अगर मैं प्रधानमंत्री होता
स्कूल के दिनों में निबंध लिखने को जो विषय दिए जाते थे वे अक्सर बेहद उबाऊ होते थे. इनमें से एक होता था, 'यदि मैं प्रधानमंत्री होता....'
बचपन में ये कभी समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री होने पर क्या करना पड़ता है और क्या किया जा सकता था. तो अंत में ये होता था कि गुरुजी अपनी मर्जी का एक निबंध लिखवा देते और ज़्यादातर बच्चे उसे रटकर परीक्षा में पास होने का जुगाड़ करते थे.
लेकिन अब कुछ चीज़ें समझ में आती हैं. क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की एक सूची मन में हर वक़्त रहती है. शायद हर सोचने विचारने वाले व्यक्ति के मन में ऐसा होता होगा.
जब यूपीए सरकार की दूसरी पारी के भी तीन साल बीत गए और मीडिया में आकलन की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई तब लगा कि अपने साथियों से ही पूछा जाए कि वे क्या सोचते हैं.
मैंने अपने साथियों से अलग-अलग पूछा कि पिछले आठ वर्षों से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं अगर वे मनमोहन सिंह की जगह होते तो क्या करते और क्या नहीं करते?
जो जवाब आए, उन्हें पिरोकर देखें तो यूपीए सरकार और मनमोहन सिंह के कार्यकाल की एक तस्वीर उभरती है. आप भी एक नज़र डालिए. बस, इतनी सी इल्तजा है कि ध्यान में रखिएगा कि ये ब्लॉग मेरे नाम से प्रकाशित हो रहा है लेकिन इस बार विचार उधार के हैं...
दस चीज़ें जो मैं करता (या नहीं करता) अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता...
1. मनमोहन सिंह बहुत पढ़े लिखे और समझदार व्यक्ति हैं. वे सब कुछ समझते हैं. अगर मैं उनकी जगह होता तो कम से कम अपने निर्णय ख़ुद लेता. किसी के इशारे पर नहीं चलता. इस अनिर्णय की स्थिति से ये हो गई है कि पिछले आठ वर्षों में ऐसा एक भी निर्णय याद नहीं आता जो मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में लिया हो. नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने लिखा था कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को भले ही 'फ़र्स्ट अमंग इक्वल्स' हों लेकिन वो होते अव्वल ही हैं. निर्णय लेने में उनसे आगे कोई नहीं होता. लेकिन मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अव्वल नहीं दिखते.
2. मैं प्रधानमंत्री की जगह होता तो लोकप्रियता और गठबंधन की राजनीति में सहन करने की एक सीमा तय करके रखता. याद है जब 2008 में अमरीका से परमाणु समझौते का मुद्दा आया था तो कैसे उन्होंने कैसे अपनी सरकार और अपने प्रधानमंत्रित्व सब कुछ को दाँव पर लगा दिया था. समझ में नहीं आता कि एफ़डीआई से लेकर रेल का भाड़ा बढ़ाए जाने तक दर्जनों और मुद्दों पर वे क्यों समझौता करते चलते हैं. मैं होता तो एक सीमा के बाद इस्तीफ़ा दे देता. मुझे लगता है कि ये सीमा पार हो चुकी है.
3. मुझे याद आता है कि वर्ष 2004 में जब प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण दिया था तो उन्होंने संस्थागत सुधारों की बात कही थी. वह मूल रूप से नौकरशाही में सुधार की बात थी. जिसमें कलेक्टर, एपी जैसे अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल देना जैसी बात शामिल थी. उन्होंने कुछ शुरुआत तो की लेकिन नौकरशाही ने आगे कुछ करने नहीं दिया. नतीजा ये है कि आज सरकार गर्त में दिखती है और नौकरशाह मज़े में. मैं होता तो नौकरशाही के विरोध के बावजूद सुधार कार्यक्रम को नहीं छोड़ता. आख़िर देश तो नौकरशाही ही चलाती है. वह जवाबदेह क्यों न बने.
