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ख़बर पैदा करने का सही तरीक़ा

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وسعت اللہ خان | बुधवार, 15 अप्रैल 2009, 14:40 IST

आज सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी जैसे ज़िम्मेदार चैनलों समेत बहुत से भारतीय चैनलों पर यह ख़बर चल रही थी- " नई दिल्ली के इंडियन इटरनेशनल सेंटर में पाकिस्तान के पत्रकारों पर राम सेना के नौजवानों का हमला, हालात पर क़ाबू करने के लिए पुलिस तलब."

मैं भी इस सेमिनार में भाग ले रहे ढाई सौ लोगों में मौजूद था, जो भारत-पाकिस्तान में अंधराष्ट्रभक्ति की सोच बढ़ाने में मीडिया की भूमिका के मौजू पर जानी-मानी लेखिका अरुंधति राय, हिंदुस्तान टाइम्स के अमित बरुआ, मेल टुडे के भारत भूषण और पाकिस्तान के रहीमुल्ला युसुफ़जई और वीना सरवर समेत कई वक्ताओं को सुनने आए थे.

जो वाक़या राई के दाने से पहाड़ बना वह बस इतना था कि रहीमुल्ला युसुफ़जई पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी मीडिया के ग़ैर ज़िम्मेदराना रवैए का तुलनात्मक जायज़ा पेश कर रहे थे तो तीन नौजवानों ने पाकिस्तान के बारे में नारा लगाया.

प्रबंधकों ने उनको हाल से बाहर निकाल दिया. बस फिर क्या था जो कैमरे सेमिनार की कार्रवाई फ़िल्मा रहे थे वे सब के सब बाहर आ गए और उन नौजवानों की प्रबंधकों से हल्की-फुल्की हाथापाई को फ़िल्माया और साउंड बाइट के तौर पर उन नौजवानों के इंटरव्यू लिए.

प्रबंधकों ने एहतियात के तौर पर पुलिस के पाँच-छह सिपाहियों को हाल के बाहर खड़ा कर दिया.
सेमिनार की कार्रवाई इसके बाद डेढ़ घंटे तक जारी रही. सवाल-जवाब का लंबा सेशन हुआ.

ढाई सौ लोगों का लंच हुआ लेकिन चैनलों को मिर्च-मसाला मिल चुका था. इसलिए उनकी नज़र में सेमिनार तो गया भाड़ में, ख़बर यह बनी कि पाकिस्तानी पत्रकारों पर नौजवानों का हमला.

फिर यह ख़बर सरहद पार पाकिस्तानी चैनलों ने भी उठा ली और पेशावर में मेरी बीवी तक भी पहुँच गई. उसने फ़ोन करके कहा, आप ख़ैरियत से तो हैं. कोई चोट तो नहीं लगी.

जब मैंने कहा इस वाकए का कोई वजूद ही नहीं है तो कहने लगी आप मेरा दिल रखने के लिए झूठ बोल रहे हैं.

अब मैं यह बात किससे कहूँ कि जिसे कल तक पत्रकारिता कहा जाता था. आज वह बंदर के हाथ का उस्तरा बन चुकी है और ऐसे माहौल में भारत-पाकिस्तान में जिंगोइज़्म यानी कि अंधराष्ट्रभक्ति बढ़ाने में मीडिया की भूमिका की बात करना ऐसा ही है कि अंधे के आगे रोए, अपने नैन खोए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:10 IST, 15 अप्रैल 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    आपने फिर वही काम किया सब को एक साथ लपेट लिया (भारत और पाक मीडिया को). शायद आप को पता नहीं भारतीय मीडिया को आजकल धर्मनिर्पेक्षता को बढ़ावा देने का भूत सवार है, इसलिए वो तुरंत सभी ऐसे मुद्दों को पकड़ कर उछाल देते हैं. सभी को एक तरह से देखने का आपका तरीक़ा सरासर ग़लत है. वह अंधराष्ट्रभक्ति नहीं बल्कि भारतीय नौजवान बुद्धिजीवियों के शब्दों में अंधसेकुलरिज़्म या बीमार धर्मनिर्पेक्षता है.

