ट्रैप्ड इन रॉन्ग बॉडी....न जाने कितने नए विशेषण अचानक हमारे बीच चले आए जिनका सही अर्थ ढूँढ पाना विराट यौन बहुलता वाली भारतीय संस्कृति के लिए बड़ी चुनौती बन गया.

नए मिलेनियम में ऐसा क्या था जिसने भारतीय समाज के भीतर चुपचाप बह रही समलैंगिकता की धारा को सड़कों पर ला दिया, गे प्राइड मार्च सिर्फ़ कुछ वर्ष पहले तक भारत में कल्पनातीत बात थी.

मेरी समझ से सिर्फ़ एक चीज़ नई थी वह है ग्लोबलाइज़ेशन.

'गर्व से कहो हम गे हैं' का नारा 1960 के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा और दो दशक के भीतर पूंजीवादी पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन के रूप में फैल गया, 1990 आते आते यूरोप और अमरीका में लगभग पूरी राजनीतिक स्वीकार्यता मिली लेकिन समाजिक स्वीकार्यता आज भी बेहद मुश्किल है.

दिल्ली हाइकोर्ट ने सहमति से होने वाले समलैंगिक यौनाचार को क़ानूनन अपराध की श्रेणी से हटा दिया तब जिस तरह का जश्न मना उससे यही लगा कि भारत में यही एक बड़ा मुद्दा था जो हल हो गया है, अब भारत दुनिया के अग्रणी देशों की पांत में खड़ा हो गया है.

निस्संदेह आधुनिक पूंजीवादी पाश्चात्य लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप यह न्यायसम्मत फ़ैसला है, जो जश्न मना रहे हैं उनमें सिर्फ़ एलजीटीबी (गे, लेस्बियन, ट्रांससेक्सुअल एंड बाइसेक्सुअल) समुदाय के ही लोग नहीं हैं, मेरे पढ़े-लिखे, विवाहित, बाल-बच्चेदार, फेसबुक वाले, मल्टीनेशनल वाले, शिक्षित-सभ्य सुसंकृत शहरी दोस्त भी हैं.

जश्न मनाने वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं बल्कि उन्हें ही मुझसे है कि मैं इसे एक महान क्रांतिकारी घटना के तौर पर देखकर उनकी तरह हर्षित क्यों नहीं हो रहा हूँ.

मेरे दोस्तों, मेरा मानना है कि यह उन चंद सौ लोगों का दबाव था जो भारत को पश्चिमी पैमाने पर एक विकसित लोकतंत्र के तौर पर सेलिब्रेट करना चाहते हैं. जल्दी ही आप देखेंगे कि भारत में 'क्रुएलिटी अगेंस्ट एनिमल' को रोकने के लिए आंदोलन चलेगा, एक कड़ा क़ानून बनेगा और आप फिर जश्न मनाएँगे.

जब मैं छत्तीसगढ़ और झारखंड की लड़कियों की तस्करी, किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों और दलितों के शोषण, भूखे बेघर बच्चों की पीड़ा का मातम मनाता हूँ, जब मैं उम्मीद की क्षीण किरण 'नरेगा' को लेकर उत्साहित हो जाता हूँ तब आप मेरे सुख-दुख कहाँ शामिल होते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 09:19 IST, 05 जुलाई 2009 अशोक पाण्‍डेय:

    आपने करोड़ों आम भारतवासियों के मन की व्‍यथा को वाणी दी है. इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ.

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  • 2. 10:13 IST, 05 जुलाई 2009 manish khattar:

    आपकी बेबसाइट का नया रूप बहुत शानदार दिख रहा है. मैं लंदन में ही रहता हूँ और एक भारतीय कंपनी में काम करता हूँ. मुझे राजेश प्रियदर्शी का ब्लॉग बहुत पसंद आया, उन्होंने यह बात बहुत सही कही है कि आदिवासियों और श्रमिकों के बारे में चिंता करने वाले लोग और गे राइट मांगने वाले अलग-अलग लोग है.

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  • 3. 11:52 IST, 05 जुलाई 2009 अशोककुमार शर्मा :

    मैं खुद एक लेखक हूँ. 28 साल हो गये इसी मीडिया जगत में. पहली बार एक घटिया समझे जाने वाले विषय पर शानदार तर्क और वाक्य पढ़ने का मौका मिला है. वाह!