4. मुझे तो प्रधानमंत्री का 1992 का भाषण याद आता है जब वित्तमंत्री के रुप में आर्थिक सुधार की शुरुआत करते हुए मनमोहन सिंह ने महात्मा गांधी का उद्धरण देते हुए कहा था कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं वह समाज के आखिरी आदमी के लिए है. आज जब वे प्रधानमंत्री के रूप में आठ साल पूरा कर रहे हैं तो यह देखना पीड़ादायक लगता है कि उनकी अध्यक्षता में चलने वाले योजना आयोग तो कभी हर रोज़ 26 रुपए कमाने वाला ग़रीब नज़र नहीं आता तो कभी उनकी सरकार को ये लगता है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लोगों की ख़रीदने की क्षमता बढ़ गई है. मैं होता तो ग़रीबी और महंगाई को लेकर ऐसी हास्यास्पद स्थिति तो कम से कम नहीं बनने देता.
5. मैंने मनमोहन सिंह को हमेशा एक अर्थशास्त्री की तरह देखा है. समझ में नहीं आता कि एक समय भारत को संकट से उबारकर आर्थिक उदारता के दौर में लाने वाले मनमोहन सिंह वामपंथी दलों के इतने दवाब में कैसे आ जाते हैं कि आर्थिक सुधार की पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती है. मैं उनकी जगह होता तो उसी अर्थशास्त्री की तरह काम करता रहता.
6. मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो देश में जगह-जगह अनाज तो सड़ने नहीं देता. उनके भंडारण की बेहतर व्यवस्था करता और जमाखोरी को ख़त्म करने के लिए कड़े क़दम उठाता. मैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ख़त्म कर देता और ज़रुरतमंदों को सीधे नक़द राशि देने का इंतज़ाम करता और अनाज का आवंटन हर उस व्यक्ति के लिए होता, जिसे उसकी ज़रुरत है. उसके लिए आय आदि की कोई सीमा नहीं होती.
7. इस समय दुनिया में राजनीतिक पुनर्ध्रुवीकरण की एक प्रक्रिया चल रही है. रूस और चीन एक साथ आते दिख रहे हैं और उनके नेतृत्व में सऊदी अरब के विरोधी इस्लामिक देश जैसे ईरान, सीरिया और लेबनान एक साथ आते दिख रहे हैं. ऐसे में अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो अपनी पूरी विदेश नीति को अमरीका की ओर न मोड़कर दूसरे देशों के साथ काम करने की एक गुंजाइश बचाए रखता है. शायद इससे आने वाले दिनों में, आने वाली पीढ़ियों की मुश्किलें कम हो जातीं.
8. अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो वर्ष 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के ख़िलाफ़ वोट नहीं देता. इस एक निर्णय की वजह से ईरान ने भारत के साथ 21 अरब डॉलर का गैस समझौता ख़त्म कर दिया. इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को जैसा नुक़सान हुआ वह अपूरणीय है. मैं ऐसा कोई क़दम नहीं उठाता.
9. मैं इस प्रधानमंत्री की जगह होता तो अन्ना हज़ारे को कभी गिरफ़्तार नहीं करवाता क्योंकि इसकी कोई वजह नहीं थी. मैं रामदेव के अनशन के दौरान आधी रात को आंसू गैस के गोले छोड़कर मैदान भी खाली नहीं करवाता. अगर ज़रुरी ही होता तो यह काम दिन में करवाया जा सकता था. क्या होता अगर भीड़ हिंसक हो जाती...क्या गोलियाँ भी चलतीं. एक लोकतांत्रिक देश में ये तरीक़ा ठीक नहीं है.
10. अगर मैं अपने आपको उनकी जगह रखकर सोचता हूँ कि लगता है कि मैं कम से कम इतना चुप तो नहीं रहता. ये ज़माना बराक ओबामा जैसे नेताओं का है, सोशल मीडिया का है. मैं उनकी जगह होता तो जनता से सीधे संवाद की कोशिश करता और फ़ेसबुक, ट्विटर आदि का ख़ूब प्रयोग करता.
ये तो रही साथियों की राय.
मैं ख़ुद इतनी गहरी बातें नहीं सोच पाता. लेकिन ये ज़रुर सोचता हूँ कि अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो कभी कभी हँसता, मुस्कुराता और कभी दुखी होकर आँसू भी बहाता. चाहे जो करना पड़ता मैं इस सपाट चेहरे से निजात पाता.
लेकिन साहबान क्या किया जाए कि मनमोहन सिंह की जगह कोई हो नहीं सकता. न मैं न मेरे साथी. फिर भी सोचिए कि अगर आप होते तो क्या करते?