  • 2. 15:18 IST, 15 अप्रैल 2009 तेजपाल सिंह हंसपाल:

    बंदर के हाथ का उस्तरा बन रही पत्रकारिता के नियंत्रण के लिए अब एक मैकेनिज़्म की आवश्यकता महसूस होने लगी है. पर सवाल ये उठता है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

  • 3. 15:39 IST, 15 अप्रैल 2009 Narendra Shekhawat:

    आप जैसे पत्रकार होनें चाहिएं. मैं आपकी प्रशंसा करता हूं.

  • 4. 15:58 IST, 15 अप्रैल 2009 Daya Shankar Singh:

    हाँ, भारत के टीवी न्यूज़ चैनल बक्वास करते हैं.

  • 5. 16:39 IST, 15 अप्रैल 2009 Tapesh TYAGI:

    मुझे आप का ब्लॉग पढ़ कर काफ़ी ख़ुशी हुई. मेरे विचार से सरकार को ऐसे लोगों के लिए एक क़ानून बनाना चाहिए जो अपना कारोबार चमकाने के लिए ऐसे न्यूज़ चैनल चलाते हैं.

  • 6. 17:07 IST, 15 अप्रैल 2009 Sanjay Sharma:

    वसतुल्लाह भाई, आपने एकदम सही रग पकड़ी है. आज का मीडिया एक ऐसा जंगली भैंसा बन चुका है जो कहीं भी लाल कपड़ा देख कर दौड़ पड़ता है. टीआरपी (TRP) की होड़ ने पत्रकारिता की आत्मा को मार दिया है.

  • 7. 17:36 IST, 15 अप्रैल 2009 T. S. Kehwar:

    मैं ख़ान साहब से पूरी तरह समहत हूँ. ये एक तथ्य है कि मीडिया बहुत ही ग़ैरज़िम्मेदार हो चुका है, वह समाज और मानवता के प्रति अपना दायित्व भूल चुका है.

  • 8. 17:42 IST, 15 अप्रैल 2009 javed:

    सर, आप सच कहते हैं. इन दिनों मीडिया राजनेताओं और चरमपंथियों का खिलौना बन चुका है. अंधराष्ट्रवाद मीडिया में ताज़ा ताज़ा आया है. वास्तव में मीडिया स्थानीय नेताओं की तरह है. जैसे नेता स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं ठीक उसी तरह टीआरपी बढ़ाने और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए मीडिया कुछ भी करने को तैयार है.

  • 9. 18:18 IST, 15 अप्रैल 2009 anjani kumar:

    सर, कृपया आप इसे इस रूप में देखिए कि यहां पर इस तरह की घटनाओं को हिंदूवादी संगठनों को बदनाम करने के लिए तूल दिया जाता है.

  • 10. 01:42 IST, 16 अप्रैल 2009 Rakesh K. Mathur:

    नौजवान पत्रकारों का आजकल यही हाल है. आजकल इस माध्यम को अनुभव और अनुभुति के आधार पर बनी विश्लेषण की नहीं बस एक पत्नी की मसालेदार टिप्पणी की आवश्यक्ता है. बहरहाल भविष्य के बारे में हम फिर भी आशावादी हैं.

  • 11. 03:56 IST, 16 अप्रैल 2009 ashok kumar rana:

    टीआरपी की इस अंधी दौड़ में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया अपना मूलभूत दायित्व भूल गए हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ के बिना मानों उनका अस्तित्व ही नहीं है. उन्हें झूठ ही जनतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. ये लोग तो मीडिया हाउस के सिर्फ़ ग़ुलाम हैं. उनकी देशभक्ति की परीक्षा तो 26/11 में ही होगई.

  • 12. 05:29 IST, 16 अप्रैल 2009 shivratan vyas:

    ये बात बिल्कुल सही है और उसके साथ सटीक भी. आजकल ख़बरें ऐसे बनाई जाती हैं. सच बात पाठकों के सामने लाने के लिए धन्यवाद.

  • 13. 05:33 IST, 16 अप्रैल 2009 Chander Tolani:

    पहले तो आप को बधाई कि आपने इस विषय में लिखा. इतनी बेबाकी से कोई और शायद ही लिख पाता, ख़ासकर ऐसे में जबकि आप ख़ुद एक पत्रकार हैं. टीवी चैनलों में ख़बरें दिखाने की जल्दबाज़ी में कुछ का कुछ दिखा दिया जाता है. कल भी एक बड़े हिंदी न्यूज़ चैनल ने सलमान ख़ान पर चुनाव प्रचार में एक लड़के के ज़रिए हमले की बात कही पर बाद में साफ़ हुआ कि वह लड़का तो सलमान का बचाव कर रहा था.