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  • 4. 13:02 IST, 05 जुलाई 2009 संजय द्विवेदी:

    समलैंगिकता एक सामाजिक बुराई है जिसको बढ़ावा देना समाज के बहुत खतरनाक साबित होगा. राजेश प्रियदर्शी की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि यह न्यायसम्मत निर्णय है लेकिन उनका यह कहना सही है कि गे गे की रट लगाने वाले मैकडॉनल्ड और पित्ज़ा हट संस्कृति वाले लोग हैं जो ग्लोबलाइजेशन के असर में ऐसी बहकी बातें कर रहे हैं. आपकी साइट पर ब्लॉग देखकर ताज़गी का अहसास हो रहा है.

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  • 5. 13:07 IST, 05 जुलाई 2009 dhiren mishra:

    मेरा मत है कि भारत में समलैंगिकता को बेवजह तूल दिया जा रहा है. समलैंगिक लोग सभी जगह होते हैं. वैसे ही भारत में भी हैं. इतना बवाल मचाने की क्या ज़रूरत है. सड़कों पर परेड निकाल कर माहौल ख़राब करने के बदले इसे लोगों का निजी मामला रहने देना चाहिए. राजेश साहब का कहना सही है कि ये सब ग्लोबलाइज़ेशन के चक्कर में हो रहा है. और बहुत से मुद्दे हैं लेकिन कोई पूछने वाला नहीं है. अच्छा ब्लॉग है. यह साइट बहुत स्मार्ट और अच्छी लग रही है.

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  • 6. 14:12 IST, 05 जुलाई 2009 Prashant Bhagat:

    राजेशजी, आप जिस मुद्दे पर बात कर रहे हैं वो मुद्दा लगभग 35 फ़ीसदी भारतीयों से जुड़ा है. जिस मुद्दे को लेकर आप चिंता व्यक्त कर रहे हैं वो भरे पेट वाले लोगों का है. जिनको रोटी की चिंता नहीं सताती है वही लोग सेक्स के विकल्प बताते हैं.

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  • 7. 14:42 IST, 05 जुलाई 2009 SHABBIR KHANNA:

    राजेश जी बहुत शानदार लिखा है. ऐसा लगता है कि भारत में एक दिन इंसान और जानवरों के बीच के संबंध को भी क़ानूनी दे दिया जाएगा. लगता है कि कोर्ट में बैठे हाकिम पूरी तरह से पश्चिम से प्रभावित हैं. साथ में बेइमान नेताओं का साथ है. क्योंकि किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया है.

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  • 8. 16:02 IST, 05 जुलाई 2009 girish bene:

    बहुत खूब, राजेशजी ने बहुत ही सही कहा है. ऐसे आंदोलन तो बस सिर्फ़ गिने चुने लोग ही चलाते हैं. खास कर पेज थ्री शख्सियतें. ये लोग समाज की वास्तविकता से कोसों दूर हैं. किस पर काम होना चाहिए और किसका जश्न मनाना चाहिए, ये आपने बहुत ही अच्छी तरह उछाला है. मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ कि कम से कम आपने तो मीडिया का सही इस्तेमाल किया.

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  • 9. 18:02 IST, 05 जुलाई 2009 JG:

    क्या बात है राजेश. शुक्रिया. मुझे बहुत खुशी है कि लंदन में आपकों यह याद रहा कि भारत कैसा है. ढेरों पत्रकार मित्र हैं,जो ए. सी. दफ्तर में जाते ही भूल जाते हैं कि जिस गाँव में उनका घर है उस गाँव का नसीब उनके नसीब की तरह नहीं बदल पाया है.
    साथियों लोकतंत्र की परिभाषा में अल्पतंत्रों के विचारों के बोलबाले को कब तक स्वीकारेंगे.

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  • 10. 22:23 IST, 05 जुलाई 2009 संजय शर्मा:

    राजेश जी यह भारतीय समाज पश्चिम की बुराइयों का ही अनुकरण क्यों करता है. क्या यहां की गरीबों, किसानों,दलितों और आदिवासियों की समस्याएं नही दिखाई देती.इन समस्याओं के लिए तो कभी ऐसी बहस और आंदोलन भारत में नही होते जैसा कि आज गे के मुद्दे पर हो रहा है.

