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कितना ऐतिहासिक है मीरा कुमार का चुनाव!

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सुहैल हलीम सुहैल हलीम | गुरुवार, 04 जून 2009, 08:05 IST

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लोकसभा अध्यक्ष के रूप में मीरा कुमार का चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है.

अगर इसलिए कि वे लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष हैं तो उनसे बहुत पहले इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री पद पर पहुँचीं, नजमा हेपतुल्ला लंबे समय तक राज्यसभा की उप सभापति रहीं और प्रतिभा पाटिल अभी राष्ट्रपति हैं.

अगर इसलिए कि वे दलित हैं तो जीएमएसी बालयोगी उनसे पहले इस पद पर रह चुके हैं और वह भी दलित थे. राजनीतिक हलकों में उनके चुनाव की अहमियत यह बताई जा रही है कि वे पहली दलित महिला लोकसभाध्यक्ष हैं लेकिन मेरे ख़्याल से उनका लोकसभाध्यक्ष बनना ऐतिहासिक कम और प्रतीकात्मक ज़्यादा है.

मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि जात-पात और भेदभाव की बुनियाद पर पर बँटे हुए हिंदुस्तान के समाज में महिलाओं और ख़ास तौर पर दलित महिलाओं के रास्ते में मुश्किलें नहीं हैं. सच तो यह है कि हर क़दम पर उनके रास्ते में रुकावटें हैं और समान अधिकार की बात एक सपने से ज़्यादा नहीं है.

लेकिन क्या मीरा कुमार वाक़ई उस तबके की नुमाइंदगी करती हैं, जिन्हें इन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है? मेरे ख़्याल में नहीं.

अगर आर्थिक बंदिशों और बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने की बात करें तो मायावती का उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन पाना राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही लिहाज़ से कहीं ज़्यादा इंक़लाबी बदलाव था.

इनकी दो वजहें हैं. मायावती ग्रासरूट से ऊपर आईं. उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक ढाँचे को चुनौती और शिकस्त दी, जहाँ दलित, सरकार बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक तो थे लेकिन उनके लिए ख़ुद सरकार बनाने का सपना देखना सिर्फ़ संविधान की धाराओं तक सीमित था.

दूसरी तरफ़ मीरा कुमार एक ऐसे पिता के घर ज़रूर पैदा हुईं जो दलित थे लेकिन उस शख़्स ने भारतीय राजनीति में जो मुक़ाम हासिल किया वह किसी भी वर्ग से संबंध रखने वाले कम ही राजनीतिज्ञ हासिल कर पाए हैं.

राजनीति के मैदान में बाबू जगजीवन राम का नाम इज़्ज़त से लिया जाता है. वे पुराने कांग्रेसी थे, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक भी. 1946 में वे जवाहर लाल नेहरू की संविदा सरकार में सबसे कम उम्र में मंत्री बने और 1980 तक तक़रीबन लगातार केंद्रीय मंत्री रहे. पचास साल संसद में रहे और इंमरजेंसी के बाद देश के उप प्रधानमंत्री बने.

यह तो हुई बाबू जगजीवन राम की बात लेकिन ख़ुद मीरा कुमार का बैकग्राऊंड क्या है?

वे 1973 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुईं. कई देशों में राजनयिक रहीं. दिल्ली और जयपुर के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में पढ़ीं. उन्हें राइफ़ल शूटिंग का शौक है. उनके पति सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं और 2009 में मीरा कुमार के पास क़रीब 10 करोड़ रुपए की संपत्ति है.

तो क्या वाक़ई मीरा कुमार का यह शानदार सफ़र दबे-कुचले दलित समाज की क़ामयाबी है. शायद इस वजह से नहीं कि वे जगजीवन राम की बेटी हैं.