  • 14. 05:38 IST, 16 अप्रैल 2009 Hanfi:

    देखा, कितना ज़िम्मेदार है हमारा मीडिया!

  • 15. 06:18 IST, 16 अप्रैल 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    काश! आप जैसे संतुलित लोगों की आवाज़ मुख्यधरा का मीडिया भी सुने और सुनाये. लेकिन उसे तो अपनी टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ से फ़ुरसत मिले तब तो वह ऐसा करें.

  • 16. 06:48 IST, 16 अप्रैल 2009 Ronny Yadav:

    बहुत दिनों बाद एक पत्रकार से मुलाक़ात हुई. साहब ये सीएनएन और एनडीटीवी वाले मुनाफ़ा ख़ोर पत्रकार नहीं हैं, बीबीसी में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें टीआरपी के लिए काम करना पड़ता है. लेकिन आप जैसे ईमानदार लोग आगे नहीं आएंगे तो कल पत्रकारों की भी वही हैसियत होगी जो हमारे देश में पुलिस और नेताओं की है.

  • 17. 06:52 IST, 16 अप्रैल 2009 kuldeep koshta:

    मैं आप के विचार से सहमत हूँ. मीडिया का हाल ये है कि जहां किसी ने कहा कि कौवा कान ले गया तो वे कान को देखे बिना कौवे के पीछे दौड़ पड़ते हैं.

  • 18. 07:32 IST, 16 अप्रैल 2009 Abhay Sahay:

    आज का न्यूज़ चैनल हमें ज़हर पिला रहा है और हम जाने अनजाने इसे पी रहे हैं क्योंकि हम न्यूज़ देखने के भूखे हैं. एक ही बात को ये न्यूज़ चैनल 8-10 बार कहते हैं. ऐसे में ग़लत भी सही लगने लगता है, उस कहावत की तरह कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच हो जाता है. मुझे तो न्यूज़ चैनल से घृणा होने लगी है.

  • 19. 08:13 IST, 16 अप्रैल 2009 Mukesh Sakarwal:

    बहुत अच्छा काम किया है आपने, ख़ास तौर से इसलिए भी की आप ही उसके चश्मदीद गवाह भी हैं और इस के बारे में आपसे बेहतर और कौन कह सकता है. आपने किसी का भी पक्ष नहीं लिया है और निशाना सीधा लगाया है. मैं समाचार देखना पसंद करता था लेकिन पिछले दस वर्षों में टीआरपी के चक्कर में और न्यूज़ कंपनी और संवाददाताओं के निजी लाभ के लिए इसमें काफ़ी गिरावट आई है. हर आदमी केंद्र में रहना चाहता है उन्हें इससे मतलब नहीं है कि वे क्या दिखा रहे हैं और इसका समाज पर क्या असर पड़ रहा है.

  • 20. 08:52 IST, 16 अप्रैल 2009 Mayank Tyagi:

    मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूं और ये विश्वास रखता हूं कि आप ऐसे ही निष्पक्ष हो कर ब्लॉग लिख कर इस अंधेर नगरी में उजाला करते रहेंगे. हो सकता है कि आपको देखकर कुछ और लोगों को भी अक़ल आए और वे इस बात को समझें कि मीडिया जिसे हम लोकतांत्रिक देश का चौथा स्तंभ मानते हैं वो आज धूल में मिल रही है.

  • 21. 09:10 IST, 16 अप्रैल 2009 Deepak Verma:

    ख़ान साहब, वैसे तो मैंने आपके काफ़ी लेख पढ़े हैं लेकिन एक दिन आपका लेख 'आख़िर रसोइया क्या करे' पढ़ा तो मैं आपका फ़ैन हो गया. मैं आपका वेदप्रताप वेदिक, अकबर जैसे पत्रकारों की तरह दिल से सम्मान करता हूँ और मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूं. आज भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो बिल्कुल बकवास हो गई है, ये हर तरह से गिर चुकी है, मैंने आरु‏षि कांड को टीवी पर देखने के बाद इनसे नफ़रत करने लागा हूं और अपना केबल कटवा दिया है. हम सबको इनका बॉयकॉट कर देना चाहिए जबतक सरकार इनके लिए कोई आचार संहिता नहीं बनाती.