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  • 11. 07:25 IST, 06 जुलाई 2009 aakansha singh:

    भारतीय स्वर्गदूत और महान नेता समलैंगिक नहीं थे लेकिन हम न तो स्वर्गदूत और न ही नेता हैं. इसलिए हम ऐसा कर सकते हैं. समलैंगिकों की दुनिया.आदर्श दुनिया नहीं है. लोगों को समझने की जरूरत है. आप परिपक्व नहीं हैं. लोगों को आहत कर रहे हैं. सेक्स हर तरह से मज़ा है.

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  • 12. 11:59 IST, 06 जुलाई 2009 हर्षवर्धन:

    राजेशजी, इस एक कानूनी अधिकार के फैसले पर बहुत से लेख पढ़े. बहुत सी बहस देखी-सुनी. यहां तक की खुद भी बहुत चाहकर भी इस पर कुछ लिख नहीं पाया. लेकिन, आपका ये लेख एकदम अलग और असल भारतीय नजरिए से लिखा दिखता है. वरना तो, हम (पूरा मीडिया और हर तबके के तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग) इस फैसले को ऐसे देख रहे थे, जैसे भारत कोई अजूब देश हो और हम (पूरा मीडिया और हर तबके के तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग) इस फैसले के जरिए बाहर से यहां आकर भारत के कल्याण और क्रांति की उम्मीद कर रहे हैं.

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  • 13. 12:14 IST, 06 जुलाई 2009 अमित प्रभाकर:

    क्या ख़ूब कहा है आपने राजेश जी! ऐसी बातें जो भारत में अधिक सहजता से स्वीकार्य थीं, को अखिल भारतीय जामा पहना कर हम इसे थोड़ा और मुश्किल बना रहे हैं.

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  • 14. 12:21 IST, 06 जुलाई 2009 Ramkomal Yadav:

    ये भारतीय संस्कृति नहीं है जो लोग इसको मानते हैं उन्हें भारतीय कहलाने का अधिकार नहीं है.

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  • 15. 12:36 IST, 06 जुलाई 2009 charu:

    मूल बात आपकी सहीं है, लेकिन 'नरेगा' को लेकर ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है.
    दोश शायद आपका भी नहीं है, लंदन में बैठ कर ऐसी बातें दिल को बड़ी तसल्ली देती होंगी, क्योंकि आप भारत में रहते तो जिस छत्तीसगढ़ से लड़कियों के लापता होने को लेकर चिंतित हो रहे हैं, वहां 'नरेगा' की वजह से किसानों को हो रही समस्या को भी समझ पाते.
    'नरेगा' की वजह से छत्तीसगढ़ से मज़दूरों का पलायन भले ही कम न हुआ हो, लेकिन दिनोंदिन महंगे होते जी रही मज़दूरी के बीच मज़दूरों का न मिलना किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गया है. इसके अलावा आपकी जानकारी के लिए छत्तीसगढ़ सरकार निम्न आय वर्ग के लोगों को एक और दो रुपए प्रति किलो के हिसाब से हर महीने 35 किलो चावल दे रही है. इससे रही-सही कसर भी पूरी हो जा रही है. कभी आइए न हमारे छत्तीसगढ़, सही तस्वीर दिखाएंगे, जिससे आप दुनिया को सही तस्वीर दिखा सकें.

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  • 16. 12:46 IST, 06 जुलाई 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    राजेश जी! आपका लेख बहुत ही अच्छा लगा. लेकिन मैं आपको ये बात बता दूँ कि भारत एक विशाल समुद्र की तरह है जिसने हर तरह की संस्कृतियाँ अपने-आप समा गई हैं. मैं आपका ध्यान उस तरफ़ ले जाना चाहूँगा जब भारत विश्व गुरू कहा जाता था. और तब ऐसी बातें हमारे समाज में अच्छी नहीं मानी जाती थीं और समझता हूँ कि अब ऐसे क़ानूनी मान्यता मिल जाने से हमारे समाज में एक तरह से ज़रूर घुल जाएगा जोकि हमारी सादियों चली आ रही सभ्यता और संस्कृति के लिए अच्छा नहीं होगा. मुझे तो इससे बहुत ही बुरा लगा है.

