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बीबीसी की ट्रेन और चुनाव

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सुशील झा सुशील झा | शनिवार, 25 अप्रैल 2009, 07:18 IST

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क्या भारत के आम चुनाव और ट्रेन के बीच कोई संबंध है? मेरे हिसाब से है... अगर आप चुनाव की कवरेज करने का कोई अलग अंदाज़ सोच रहे हैं तो....

सस्ती उड़ानों और बसों के बावजूद आज भी भारत के आम लोगों की एक बड़ी संख्या ट्रेनों से सफ़र करती है और भारतीय रेल पूरे देश को जोड़ती तो है ही.

तो फिर चलिए मेरे साथ बीबीसी के चुनावी सफ़र पर जो ट्रेन के ज़रिए तय किया जाएगा.

25 अप्रैल से बीबीसी चुनाव एक्सप्रेस ट्रेन चल रही है दिल्ली से और 13 मई तक भारत के विभिन्न राज्यों का सफ़र तय करेगी -- अहमदाबाद, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर, कोलकाता, पटना और इलाहाबाद होते हुए .....

मैं इसी ट्रेन पर अगले 20 दिन रहूँगा. खाना-पीना-सोना-जगना सबकुछ होगा ट्रेन पर और कोशिश होगी आपके लिए चुनावों और भारतीय जनमानस की एक छवि पेश करने की.

अब कुछ इस यात्रा और अपने बारे में बताता चलूं. यात्रा ज़ाहिर है लंबी होगी और मुलाक़ातें होंगी न केवल आम लोगों से बल्कि नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों से भी.....और होंगे अनेक सवाल...

रेल से मुझे प्यार है और मेरे पत्रकार बनने की कहानी में रेल से जुड़ा एक हादसा भी है. क़रीब 11 साल पहले जब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान के साक्षात्कार के लिए जमशेदपुर से ट्रेन में चढ़ा तो मेरे पास टिकट था लेकिन बर्थ नहीं थी. भीड़ तो थी, लेकिन ये तो आम बात है.

एक सीट पर हम तीन दोस्त थे. एक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ता था और दूसरा एक अन्य साक्षात्कार देने दिल्ली जा रहा था. मुगलसराय स्टेशन के पास जब टीटी साहब चढ़े तो हमने बड़ी मिन्नतें की कि एक सीट दे दी जाए.....

अनुनय विनय के बाद उन्होंने तीन सौ रुपए लिए और हमें पांच डिब्बों के बाद छठे में जाने को कहा.टिकट पर एक सीट नंबर भी लिख दिया गया. जब हम वहां पहुँचे तो पता चला कि उस पर पहले से कोई सोया था और उसकी टिकट पर भी नंबर लिखा हुआ था.

हम दोनों के बीच अभी सीट को लेकर लड़ाई शुरु हुई थी कि अगला स्टेशन आया और तीसरे सज्जन आए जिन्होंने कहा कि सीट उनकी है. इसी स्टेशन पर नए टीटी साहब आए और पूरा माजरा जानने के बाद स्पष्ट किया कि हमें उनकी बिरादरी के दूसरे टीटी साहब ने ठग लिया है.

खैर मूर्ख हम बने और एक सीट पर तीन लोग सोते हुए आए और आख़िरकार पत्रकार बन गए.

लेकिन इस यात्रा में सीट का झंझट नहीं है..... हाँ कुछ तनाव और उत्सुकता ज़रुर है कि आपके लिए रोचक और चुनावी तस्वीर स्पष्ट करने वाली क्या-क्या कहानियां लाएँ.....

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:00 IST, 25 अप्रैल 2009 Rabindra Chauhan:

    सुशील झा साहब, आपकी इस यात्रा में हम भी शामिल हैं आपके साथ. आप निडर होकर यात्रा में आनेवाली बाधाओं के बारे में रिपोर्ट करें. ज़ाहिर है तरह तरह के लोगों से तो मुलाक़ात होगी ही. मेरे ख़याल से चुनाव को छोड़ कर बहुत सारे मुद्दे सामने आएंगे पर आपको तो दिए गए फ़ार्मेट में ही काम करना है. इस तरह के प्रयोग बीबीसी में ज़्यादा होते रहते हैं जो काफ़ी दिलचस्प भी होते हैं. हम आपकी सफल यात्रा की कामना करते हैं.