  • 22. 09:52 IST, 16 अप्रैल 2009 Abdul Wahid:

    भाई जवाब नहीं. मै खुद भी एक टीवी पत्रकार हूँ. लेकिन पत्रकारिता बनाम बाज़ारवाद और न जाने कितने वादों से आहत हूँ. कभी कभी तो मेरा दम घुटने लगता है. वास्तविकता यह है कि योग्य पत्रकार पूँजीवादी अर्थव्यव्स्था में धरातल से रसातल में चला गया है. कुछ लुभावने और मनमोहक चेहरों से काम चलाया जा रहा है. ऐसे वातावरण में आप क्या आशा कर सकते हैं.

  • 23. 10:06 IST, 16 अप्रैल 2009 Mohd Alamgir:

    भारतीय मीडिया केवल टीआरपी के लिए कुछ भी बोल और दिखा देता है. जैसे इंडिया टीवी केवल साँप बिच्छू और प्रलय ही दिखाता है. उसकी हर ख़बर विशेष ही होती है. बाटला हाउस एनकाउंटर में ही मीडिया वालों का सच सामने आ गया था. सच क्या है उसे जानते हुए भी सच को नहीं दिखा रहे थे. मीडिया वाले भी पुलिस और सरकार से डरते हैं.

  • 24. 10:48 IST, 16 अप्रैल 2009 sanjeev sharma:

    भारत का टीवी मीडिया हर मायने में ग़ैर ज़िम्मेदार है.

  • 25. 11:06 IST, 16 अप्रैल 2009 Shailesh Sharma:

    खान साहब, आपने आज दुखती रग पर हाथ रख दिया. एनडीटीवी, आईबीएन-7 जैसे चैनल भी आब मुनाफ़ाखोर हो गए हैं. एकतरफ़ा खबरें देने लगे हैं. बिक चुके हैं इलैक्ट्रॉनिक मीडिया. एब तो प्रिंट मीडिया से ही उम्मीद बची है.

  • 26. 11:52 IST, 16 अप्रैल 2009 sanjeev kumar:

    खान साहब, मैं आपके हर ब्लॉग को पढ़ता हूँ. आपकी बात हमारे दिल को छू जाती है. लगता है कि पत्रकारिता का जो मक़सद होना चाहिए वो अब रहा नहीं और अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ये लोग ख़ास करके भारत के सारे चैनल काम करने में लगे रहते हैं. आप जैसे वरिष्ठ समझदार लोगों को सरकार से मिल कर कुछ मापदंड बनानी चाहिए नहीं तो पत्रकारिता का मतलब ही ग़लत हो जाएगा.

  • 27. 12:09 IST, 16 अप्रैल 2009 Ashok:

    मैं मानता हूँ कि आज हमारे देश का जो बुरा हाल है उसके ज़िम्मेदार आज ये सारे समाचार चैनल हैं क्योंकि मीडिया ही लोगों को जैसा दिखाएगा वो वैसा ही देख कर सोचेंगे. मीडिया को अपनी सही ज़िम्मेदारी समझने की ज़रूरत है न कि अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने की.

  • 28. 12:43 IST, 16 अप्रैल 2009 जितेंद्र वाघ:

    बहुत खूब वसतुल्लाह साहब, लेकिन सही कहूं तो आपका लेख पढ़ने से कहीं ज़्यादा मज़ा आपके निराले अंदाज़ में आपकी रिपोर्टर की चिट्ठी सुनने में आता है. एक निष्पक्ष पत्रकार, वाकई ढूंढे नहीं मिलता आज, सिवाय बीबीसी के.

  • 29. 12:44 IST, 16 अप्रैल 2009 Rajan:

    आपका बहुत शुक्रिया. मुझे बड़ी हैरानी है आपका ब्लॉग पढ़कर लेकिन उससे ज़्यादा हैरानी हुई यह देखकर कि ये बीबीसी पर है. मतलब अभी कुछ लोग मीडिया में हैं ज़मीर वाले लेकिन हिंदुस्तान में एक भी नहीं बचा. आज नेता और पुलिस से ज़्यादा भ्रष्टाचार मीडिया में है . हर किसी को पैसा चाहिए. चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए क्या बोलते हैं और कैसे बोलते हैं कुछ अहसास नहीं है. मैं आपकी ईमानदारी की तहेदिल से कद्र करता हूँ. मुझे मालूम है अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता पर कम से कम हमें अपने ज़मीर के आगे शर्मिंदा नहीं होना पड़ता.