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  • 17. 15:55 IST, 06 जुलाई 2009 Manoj Bhawuk:

    इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई
    नर नर संगे, मादा मादा संगे जाई .
    हाई कोर्ट देले बाटे अइसन एगो फैसला
    गे लो के मन बढल लेस्बियन के हौसला
    भइया संगे मूंछ वाली भउजी घरे आई
    इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

    खतम भइल धारा अब तीन सौ सतहत्तर
    घूमतारे छूटा अब समलैंगिक सभत्तर
    रीना अब बनि जइहें लीना के लुगाई
    इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

    पछिमे से मिलल बाटे अइसन इंसपिरेशन
    अच्छे भइल बढी ना अब ओतना पोपुलेशन
    बोअत रहीं बिया बाकि फूल ना फुलाई
    इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

    जानवर से यौनाचार के नियम इक दिन टूटी
    आदमी से जानवर के रिस्ता ओह दिन जुटी
    फेर जे बिआई , ऊहे देश के चलाई
    इ आज के डिमांड बा रउरा ना बुझाई

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  • 18. 16:55 IST, 06 जुलाई 2009 सोमेश गांगुली:

    आपने सही मुद्दे को उठाया है. भारत ऐसा देश है जो किसी की छवि में विश्वास करता है न कि आत्मा में, और यह बात जल्दी ही नहीं बदलने वाली. समलैंगिकों के संदर्भ में भी नहीं. सबसे पहले भारत को अपनी प्राथमिकताएं तय कर लेनी चाहिए कि वह करना क्या चाहता है. इस मुद्दे पर अब तक लिखे गए सबसे बेहतरीन ब्लॉगों में से एक है यह.

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  • 19. 17:03 IST, 06 जुलाई 2009 sushant Singh Dangi:

    आज बीबीसी हिंदी वेबसाइट का नया रूप देख कर बहुत खुशी हुई.

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  • 20. 18:02 IST, 06 जुलाई 2009 विवेक सिंह:

    बेहद प्रभावशाली लेखन!

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  • 21. 19:18 IST, 06 जुलाई 2009 murlidhar:

    भारत में यह मुद्दा बहस का नहीं है. इस पर बेकार की बहस से बचना अच्छा है. सेक्स मज़े की चीज़ नहीं है, बल्कि यह संतानोत्पत्ति के लिए ज़रूरी है.

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  • 22. 19:47 IST, 06 जुलाई 2009 sHREEANSH SINGH (PRINCE) :

    राजेश जी आपको पहली बार देखा और पढ़ा. आपके कॉलम की ताक़त आपकी आवाज़ की ताक़त की पर्याय या कहें दोनों समान हैं. मैं पिछली पाँच जुलाई को कोलकाता में परीक्षा के सिलसिले में था वहाँ मुझे गे-परेड का साक्षात दर्शन करने को मिला. सभी तथाकथित समलैंगिक उच्च मध्य वर्ग का दर्पण लगे जो मीडिया पर्सन और विदेशियों से घिरे हुए धारा 377 का विरोध कम अपनी गे लीगेसी को बढ़ावा देने के विचार में दिखावा करते ज़्यादा नज़र आए. बीबीसी हिंदा का बदलाव और इसके मोबाइल में आ जाने से मैं स्वर्ग का सा महसूस कर रहा हूँ. शुक्रिया.

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  • 23. 20:04 IST, 06 जुलाई 2009 Swati Sharma:

    ग़लत काम को कितने ही साल तक किया जाए. वो हमेशा ग़लत ही रहेगा. समय की दलील देकर ग़लत को सही नहीं किया जा सकता है. अगर अप्राकृतिक सेक्स हज़ारों साल से होता आया है और ये ग़लत है तो हमेशा हमेशा ग़लत ही रहेगा. कृपया ग़लत को ग़लत ही कहें.