जिस शख़्स ने इतनी सियासी ऊँचाइयों को छुआ हो उसकी बेटी के लिए लोकसभा का अध्यक्ष बनना एक बड़ा सम्मान ज़रूर है लेकिन यह किसी आम दलित महिला का ग़ैर मामूली सफ़र नहीं जैसा कि दिखाया जा रहा है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:48 IST, 04 जून 2009 Shailesh "Anarakshit":

    सुहैल साहब, मीडिया से मेरा अनुरोध है कि कृपया ऐसे लोगों को दलित कहना छोड़ दीजिए. ये दलित होने के नाम पर बस फ़ायदा उठाते हैं. इनका दलितों से कोई लेना0देना नहीं है. दलितों का समग्र विकास इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि ऐसे स्वर्ण दलित अब उनका हक़ मार रहे हैं. दलितों में एक ऐसा वर्ग पैदा हो चुका है जो इसका फ़ायदा बार-बार उठा रहा है.

  • 2. 09:15 IST, 04 जून 2009 संदीप भट्ट:

    सटीक विश्‍लेषण.

  • 3. 09:45 IST, 04 जून 2009 sarjana chaturvedi:

    मीरा कुमार का लोकसभा अध्यक्ष बनने से महिलाओं की बढ़ती सफलताओं में इज़ाफ़ा तो हुआ है मगर वे आम दलित महिलाओं के लिए क्या करेंगी यह देखना दिलचस्प होगा.

  • 4. 10:19 IST, 04 जून 2009 vijaay kant:

    बिल्कुल सही कहा आपने.

  • 5. 14:39 IST, 04 जून 2009 Sandeep Mahato:

    सुहैल जी, मीरा कुमार के बारे में कुछ अज्ञात जानकारी और मीडिया में किए जा रहे तथाकथित गुणगान के लिए धन्यवाद. यह बाकई बहुत ख़राब है. आज का मीडिया निष्पक्ष नहीं रह गया है और वह किसी घटना का केवल एक ही पक्ष दिखा रहा है. निष्पक्ष ख़बरें देने के लिए बीबीसी का धन्यवाद. अब मीरा कुमार के ज़िम्मेदारी भरे पद पर विराजमान हैं. वे किसी तरह निष्पक्ष फ़ैसले करती हैं, वही उन्हें महान बनाएगा. उन्हें लोकसभा में सदस्यों के व्यवहार पर अंकुश लगाना चाहिए जो लोकसभा की कार्यवाही ठीक से चलाने में बाधा पैदा करते हैं.

  • 6. 14:45 IST, 04 जून 2009 ram baran yadonv:

    मीरा क्या कांग्रेस के और जितने भी दलित, पिछड़े और मुस्लिम चेहरे हैं, सब प्रतिकात्मक हैं. जनता को भी पता है कि यह कांग्रेस की नौटकी से ज़्यादा कुछ नहीं है लेकिन दुख इस बात का है कि मीडिया अपना दायित्व ठीक से नहीं निभाता है, पक्षपात करता है.

  • 7. 14:57 IST, 04 जून 2009 piyush:

    आपका विश्लेषण कुछ ठीकठाक है. मुझे लगता है कि उनके पास जो ऊर्जा है उससे वे और ऊँचाई पर जा सकती हैं. इतिहास में याद रखे जाने के लिए उन्हें और ज़िम्मेदारी और कांग्रेस कार्यकर्ता से ऊपर उठकर काम करना होगा. उनका लोकसभा का अध्यक्ष होना ऐतिहासिक है.

  • 8. 15:06 IST, 04 जून 2009 Archana Bharti,Muzaffarpur:

    लोकसभाध्यक्ष जैसे गरिमामय पद पर पहली बार किसी दलित महिला का होना हमारे देश के लिए गर्व की बात है. यह आम और ख़ासकर आम दलित महिलाओं के लिए प्रेरणादायक क़दम साबित हो सकता है.