  • 30. 13:05 IST, 16 अप्रैल 2009 dashrath singh:

    वाह आज मुझे एक सच्चे पत्रकार का लेख पढ़ने को मिला है. नफ़रत के सैलाब में मोहब्बत का पैग़ाम मिला है. आप जैसे पत्रकार मिल जाएं तो दुनिया में शांति छा जाएगी और धर्म से बढ़ कर इंसानियत हो जाएगी. आप जैसे लोगों को बुद्धिजीवी कहने में मुझे फ़ख़्र महसूस हुआ. सर, माफ़ करें, मेरे पास आपकी क़ाबिलियत की तारीफ़ के लिए शब्द नहीं हैं.

  • 31. 13:19 IST, 16 अप्रैल 2009 govind goyal, sriganganagar:

    तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाना हमें बहुत आता है और बहुत भाता भी है.

  • 32. 13:47 IST, 16 अप्रैल 2009 NARENDRA SHARMA:

    कभी मैं भी पत्रकार बनना चाहता था लेकिन आज की पत्रकारिता से चिढ़ हो गई है. आजकल के पत्रकार पैसे के भूखे और देश के दुश्मन हैं. जब पाकिस्तान यूरोप से हॉकी में जीतता है तो मैं खुश होता हूँ जैसे हम जीते. एक बात कहूँ, ..हिंदी पाकिस्तानी भाई भाई क्योंकि और कोई भाई हो ही नहीं सकता. सोचना होगा हम सबको इस बारे में. आपका बेइंतेहा शुक्रिया.

  • 33. 14:33 IST, 16 अप्रैल 2009 prashant:

    आपको पढ़ कर सोचने पर मजबूर हुआ कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता.

  • 34. 14:54 IST, 16 अप्रैल 2009 pradeep singh:

    बिलकुल सही कहा आपने.

  • 35. 14:55 IST, 16 अप्रैल 2009 pradeep singh:

    सही कहा आपने कि पत्रकारिता से ज़िम्मेदारी गायब होती जा रही है. ख़ास कर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से. उनको तो सिर्फ़ मसाला चाहिए.

  • 36. 15:11 IST, 16 अप्रैल 2009 sharma:

    मीडिया कभी गरीब का दर्द नहीं दिखाता. उन्हें तो अरबपतियों-करोड़पतियों की खबर ही दिखती हैं जैसे सोनिया गाँधी. वह जूता चप्पल की बात करते हैं लेकिन गरीब बच्चों की शिक्षा के बारे में कोई खबर नहीं दिखाते.

  • 37. 15:59 IST, 16 अप्रैल 2009 Ramprakash meel:

    वुसतुल्ला जी, आपको पढ़ा, यह सही है कि भारत हो या पाकिस्तान, दोनों तरफ़ ही मीडिया ऐसे लोगों के कब्ज़े में है जिन्हें इन देशों की असली समस्या पर बात करने की बजाय एक दूसरे के देश को गालियाँ निकालना आसान लगता है. वो मानते हैं कि ऐसा करने से वो सच्चे राष्ट्रभक्त बन जाते हैं. इन्हें कौन सदबुद्धि देगा. ये सबसे बड़ा सवाल है.

  • 38. 16:15 IST, 16 अप्रैल 2009 maneesh kumar sinha:

    आप यहाँ क्या कर रहे हैं? आप स्वात में अपने समाज की ओर से चलाए जा रहे तालेबानी और चरमपंथी शिविरों के बारे में बात करने की हिम्मत क्यों नहीं करते.

  • 39. 16:55 IST, 16 अप्रैल 2009 Archana Bharti:

    सर, आपका कहना बिलकुल सही है. आज का मीडिया राजनेताओं के हाथ का खिलौना बन चुका है. उनमें वस्तुनिष्ठा की कमी हो गई है. ये जो भी हो रहा है बहुत ग़लत हो रहा है जिसके कारण मीडिया का ग़लत असर समाज पर पड़ रहा है. मीडिया के लोग एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में ऐसा काम कर रहे हैं. मीडिया के सिद्धांत और नियमों को तो भूल चुके हैं. ऐसे मीडियाकर्मी के कारण मीडिया बदनाम हो रहा है.