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  • 24. 21:56 IST, 06 जुलाई 2009 मधुरेश:

    मैं इस ब्लॉग से सहमत नहीं हूँ. मीडिया और कुछ बुद्धिजीवी लोगों की आदत है हर अच्छे काम में खोट निकालना. एक बहुत अहम फ़ैसला है, सही अर्थों में मैं लोकतांत्रिक स्वतंत्रता मिली है लोगों को. इसको किसी और मुद्दे से क्यों जोड़ रहे हैं. अच्छा काम हुआ है उसकी सराहना करनी चाहिए और आदिवासियों का इससे क्या नुकसान हो जाएगा. इस फ़ैसले से विदेश में भारत का सम्मान ही बढ़ा है.

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  • 25. 22:30 IST, 06 जुलाई 2009 maharaj baniya:

    ये बात बिलकुल सोलह आने सही है कि इस तरह की चीज़ उन 35 फ़ीसदी लोगों के दिमाग में है जिनको रोटी के लिए नहीं सोचना और भागना नहीं पड़ता और आम आदमी तो शायद चकरा ही गया होगा जब उसने ये खबर मीडिया से सुनी या पढ़ी होगी. ज़िंदगी खूबसूरत है जब आप खुश हैं और अपनी मनमानी कर रहे हैं. बिना रोक टोक के कानून के तहत रहकर. अब जब ये कानून के ज़रिए पास हो गया है तो फिर उन लोगों के लिए और आसानी हो गई है और जिन्हें इस की खबर नहीं. वो अपनी दीन दुनिया में खुश हैं. पर इन बदलावों पर व्यवस्था की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसे तो समय ही बताएगा.

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  • 26. 23:11 IST, 06 जुलाई 2009 UMESH YADAVA:

    बहुत अच्छा राजेश जी ! आप ने बिलकुल सही कहा यह ग्लोबलाइजेशन का ही असर है. अब तो यही लगता है कि जन प्रदर्शन भी यथार्थ के विषयों से हटकर फैंसी विषयों पर ज्यादा होते हैं. बहुत अच्छा लेख है; आप का धन्यवाद.

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  • 27. 00:10 IST, 07 जुलाई 2009 Anup Adhyaksha:

    किसी भारतीय देहाती की निगाहों से देश की समस्याएँ थोड़े ही समझी जाती है. विदेशी चासनी में लबरेज़ cheer leaders की समझ कुछ और है. हिजडों की फौज हमारे गली मुहल्लों में सदियों से शोभायमान है. पर उनके अधिकारों के लिए कोई मनभावन सा इम्पोर्टेड नामकरन Gay Lesbian Pride हो तो कितना आकर्षक लगता है. हमारी भारतीय गरीबी को दर्शाता सत्यजित राय की फिल्में भारतीयों का अपमान है, पर ब्रिटिश निदेशक उसी गरीबी को स्लमडॉग में चित्रित करें तो भाई वह ऑस्कर जीतता है. जय हो जय हो......!

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  • 28. 03:31 IST, 07 जुलाई 2009 Jagdeesh Ram:

    मुझे गर्व है कि आज भी कुछ लोग संस्कृति के बारे में लिखते हैं. इंसानियत के वजूद को समझते हैं.. पता नहीं ये समलैंगिक लोग हमारी संस्कृति को किस मोड़ पर ले जाकर छोड़ देंगे.

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  • 29. 04:33 IST, 07 जुलाई 2009 arvind sharma:

    आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा.

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  • 30. 05:56 IST, 07 जुलाई 2009 Deepak Tiwari:

    बहुत बेहतर राजेशजी, भारत में कुछ एक हज़ारलोग अगर आपके साथ हैं तो जो आप कह रहे हैं वही सही है. यही लोकतंत्र का नुकसान है. कुछ लोग अगर चाहते हैं कि वो सर के बल चलेंगे और भैंस के साथ शादी करेंगे तो कर सकते हैं क्या फ़र्क पड़ता है देश को....लोकतंत्र है कहीं सुना था कि केवल सींग वाले ही राक्षस नहीं होते, बिना सींग वाले भी हमारे आसपास ही मिल जाते हैं.