  • 9. 15:19 IST, 04 जून 2009 himmat singh bhati:

    यह कहना ग़लत भी नहीं होगा कि जब दलित के लिए हर जगह सुविधा मिली हुई है तो भारत में दलित रहने ही नहीं चाहिए. सच में दलितों का दलिया दलितों ने ही बना कर दलितों को दलित बनाए रखा है क्योंकि दलितों में जो शिक्षित हैं, पैसे वाले हैं और जागरूक हैं वे ही लगातार फ़ायदा उठा रहे हैं. इसे दलितों और सरकार की लापरवाही कहना ज़्यादा उचित होगा जबकि होना यह चाहिए की जिस दलित की दरिद्रता दूर हो गई है उसे लाभ नहीं मिलना चाहिए.

  • 10. 15:41 IST, 04 जून 2009 SHABBIR KHANNA:

    सुहैल हलीम साहब आपने जो लिखा है वह सौ फ़ीसदी सही है. जिस दलित नेता के पास 10 करोड़ की संपत्ति हो वह क्या ग़रीब का दर्द महसूस करेगी. दुख इस बात का है कि आज भी महान भारत में दलित के नाम से क्यों किसी समुदाय को पुकारा जाता है. यह सोचना की किसी दलित के लोकसभा अध्यक्ष बन जाने से कोई बदलाव आएगा, यह भारत की जनता की भूल होगी. आपने जितना सच बताया है उतना तो हम जानते हैं लेकिन बीबीसी ने आजतक मीरा की संपत्ति का विवरण नहीं दिया है. सच लिखने के लिए शुक्रिया. क्यों न कांग्रेस सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाकर इतिहास रच दे, राष्ट्रपति महिला, प्रधानमंत्री महिला और लोकसभा अध्यक्ष महिला. मीरा कुमार को लोकसभा का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने केवट वोट पाने की कोशिश की है.

  • 11. 15:55 IST, 04 जून 2009 mukesh kumar , deoghar:

    मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बनाना दलित वर्ग के लिए शुभ संकेत है. दलित वर्ग की महिलाएँ घर का चाहरदीवारी तक ही सीमित रहती हैं. अब दलित वर्ग में चेतना और हर चीज को नए ढंग से सोचने-समझने की बुद्धि विकसित होगी.

  • 12. 20:00 IST, 04 जून 2009 इलमान खान:

    इसमें कोई शक नहीं कि एक आला कांग्रेसी खानदान की होने की वजह से मीरा कुमार आज स्पीकर बन पाईं. अगर आप दलित की बात करे तो मध्यप्रदेश या किसी दूसरे राज्य में जाकर देखें. दलित महिलाएं सिर्फ उपभोग का एक माध्यम समझी जाती है.लोकसभा का स्पीकर बनना तो दूर की बात है.

  • 13. 04:13 IST, 05 जून 2009 MOHIT RAJ DUBEY(JOURNALIST):

    मीरा कुमार का लोकसभा अध्यक्ष बनना वाकई दलित समाज के लिए एक बानगी है. लेकिन हम किस दलित समाज की बात कर रहे है. जिसे दो वक्त की रोटी भी ठीक से नसीब नहीं होती, जिसे समाज में अभी तक बराबर का हक़ नहीं मिला या उसकी जो सोने का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ है. इन सभी बातों पर हमारे समाज को आत्ममंथन और आत्मचिंतन करने की बेहद ज़रूरत है कि हमने किस मीरा को लोकसभा की कमान सौंपी है.

  • 14. 05:50 IST, 05 जून 2009 Devkumar pukhraj ,hyderabad:

    मीरा कुमार को दलित कहकर महिमामंडित करना ठीक नहीं है.क्या दलित परिवार में जन्म लेने भर से मीरा दलित हो गयीं ,शायद नहीं. उनकी शिक्षा-दीक्षा और परवरिश एक संभ्रात परिवार के बच्चे की तरह हुई. शादी के लिए भी उन्होंने गैर दलित को चुना .उनके पति मंजुल कुमार खुद अन्य पिछड़ी जाति के एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं.फिर मीरा दलित कैसे रहीं. दलितों को देखना है तो खुद मीरा के पैतृक गांव आरा के चंदवा चले जाइए. दलित की परिभाषा समझ में आ जाएगी.

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