  • 40. 17:17 IST, 16 अप्रैल 2009 KHALID NAJMI JALKAURVI:

    वुसतुल्ला भाई, उर्दू रेडियों में आपका मशहूर कार्यक्रम बात से बात हो, हम बहुत पसंद करते हैं जो सच्चाई और हक़ीक़त पर आधारित होता है. लेकिन आज जो वाकई हुआ वो भी आज की पत्रकारिता की तल्ख़ हक़ीक़त का पता देती है. सिर्फ़ सबसे तेज बनने के लिए असल चीज़ छूट जाती है. जिसे हम पत्रकारों को सीखने की ज़रूरत है. आज की पत्रकारिता का हाल यह है कि ख़ुदकुशी करने वाला कैमरे के सामने ख़ुदकुशी कर रहा है और लोग बचाने की बजाय फ़िल्म बनाने में मशगूल हैं. शायद समाज को उसूल सिखाने वालों को भी उसूल सिखाने की ज़रूरत आ पड़ी है.

  • 41. 19:01 IST, 16 अप्रैल 2009 आर्य:

    ये बात बिलकुल सही कही आपने. आजकल टीवी और समाचार पत्र बिलकुल बेकार हो गए हैं.
    हर कोई अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहा है. पैसे और नाम कमाने के लिए अधिकतर पत्रकार कुछ भी करने को तैयार हैं. अब पत्रकार जन-हित की नहीं सोचते, केवल अपने हित की ही सोचते हैं.

  • 42. 19:09 IST, 16 अप्रैल 2009 दीपक शर्मा:

    आपने बिल्कुल सही बात कही है. लोगो को पता है कि कुछ भी ,अर्थविहीन या अनाप-शनाप करो, जैसे कैमरे के सामने जूते फ़ेंको, फिर आपको हिट करने के लिये सनसनी खोजने वाला मीडिया तो है ही ! मगर बुनियादी प्रश्न यह है कि दिखाने वाला है इसीलिये कोई देखता है या कोई देखना चाहता है इसलिये दिखाने वाला है. असल में इसके पीछे आम लोगों की मांग है ...इसी कारण जर्नालिज़्म का कैपिटलिज़्म हो रहा है!

  • 43. 19:17 IST, 16 अप्रैल 2009 satish shama:

    निष्पक्ष खबरें लोगों के सामने ज़्यादा संख्या में आनी चाहिए.

  • 44. 19:48 IST, 16 अप्रैल 2009 Sanjay Shah:

    जी हाँ, खान साहब, मैं आपकी बातों से बिलकुल सहमत हूँ. कुछ मीडिया वाले राई का पहाड़ बनाने में माहिर हैं. लेकिन ये यह नहीं समझते कि इसका प्रभाव क्या होगा. जैसे कि आपने कहा कि आपने अपनी बीवी को फ़ोन करके बताया कि आप ख़ैरियत से हैं लेकिन उनको यकीं नहीं हुआ...यही वो वजह है जो दिलों में नफ़रत की चिंगारी भरती है. ये मीडियावाले कुछ भाईचारा, कुछ दूरियों को दूर करने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं. मीडिया वालों, अभी भी कुछ अच्छा करो. पहले तो नेताओं की वजह से 2/3 टुकड़े हो चुके हैं हिंदुस्तान के...पता नहीं तुम्हारे रवैये से इस मुल्क़ के कितने टुकड़े होंगे.

  • 45. 06:08 IST, 17 अप्रैल 2009 vishal gupta:

    यह बिलकुल सच है कि आजकल मीडिया समाज को जोड़ने नहीं बल्कि तोड़ने का काम कर रहा है. इसपर रोक लगनी चाहिए. इसके लिए हमें भी कुछ प्रयास करने चाहिए जैसे मीडिया के लोगों के साथ बातचीत की जाए.

  • 46. 06:38 IST, 17 अप्रैल 2009 tanzir ansar:

    शायद इसीलिए पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है. और इसमें भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की विश्वसनीयता पर सबसे ज़्यादा सवाल उठ रहे हैं. टीआरपी की अंधी दौड़ और कुछ नया परोसने की जल्दबाज़ी ने इसे आम आदमी के सरोकार से अलग कर दिया है. देखते हैं कि यह सब कब तक बर्दाश्त किया जाएगा.

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