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  • 31. 07:09 IST, 07 जुलाई 2009 sandeep:

    इन सब दोयम दर्ज़े की बातों पर हम इतना ज़ोर क्यों देते हैं. इस तरह ब्लॉग छपने से अच्छा होता कि कुछ कर दिखाते. मीडिया का इतना ध्यानाकर्षण करने वाली इन चीज़ों को पत्रकारिता की निचली श्रेणी में रखना पड़ेगा. कई अच्छी और उज्ज्वल भविष्य की और उन्मुख बातें हैं, कृपया उन पर अपना ध्यान दें. और समलैंगिक का राग अलापना बंद करें, हिंदुस्तानी समाज शायद सबसे बनावटी समाज है. आप चाहेंगे तो मैं आगे भी लिखता रहूँगा. धन्यवाद

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  • 32. 07:13 IST, 07 जुलाई 2009 himmat singh bhati:

    जो बात आपने अपने ब्लॉग में लिखी है उसी तरह की बात नवभारतटाइम्स डॉट कॉम पर मधुसूदन आनंद ने भी लिखी है. कुछ चंद लोगों पर इतनी चर्चा हो रही है. पर आम लोगों पर कोई चर्चा क्यों नहीं हो रही है जिनकी संख्या इन समलैंगिकों से बहुत ज़्यादा है. इन आम लोगों की बातें और समस्याओं पर सरकार या न्यायालय भी कोई फ़ैसला नहीं देता जो उनकी जायज़ माँगें हैं और वह सदियों से चली आ रही है. समलैंगिकों की तरह आम लोगों को भी एकजुट होना चाहिए औरअपनी माँगें मनवानी चाहिए. यही इन ब्लॉग में भी लिखा गया है.

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  • 33. 07:49 IST, 07 जुलाई 2009 farhat farooqui:

    अब मैं क्या लिखूँ, सब कुछ तो मनोज भावुक साहब ने लिख दिया...क्या खूब कविता लिखी है. पूरी सूरते हाल को एक तंज़ का झाँपड़ मार कर बयान कर दिया है. ...आगे आगे देखिए होता है क्या?

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  • 34. 07:59 IST, 07 जुलाई 2009 atul shahi:

    बिलकुल सही कहा है आपने. इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.

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  • 35. 08:08 IST, 07 जुलाई 2009 Abdul Salaam:

    आज आप समलैंगिकों को ना नहीं कह सकते. कल आप अगर समलैंगिक नहीं हैं, तो भारत में नहीं रह पाएंगे. भारत में अब पश्चिम से उधार ली गई अनेक बातें आप देखेंगे.

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  • 36. 08:23 IST, 07 जुलाई 2009 Mohd Alamgir, Zakir Nagar, 70/2-20, New Delhi:

    राजेशजी जैसे ख़याल के लोग अगर दुनिया में रहें तो सच में दुनिया बदल जाएगी. ऐसी सोच वाले लोगों की ज़रूरत है. और रही बात समलैंगिकों की, इसके लिए सरकार को चाहिए कि एक संगठन बना कर इनको सुधारने की कोशिश की जाए. बहुत बहुत शुक्रिया राजेश जी.

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  • 37. 11:52 IST, 07 जुलाई 2009 s a mulani:

    किस लिए इतना हल्ला मचा रहे हैं लोग! कोर्ट ने फ़ैसला बिल्कुल सही और उचित है! समलैंगिक हज़ारों साल से दुनिया में हैं, और अब भी विद्यमान है, इस फ़ैसले के वजह से पुलिस के अत्याचार से बचा जा सकता है !! किसी को कॉफ़ी अच्छी लगती है तो किसी को चाय, रही बात हमारी संस्कृति की तो वह बची कहां है? दुनिया में घूस दी जाती है, ली जाती है, दुराचार होता किया जाता है? धर्म के नामपर, चढ़ावा के नाम पर ,लेनदेन मे हेराफेरी होती है कि नहीं? भाई दुनिया में इतना गजब होता है फिर भी सह रहे हैं!! फिर समलैंगिक लोगों का तो कोई कसूर भी नहीं है! उन्हें भी तो भगवान ने बनाया है ना ? समाज में उनसे कुछ तकलीफ़ नहीं है. कोर्ट ने बड़ी समझदारी दिखाकर उचित फ़ैसला लिया है!

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  • 38. 14:09 IST, 07 जुलाई 2009 Abdul Salaam:

    हमें अब अपनी सभ्यताओं को छोड़कर पश्चिम की सभ्यता को अपनाना होगा. अगर शराफ़त से नहीं माने तो पश्चिम हमें अजीब, अजीब तरह के हथकडों में ले जाएगा.हमारी ज़िंदगी को जानवरों जैसा कर देंगे. देसवासियों से गुलाबी ब्यार की मनमोहक बहकावे से बचना चाहिए.