  • 2. 13:26 IST, 25 अप्रैल 2009 Iqbal Fazli, Asansol (WB):

    अच्छा होता कि यह छोटे शहरों और कस्बों में भी रुकती. जैसे मैं आसनसोल के पास रहता हूँ और जब ट्रेन कोलकाता से पटना की ओर निकलेगी, यह आसनसोल होकर ही जाएगी लेकिन रुकेगी नहीं. क्या इस बारे में कुछ हो सकता है.

  • 3. 17:27 IST, 25 अप्रैल 2009 bhupendra :

    यह बहुत अच्छी शुरुआत है. उम्मीद है कि हमें इस चुनावी गहमागहमी में नेताओं के बयानों से इतर कुछ अच्छा पढ़ने को मिलेगा. आपकी रिपोर्ट के ज़रिए हमें इस देश के बारे में और जानकारियां हासिल होगी, जिससे हम अभी तक शायद महरूम रहे हों. हम आपकी यात्रा के साथ हैं. आपकी यात्रा मंगलमय हो....

  • 4. 18:16 IST, 25 अप्रैल 2009 anuj kumar gupta:

    काश मैं भी आपके साथ होता!

  • 5. 20:34 IST, 25 अप्रैल 2009 अश्‍वनी कुमार निगम:

    बीबीसी का यह प्रयास सराहनीय है लेकिन दिक्कत यह है कि बीबीसी की यह इलेक्शन ट्रेन इतने देर में क्यों शुरू की गई. दो चरण के मतदान हो चुके हैं. जिन राज्यों में इलेक्शन हो चुके हैं वहां अब इसको लेकर जनता में क्रेज नहीं रहेगा. अच्छा होता अगर आप लोग इसे प्रथम चरण के चुनाव के पहले ही इस ट्रेन को चलाते. शिकायत सिर्फ इतनी है कि लोकतंत्र के महापर्व को कवर करने में बीबीसी इतना लेट क्यों हो गया.

  • 6. 20:42 IST, 25 अप्रैल 2009 पृथ्‍वी :

    अच्‍छा और सराहनीय प्रयास. यात्राएं तो वैसे भी जीवन को नयी दिशा और सोच देती हैं. आप लोगों की यह यात्रा बीबीसी के सभी पाठकों/श्रोताओं के लिए ज्ञानवर्धक होगी, यह अपेक्षा है. आपकी यात्रा शुभ और सुखद हो...

  • 7. 02:25 IST, 26 अप्रैल 2009 neetu budhiraja:

    सर, मैने अपनी जिंदगी में ऐसी ट्रेन के बारे में पहली बार सुना है..और फोटोग्राफ़्स को देखकर तो ये बेहद ही उत्साह है..सुशील जी आप उन खुशनसीब लोगों में से एक हैं जो व्यकितगत तौर पर इस तरह का अनुभव ले रहे है..औऱ इन सबसे ये एक बार फिर साबित होता है कि बीबीसी आज भी सर्वोपरि है..

  • 8. 03:25 IST, 26 अप्रैल 2009 Sushil Mishra:

    सुशील जी आपका काम निश्चित रूप से चुनौतियों भरा है. हम आपके सफल यात्रा की कामना करते है। बीबीसी का यह प्रयास काबिले तारीफ है और निश्चित रूप से भगवान आपकी मदद करेगा। भारतीय चैनलो में ऐसा कुछ नहीं बचा है जो सुनने लायक और देखने लायक हो।

  • 9. 03:53 IST, 26 अप्रैल 2009 rajiv kumar :

    हस सब आपके साथ हैं. मुझे लगता है कि आप बेहतर काम करेंगे. हम आपके अगले ब्लॉग का इंतज़ार कर रहे हैं.

  • 10. 09:49 IST, 26 अप्रैल 2009 Rakesh From SRM UBIVERSITY:

    यह देश के मतदाताओं के लिए बहुत अच्छा है. अगर यह ट्रेन छोटे कस्बों में भी जाती तो इस यात्रा में बहुत से स्टार और जुड़ जाते.