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  • 39. 14:49 IST, 07 जुलाई 2009 gulzar hussain:

    बहुत अच्छा आलेख है. स्कूल के ज़माने से ही बीबीसी रेडियो को सुनते आ रहा हूँ, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम का नया रुप देखकर बड़ी ख़ुशी हुई.

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  • 40. 15:16 IST, 07 जुलाई 2009 koi sathi:

    क्या आप वाक़ई में अपने उस गृह प्रदेश के बारे में सोचते हैं... जहाँ से आप लंदन तक पहुँचे. भाई साहिब कई लोग हैं जो झारखंड और छत्तीसगढ़ के नाम पर कमाने का धँधा करते हैं.

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  • 41. 16:04 IST, 07 जुलाई 2009 shantanu:

    वेश्यावृति के अधिकतर मामलों में सहमति होती है. सेक्स वर्कर और ग्राहकों के बीच कोई मतभेद नहीं होते. अगर गे कलचर को कोर्ट मान्यता देता है तो वेश्यावृति को क्यों नहीं. इसे भी क़ानूनी मान्यता मिलनी चाहिए.

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  • 42. 19:25 IST, 07 जुलाई 2009 Dr,Vivek:

    बहुत ही बढ़िया. इस तरह के प्रायोजित मुद्दों पर इस समय हमारा सारा मीडिया फ़िदा है. आपको पढ़ने से और समर्थन में इतने लोगों को पढ़ने से लगता है कि अभी भी कुछ लोग मीडिया का सही इस्तेमान कर रहे हैं. मधुरेश जी की टिपण्णी पढ़कर मज़ा आ गया. अभी भी बिल्कुल मगन हूँ. ऐसे लोगों की आंखें कब खुलेगी? कब सही बातों के लिए धरने शुरू करेंगे ये लोग? आप ने बहुत ही संतुलित और सधी हुई भाषा में बात कही है.

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  • 43. 00:16 IST, 08 जुलाई 2009 सत्यम सिन्हा:

    सही लिखा है. यह बात सही है कि कुछ लोग जो अंगरेज़ी बोलते हैं, जो लोग अमरीका और इंगलैंड का आँख मूंदकर नक़ल करते हैं उनकी संख्या बहुत कम है जो लोग भारत में रहते हैं और भारत के कलचर के हिसाब से जीते हैं उनकी संख्या एक अरब से अधिक है, मीडिया की भी ग़लती है जो इस मामले को एसा रंग दे रही है. यह लोकतंत्र की हार है, जीत नहीं.

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  • 44. 00:21 IST, 08 जुलाई 2009 dinesh manohar:

    देखने में तो सही लगता है लेकिन हम भूल रहे हैं कि भारत एक पारंपरिक देश है और ये अपने संस्कृति पर चलता है. और लगता है कि कुछ लोग इसे बदलने देना नहीं चाहते. भारत एक महान देश है और उसने हमेशा सही रास्ते को चुना है. और वो पश्चिम की राह पर नहीं चलेगा. इसलिए घबराने की ज़रूरत नहीं है.

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  • 45. 07:10 IST, 08 जुलाई 2009 Deepak Mishra:

    ये बहुत अच्छा रहा. आपकी बात सोचने को मजबूर करती है. पढ़कर मज़ा आ गया. बीबीसी हिंदी का प्रशंसक हूँ. नए परिवर्तन ने दीवाना बना दिया.

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  • 46. 10:42 IST, 08 जुलाई 2009 sachin:

    दिल्ली हार् कोर्ट का फ़ैसला समलैंगिकों के लिए जीने और सुरक्षा का सवाल है. अब पुलिस उन्हें परेशान नहीं करेगी. समलैंगिकों की ज़िंदगी ऐसी है कि वे हमारे समाज का हिस्सा रहते हुए भी समाज से अलग है. इस फ़ैसले के बाद उन्हें ताक़त मिलेगी. जहाँ तक ग़लत या सही का सवाल है ये एक बड़े बहस का विषय है.

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  • 47. 10:46 IST, 09 जुलाई 2009 Shishu Prajapati:

    अजब-गजब का हाल
    शादी लड़के से ही होगी,
    लड़का लड़का ही लायेगा।
    लड़की दूल्हा बनकर के अब,
    लड़की के घर ही आयेगा।

    सौतन भी लड़का ही होगा,
    जोगन भी लड़का ही होगा।
    लड़की-लड़की संग भागेगी,
    मज़नू-लैला अब न होगा।

    अब दोस्त दोस्त संग चलने से,
    निश्चित यारों कतरायेगें।
    लड़की-लड़की यदि साथ चली,
    हां अर्थ बदल तो जायेंगे।

    मां-बाप आजकल सोच रहे,
    क्या लड़का लड़की लायेगा?
    या लड़की मेरी भाग किसी,
    लड़की का साथ निभायेगा!

    हो रहा अजब का गजब हाल,
    वैज्ञानिक युग जो है ठहरा,
    इस युग में सब कुछ जायज है,
    पहले नाजायज था पहरा?

    सच बात कहें तो ‘शिशु’ बुरा
    दुनिया भर का बन जाएगा
    क्या फर्क पड़ेगा इससे कुछ
    वो तो बस लिखता जायेगा।

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  • 48. 15:09 IST, 11 जुलाई 2009 satyendra kumar pathak :

    किसी चीज़ का सही होना और किसी चीज़ को अदालती आदेश द्वारा वैध ठहराना{जो किसी चंद तबके को ध्यान में रखकर दिया गया है}दोनों भिन्न बातें हैं.किसी चंद लोगो का अप्राकृतिक सेक्स समाज के मूलविचार को परिवर्तित नहीं कर सकता.यह अश्लील आधुनिकता को एक फैशन बनाने का षडयंत्र मात्र है.समलैंगिग रिश्तो की वकालत करने वाले इसे सेक्स त्रुटी कहते हैं लेकिन अगर यह एक सेक्स त्रुटि होता तो पुरातन काल में अथवा 1960 के पहले क्यों नहीं था?ये सारे सवाल अनुत्तरित हैं.
    "राजेश जी आपके विचार से मैं सहमत हूँ...लेकिन इसमें सामाजिक सोच को और उधृत किया जाता तो मेरे ख्याल से अच्छा होता ...
    आपको सराहनीय प्रयास के लिए साधुवाद ...
    सत्येन्द्र

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  • 49. 10:09 IST, 13 जुलाई 2009 Aaditya narayan jha:

    ऐसे में जबकि एड्स का पहला मामला अमरीका (हेटी) में एक समलैंगिक सिपाही में पाया गया फिर भी गे को क़ानूनी क़रार देना एड्स को न्योता देना है.

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  • 50. 11:32 IST, 13 जुलाई 2009 Sharovan:

    राजेश जी का इस फ़ैसले को न्यायसम्मत कहने पर मैं यही कहुंगा कि जो इस घिनौने फ़ैसले का समर्थन करता है मैं उससे जानवरों का सम्मान करना अधिक पसंद करुंगा. कम से कम जानवर तो ऐसा नहीं करते हैं.

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  • 51. 15:55 IST, 13 जुलाई 2009 navin:

    आपके ब्लॉग पर मनोज भावुक का जवाब पढ़ा तो दिल बाग़ बाग़ हो गया.
    अब जाएंगे मर्द मर्द के साथ
    और महिलाएँ महिलाओं के साथ
    ये हाई कोर्ट का फ़ैसला है
    सचमुच ये कमाल का रिश्ता है.

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  • 52. 15:22 IST, 21 जुलाई 2009 Rajnandan :

    समलैंगिकता एक मानसिक विकृति एवं सामाजिक कुकृत्य है!दुर्भाग्यवश इसे भारत में कानुनी मंजूरी भी मिल गई है मगर अब इसे सामाजिक मान्यता दिलवाने की कोशिस मेरी समझ से उचित नही है| प्रियदर्शी भाई!मेरी समझ में नही आया कि आपने भारत में कहाँ पर ऐसा कौन सा जश्न देख लिया और आप यह कहने पर विवश हो गये "...कि भारत में यही एक बड़ा मुद्दा था जो हल हो गया है, अब भारत दुनिया के अग्रणी देशों की पांत में खड़ा हो गया है."

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