  • 11. 10:37 IST, 26 अप्रैल 2009 Mohammad Saleem:

    सुशील जी ने बिलकुल ठीक कहा. भारतीय चैनलों में वास्तव में कुछ नहीं बचा सिवाय जिन्गोइज्म के. बीबीसी भी एक हिंदी टीवी चैनल शुरू कर दे तो कितना अच्छा हो.

  • 12. 12:07 IST, 26 अप्रैल 2009 MD. AAMIR EQUBAL:

    सुशील जी, बीबीसी की ट्रेन में हमें भी शामिल करने के लिए हमारा धन्यवाद. हम आपको कोशी, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा के इलाके में आने के लिए आमंत्रित करते हैं. जहां पिछले दिनों भयंकर बाढ़ की विभीषिका को झेलना पड़ा. हम आपके स्वागत में खड़े हैं. क्या यह संभव हैं?

  • 13. 13:09 IST, 26 अप्रैल 2009 Prem Verma:

    बधाई हो. इस यात्रा का विचार बहुत अच्छा है. मैंने आपका शेड्यूल देखा है. लेकिन आपकी इस परिक्रमा में मध्यप्रदेश का स्थान नहीं है. आप कह सकते हैं कि देश के सभी राज्यों को कवर नहीं किया जा सकता है. मध्यप्रदेश के साथ ऐसा हमेशा होता है. लेकिन साथ ही मैं यह भी जानता हूँ कि मध्यप्रदेश शांतिपूर्ण राज्य है और आपको यहाँ कोई बूथ कैप्चरिंग या अपराधों की ख़बर नहीं मिलेगी. मुझे मालूम है कि आपका यहाँ न आना यहाँ की शांति की कीमत है. एकबार हमारे उर्दू एनाउंसर रज़ा अली आब्दी ने कहा था कि जहाँ कोई खबर नहीं है, यही सबसे अच्छी खबर है. लेकिन मैं जानता हूँ कि मध्यप्रदेश का स्टोरी बनाने का रिकॉर्ड बहुत खराब है. इसलिए मैं बीबीसी की ट्रेन से यह कैसे उम्मीद कर सकता हूँ कि वह मेरे राज्य में आए. वाकई मुझे बहुत ख़राब लगा है. मेरी समस्या यह है कि मैं शांति और बीबीसी दोनों को चाहता हूँ. जबकि दुर्भाग्य से दोनों की दिशाएं अलग अलग हैं. ख़ैर, शुभयात्रा!

  • 14. 06:03 IST, 27 अप्रैल 2009 NARENDRA SHARMA:

    आपने भी नए पत्रकारों की तरह लगता है एसी ट्रेन चुनी है. ग्यारह साल पहले की तरह अब भी सामान्य ट्रेन से जाते तो भारत को और चुनाव को अच्छे से जान पाते. क्या कोई भविष्यवाणी एसी ट्रेन से हो सकेगी?

  • 15. 17:49 IST, 27 अप्रैल 2009 दिवाकर झा:

    इस तरह की यात्रा के बारे में मैं भी पहली बार ही सुन रहा हूं....मुझे आपसे जलन भी हो रही है...कि काश मैं भी इस यात्रा पर होता....और लोगों की तरह मुझे भी बीबीसी से शिकायत है कि ..ये यात्रा इतनी लेट क्यों शुरु हुई है...खैर आशा करते है कि आप नई-नई जानकारियां लेकर लैटेंगे...हमारी ढेर सारी शुभकामनाएं...
    हां एक बात और कि इस लेख को पढकर आपकी रोचक यात्रा के बारे में भी जाना....

  • 16. 11:46 IST, 01 मई 2009 Sunita Kumari:

    बीबीसी का यह चुनावी सफर अपने-आप में अनोखा है। शायद और किसी ने ऐसा प्रयास नहीं किया है. बीबीसी का लोगों के बीच जाके आम लोगों से रू-ब-रू होना और उनकी राय को सबके बीच लाना कि आखिर जनता कैसी सरकार चाहती है और यह सबसे ज्यादा महत्वपूणॆ है.आपकी यात्रा मंगलमय हो.

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